Thursday, February 19, 2026

धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि

 डॉ धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि


विवेक रंजन श्रीवास्तव


धर्मवीर भारती के लेखन में व्यंग्य उनकी संवेदना के भीतर घुली हुई वह कसक है जो करुणा, नैतिक बेचैनी और उनके लेखन में ऐतिहासिक दृष्टि के साथ मिलकर प्रकट होती है। वे हँसाने वाले व्यंग्यकार नहीं हैं बल्कि मुस्कान के भीतर छिपी हुई पीड़ा दिखाने वाले रचनाकार हैं। उनके नाटक , उपन्यास , कविता में व्यंग्य पात्रों की सहज अभिव्यक्ति से पाठक की अंतरात्मा को कुरेदता है।


उनका काव्य नाटक अंधा युग इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। महाभारत के युद्ध के बाद की कथा के माध्यम से उन्होंने आधुनिक मनुष्य के नैतिक अंधेरे, सत्ता की क्रूरता और विजेताओं की खोखली विजय पर ऐसा व्यंग्य किया है जो सीधे किसी व्यक्ति पर नहीं पूरी सभ्यता पर लक्षित है। उनके ये प्रयोग किसी नितांत व्यंग्य का टैग लगाए आज की कई रचनाओं से अधिक प्रभावी हैं ।

उनकी अभिव्यक्ति में धृतराष्ट्र का अंधापन केवल शारीरिक नहीं रह जाता वह सत्ता में बैठे हर उस व्यक्ति का प्रतीक बन जाता है जो सच जानते हुए भी उसे देखना नहीं चाहता। उदाहरण स्वरूप नाटक में धृतराष्ट्र का संवाद "मैंने कुछ नहीं देखा कुछ नहीं सुना" आधुनिक शासकों की जानबूझकर की अज्ञानता पर तीखा व्यंग्य है जो युद्ध की विभीषिका को नजर अंदाज कर सत्ता की भूलभुलैया में भटकते हैं। गांधारी का क्षोभ और अश्वत्थामा का अंध प्रतिशोध आधुनिक राजनीतिक वर्गों की मानसिकता को उघाड़ते हैं जहाँ एक अन्य पंक्ति "विजय तो हुई पर मनुष्य कहाँ बचा" विजेताओं के खोखले दंभ पर प्रहार करती है। 


उनके उपन्यास गुनाहों का देवता में भी व्यंग्य सामाजिक संरचनाओं पर है। स्वयं उपन्यास के नाम में ही व्यंग्य का कंट्रास्ट दिखता है। यह कृति प्रेमकथा का उपन्यास मानी जाती है किन्तु, इसमें व्यंग्य अंतर्निहित है। प्रेम के नाम पर त्याग का महिमामंडन करने वाला समाज स्वयं प्रेम से डरता है। चंदर और सुधा के संबंधों की विवशताएँ पाठक को द्रवित करती हैं पर साथ ही यह प्रश्न भी उठाती हैं कि क्या हमारी नैतिकता वास्तव में मानवीय है या केवल सामाजिक सुविधा है। एक उदाहरण है चंदर का वह अंतर्मन जहाँ वह सोचता है "प्रेम तो देवत्व है पर समाज इसे गुनाह बना देता है" जो प्रेम को पवित्र बताकर त्याग थोपने वाली सामाजिक मान्यताओं पर सूक्ष्म व्यंग्य है। दूसरा उदाहरण सुधा का विवाह बिंदु है जहाँ प्रेम का बलिदान सामाजिक सम्मान के नाम पर मजबूर किया जाता है यह दर्शाते हुए कि हिन्दू समाज नारी को देवी बनाकर उसी के गुनाहों का देवता कैसे थोप देता है। यहाँ व्यंग्य खुलकर नहीं बोलता बल्कि परिस्थितियों की विडंबना में स्वतः उभरता है।


डॉ भारती की कविताओं विशेषकर कनुप्रिया में भी पारंपरिक प्रेम आख्यानों पर एक सूक्ष्म पुनर्पाठ दिखाई देता है। राधा का स्वर कहीं कहीं उस पुरुष केंद्रित मिथकीय संरचना पर प्रश्न करता हुआ प्रतीत होता है जिसने स्त्री को प्रतीक्षा और विरह की मूर्ति बनाकर स्थापित किया। कनुप्रिया नारी के अंतर्मन की परतें खोलती है जहाँ सुख के क्षणों में घिर आने वाली निर्व्याख्या उदासी और विप्र लब्धा रस की पीड़ा को सौंदर्यपूर्ण ढंग से व्यक्त करती है। यह व्यंग्य आक्रामक नहीं आत्म संवादी है। ठंडा लोहा संग्रह में शहर की उदासीनता अकेलेपन और मूल्य क्षय पर प्रतीकात्मक व्यंग्य है । जैसे मेरी दुखती हुई रगों पर ठंडा लोहा रखना उस व्यवस्था का प्रतीक है जो संवेदनशीलता पर कठोरता चढ़ाती है । 


पत्रकार और संपादक के रूप में जब वे धर्मयुग का संचालन कर रहे थे तब उनके संपादकीय लेखों में सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर संयत किन्तु तीक्ष्ण टिप्पणी मिलती है। वे शोर नहीं मचाते पर शब्दों के बीच ऐसी रिक्ति छोड़ते हैं जहाँ पाठक स्वयं व्यवस्था की विडंबना पहचान लेता है। धर्मयुग के माध्यम से उन्होंने नई पीढ़ी को विसंगति पहचानने की संवेदना दी।


उनके व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह व्यक्ति विरोधी नहीं स्थिति विरोधी है। उसमें क्रोध कम नैतिक पीड़ा अधिक है। वे उपहास नहीं करते बल्कि यह दिखाते हैं कि मनुष्य अपनी ही बनाई संरचनाओं में कैसे फँस गया है। इसलिए उनका व्यंग्य समय के साथ पुराना नहीं पड़ता क्योंकि वह किसी घटना पर नहीं मनुष्य की प्रवृत्ति पर केंद्रित है।


धर्मवीर भारती को पढ़ते हुए लगता है कि व्यंग्य तब सबसे प्रभावी होता है जब वह हँसी पैदा न करे बल्कि भीतर एक असुविधाजनक चुप्पी छोड़ जाए। वही चुप्पी उनकी रचनाओं की वास्तविक शक्ति है और वही उन्हें केवल साहित्यकार नहीं अपने समय का आत्मद्रष्टा बनाती है।

एक प्रसंग डॉ पुष्पा भारती के संस्मरण पढ़ने में मिला , रागदरबारी का प्रारंभिक लेखन श्रीलाल शुक्ल जी ने डॉ 

धर्मवीर भारती के मुंबई के जुहू वाले समुद्र किनारे के फ्लैट में ही किया था। 

पुष्पा जी ने लिखा है, " मुंबई शहर के छोर पर महासागर से अभिप्रेरित ही रागदरबारी की पहली पंक्तियां हैं - महानगर के छोर से ही भारत में देहात का महासागर प्रारंभ हो जाता है...


तो जिन धर्मवीर भारती जी के घर में ही व्यंग्य का राग दरबार उपजा हो , उनके लेखन में व्यंग्य स्वाभाविक रूप से घुला होना स्वाभाविक ही है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Saturday, February 14, 2026

प्रेमचन्द के साहित्य में व्यंग्य

 प्रेमचंद के साहित्य में निहित व्यंग्य


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

ए 233 ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी जे के रोड भोपाल 462023


कथा सम्राट का व्यंग्यबोध


मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६) हिंदी साहित्य के इतिहास में एक युगप्रवर्तक रचनाकार के रूप में स्थापित हुए हैं। उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता आदर्शोन्मुख यथार्थवाद रहा, जिसके अंतर्गत उन्होंने भारतीय समाज के यथार्थ चित्रण के साथ-साथ उसमें सकारात्मक परिवर्तन की रचनाएं की हैं , जो क्रिएटिव हिंदी कथा साहित्य की धरोहर है। उनकी रचनाओं में व्यंग्य की एक अंतर्निहित सशक्त धारा विद्यमान है, जो सामाजिक कुरीतियों, राजनीतिक विसंगतियों, धार्मिक पाखंड और मानवीय दुर्बलताओं पर करारी चोट करती दिखती है।


प्रेमचंद का सम्पूर्ण साहित्य 1906 से 1936 के बीच लिखा गया, जो उस दौर का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक दस्तावेज है। 

प्रेमचंद के लेखन की विशेषता यह है कि वह कटु और आक्रामक होने के बजाय रचनात्मक और सकारात्मक है, जिसका उद्देश्य पाठक की विवेकशीलता को जगाना और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणा देना है। इस हेतु उन्होंने व्यंग्य के उपालंभों का खूबसूरत उपयोग किया है।


व्यंग्य का सैद्धांतिक आधार और प्रेमचंदीय लेखन...


व्यंग्य साहित्य की वह विधा है जो विडंबना, कटाक्ष और हास्य के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक विसंगतियों पर प्रहार करती है। प्रेमचंद के साहित्य में व्यंग्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और नैतिक जागरण का माध्यम बना है।


प्रेमचंद के व्यंग्य के प्रमुख लक्ष्यों में धार्मिक आडंबर, सामंती मानसिकता, नौकरशाही भ्रष्टाचार, पूँजीवादी शोषण, जातिगत भेदभाव और स्त्री के प्रति अन्याय पर सतत प्रहार शामिल हैं। उन्होंने अपने व्यंग्य प्रयोग से किसी व्यक्ति विशेष के बजाय पूरी सामाजिक व्यवस्था और मानसिकता पर केंद्रित लेखन किया है।


धार्मिक आडंबर और पाखंड पर व्यंग्य ..


प्रेमचंद के साहित्य में धार्मिक अनुष्ठानों और धर्मगुरुओं के पाखंड पर करारा व्यंग्य मिलता है। उनके विचार में धर्म मनुष्य की आंतरिक नैतिकता और सामाजिक समरसता का मार्गदर्शक होना चाहिए, बाहरी दिखावा नहीं।


प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'सवा सेर गेहूँ' में एक ब्राह्मण पंडित और कुम्हार के माध्यम से धार्मिक पाखंड, छुआछूत और जातिगत भेदभाव पर गहरा प्रहार किया गया है। पंडित का चरित्र उन तथाकथित धर्माचार्यों का प्रतीक है, जो धर्म को स्वार्थ सिद्धि का साधन बना लेते हैं।


इसी प्रकार 'मंदिर और मस्जिद' कहानी में सांप्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता पर जबर्दस्त व्यंग्य है। दरवेश का कथन कि "मंदिर और मस्जिद तो ईंधन-पत्थर के ढेर हैं, असली ईश्वर तो तुम्हारे हृदय में बसता है" धर्म की वास्तविक भावना को उजागर करता है।


नौकरशाही और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर व्यंग्य ..


प्रेमचंद के साहित्य में तत्कालीन ब्रिटिश शासन और नौकरशाही तंत्र पर भी जमकर व्यंग्य किया गया है। उनकी रचनाओं में अधिकारियों के ढुलमुल व्यवहार, रिश्वतखोरी और जनता के प्रति उदासीनता का मार्मिक चित्रण मिलता है।


'नमक का दरोगा' कहानी हिंदी साहित्य में नौकरशाही पर व्यंग्य की क्लासिक कहानी मानी जाती है। इस कहानी का नायक वंशीधर एक ईमानदार नमक इंपेक्टर है, जो रिश्वत लेने से इनकार कर देता है। कहानी का अंत इस व्यंग्य के साथ होता है कि पूँजीपति वर्ग अंततः ईमानदारी का उपयोग अपने हितों की रक्षा के लिए ही करता है। यह सब आज भी प्रासंगिक लगता है।


प्रेमचंद की 'ओझा' कहानी में न्यायिक व्यवस्था पर जबर्दस्त व्यंग्य कटाक्ष है। इस कहानी में वकीलों को "ओझा" कहकर संबोधित किया गया है, जो उनके समकाल का अंधविश्वास और ढोंग से जुड़ा शब्द है। प्रेमचंद लिखते हैं "ये ओझा लोग न्याय की देवी के पुजारी हैं, इनकी पूजा-अर्चना किए बिना न्याय की देवी प्रसन्न नहीं होती।"


आर्थिक शोषण और सामंतवाद पर व्यंग्य ..


प्रेमचंद के साहित्य में आर्थिक विषमता और सामंतवादी शोषण पर गहरा व्यंग्य पठनीय है। उनके उपन्यास 'गोदान', 'रंगभूमि' और 'प्रेमाश्रम' में किसान जीवन की त्रासदी और पूँजीवादी शोषण का मार्मिक चित्रण है।


'गोदान' प्रेमचंद का सर्वाधिक चर्चित उपन्यास है, जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक संबंधों का यथार्थ चित्रण है। इस उपन्यास का नायक होरी एक गरीब किसान है, जो अपने छोटे से खेत में जीवनयापन करता है, किन्तु कर्ज़ और लगान के बोझ तले दबकर अंततः उसकी मृत्यु हो जाती है।


इसी तरह 'पूस की रात' कहानी में किसान जीवन की विवशता और शोषण पर मार्मिक व्यंग्य है। कहानी का नायक हाल्कू एक गरीब किसान है, जिसके पास रात में ओढ़ने के लिए कंबल नहीं है। इस कहानी में हल्कू का कुत्ता कर्मरत और भोला प्राणी है, जिसके अपने मालिक के साथ सहयोग और वफादारी का संबंध प्रस्तुत किया गया है। यह चित्रण मानवीय संबंधों की कटुता और सामंती व्यवस्था की क्रूरता पर गहरा व्यंग्य है।


स्त्री-पुरुष असमानता और पितृसत्ता पर व्यंग्य...


प्रेमचंद के साहित्य में तब की स्त्री जीवन की व्यथा और पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर तीक्ष्ण व्यंग्य मिलता है। उन्होंने दहेज प्रथा, विधवा विवाह निषेध, स्त्री शिक्षा का अभाव, बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों पर कटाक्ष किया है।


'निर्मला' उपन्यास में दहेज प्रथा और अनमेल विवाह पर करारा व्यंग्य है। निर्मला एक सुशिक्षित और सुंदर युवती है, जिसका विवाह एक वृद्ध विधुर के साथ कर दिया जाता है। इस अनमेल विवाह के कारण निर्मला का जीवन नर्क बन जाता है और अंततः वह आत्महत्या कर लेती है।


'बड़े घर की बेटी' कहानी में प्रेमचंद ने स्त्री शिक्षा और नारी स्वतंत्रता पर बल दिया है। कहानी की नायिका बेनी एक उच्च कुल की लड़की है, जो शिक्षित और स्वतंत्रचेता है। इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद ने उन उच्च कुलीन परिवारों पर व्यंग्य किया है, जो दिखावटी शिष्टता और रूढ़िवादिता में जकड़े हुए हैं।


प्रेमचंद के व्यंग्य की साहित्यिक विशेषताएँ...


प्रेमचंद के व्यंग्य की कुछ विशिष्ट साहित्यिक विशेषताएँ हैं, जो उनके साहित्य को विशिष्ट और प्रभावशाली बनाती हैं...


चरित्र चित्रण की यथार्थपरकता..


प्रेमचंद के व्यंग्य की पहली विशेषता है चरित्र चित्रण की यथार्थपरकता है। उनके व्यंग्य प्रयोग में लालित्य है। वे व्यंग्य को मूल कहानी के अभिव्यति के एक उपकरण के रूप में उपयोग करते हैं। उन्होंने आजकल प्रचलित स्वतंत्र व्यंग्य लेख की तरह नहीं लिखा । उनके कथा पात्र जीवंत और सहज हैं, जो अपने व्यवहार और वाणी के माध्यम से स्वयं ही व्यंग्य प्रस्तुत कर देते हैं। उदाहरण के लिए, 'शतरंज के खिलाड़ी' कहानी में मिर्ज़ा सज्जाद अली और मीर रौशन अली का चरित्र नवाबी शानोशौकत और आलस्य का प्रतीक है।


भाषा शैली की सहजता और प्रवाह ..


प्रेमचंद के व्यंग्य की दूसरी विशेषता है भाषा शैली की सहजता और प्रवाह। उनकी भाषा सरल, बोधगम्य और जनसामान्य की भाषा है, जिसमें मुहावरों और लोकोक्तियों का सुंदर प्रयोग है। उदाहरण के लिए, 'कफन' कहानी में घीसू और माधव का चित्रण गरीबी और अकर्मण्यता का प्रतीक है।


हास्य और व्यंग्य का सन्तुलन...


प्रेमचंद के व्यंग्य की तीसरी विशेषता है हास्य और व्यंग्य का सन्तुलन। उनके व्यंग्य में कटुता नहीं है, बल्कि विनोदी स्वर में गंभीर बात कही गई है। उदाहरण के लिए, 'बूढ़ी काकी' कहानी में बूढ़ी विधवा की उपेक्षा और अनादर का चित्रण है।


नैतिकता और मानवीय मूल्यों का समर्थन..


प्रेमचंद के व्यंग्य की चौथी विशेषता है नैतिकता और मानवीय मूल्यों का समर्थन। उनका व्यंग्य नकारात्मक आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि सकारात्मक मूल्यों की स्थापना की ओर उन्मुख है। उदाहरण के लिए, 'ईदगाह' कहानी में हामिद का चरित्र मानवीय संबंधों की महत्ता को उजागर करता है। यह कारुणिक कहानी है।


प्रेमचंद के व्यंग्य की सार्वकालिक प्रासंगिकता..


मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में निहित व्यंग्य एक सशक्त सामाजिक हस्तक्षेप है, जो रूढ़िवादिता, अन्याय और शोषण के विरुद्ध खड़ा होता है। उनका व्यंग्य नैतिक चेतना और सामाजिक दायित्व से अनुप्राणित है, जिसका उद्देश्य मनुष्य के आंतरिक परिवर्तन के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देना है।


प्रेमचंद का साहित्यिक दृष्टिकोण सर्वहारा वर्ग के प्रति सहानुभूति और शोषक वर्ग के प्रति विरोध से परिभाषित होता है। उन्होंने गरीबों, किसानों, मजदूरों और स्त्रियों की व्यथा को अपने साहित्य का विषय बनाया और उनके अधिकारों और गरिमा के लिए आवाज उठाई।


प्रेमचंद की साहित्यिक विरासत आज भी प्रगतिशील जनवादी साहित्य के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई है। आज के भौतिकवादी युग में, जब नैतिक मूल्य और मानवीय संबंध तेजी से क्षरित हो रहे हैं, प्रेमचंद का साहित्य हमें आत्ममंथन और सामाजिक सुधार की प्रेरणा देता है। प्रेमचंद के शब्दों में "साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का मार्गदर्शन करना है।" और उनका व्यंग्य इस उद्देश्य की पूर्ति का एक सशक्त माध्यम है। वर्तमान व्यंग्यकार प्रेमचंद के लेखन में व्यंग्य प्रयोग के अध्ययन से बहुत कुछ सीख सकते हैं। 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

इन दिनों दुबई में

सानू की

 व्यंग्य 


सानू की — सभ्यता का नया राग


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


सानू की , मतलब मुझे क्या , आग लगे बस्ती में मस्त रहो मस्ती में। 


 जमाना अब किसी भी गंभीर चीज से नहीं, बस आरामदेह अनासक्ति से चलता है। पहले लोग सच को आवाज़ देते थे, जमाने की चिंता में मरा जाता था, अब कहते हैं “सानू की”। यह एक वाक्य नहीं, यह आज के मनुष्य की आत्मा का नया घोषणापत्र है। युद्ध हो, महामारी हो, या किसी देश का मलबा ही क्यों न बन जाए ,  जब तक हमारी सेल्फी ठीक आ रही है, तब तक दुनिया सुरक्षित है।  

कहीं कोई देश धधक रहा है, बच्चे शरणार्थी शिविरों में भूख से तड़प रहे हैं, महिलाएँ सुरक्षा की कगार पर भी असुरक्षित हैं ,  मगर हमारे लिए यह सब बस “ग्लोबल न्यूज़” है। हम थोड़ी देर हेडलाइन देखेंगे, फिर रिमोट फेक देंगे, क्योंकि इस हालत से “सानू की”! हमारे फ्रिज में कोल्ड ड्रिंक है, नेटफ्लिक्स पर नया शो है, और ट्वीट्स पोस्ट करने के लिए फ्री वाई-फाई है।   राजनीति की दुनिया में नेता भाषणों से झाग उड़ा रहे हैं, संसद में आवाज़ें उठती हैं और जल्द ही मोबाइल की रीलों में घुल जाती हैं। जनता के हिस्से में जो रह जाता है, वह है “सानू की” की मानसिक शांति। अब किसी का खून सस्ता है, किसी का झूठ अमूल्य, और किसी की संवेदना ‘डाटा लिमिट’ से बंधी हुई। विपक्ष हो या सत्ताधारी ,  दोनों के बीच एक अद्भुत एकता है कि जनता को उदासीन बनाकर रखा जाए। और जनता ने भी यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई है । सड़क पर बड़े से बड़ा हादसा हो जाए , उसे अनदेखा कर निकल लेना जमाने की रफ्तार में मज़बूरी है,“सानू की” ।समाज की हालत ऐसी हो गई है कि हर अन्याय, हर अपराध पर उतनी ही प्रतिक्रिया होती है जितनी एक विज्ञापन पर  थोड़ी देर में “स्किप ऐड”।   स्त्रियों के प्रति हिंसा बढ़ती है, तो कहा जाता है — “क्या कर सकते हैं, अगले ही क्षण सानू की!” ब्रेन रिसेट कर देता है ।दलितों के साथ अत्याचार होता है, तो कहा जाता है , “कहीं न कहीं तो होता ही रहेगा।” पिछड़ों के हक पर राजनीति की बोली बाज़ार में बिकी जा रही है, और हर दर्शक सोचता है, “अरे भाई, सानू की, मैं तो सभ्य नागरिक हूँ।”  

अब यह “सभ्यता” किसी संवेदना से नहीं, बल्कि सुविधा से मापी जाती है। किसी ने कहा था, “मनुष्य सामाजिक प्राणी है।” पर आज वह “सोशल मीडिया प्राणी” बन गया है। वह दूसरों की तकलीफ़ पर ‘लाइक’ कर साथ  देता है, सैडी इमोशन ढूंढता है मोमबत्ती जलाने से पहले सेल्फी लेता है, और किसी शहीद की ख़बर पर कमेंट लिखता है — “Respect!”, क्योंकि यही डिजिटल युग का नया शोकगीत है  छोटा, चुस्त, और भावनाशून्य। साहित्य भी अब इस गहरी नींद में सोया हुआ है। पहले लेखक समाज की नब्ज़ पकड़ता था, अब इंटरनेट की भाषा पकड़ता है। जो लिखेगा वही छपेगा, जो छपेगा वही बिकेगा  और जो बिकेगा, वही पुरस्कार पाएगा। जो न बिके, वह “सनातन काल का महान लेखक” घोषित कर दिया जाएगा पर मरने के बाद।  

ए आई की इबारत में लोगों के लिखने की शैली गुम हो गई है। पर एक्सप्रेशन में सुविधा कहती है, सानू की। 

 साहित्यिक सभाओं में अब शब्द नहीं, ‘नेटवर्किंग’ है। पुरस्कार अब प्रतिभा नहीं, सेटिंग से तय होते हैं। जो सही लिखे वह किनारे, जो सही लोगों को सलाम करे वो सितारे। चोरी भी अब सम्मान है ,बस उसे “इंटरटेक्स्चुअल इंफ्लुएंस” कह दीजिए। अगर किसी ने सवाल कर दिया तो तैयार रखिए जवाब, “सानू की?”  

 मीडिया पहले चौथा स्तंभ था, अब चौथी दीवार बन गया है , जिसके उस पार सच्चाई नहीं दिखती, बस प्रायोजित रोशनी झिलमिलाती है। बहसें मंचित नाटक बन गई हैं जहाँ हर किरदार अपनी चीख के लिए टाइम स्लॉट तय करता है। बीच में कोई दर्शक चैनल बदल देता है , “सानू की, सब तो एक जैसे हैं।” यही है इस शो के निर्देशक का सपना, दर्शक का जीवित रहना, मगर जागृत न रहना।  

देखिए, इस व्यंग्य के बीच भी हम कभी यह नहीं कहते कि कुछ बदलिए। नहीं, क्योंकि यह ‘सानू की’ का युग है , आत्मकेंद्रित, आत्ममुग्ध, आत्मनिष्ठ। आदमी अब ब्रह्मांड का केंद्र नहीं, वह अपने मोबाइल स्क्रीन का केंद्र है। उसके लिए न्याय, अन्याय, क्रांति, करुणा , सब लॉक स्क्रीन के नोटिफिकेशन हैं जिन्हें स्वाइप करके हटाया जा सकता है।   मनुष्य अब दो रूपों में बंट गया है , एक “ऑनलाइन” आदमी, जो सब कुछ जानता है, और एक “ऑफ़लाइन” आदमी, जो किसी चीज़ से मतलब नहीं रखता। जब दुनिया जल रही होती है, तब भी वह अपने डिजिटल ब्रह्मांड में किसी मीम पर हँस रहा होता है, क्योंकि हँसी ने अब संवेदना को विस्थापित कर दिया है।  

  यह विसंगति किसी एक देश या समाज की नहीं। यह वैश्विक महामारी है , युद्ध से त्रस्त देश हों या अमन के खांचे में सजे लोकतंत्र, हर जगह मनुष्य की प्राथमिकता बदल चुकी है। पहले कहा जाता था “वसुधैव कुटुम्बकम्।” अब नया सिद्धांत है — “Where is my comfort zone, bro?” यानी — सानू की!  

 पश्चिम में हथियारों की नीलामी से लेकर पूरब में भूख की चिताओं तक, हर जगह वही दृश्य है , नेता युद्ध का समर्थन करता है, उद्योगपति सौदा करते हैं, मल्टीनेशनल ए आई के चलते बाजू की डेस्क वाले को नौकरी से हटा देता है और आम आदमी सोचता है, “सानू की, मेरी नौकरी तो बची है।” यही वह मौन सहमति है जो आतंक से भी बड़ी है , यह वह स्वीकृति है जो अत्याचार को जीवनशैली में बदल देती है।  

 आदमी अब अपने भीतर भी नहीं झाँकता। विवेक, करुणा, सवाल , ये सब पुराने ऐप्स की तरह अनइंस्टॉल कर दिए गए हैं। जो बचा है, वह है “मैं”। यह “मैं” अब किसी तत्वमीमांसा का प्रतीक नहीं, बल्कि एक बहुराष्ट्रीय उत्पाद है , जिसका साउंड ब्रांड है “सानू की”।  

सभ्यता के इस मोड़ पर इतिहास शायद दुबारा अपने पन्ने पलटेगा और देखेगा कि जिस युग को मानव प्रगति का शिखर कहा गया था, वही सबसे संवेदनहीन निकला। हम अंतरिक्ष में जीवन खोजने निकले थे, मगर अपने पड़ोसी की परेशानी नहीं देख पाए। हमने कृत्रिम बुद्धि (AI) बना ली, मगर प्राकृतिक इंसान खो दिया।  शायद भविष्य का कोई पुरातत्ववेत्ता इस युग की खुदाई में हमारे फोन, हमारी रीलें, हमारे 'सानू की' वाले मीम पाएगा और इतिहास में यह युग दर्ज होगा कि “मानव सभ्यता का उदासीन काल”। और तब किसी पुरानी पथरीली लिपि में लिखा मिलेगा, “जब सब कुछ जल रहा था, तब वे हँस रहे थे  और कह रहे थे, सानू की।”  


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Wednesday, February 11, 2026

बारी बरसी खटन गया सी...

 व्यंग्य 

बारी बरसी खटन गया सी...

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


बारी बरसी खटन गया सी...ये गीत पंजाब के उस मेहनतकश का लोक गीत है, जो बारह साल परदेस में कमाकर लौटा है। हर बार उसकी झोली में कुछ नया गिफ्ट होता है , कभी लोई, कभी सितारा, कभी गहना, कभी चूल्हा-ताला।  ढोल बजता है। भांगड़ा चलता है। और सारा गांव, साले-बिरादरी नाच उठते हैं। क्योंकि मेहनत रंग लाई है। कुछ हाथ लगा है।


अब इसी गीत की रस्म को कांग्रेस पार्टी ने राजनीति का नया मनोरंजक कायदा बना लिया है।


फर्क सिर्फ इतना है कि वहां बारह साल बाद सच में कुछ लेकर , लौटा था। ये लोग रोज़ सुबह उठते हैं, खाली हाथ में थाल सजाते हैं, ऊपर से झूठे सबूत की चटनी परोसते हैं, और ढोल बजवा देते हैं"और अब डांस करेंगे सारे के सारे!"


बारी बरसी खटन गया सी।

हर चुनाव, हर प्रेस कॉन्फ्रेंस, हर बजट सत्र,  यही क्रम है।

हाथ में कुछ ठोस नहीं, मगर उल्लास ऐसा मानो पूरी दिल्ली जीत ली हो।


राफेल डील, आई, देखी, डांस हुआ। सुप्रीम कोर्ट बैठा, CBI बैठी, ED बैठी, सबने कहा, कुछ नहीं। मगर इनकी थिरकन अभी थमी नहीं। अब राफेल आसमान में उड़ते हैं, और ये ज़मीन पर वही स्टेप्स दोहराते हैं। असल ज़िंदगी में रीप्ले नहीं मिलता, पर यहाँ तो हर साल रीमिक्स है।


चौकीदार चोर है, क्या पंचलाइन थी! इतनी जोरदार कि पार्टी कार्यकर्ता झूम उठे। मगर सबूत? वो तो बाद में देखेंगे, पहले डांस। अब सात साल हो गए। अदालत ने कहा, सबूत नहीं मिला। जाँच एजेंसी ने कहा सबूत नहीं मिला। पर ये कहते हैं "हमें तो अब भी यकीन है।"

यकीन है। 


ईवीएम और वोट चोरी , चुनाव हारो, तुरंत मशीन पर ठुमका लगाओ । कभी बैटरी बदली, कभी हैकिंग, कभी हनुमान चालीसा। मगर जब पूछो कि पंजाब, तेलंगाना, हिमाचल में तुम जीते कैसे? तब मशीन ठीक थी या उसमें भी भगवान का चमत्कार? सवाल सुनते ही डांस और तेज़। क्योंकि यह सवालों के जवाब का नहीं, जश्न का मौका है।


संविधान की प्रति, लाल किताब हाथ में, आँखों में नमी, होंठों पर गांधी, मन में नेहरू, और जेब में... खैर। संविधान बचाओ, लोकतंत्र बचाओ, देश बचाओ। तीनों थाली में सजे, वही ठुमके। पर संविधान पढ़ने का वक्त कहाँ? जब तक अनुच्छेद पढ़ोगे, तब तक कोई और डांस शुरू हो जाएगा।


नरवडे जी की अप्रकाशित पुस्तक, ये तो कमाल है।

अप्रकाशित। यानी अभी छपी नहीं। किसी ने पढ़ी नहीं। उसमें है क्या, पता नहीं। मगर प्रेस कॉन्फ्रेंस हो चुकी, आरोप लग चुके, डांस शुरू हो चुका। फेक कापी हवा में लहरा कर डांस किया जा चुका । साहित्य जगत में किताब छपने पर चर्चा होती है, यहाँ किताब छपने से पहले ही चर्चा, आरोप, और भांगड़ा , सब एक साथ।


अमेरिका से डील, अब ये तो सबसे ताज़ा एंट्री है। डील में हुआ क्या, पता नहीं। किसने की, कैसे की, कितने में की , बारीक अध्ययन, , विवेचन, जानकारी शून्य है। मगर आरोप हवा में हैं, अडानी और अंबानी को उछाल कर, हवा हवाई डांस चल रहा है। इतनी ऊर्जा है,  कि पावर  परचेज के टाई-अप करना चाहिए। 


अब सवाल यह नहीं कि इन मुद्दों में दम है या नहीं।

सवाल यह है कि जब हर बार थाल खाली निकलती है, तो फिर भी ढोल क्यों बजता है?

भेड़िया आया भेड़िया आया, आखि़र कब तक?

लकड़ी की हांडी कितनी बार चढ सकती है?

क्योंकि अब आरोप  कोई बहस नहीं, रस्म बन गए है।और रस्में सबूतों की मोहताज नहीं होतीं।


राफेल झूठा, चौकीदार सच्चा, फिर भी नारा वही।

ईवीएम सही, वोट सुरक्षित, फिर भी चीख वही।

किताब अप्रकाशित, आरोप प्रकाशित, फिर भी थिरकन वही।


बारी बरसी खटन गया सी।

हर बार खाली हाथ,पर  हर बार पूरा उल्लास।


सारी दुनिया देख लई, माँ तेरे जेहा न कोई।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Wednesday, January 14, 2026

पुस्तक चर्चा:पाखंड के विरुद्ध विजी श्रीवास्तव का निर्भीक शब्द-युद्ध .. "ए जी! सुनते हो' (व्यंग्य संग्रह)

 पुस्तक चर्चा 


  पाखंड के विरुद्ध विजी श्रीवास्तव का निर्भीक शब्द-युद्ध .. "ए जी! सुनते हो' (व्यंग्य संग्रह)


चर्चा.. विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 विजी श्रीवास्तव का सद्यः प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ए जी सुनते हो , समकालीन हिंदी साहित्य में व्यंग्य की एक ऐसी मशाल बन कर प्रस्तुत हो रहा है जो समाज के अंधेरे कोनों को उजागर करता दिखता है। यह पुस्तक शीर्षक के अनुरूप मात्र हल्का फुल्का हँसाने का साधन नहीं, बल्कि समाज के सामूहिक पाखंड और नैतिक पतन का एक गहरा अन्वेषण है । यह संग्रह पाठकों से कहता है, ए जी सुनते हो? पढ़ो, सुनो , गुनो, और हो सके तो कुछ करो भी ।


लेखक ने माइनिंग में होते व्यापक भ्रष्टाचार को समझाने के लिए शब्दों को ही प्रयोगशाला बना दिया है। वे 'खान' को (यानी खाते रहना) और 'खनिज' को 'निज' (स्वयं का) में बदलकर यह बताते हैं कि कैसे सार्वजनिक खनिज संपदा माफिया की निजी लूट का साधन बन गई है।


 लेखक ने उधारी का शहीद, इस नवाचारी पदबंध के माध्यम से पूँजीवादी व्यवस्था पर प्रहार किया है। जो व्यक्ति कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या करता है, वह व्यवस्था के लिए केवल ' शहीद' बनकर रह जाता है।


 'कफ़न चाहिए तो बोलो' रचना में दिखाया गया है कि भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि सरकारी तंत्र मृतकों को मुफ्त कफ़न बाँटने की योजना में भी अपने लिए 'कमीशन' की गुंजाइश ढूँढ लेता है।


 चम्मच घुमाना , का रोचक प्रयोग लेखक की शैली बताता है। एक सड़क ठेकेदार का यह कहना कि उसने ठेका लेने के लिए 'कितनी ही जगह चम्मच घुमाया था' (रिश्वत दी थी), शासन प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार की परतें खोलता मारक स्टेटमेंट है।


 'ए जी! सुनते हो' , पाखंड के विरुद्ध एक निर्भीक शब्द-युद्ध है। 

विजी श्रीवास्तव का यह व्यंग्य-संग्रह आधुनिक जीवन की विसंगतियों का एक 'सोशल क्रॉस-सेक्शन' है। 

यह पुस्तक अपनी भाषा की मारक क्षमता और शिल्प की नवीनता के कारण विशिष्ट बन पड़ी है। 

शब्द-कीमियागरी और भाषाई प्रहार जबर्दस्त हैं।

लेखक के पास शब्दों का 'संप्रभु अधिकार' है। वे 'चूना लगाना' जैसे लोक-मुहावरों को राजनीतिक विचारधारा के स्तर तक ले जाते हैं। 'चूना मंत्री' या 'विशेष अतिथि' जैसे शब्दों के माध्यम से वे समाज के उस वर्ग पर चोट करते हैं जो बिना किसी उपयोगिता के केवल 'मंच का बैलेंस' (फोटो खिंचवाने) के लिए मौजूद रहता है।

संस्थागत पाखंड का पर्दाफाश करने में लेखक सफल है। 

'चरण रज का अभिलाषी' में लेखक ने साहित्यिक और अकादमिक बाज़ार के पतन को दिखाया है। जहाँ योग्यता की जगह 'नेटवर्किंग' और चाटुकारिता ने ले ली है। जब एक युवक भ्रष्ट लोगों की चरण रज इकट्ठा करके बंजर खेत को उर्वर बनाने का दावा करता है, तो यह इस बात का प्रतीक है कि भ्रष्टाचार ही हमारा नया जीवन-स्रोत बन चुका है । लेखक मीडिया और तकनीक पर कटाक्ष करने में पीछे नहीं रहते । 

'आत्मा से मिलाप' में टीआरपी की दौड़ , अंधी होती पत्रकारिता को निशाना बनाया गया है। वहीं 'ओटीपी आ गया' और 'कस्टमर केयर के चक्रव्यूह में फँसा अभिमन्यु' जैसी रचनाएँ दिखाती हैं कि कैसे आधुनिक तकनीक ने जीवन को सुलभ बनाने के बजाय उसे अधिक खीज भरा और जटिल बना दिया है।

 मानवीय संवेदनाओं का क्षरण लेखक के निशाने पर है। लेखक इस बात से व्यथित हैं कि आज का मनुष्य संवेदना शून्य होता जा रहा है। 'कल शायद श्मशान जाना पड़े' जैसी सूचना पर व्यक्ति दुखी होने के बजाय अपने 'अपॉइंटमेंट' बिगड़ने की चिंता करता है। जब समाज में न्याय और रोटी की खबरें छोटे कॉलम में सिमट जाती हैं और जूता उछालने जैसी घटनाएँ 'हेडलाइन' बनती हैं, तो लेखक की निराशा एक तीखे व्यंग्य के रूप में फूटती है।


'एजी! सुनते हो' एक अत्यंत सजग और सतर्क, सतत् व्यंग्य दृष्टि का परिणामी ,सुदृढ़ लेखन है। विजी श्रीवास्तव ने उपदेश देने के बजाय हास्य और फंतासी के माध्यम से पाठकों को चेताया है। यह पुस्तक समकालीन समय के कठिन सवालों से मुठभेड़ करती है और हमें अपने भीतर झाँकने पर विवश करती है।


 पार्टी के अनुशासित सिपाहियों की महफिल,

लिव इन की कहानी का अंत,चूने की लकीर,और सुनाओ भाभी कैसी हैं,

कृषि दर्शन में जूते की खेती,क्या डिलिट किया,शोक सभा की तैयारियाँ,सावधान ! खाँसना मना है,स्वतंत्रता दिवस की बूंदी और ट्रिलियन के शून्य,कुत्तों का नामकरण , अपनी पर आने वालो अब आ ही जाओ ,बिल्ली की शिट्टी-न लीपने की न पोतने की, तेल, तेल की धार और फैट-फ्री आम आदमी , हिंदी संस्थान का कुत्ता,अपने पाले में हमें तो मत गिनो यार..,

उल्लू के पट्टे कभी कम न होंगे,स्वदेशी मुर्गी का हिंदी दर्शन,विशेष-अतिथि, पतन के मार्गों पर गड्ढों का नामकरण,समर्थन का मूल्य,इन्साफ का तलबगार,ग्लूकोज के बिस्कुट का साहित्य के विकास में योगदान,

नींद में बिकती इन्सानियत,लोकतंत्र घायल है,अच्छे डॉक्टर से इलाज कराओ,हुआ हुआ न हुआ हमला,हलो चेक हलो,कोरोना वायरस का अभिनंदन समारोह,हैरान हैं सड़कें,साढ़े इक्कीसवीं सदी में सब्जी की साहसिक खरीदी,शांति के मसीहा के बहुरंगी रूमाल,

 जैसे अपेक्षाकृत लंबे शीर्षकों वाली किन्तु गहरे मंतव्य की , हर वाक्य में सार्थक कटाक्ष से भरी रचनाएं एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर वैचारिक संप्रेषण करती हैं। सारी किताब विजी श्रीवास्तव की परिपक्व लेखनी से परिचित करवाती है। किताब पाठक को व्यंग्य का आनंद प्रदान करने वाली है। भाषा , शैली , अभिव्यक्ति, संप्रेषण सधा हुआ है। इसे पढ़कर मैं आश्वस्त हूं कि पुस्तक एजी सुनते हो , समकालीन व्यंग्य जगत में विशिष्ट पहचान स्थापित करेगी ही करेगी। पुस्तक वनिका पब्लिकेशन से प्रकाशित हुई है, और नई दिल्ली पुस्तक मेले में हाल ही कृति का विमोचन हुआ है। 


चर्चा .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

Wednesday, January 7, 2026

फैशन बनाम फ्रीडम

 व्यंग्य 

फैशन बनाम फ्रीडम 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से



स्त्री विमर्श की आड़ में नया बौद्धिक फैशन चला है , “कपड़ों में खराबी नहीं, तुम्हारी नज़र में खराबी है!” सुनने में यह वाक्य बड़ा आधुनिक और आत्मनिर्भर लगता है, पर असल में यह एक ऐसा नारा है, जो सोच की बहस को एक ही दिशा में मोड़ देता है। सवाल यह नहीं कि कौन क्या पहनता है ? सवाल यह है कि सोच किसकी बदलनी चाहिए, देखने वाले की या दिखाने वाले की?  

पहले भी लोग कपड़े पहनते थे, आज भी पहनते हैं। फर्क बस इतना है कि तब वस्त्र देह को ढंकने के लिए होते थे, अब फैशनेबल वस्त्र चर्चा में रहने के साधन बना लिए गए हैं ।

 चाणक्य ने वासना को सबसे बड़ा नशा कहा था। आज वही नशा “बॉडी पॉजिटिविटी” के नाम से सभ्यता की थाली में परोसा जा रहा है। 

 “हम क्या पहनेंगे, यह हम तय करेंगे।” बिल्कुल ठीक है! पर यह भी उतना ही सच है कि “दूसरे हमें कैसे देखेंगे, यह भी वे ही तय करेंगे।” दोनों अर्ध सत्य हैं, पर मिलकर एक पूरा सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य बनाते हैं । सम्मान मांगने से नहीं, व्यवहार से अर्जित होता है। समस्या कपड़ों की नहीं, उस विचार की है जो कपड़ों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा रहा है।

 “आधुनिकता” की परिभाषा कुछ ऐसी हो गई है कि जितना कम कपड़ा, उतनी ज़्यादा प्रगति। तो क्या जंगलों में रहने वाले साधन हीन आदिवासी सबसे आधुनिक थे ? अगर सभ्यता का पैमाना वस्त्रों की लंबाई है, तो यह पैमाना तो काफ़ी गड़बड़ा गया लगता है।  

 फैशन जगत “स्वतंत्रता” बेचता है और समाज उसे “प्रगतिशीलता” के दाम पर खरीद लेता है। स्त्री देह का नैसर्गिक सौंदर्य विज्ञापन की भेंट चढ़ रहा है। अब वस्तु से अधिक उसका प्रमोशन महत्वपूर्ण बना दिया गया है। इंस्टाग्राम पर फोटो को विचार समझ लिया गया है, और सोच को ‘लाइक’ के पैमाने पर नापा जाता है। सब तरफ एक ही आवाज़ “सोच बदलो!” मगर सवाल वही पुराना “किसकी सोच?”  


कभी हमारे यहाँ लाज, मर्यादा, शालीनता को नारी का आभूषण कहा गया था। आज ब्रांडेड कपड़े उस आभूषण के प्रतिस्पर्धी बन बैठे हैं। पहले माँ अपनी बेटी से कहती थी “बेटी, ऐसा पहन जो तुझे शोभा दे।” अब बेटी कहती है “माँ, ऐसा पहन जो ट्रेंड में हो।” फर्क वक्त का नहीं, दृष्टि का है।  


फैशन के विरोध में कोई नहीं किन्तु विसंगति उस सोच से है जहाँ “दिखने” का अर्थ “होने” से बड़ा हो गया है। वस्त्र तभी खूबसूरत लगते हैं जब वे व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाते हैं, उसे वस्तु में नहीं बदलते । संस्कृति और सभ्यता को कपड़ों से नहीं, सोच से जाना जाता है।  


आधुनिकता को त्याग नहीं, चयन बनाइए। न दृष्टि को दूषित करें, न अभिव्यक्ति को अशोभन। वस्त्र सौंदर्य का प्रतीक रहें, संस्कार का विकल्प नहीं, फैशन की आज़ादी बुरा विचार नहीं, पर सोच की गुलामी बुरी ज़रूर है।  

कपड़े बदलिए जितना चाहे , पर सोच ऐसी रखिए जो सभ्यता न उतारे, उसे शालीनता से धारण करे।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

पहचाना?

 पहचाना आप ने ? 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


पहचाना आप ने ? ...

, अरे कैसी बात करते हैं, आप भी! संकोच में ऐसा कह चुकने के बाद , वे बातों बातों में वह सूत्र ढूंढते हैं कि किसी तरह मिलने वाले का नाम याद आ जाए ? दरअसल, 

नाम आदमी की पहचान है, पर याददाश्त के साथ उसका रिश्ता हमेशा लुका-छुपी का ही रहा है। चेहरा तो लोग पहचान लेते हैं, पर नाम जैसे हमारी स्मृति से सबसे पहले पलायन कर जाता है। किसी को फोन करना हो तो याद ही नहीं आता कि बंदे का नंबर किस नाम से सेव किया था । 

एक विवेक ढूंढो तो तीन निकल आते हैं, इसलिए रिफरेंस या शहर का नाम साथ लिखना पड़ता है।

किसी पार्टी या सभा में मिलते समय नाम स्मरण की यह समस्या सबसे अधिक होती है। सामने वाला मुस्कराते हुए "कैसे हैं आप" कहता है और हम भी उतनी ही आत्मीयता से "अरे आप!" कह देते हैं। इस "आप" के पीछे कितनी मजबूरी और कितना अपराध बोध छुपा होता है, यह वही समझ सकता है जिसने मिलने वाले का नाम दिमाग की हार्ड डिस्क से डिलीट कर ‘रीसायकल बिन’ में पहुंचा दिया होता है। और रिसाइकिल बिन क्लीन कर दी होती है। दिमाग को सारे खाए हुए बादाम की कसम देते रहो पर नाम याद ही नहीं आते, तब सभ्यता के नाते दिमाग से काम लेना पड़ता है , और पहचानने की एक्टिंग करनी पड़ती है।


शशि कपूर साहब ने इस विसंगति का हल खोज निकाला था। वे मिलते ही सामने वाले से कहते, "हाय, आई एम शशि कपूर।" सामने वाला भी शिष्टाचार निभाने के चक्कर में अपना परिचय दे देता। यह फार्मूला कलाकारों और सेलिब्रिटीज के लिए तो ठीक है, पर अगर मोहल्ले का गजोधर प्रसाद या हरिप्रसाद यही तरीका अपनाए तो सामने वाला शक करने लगेगा कि कहीं यह बीमा बेचने वाला एजेंट तो नहीं।


कुछ लोग इस समस्या को छिपाने के लिए ऐसे रचनात्मक वाक्य गढ़ते हैं कि सुनकर हंसी भी आए और दया भी। जैसे कोई कहे "भाई साहब, आप तो बिल्कुल नहीं बदले!" अब सामने वाला सोचता है कि मैं पचास साल से यही हूँ, बदली तो तुम्हारी याददाश्त है। या फिर लोग बचने के लिए रिश्तों का सहारा लेते हैं "भाभी जी", "भाई साहब", "चाचा जी"। यही तो भारतीय संस्कृति का अद्भुत चमत्कार है। जब नाम याद न आए तो रिश्ते का लेबल चिपका दो, सामने वाला खुद ही नाम बता देगा।


हमारे एक अंकल ने इस समस्या को सीधे ईमानदारी से हल किया। वे मिलते ही कहते, "बेटा, याददाश्त कमजोर हो चुकी है, बातें करने से पहले नाम और पता बता दीजिए।" अब उनकी इस सादगी में न दिखावा है, न शिष्टाचार का जाल। सामने वाला झट से नाम बता देता है, जैसे परीक्षा हॉल में अपना एडमिशन कार्ड दिखा रहा हो।


नाम भूलने की समस्या अक्सर हास्यास्पद हालात पैदा कर देती है। शादी ब्याह में रिश्तेदार एक-दूसरे से टकराते हैं, पर नाम भूलने का अपराधबोध दोनों ओर इतना गहरा होता है कि बातचीत का सारांश यही रह जाता है "अरे आप!" और "जी, वही!" 

ऑफिस पार्टियों में तो यह विसंगति और भी दिलचस्प हो जाती है। कोई पूरे आत्मविश्वास से पांच मिनट तक बतियाता रहता है और फिर पूछ बैठता है "वैसे आपने मेरा नाम तो नहीं भुलाया?" तब तक नाम सचमुच स्मृति की फाइलों से प्रसंगवश रिकवर हो गया तो हम पूरे आत्मीय भाव से मुस्कराते हुए कहते हैं , अरे फलां जी कैसी बात करते हैं आप भी ।

वरना बाद में सिर खुजाते मिलने वाले का नाम स्मृति पटल पर खोजना होता है। 

सच यह है कि नाम भूलना कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है, यह भीड़ में घुल जाने की कला है। हम रोज़ इतने चेहरों से मिलते हैं कि दिमाग भी कभी-कभी ‘सिस्टम हैंग’ कर देता है। और तब "अरे आप" या "भाई साहब" जैसे संबोधन जीवनरक्षक ऐप साबित होते हैं।


अब समय आ गया है कि सरकार आधार कार्ड में एक नया फीचर जोड़ दे। जैसे ही हम किसी से मिलें, दोनों के मोबाइल पास लाते ही ब्लूटूथ से स्क्रीन पर स्वयं ही नाम चमक उठे। पर तब तक हमें अंकल की ही ईमानदार शैली अपनानी होगी कहना होगा "ओ मिलने वाले, जरा अपना नाम तो बता।" क्योंकि बिना नाम का संदर्भ समझे बातचीत करना वैसा ही है जैसे अंधेरे में रेडियो सुनना । आवाज तो आती है, मज़ा भी आता है, लेकिन यह समझ ही नहीं पड़ता कि प्रसारण किस स्टेशन से चल रहा है।

मैं एक सज्जन के यहां, रात्रि भोज पर निमंत्रित था , भोजन कर आया । उनकी पत्नी से यह पहली भेंट थी । सभ्यता से भाभी जी की ओर बहुत ध्यान से देखा भी नहीं । अगले दिन जब बाजार में जब एक महिला मेरी ओर देख कर मुस्करा रही थी, तो मुझे समझ ही नहीं आया कि यह क्या और क्यों हो रहा है । मुझे अजनबी सा देखते पा कर देवी जी बोली , अरे खाना खाकर भी आपने पहचाना नही , झेंपने के सिवा क्या कर सकता था मैं । दरअसल महिलाएं हेयर स्टाइल बदल दें, या देसी परिधान की जगह पाश्चात्य ड्रेस पहन लें तो उन्हें पहचानना मेरे लिए वैसे भी कठिन हो जाता है । सच तो यह है कि एक नग अपनी पत्नी के मूड तक को भी अब तक कभी पहचान नहीं पाया! 

खैर आप ही बताइए , किस को कितना पहचाना आप ने? आभासी दुनिया के ढेरों मित्र बड़े मिले मिले से लगते हैं, पर आसपास के कई लोग भी बहुत अनजाने होते हैं।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 भोपाल

Tuesday, January 6, 2026

नंबर वन का 'अमृत' और नरक का ड्रेनेज

 व्यंग्य

नंबर वन का 'अमृत' और नरक का ड्रेनेज


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


इंदौर में इन दिनों गजब का द्वंद्व चल रहा है। एक तरफ आसमान से टपकती स्वच्छता की 'नंबर वन' की ट्राफियां हैं और दूसरी तरफ जमीन फाड़कर निकलता 'भागीरथपुरा' का सच। सूचना मिली है कि प्रशासन ने अपनी चिर-परिचित फुर्ती दिखाते हुए कुछ अधिकारियों का 'स्थानांतरण' कर दिया है। वाह! क्या गजब का इलाज है। जैसे किसी का अपेंडिक्स फट गया हो और डॉक्टर उसका बिस्तर बदल दे। साहब यहाँ से वहाँ हुए नहीं कि सिस्टम का पाप धुल गया! सुना है नए साहब के आते ही पुरानी पाइप लाइन ने शर्म के मारे जहर उगलना बंद कर दिया है।


भागीरथपुरा, नाम कितना पवित्र है। महाराज भगीरथ ने गंगा लाने के लिए अंगूठे पर खड़े होकर तपस्या की थी ताकि पूर्वजों को तार सकें, पर हमारे आधुनिक भगीरथों (इंजीनियरों) ने पाइपलाइन बिछाते समय ऐसी 'तपस्या' की कि अमृत योजना की नली को सीधे ड्रेनेज की नाली से 'कनेक्ट' कर दिया। अब पुरखे तरें न तरें, मोहल्ले वाले सीधे इस लोक को छोड़  मोक्ष की यात्रा पर निकल पड़े। यह सरकारी मोक्ष ही है, बस फर्क इतना है कि यह यमराज द्वारा नहीं, बल्कि नगर निगम द्वारा 'स्पॉन्सर्ड' है।

इस पूरी त्रासदी के पीछे जो 'महान कलाकार' छिपा है, वह है, सरकारी ठेकेदार। यह वह प्रजाति है जो लोहे के पाइप को कागज की तरह मोड़ सकती है और कंक्रीट में इतनी रेत मिला सकती है कि रेगिस्तान को भी शर्म आ जाए। ठेकेदार साहब का गणित एकदम स्पष्ट है, "ऊपर की सड़क ऐसी बनाओ कि मुख्यमंत्री का काफिला निकले तो झटका न लगे, और नीचे पाइप ऐसा डालो कि अगली बारिश तक गायब हो जाए।" टेंडर की मलाई और कमीशन के खेल में पाइपलाइन की मोटाई इतनी कम रह गई कि सीवेज के कीड़ों ने उसे 'डोरस्टेप डिलीवरी' का रास्ता समझ लिया। ठेकेदार के लिए 'अमृत' का मतलब वह 'प्रसाद' है जो उसे फाइल पास होने के बाद मिलता है, जनता का गला सूखे या सड़े, इससे उसके बैंक बैलेंस का 'फ्लो' नहीं रुकता।

शहर का चेहरा तो इतना चमकीला है कि आप अपनी शक्ल डिवाइडर पर देख लें। दीवारों पर नाचते मोर हैं, स्वच्छता के गान गाती गाड़ियाँ हैं और हर खंभे पर मुस्कराते नेताओं के पोस्टर हैं। पर इस चमक-धमक के नीचे शहर क्या 'पाल' रहा है, यह तब पता चलता है जब अस्पताल के बेड कम पड़ जाते हैं। यहाँ मोहल्ला राजनीति का भी अपना स्वैग है। "हमारे भाईसाहब" का वोट बैंक बना रहे, इसलिए पाइपलाइन चाहे गटर के भीतर से निकले या शौचालय के नीचे से, बस 'नल' चलना चाहिए। पार्षद जी को चिंता इस बात की नहीं थी कि पानी में बैक्टीरिया हैं, उन्हें चिंता इस बात की थी कि उद्घाटन के पत्थर पर उनका नाम बड़ा है या नहीं। चुनावी गणित में 'शुद्ध पेयजल' से ज्यादा जरूरी 'मुफ्त का टैंकर' होता है, ताकि संकट के समय मसीहा बना जा सके।

जब जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँचा, तो नेताओं ने अपना अचूक ब्रह्मास्त्र निकाला, 'स्थानांतरण'। कलेक्टर साहब हटा दिए गए, कमिश्नर साहब विदा कर दिए गए। जनता दुख भूल कर फटाफट खुश हो गई! उसे लगा  कि 'न्याय' हो गया। अरे भाई, साहब तो बदल गए, पर वह सड़ा हुआ सिस्टम और वह लीकेज वाली पाइपलाइन तो वहीं है जो पिछले दस सालों से ड्रेनेज को चूम रही है। यह तो वही बात हुई कि इंजन खराब है और आप बार-बार ड्राइवर बदल रहे हैं। राजनेता जानते हैं कि पब्लिक की याददाश्त और पानी का स्वाद, दोनों बहुत जल्दी बदल जाते हैं।

रही बात समाधान की, तो हुजूर! समाधान किसी फाइल या तबादले में नहीं, बल्कि इस 'स्मार्ट' चश्मे को उतारने में है। जल्दी ही मजबूर जनता जीने के लिए अपने घरों में यूरेका के असरदार वाटर फिल्टर खुद लगा ही लेगी । तब तक बिसलेरी की बोतलों से नहाने का सौभाग्य मिलेगा । 

पर यह कौन बताए कि असली 'अमृत' जल तब बरसेगा जब ड्रेनेज और पेयजल की लाइनों के बीच की दूरी कम से कम उतनी कर दी जाएगी जितनी एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच नेता और जनता की होती है। बेहतर होगा कि अगली बार 'स्मार्ट सिटी' का तमगा देने से पहले दीवारों के पेंट की जगह पाइपों के 'प्रेसर' की जाँच की जाए। समाधान तो यह भी है कि जिस ठेकेदार और इंजीनियर ने यह महान 'जुगलबंदी' की है, उन्हें तब तक उसी मोहल्ले का पानी पिलाया जाए जब तक वे खुद न मान लें कि अमृत योजना में 'विष' का मिश्रण सरकारी गाइडलाइन का हिस्सा नहीं है। बड़े अधिकारियों के तबादलों के इस सर्कस को बंद कर अगर 'जवाबदेही' को भी 'नंबर वन' बना दिया जाए, तो शायद किसी और भगीरथ को अपने मोहल्ले के पुरखों को तारने के लिए श्मशान न जाना पड़े। वरना याद रखिए, इतिहास केवल आपके रंगे-पुते डिवाइडर याद नहीं रखेगा, वह उन पाइपों के बारे में भी लिखेगा जिन्होंने शहर की साख को गटर में बहा दिया। आज इंदौर कल कोई दूसरा शहर लीकेज का माइलेज अखबार की इबारत बनता रहने से रोकना है तो तकनीकी प्रोजेक्ट्स को राजनीति से दूर करना होगा । 


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Tuesday, December 30, 2025

कटाक्ष की कसौटी पर दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें

 कटाक्ष की कसौटी पर दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


दुष्यन्त कुमार (1933-1975) आधुनिक हिन्दी साहित्य के ऐसे विशिष्ट ग़ज़लकार हैं, जिन्होंने ग़ज़ल को रूमानियत और श्रृंगार के परम्परागत दायरे से निकालकर समकालीन यथार्थ, सामाजिक विसंगतियों और राजनीतिक विद्रूपताओं के चित्रण का माध्यम बनाया। उनकी काव्य चेतना का केन्द्र 'आम आदमी' की पीड़ा, आकांक्षा और संघर्ष है। इसी चेतना को अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने हिंदी ग़ज़ल को एक सशक्त अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया। ग़ज़लों में उनका कटाक्ष , व्यंग्यात्मक प्रहार और तंज  सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था की जड़ता, संवेदनहीनता और विडम्बनाओं के प्रति तीखा प्रहार तथा जन चेतना जगाने का प्रयास  सिद्ध हुआ है।

दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों में निहित व्यंग्य के स्वरूप, विषय वस्तु और अभिव्यक्ति का विवेचन महत्वपूर्ण है। 


दुष्यन्त कुमार के कटाक्ष की जड़ें उनकी गहन सामाजिक प्रतिबद्धता में निहित हैं।  उनकी ग़ज़लों में "सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक विसंगतियों को बेबाकी से उभारने" के व्यापक उदाहरण हैं।  वे 'साये में धूप' जैसे संग्रह के माध्यम से आज़ाद भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की विडंबनाओं को उजागर करते हैं और "जनता की सुप्त संवेदनाओं को जागृत करते हैं"। उनका व्यंग्य दो स्तरों पर काम करता है , एक ओर वे शोषित जनता से सहानुभूति रखते हैं, तो दूसरी ओर "उसकी संवेदनहीनता और जड़ता पर व भी कटाक्ष में गजल कहते हैं"। इस प्रकार उनकी ग़ज़ल केवल विरोध तक सीमित नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक चेतना के निर्माण का छंद बद्ध आह्वान है।


 राजनीतिक व्यवस्था और खोखले वादों पर कटाक्ष उनकी लोकप्रियता की ताकत बना दिखाई देता है। 

दुष्यन्त कुमार की सबसे प्रसिद्ध  ग़ज़लों में से एक है  "कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए"...। इस ग़ज़ल में राजनीतिज्ञों के कथनी और करनी के अन्तर पर करारा कटाक्ष है। वे कहते हैं कि नेताओं ने हर घर को रोशन करने (सुख-सुविधा देने) का सपना दिखाया, लेकिन वास्तविकता यह है कि "कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए"। यहाँ 'चिराग़' सुविधाओं और विकास का प्रतीक है।  "दुष्यंत जी  राजनीति पर व्यंग करते हुए कहते हैं कि राजनीति लोगों को बड़े-बड़े लुभाने सपने दिखाती है... आज स्थिति यह है कि शहरों में भी चिराग़ अर्थात् सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, नेताओं की घोषणा कागज़ी है"। यह ग़ज़ल राजनीतिक व्यवस्था के थोथे आश्वासनों और जनता के साथ धोखे के उनके अनुभव का जीवन्त भावनात्मक दस्तावेज है, इसी तेवर से वे आम आदमी में लोकप्रिय हुए। 


ग़ज़ल "मत कहो, आकाश में कुहरा घना है" सामाजिक यथार्थ की कड़वी सच्चाई को व्यंग्य के माध्यम से पेश करती है। कवि कहता है कि सड़क पर इतना कीचड़ है कि हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है, लेकिन "पक्ष और’ प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं, बात इतनी है कि कोई पुल बना है"। यहाँ संसद में होने वाली खोखली बहस और जमीनी हकीकत (सड़कों की बदहाली) के बीच की विसंगति पर तीखा तंज है। वे आगे कहते हैं कि "रक्त वर्षों से नसों में खौलता है, आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है" , यह समाज में जमी हुई पीड़ा और उसे हल्के में लेने की प्रवृत्ति पर चोट है। अंत में, "दोस्तो! अब मंच पर सुविधा नहीं है, आजकल नेपथ्य में संभावना है" पंक्ति सत्ता और अवसर के केन्द्रों से सामान्य जन के हटाए जाने की विडम्बना को दर्शाती है।


ग़ज़ल "वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है" सत्ता के एक ऐसे कृत्रिम, दम्भी और खोखले प्रतिनिधि का चित्रण करती है, जो असलियत में कुछ नहीं है, बस एक 'बयान' मात्र है। उसके "झोले में कोई संविधान है" जैसी पंक्ति शासन के नाममात्र के औपचारिक ढाँचे और उसकी वास्तविक निरंकुशता के बीच के अन्तर को उजागर करती है। यह चित्रण उन तथाकथित 'विकास' और 'कानून' के ठेकेदारों की पोल खोलता है, जिनका असली चरित्र जनता से कोसों दूर है।

आज भी राजनेता अपने भाषणों में झोले से संविधान निकाल कर जन सभाओं में लहराते नजर आते हैं, और ये स्थिति दुष्यन्त को प्रासंगिक बनाए हुए है।


"कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं" ग़ज़ल में समकालीन समाज में व्याप्त विसंगतियों का चित्रण है। "गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं", "वो सलीबों के क़रीब आए तो हम को क़ायदे क़ानून समझाने लगे हैं" जैसी पंक्तियाँ धर्म और कानून के नाम पर होने वाले पाखण्ड पर प्रहार करती हैं। "अब नई तहज़ीब के पेश-ए-नज़र हम आदमी को भून कर खाने लगे हैं" , यह पंक्ति नवीन सभ्यता के नाम पर मनुष्यता के भक्षण (शोषण) की ओर संकेत करती है, जो आधुनिकता के नकली आवरण में छिपे बर्बरता भरे व्यवहार पर गहरा व्यंग्य है। 

अब विद्रूप स्थिति तो ये हो रही है कि सचमुच तंदूर कांड , या बोटियां काटकर फ्रिज में रखने जैसी वीभत्स्व घटनाएं समाज में हो रही हैं, पर कोई दुष्यन्त कुछ वैसा लिख नहीं रहा, जैसा उस दुष्यन्त ने तात्कालिक परिस्थित पर लिख लिया। 


दुष्यन्त कुमार के व्यंग्य की प्रभावोत्पादकता उनकी भाषा-शैली में निहित है। वे उर्दू-हिन्दी के मिश्रित, सहज लेकिन चुभते हुए शब्दों का प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा में एक विशिष्ट 'बेचैनी' और 'बेलौस मस्ती' है, जो सामाजिक विसंगतियों को देखकर भीतर ही भीतर सुलगने वाले व्यक्ति की आग को दर्शाती है। वे प्रतीकों और विरोधाभासों का सटीक इस्तेमाल करते हैं, जैसे 'दरख़्तों के साये में धूप लगती है'। यह विरोधाभासी प्रतीक एक ऐसी व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जो शरण तो देना चाहती है, लेकिन उसमें भी कष्ट ही है। इस तरह उनकी भाषा व्यंग्य को स्मरणीय और प्रभावशाली बना देती है।


दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों में व्यंग्य कोरी आलोचना या नकारात्मकता नहीं है, बल्कि यह एक रचनात्मक विरोध और सकारात्मक परिवर्तन का आह्वान है। उन्होंने ग़ज़ल की कोमल तान को समाज के कठोर यथार्थ और उसके प्रति तीखे प्रतिरोध की धार दी। राजनीतिक व्यवस्था की खोखली, सामाजिक विडम्बनाओं, जनता की जड़ता और नैतिक मूल्यों के क्षरण पर उनकी व्यंग्यदृष्टि ने हिन्दी ग़ज़ल को एक नया विस्तार और गरिमा प्रदान की। उनका काव्य-संसार इस बात का प्रमाण है कि साहित्य यदि जन-पक्षधर है, तो उसका व्यंग्य केवल विध्वंसक नहीं, बल्कि एक नई चेतना के निर्माण का सृजनात्मक औज़ार भी हो सकता है।

दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि उनमें चित्रित विसंगतियाँ और उन पर किया गया व्यंग्य समय के साथ और भी स्पष्ट होता गया है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

प्रबुद्ध व्यंग्यकार और समालोचक

( व्यंग्य कल आज और कल के लेखक )

Thursday, December 25, 2025

काश कि सांता सचमुच खुशियां बांट सकता

व्यंग्य

 “सांता, सेल और हम”


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


लाल टोपी वाला सांता इस बार देर से आया   शायद उसे पेट्रोल महंगा पड़ रहा हो, या फिर रूस-यूक्रेन की बर्फ में उसका रेनडियर फँस गया। चिमनी से उतरने की जहमत भी अब कौन उठाए, जब दरवाज़े पर “नो ट्रेसपासिंग” की चेतावनी लगी हो और सुरक्षा कैमरे रिकॉर्डिंग कर रहे हों।


बच्चों को अब चाकलेट और कुकीज़ से ज़्यादा डेटा पैक चाहिए  ताकि वे ऑनलाइन गिफ्ट ट्रैक कर सकें। और बड़ों की  हालत ये है कि उन्होंने क्रिसमस ट्री को भी ईएमआई पर लिया हुआ है। क्रिसमस ट्री पर  लगी लाइटें ऐसे टिमटिमाती हैं, जैसे अर्थव्यवस्था , या शेयर मार्केट और सोने की कीमत के ग्राफ। 


सांता की स्लेज़ पर अब कॉर्पोरेट विज्ञापनों के लोगो लगे हैं  । वह अब जादू की थैली नहीं खोलता । कार्ड स्वाइप करता है। या डायरेक्ट एकाउंट में मनी ट्रांसफर करता है जिससे वोट सुनिश्चित किए जा सकें।गरीब इलाकों में जिस दिन सांता आता है, उसी दिन बिजली चली जाती है। कुछ बच्चों को लगता है कि अंधेरा ही उनका “गिफ्ट रैपर” है।


दुनिया भर के नेता हर साल सांता की तरह भाषण देते हैं ,  मीठी आवाज़, लाल कपड़े, खाली थैला। कोई वादा करता है “शांति लाने” का, कोई “सुधार” का, पर हिरन उन्हीं मैदानों में घास ढूंढ रहे होते हैं जहाँ पहले से ही कुछ नहीं बचा।


सांता अब “ग्लोबल वार्मिंग” से परेशान है । बर्फ पिघल रही है और उसके रहने की जगह कम होती जा रही है। शायद इसलिए उसने उत्तरी ध्रुव छोड़कर स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिया। अब वह शेयर की गिरावट में उतरता है, और भरोसे की चिमनी में फँस जाता है।


पर असली सवाल यह नहीं कि सांता आएगा या नहीं । असली सवाल यह है कि हम अब भी किसी “सांता” की प्रतीक्षा क्यों कर रहे हैं?  

क्या हमें सच में जादुई टोपी वाला कोई चाहिए जो हमारी बर्फबारी रोके और महंगाई घटाए ?  या हमें चाहिए वो आत्म विश्वास जो हमें मेहनत का यथार्थ याद दिलाए?


क्योंकि सांता का काम तो बस प्रेरणा देना था, स्थाई सुविधाएं नहीं देना। उसने गिफ्ट का रास्ता दिखाया था, पर उससे हम मेहनत से अर्जित करना भूल रहे हैं , हमें हर मुसीबत में सांता या कोई संत की ओर देखने की आदत पड़ गई है, जबकि वास्तव में ये हम ही हैं जो खुद रैप कर के गिफ्ट क्रिसमस ट्री के नीचे रख लेते हैं।  इस तरह बच्चों को तो बहलाया जा सकता है पर पल भर की झूठी खुशी सच्चाई नहीं बदल सकती । 

अब अगर सांता सचमुच आ भी आए, तो शायद मुस्कुराएगा और कहेगा  “मैं तो बस  प्रतीक हूं , खुशी , दुनियां में शांति, गरीबी दूर करना , मंहगाई से निपटना सब हमें खुद करना है।”

इस सबके साथ इन दिनों के वास्तविक सांता वे डिलीवरी बॉय हैं जो कड़कती ठंड , चिलचिलाती धूप में दुनियां भर में घर घर हमारे पैकेट्स हमे पहुंचा रहे हैं, क्या इन सांता के लिए कभी हमने कोई चाकलेट रखी है, दरवाजे के पास, या उन्हें मात्र डीलवरी नोटिफिकेशन की तरह स्वाइप कर हम दरवाजे बंद कर देते हैं? 


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Wednesday, December 24, 2025

बैठे बैठे

 व्यंग्य 

बैठे बैठे


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


"बैठे बैठे क्या करें, करना है कुछ काम” टाइम पास के लिए, बोर होते समूह की अंताक्षरी की शुरुआत के लिए सिर्फ पंक्ति नहीं, बल्कि आज के डिजिटल, सोशल-मीडिया-व्यस्त, पर फिर भी बेरोजगार दिखते समाज का सटीक रूपक है। “बैठे बैठे क्या करें…” यह आज के समाज की स्थायी प्लेलिस्ट बन चुकी है। फर्क बस इतना है कि पहले यह शाम को छतों पर गाई जाती थी, अब यह मोबाइल की स्क्रीन पर स्क्रॉल करते  लोगों के मन वचन कर्म में दिखती  है।  

सोशल मीडिया पर कई लोग इन दिनों ‘कंटेंट’ पर बहस कर रहे हैं ,कोई रो रहा है कि लोग बेवजह रील बना रहे हैं, तो कोई कह रहा है, “कुछ तो करो!”और ये “कुछ”प्रायः टच स्क्रीन पर नाचती हुई अंगुलियों में सिमट जाता है।  


ऑफिस में भी दृश्य समान है ,  ज़ूम मीटिंग का कैमरा बंद हुआ , और कर्मचारी का मन दिमाग सब टिकटॉक मोड में कुछ करने लगता है। बॉस पूछे, “फाइल भेजी?” तो आत्मा जवाब देती है, “सावन आया, बदरा छाए…”  क्योंकि फाइल निपटाने से ज़्यादा भावना का भोजन ज़रूरी है।  


‘बैठे बैठे कुछ करें’ का नया संस्करण ए आई पर भी चल पड़ा है । “कुछ वायरल कंटेंट बना दो…” मतलब ‘करना है कुछ काम’, लेकिन खुद से नहीं, मशीन से, हो तो और बेहतर! आलस्य अब  अपडेट हो चुका है और उसमें भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फिट हो रहा है।  

इस आलस्य में भी अच्छाई है। बैठे-बैठे कुछ सोचना, खुद से बातें करना, या समाज की नई तस्वीरें बनाना यही रचनात्मकता की जड़ है। कबीर भी तो कहते थे, “साधो, यही शरीर है”  यानी भीतर झांको, बाहर भागो मत।  

तो अगर सच में "करना है कुछ काम", तो ज़रा मन का वाई-फाई ऑन करो। किताब उठाओ, पौधा लगाओ, किसी को देख  मुस्करा दो, या बस किसी पुराने दोस्त को याद कर उसे फोन मिला लो। सब कामों में ऊर्जा है । बस ट्रेंड की जगह थोड़ा अर्थ चुनना होगा।  


क्योंकि कुछ काम यही है कि हँसते-हँसते कट जाएं रस्ते। राम का नाम सदा सुखदाई , वरना राम नाम सत्य तो शाश्वत है ही । 

तो शुरू करो अंत्याक्षरी, लेकर प्रभु का नाम, जीवन जीने के लिए करना है कुछ काम।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Thursday, December 18, 2025

व्यंग्य कल आज और कल

 *पुस्तक चर्चा- 'व्यंग्य कल आज और कल'* 

‎ _लेखक- श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

‎प्रकाशक- न्यू वर्ल्ड पब्लीकेशन, नई दिल्ली

‎नामचीन व्यंग्यकार श्री विवेक; रंजन श्रीवास्तव जी की पुस्तक 'व्यंग्य: कल आज और कल' इस मायने में विशिष्ठ है कि यह व्यंग्य विधा के सृजनात्मक पहलुओं की गहराई में घुसकर पड़ताल करते हुए उस पर विस्तृत प्रकाश डालती है। जैसा कि पुस्तक का शीर्षक है तथा स्वयं उन्होने अपनी भूमिका मे स्पष्ट किया है " व्यंग्य समालोचना शास्त्र अभी भी विकास क्रम में है।..... यह पुस्तक इसी जटिल,सूक्ष्म और अत्यंत प्रभावशाली साहित्यिक विषय के बहुआयामी विश्लेषण पर केन्द्रित लेखों का एक महत्वपूर्ण संकलन है। यह पुस्तक व्यंग्य को केवल रचना के स्तर पर ही नहीं बल्कि उसके सैद्धांतिक आधारों, ऐतिहासिक विकास यात्रा,विविध साहित्यिक विधाओं में उसकी अभिव्यक्ति और सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में उसकी भूमिका को गहराई से समझने का एक सुविचारित प्रयास है।"

‎इस पुस्तक में उन्होने व्यंग्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सिद्धांतों, विभिन्न साहित्यिक विधाओं में व्यंग्य की उपस्थिति और सामाजिक- सांस्कृतिक प्रश्नों पर तर्कपरक भूमिका पर इक्कीस विभिन्न अध्यायों में विस्तृत विवेचना की है। यह पुस्तक ऐसे समय पर आई है जब सोशल मीडिया की सुलभ सुविधा के कारण नये लेखकों को अपनी रचनाएं प्रदर्शित करने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हो गये हैं। विभिन्न विधाओं में लिखा भी बहुत जा रहा है जिसके अच्छे व बुरे दोनो ही रह के प्रभाव सामने आ रहे हैं। एक ओर जहाँ प्रतिभाशाली लोगों को अपने लेखन प्रदर्शन का अवसर मिला है वहीं अनेक शौकिया लेखकों की न सिर्फ बाढ़ सी आ गयी है बल्कि कुछ पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं को स्थान भी मिल जाता है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि ऐसे लेखक अपनी गैर स्तरीय रचनाओं को श्रेष्ठ मानकार अपने लेखन कौशल से संतुष्ट हो जाते हैं और गम्भीर पाठकों को स्तरीय रचनाओं की उपलब्धता सीमित हो जाती है। इन परिस्थियों में चर्चाधीन यह पुस्तक न सिर्फ नये व्यंग्य लेखकों के लिये वरन् निष्पक्ष समीक्षकों के लिये एक मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वाह करती है।वर्तमान में अनेक लेखक लोकप्रियता के लिये हास्यपूर्ण मनोरंजक लेख लिख रहे हैं और उन्हे पत्र-पत्रिकाओं में स्थान व प्रशंसा भी मिल रही है, शायद इसलिये भी पुस्तक लेखक श्री विवेक जी को अपनी पुस्तक का आरम्भ ही इस वाक्य के साथ करना पड़ गया होगा, " व्यंग्य साहित्य की वह सशक्त विधा है जो समाज के ताने-बाने में गुथी विसंगतियों, विडम्बनाओं और कुरीतियों को उधेड़ने का साहस रखती है। यह मात्र हास्य नहीं, वरन हँसी के पीछे छुपे एक तीखे प्रहार की लेखकीय कला है,जो पाठक को झकझोरती है, सोचने को मजबूर करती है और परिवर्तन की ओर उन्मुख करती है।" स्पष्ट है कि व्यंग्य की प्रहारक शक्ति ही उसे सशक्त बनाती है। हास्यरहित व्यंग्य एक कटु व्यंग्य बन जाता है और व्यंग्यरहित हास्य एक उद्देश्यहीन रचना ही कहलाएगी। यह व्यंग्यकार के रचना कौशल पर निर्भर करता है कि वह अपनी रचना को कितना सार्थक, सुस्पष्ट और रोचक बना पाता है। श्री विवेक जी ने अपने आरम्भिक चरण में ही व्यंग्य लेखन के सैद्धांतिक ढ़ाँचे व मूल्यांकन हेतु एक सुष्पष्ट मानदण्डों की जमीन तैयार कर दी है।

‎'व्यंग्य आलोचना के लिये वर्गीकरण बिंदु' में समस्त आवश्यक बिन्दुओं को इंगित करते हुए विवेक जी एक महत्वपूर्ण बात करते हुए अपनी चिंता व्यक्त करते हैं - " व्यंग्य का स्वतंत्र आलोचना शास्त्र अब तक निर्धारित नहीं है। एक दूसरे की जो व्यंग्य समीक्षा इन दिनों हो रही है उसमें मापदण्डों पर आधारित वास्तविक आलोचना की जगह इतनी प्रशंसा भर दी जाती है कि लेखक परिष्कार की जगह स्वयं को व्यंग्य का महारथी मानने की भूल कर बैठता है। इसलिये निबंधात्मक सपाटबयानी को भी आज व्यंग्य समझा जा रहा है।" 

‎उपरोक्त उल्लेख पहले किया जा चुका है और देखने में भी आ रहा है     कि नये व्यंग्य लेखक भले ही व्यंग्य के शीर्ष पुरुष परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्र नाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल आदि के लेखन की पूँछ पकड़ कर उनका अनुसरण कर रहे हों पर उनके लेखन में निरन्तर परिष्करण का अभाव स्पष्ट प्रतीत होता है। पुस्तक में रचनाओं के व्यंग्य लेखन में अपेक्षित सुधार‌ व इस विकास हेतु परसाई, शरद जोशी की रचनाओं का  अवलम्बन लेकर कुछ संरचनात्मक मानदण्ड तय किये गये हैं जिसकी कसौटी पर व्यंग्य रचना की गुणवत्ता निर्धारित की जा सकती है। यह कसौटी किसी यांत्रिक उपकरण की तरह नहीं है कि नाप-तौल से निर्धारित हो जावे बल्कि यह रचना कौशल की कलात्मक अभिव्यक्ति भी है जो सिर्फ महसूस की जा सके। इसलिये पुस्तक यह प्रश्न भी उठाती है - " क्या व्यंग्य समस्या की जड़ तक पहुँचता है या सतही है ? क्या भाषा और शैली संदेश के अनुरूप है ? क्या यह पाठक को सोचने के लिये प्रेरित करता है या सिर्फ हँसाता है ? क्या यह सामाजिक परिवर्तन की सम्भावना जगाता है ? 

‎वैज्ञानिक दष्टिकोण में मानव विकास में हँसी का मूल सामाजिक बंधन में है वहीं कथा साहित्य में पौराणिक दृष्टिकोण से ब्रम्हा द्वारा सृष्टि की रचना उपरान्त उनके हँसने से हास्य उत्पन्न होना बताया गया है। तात्पर्य यह कि हास्य एक मानवीय प्रवृत्ति है, जिसे साहित्य के नौ विभिन्न रसों के अंतर्गत माना गया है। इस पुस्तक के एक पृथक अध्याय में हास्य व्यंग्य को वे एक सहज मानवीय प्रवृत्ति बताया गया है और सहित्य क्षेत्र में हास्य का महत्व बताते हुए हास्य के भिन्न प्रकारों पर भी प्रकाश डाला गया है साथ ही साथ हास्य रचना के पाँच प्रकारों ह्यूमर, विट, सेटायर, आयरनी, और फार्स पर भी बात की गयी है। पुस्तक में हास्य रस/ मानवीय प्रवृत्ति पर पृथक अध्याय सार्थकता इसलिये भी है कि हास्य व्यंग्य का समावेश लगभग हर साहित्यिक विधा में किया गया है। व्यंग्य विधा में तो हास्य का अभाव बेस्वाद भोजन ही माना जाएगा‌ जिसमें पौष्टिकता भले हो पर तृप्ति न मिल सकेगी।  

‎समाज व्यंग्य रचना की जमीन भी है और उसका केन्द्रीय स्तम्भ भी।

‎'व्यंग्य और समाज के अंतर्सम्बंध' नामक अध्याय में लेखक ने लिखा है, " समाज व्यंग्य को जन्म देता है, पोषित करता है और कभी-कभी दबाने का प्रयास भी करता है।" यह लेख व्यंग्यकार को उसकी जिम्मेवारी के प्रति भी आगाह करता है जिसका अभाव समाज की आहत प्रतिक्रिया के तौर पर सामने आ सकता है। 

‎'व्यंग्य में महिला हस्तक्षेप' पर व्यापक चर्चा की गई है और इस क्षेत्र में सक्रिय महिला रचनाकारों का उल्लेख किया गया है, जिस कारण समाज के प्रति उनका दृष्टिकोण व अवलोकन की एक नवीन दृष्टि व अनछुए पहलुओं से परिचय होना सम्भव है।

‎'व्यंग्य के विविध आयाम' पर विस्तारपूर्क चर्चा करते हुए रचना की प्रहारक क्षमता व सफलता पर प्रस्तुतीकरण के कला पक्ष पर प्रकाश डाला गया है।

‎हिंदी व्यंग्य जगत के मूर्धन्य रचनाकार कबीर, परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्र नाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल, नरेन्द्र कोहली, नागार्जुन की रचनाओं  उनके लेखकीय शिल्प पर व्यापक चर्चा की गयी है जो एक व्यंग्यकार को अपनी कलम तराशने और समीक्षक को अपनी समझ का दायरा बढ़ाने के पर्याप्त अवसर प्रदान करती है। 

‎'विसंगतियों के युग में व्यंग्य का भविष्य'  पर यह पुस्तक तर्कसम्मत व्याख्या करते हुए रचनाकार को उसकी जिम्मेवारी का आभास भी कराती है और बदलते हुए समय अनुरूप मार्गदर्शन भी देती है।

‎पुस्तक के अंतिम पृष्ठों में विभिन्न प्रश्नकर्ताओं द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तर भी दिये गये हैं जो पाठकों की रही-सही जिज्ञासाओं/शंकाओं का समाधान करते हैं।

‎सरल एवं ग्राह्य भाषा में लिखी गयी इस पुस्तक में व्यंग्य लेखन के समस्त मानदण्डों की विस्तृत व्याख्या है, शीर्ष व्यंग्यकारों की विशिष्ठ शैलियों की चर्चा है, व्यंग्य के विभिन्न उदाहरण हैं और सबसे बड़ी बात यह कि यह साहित्य के हर फार्म में व्यंग्य के समावेश पर लागू है। विवेक जी की यह पुस्तक व्यंग्य लेखकों, समीक्षकों व नये व्यंग्य रचनाकारों के लिये काफी उपयोगी है।

‎उम्मीद है कि पुस्तक के माध्यम से लेखक का यह प्रयास निश्चित ही व्यंग्य विधा को सशक्त बनाने के लिये लेखकों के लिये सहायक सिद्ध होगा ।

‎शारदा दयाल श्रीवास्तव

‎भोपाल

अकादमी सम्मान की रुकी हुई घोषणा

त्वरित व्यंग्य 

अकादमी सम्मान की रुकी हुई घोषणा


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


सचिव का इंतजार था जो संस्कृति मंत्रालय में निदेशक भी हैं।अकादमी सम्मान घोषित होने थे । इंतजार सिर्फ एक घोषणा का नहीं था , उस व्यवस्था का था जो कहती है कि साहित्य स्वायत्त है । देश दुनियां में साहित्य के मेरे जैसे जागरूक पाठक , सुधी रचनाकार , साहित्यिक पत्रकार सब इंतजार करते रह गए और कोई ब्यूरोक्रेट गले में आई कार्ड डाले हाल में आया , दबी जुबान में कह गया कि आज घोषणा नहीं होगी । 

शब्द सहम जाते हैं,  दृश्य किसी रंगमंच का लगता है, पर है देश की साहित्य अकादमी का। काना फूसी है ऊपर से आदेश आया दो नाम जोड़ो किसी ने कहा जूरी और सरकार में टकराव हुआ है,  किसी ने कहा नाम तय है पर घोषणा रुकी है। इस सारी गासिप में सच्चाई कहीं बीच में छिपी बैठी जरूर होगी पर उसे कुर्सी नहीं मिली, और सब हाल की कुर्सियां खाली होते देखते रहे।

जिस हाल में कैमरे सज चुके हों , सवालों की फेहरिस्त तैयार हों और समय की सुई प्रेस कांफ्रेंस के तय समय पर अटक गई हो , वहां  पर्दा उठने से पहले ही गिरा दिया गया और दर्शक तालियां बजाने के बजाय सिर खुजाते हाल से बाहर निकलने के लिए मजबूर हुए। साहित्य अकादमी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि न प्रेस कांफ्रेंस हुई न प्रेस रिलीज जारी की गई। 

पत्रकार घर लौट आया पर खबर वहीं की वहीं अटकी रह गई। भीतर क्या हुआ यह कोई बताने को तैयार नहीं पर बाहर बैठे हर आदमी को पता है कि भीतर कुछ न कुछ जरूर हुआ है। मंत्री जी, सफेद शर्ट वाले आका जी , बड़े प्रकाशक, कोई ना कोई तो है जो घोषणा रोकने की ताकत रखता है। सरकारी गलियारों की यह खासियत होती है कि वहां जब कुछ नहीं होता तब भी भीतर ही भीतर बहुत कुछ हो रहा होता है और जब बहुत कुछ होता है तब भी उसे कुछ भी नहीं कहा जाता । 

सवाल है कि  इस उठापटक के बाद जो पुरस्कार घोषित होंगे , उन्हें सम्मान कहा जाए या जुगाड़ , प्रेशर पॉलिटिक्स या प्रतिभा , कलम का अपमान अथवा समझौता,  उपलब्धि या अनुकंपा। 

साहित्य का मौलिक स्वभाव प्रश्न करना है पर पुरस्कार का स्वभाव अक्सर चुप करा देना होता है। जो कल तक व्यवस्था की विसंगतियों पर कलम चलाता था आज उसी व्यवस्था की चुप्पी पर मौन साध ले तो आम पाठक के भीतर का आदमी सरे आम ठगा ठगा सा रह जाता है। 

यह वह बिंदु है जहां व्यंग्य जन्म लेता है , और रोता नहीं हंसता है ताकि रोने की आवाज कहीं दब न जाए।


नोबेल पुरस्कार की राजनीति की बातें अब फुसफुसाहट नहीं रहीं। साम दाम दंड भेद के सूत्र वहां भी खुली किताब की तरह पढ़े जा रहे हैं। जब विश्व का सबसे प्रतिष्ठित मंच भी सत्ता समीकरणों से अछूता नहीं तो अपने यहां के छोटे बड़े मंचों से मासूमियत की उम्मीद करना बाल सुलभ ही है। उत्तर प्रदेश राज्य सरकार के सम्मान , पुरस्कार वर्षों से लंबित हैं और फाइलें धूल खा रहीं हैं। सम्मान अब महज योग्यता का नहीं धैर्य का इम्तहान भी बन गये है।


इस पूरी कथा में सबसे रोचक यह है कि सबको सब पता है पर कोई कुछ नहीं जानता। यह अनभिज्ञता नहीं एक संस्थागत अभिनय है। जब अकादमी जैसे मंच पर  प्रेस कांफ्रेंस का रद्द होना एक रहस्य बने , तो समझ लेना चाहिए कि साहित्य से ज्यादा राजनीति और साहित्य की जुगलबंदी की गोपनीयता फलफूल रही है।


 समाधान क्या है? समाधान वही पुराना है। पुरस्कारों की प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाए , जूरी की राय को संक्षेप में सामने रखा जाए , सरकार का दखल अगर है तो उसे स्वीकार कर ,  स्पष्ट वैधानिक नामांकन नीति बनाई जाए ताकि पर्दे के पीछे की फुसफुसाहट मंच के खुले संवाद में बदल सके। और सबसे जरूरी यह कि लेखक पुरस्कार को अंतिम सत्य न माने बल्कि पाठक को ही अपना स्थायी निर्णायक समझे।


व्यंग्यकार के लिए यह समय उपजाऊ है क्योंकि विसंगति खुलेआम मुस्कुरा रही है। यह पूरा प्रसंग किसी प्रहसन से कम नहीं जहां पात्र गंभीर हैं, संवाद गुप्त हैं और मंच पर अंधेरा है। फर्क बस इतना है कि यहां शो के प्रवेश पत्र पाठक ने, लेखकों ने और साहित्य प्रेमियों ने ले रखे हैं पर शो रद्द कर दिया गया है। ऐसे में हंसी ही बचाव है और सवाल ही उम्मीद है। साहित्य अगर जीवित है तो वह इन रहस्यों पर हंसेगा भी और उन्हें उजागर भी करेगा। यही साहित्य की सदा से  जिद रही है ,यही उसका दायित्व भी है ।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क

Friday, January 1, 2021

हरीश नवल बजरिये अंतरताना

 हरीश नवल बजरिये अंतरताना



विवेक रंजन श्रीवास्तव


किसी भी व्यक्ति को जानने समझने के लिये अंतरताना यानी इंटरनेट आज वैश्विक सुलभ सबसे बढ़ियां संसाधन है . एक क्लिक पर गूगल सहित ढ़ेरो सर्च एंजिन व्यक्ति के विषय में अलग अलग लोगों के द्वारा समय समय पर पोस्ट किये गये समाचार , आलेख , चित्र,  वीडीयो , किताबें वगैरह वगैरह जानकारियां पल भर में स्क्रीन पर ले आते हैं . यह स्क्रीनीग बड़ी रोचक होती है . मैं तो कभी कभी स्वयं अपने आप को ही सर्च कर लेता हूं . कई बार स्वयं मेरी ही विस्मृत स्मृतियां देखकर प्रसन्नता होती है . अनेक बार तो अपनी ही रचनायें ऐसे अखबारों या पोर्टल पर पढ़ने मिल जाती हैं , जिनमें कभी मैने वह रचना भेजी ही नही होती . एक बार तो अपने लेख के अंश वाक्य सर्च किये और वह एक नामी न्यूज चैनल के पेज पर बिना मेरे नामोल्लेख के मिली . इंटरनेट के सर्च एंजिन्स की इसी क्षमता का उपयोग कर इन दिनो निजी संस्थान नौकरी देने से पहले उम्मीदवारों की जांच परख कर रहे हैं . मेरे जैसे माता पिता बच्चो की शादी तय करने से पहले भी इंटरनेट का सहारा लेते दिखते हैं .  अस्तु .

मैने हिन्दी में हरीश नवल लिखकर इंटरनेट के जरिये उन्हें जानने की छोटी सी कोशिश की . एक सेकेन्ड से भी कम समय में लगभग बारह लाख परिणाम मेरे सामने थे . वे फेसबुक , से लेकर विकीपीडीया तक यू ट्यूब से लेकर ई बुक्स तक , ब्लाग्स से लेकर समाचारों तक छाये हुये हैं . अलग अलग मुद्राओ में उनकी युवावस्था से अब तक की ढ़ेरों सौम्य छबियां देखने मिलीं . उनके इतने सारे व्यंग्य पढ़ने को उपलब्ध हैं कि पूरी रिसर्च संभव है . इंटरनेट ने आज अमरत्व का तत्व सुलभ कर दिया है .

बागपत के खरबूजे लिखकर युवा ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले हरीश जी आज  व्यंग्य के परिपक्व मूर्धन्य विद्वान हैं . उन्हें साहित्य के संस्कार परिवार से विरासत में मिले हैं. उनकी शालीनता व शिष्‍टता उनके साहित्य व व्यक्‍तित्व की विशेषता है. उनसे फोन पर भी बातें कर हृदय प्रफुल्लित हो जाता है . वे इतनी सहजता और आत्मीयता से बातें करते हैं कि उनके विशाल साहित्यिक कद का अहसास ही नही होता . अपने लेखन में मुहावरे और लोकोक्‍तियों का रोचक तरीके से प्रयोग कर वे पाठक को बांधे रहते हैं .  वे माफिया जिंदाबाद कहने के मजेदार प्रयोग करने की क्षमता रखते हैं . पीली छत पर काला निशान, दिल्ली चढ़ी पहाड़, मादक पदार्थ, आधी छुट्टी की छुट्टी, दीनानाथ का हाथ, वाया पेरिस आया गांधीवाद, वीरगढ़ के वीर,  निराला की गली में जैसे टाइटिल ही उनकी व्यंग्य अभिव्यक्ति के परिचायक हैं .

प्रतिष्ठित हिन्दू कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहते हुये उन्होंने ऐसा अध्यापन किया है कि  उनके छात्र जीवन पर्यंत उन्हें भूल नही पाते . उन्होने शिक्षा के साथ साथ छात्रो को संस्कार दिये हैं और उनके  व्यक्तित्व का रचनात्मक विकास किया है . अपने लेखन से उन्होने मेरे जैसे व्यक्तिगत रूप से नितांत अपरिचित पाठको का विशाल वैश्विक संसार रचा है .  डॉ. हरीश नवल बतौर स्तम्भकार इंडिया टुडे, नवभारत टाइम्स, दिल्ली प्रेस की पत्रिकाएँ, कल्पांत, राज-सरोकार तथा जनवाणी (मॉरीशस) से जुड़े रहें हैं . उन्होने इंडिया टुडे, माया, हिंद वार्ता, गगनांचल और सत्ताचक्र के साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण काम किये हैं. वे एन.डी.टी.वी के हिन्दी प्रोग्रामिंग परामर्शदाता, आकाशवाणी दिल्ली के कार्यक्रम सलाहकार, बालमंच सलाहकार, जागृति मंच के मुख्य परामर्शदाता, विश्व युवा संगठन के अध्यक्ष, तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय सह-संयोजक पुरस्कार समिति तथा हिन्दी वार्ता के सलाहकार संपादक के पद पर सफलता पूर्वक काम कर चुके हैं.  वे अतिथि व्याख्याता के रुप में सोफिया वि.वि. बुल्गारिया तथा मुख्य परीक्षक के रूप में मॉरीशस विश्वविद्यालय (महात्मा गांधी संस्थान) से जुड़े रहे हैं. दुनियां के ५० से ज्यादा देशो की यात्राओ ने उनके अनुभव तथा अभिव्यक्ति को व्यापक बना दिया है . उनके इसी हिन्दी प्रेम व विशिष्ट व्यक्तित्व को पहचान कर स्व सुषमा स्वराज जी ने उन्हें ग्यारहवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की पांच सदस्यीय आयोजक समिति का संयोजक मनोनीत किया था .  

हरीश जी ने आचार्य तुलसी के जीवन को गंभीरता से पढ़ा समझा और अपने उपन्यास रेतीले टीले का राजहंस में उतारा है .  जैन धर्म के अंतर्गत ‘तेरापंथ’ के उन्नायक आचार्य तुलसी भारत के एक ऐसे संत-शिरोमणि हैं, जिनका देश में अपने समय के धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक आदि विभिन्न क्षेत्रों पर गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है . आचार्य तुलसी का दर्शन, उनके जीवन-सूत्र, सामाजिक चेतना, युग-बोध, साहित्यिक अवदान और मार्मिक तथा प्रेरक प्रसंगों को हरीश जी ने इस कृति में प्रतिबिंबित किया है.  पाठक पृष्ठ-दर-पृष्ठ पढ़ते हुये आचार्य तुलसी के व्यक्तित्व और अवदान से परिचित होते हैं व आत्मोत्थान की राह ढ़ूंढ़ सकते हैं .

उनके लेखन में विविधता है . समीक्षात्मक लेख,  पटकथा लेखन , संपादन , निबंध लेखन , लघुकथा , व्यंग्य के हाफ लाइनर , जैसे प्रचुर प्रयोग , और हर विधा में श्रेष्ठ प्रदर्शन उन्हें विशिष्ट बनाता है . अपनी कला प्रेमी चित्रकार पत्नी व बेटियों के प्रति उनका प्यार उनकी फेसबुक में सहज ही पढ़ा जा सकता है . उन्हें यू ट्यूब के उनके साक्षात्कारो की श्रंखलाओ व प्रस्तुतियो में जीवंत देख सुन कर कोई भी कभी भी आनंदित हो सकता है . लेख की शब्द सीमा मुझे संकुचित कर रही है , जबकि वास्तविकता यह है कि "हरीश नवल बजरिये अंतरताना" पूरा एक रिसर्च पेपर बनाया जा सकता है .  

 

Wednesday, December 30, 2020

पुस्तक चर्चा साहबनामा मुकेश नेमा


 

पुस्तक चर्चा
साहबनामा
मुकेश नेमा
पृष्ठ २२४ , मूल्य २२५ रु
मेन्ड्रेक पब्लिकेशन , भोपाल
चर्चाकार .. विवेक रंजन श्रीवास्तव , शिला कुंज , नयागांव ,जबलपुर ४८२००८

कहा जाता है कि दो स्थानो के बीच दूरी निश्चित होती है . पर जब जब कोई पुल बनता है , कोई सुरंग बनाई जाती है या किसी खाई को पाटकर लहराती सड़क को सीधा किया जा है तब यह दूरी कम हो जाती है . मुकेश नेमा जी का साहबनामा पढ़ा . वे अपनी प्रत्येक रचना में सहज अभिव्यक्ति का पुल बनाकर , दुरूह भाषा के पहाड़ काटकर स्मित हास्य के तंज की सुरंग गढ़ते हैं और बातों बातो में अपने पाठक के चश्मे और अपनी कलम के बीच की खाई पाटकर आड़े टेढ़े विषय को भी पाठक के मन के निकट लाने में सफल हुये हैं .
साहबनामा उनकी पहली किताब है . मेन्ड्रेक पब्लिकेशन , भोपाल ने लाइट वेट पेपर पर बिल्कुल अंग्रेजी उपन्यासो की तरह बेहतरीन प्रिंटिग और बाइंडिग के साथ विश्वस्तरीय किताब प्रस्तुत की है.पुस्तक लाइट वेट है ,  किताब रोजमर्रा के लाइट सबजेक्ट्स समेटे हुये है . लाइट मूड में पढ़े जाने योग्य हैं . लाइट ह्यूमर हैं जो पाठक के बोझिल टाइट मन को लाइट करते हैं . लेखन लाइट स्टाईल में है पर कंटेंट और व्यंग्य वजनदार हैं .
अलटते पलटते किताब को पीछे से पढ़ना शुरू किया था , बैक आउटर कवर पर निबंधात्मक शैली में उन्होने अपना संक्षिप्त परिचय लिखा है , उसे भी जरूर पढ़ियेगा , लिखने की  स्टाईल रोचक है . किताब के आखिरी पन्ने पर उन्होने खूब से आभार व्यक्त किये हैं . किताब पढ़ने के बाद उनकी हिन्दी की अभिव्यक्ति क्षमता समझकर मैं लिखना चाहता हूं कि वे अपने स्कूल के हिन्दी टीचर के प्रति आभार व्यक्त करना भूल गये हैं . जिस सहजता से वे सरल हिन्दी में स्वयं को व्यक्त कर लेते हैं , अपरोक्ष रूप से उस शैली और क्षमता को विकसित करने में उनके बचपन के हिन्दी मास्साब का योगदान मैं समझ सकता हूं .
जिस लेखक की रचनाये फेसबुक से कापी पोस्ट होकर बिना उसके नाम के व्हाट्सअप के सफर तय कर चुकी हों उसकी किताब पर कापीराइट की कठोर चेतावनी पढ़कर तो मैं समीक्षा में भी लेखों के अंश उधृत करने से डर रहा हूं . एक एक्साईज अधिकारी के मन में जिन विषयो को लेकर समय समय पर उथल पुथल होती रही हो उन्हें दफ्तर , परिवार , फिल्मी गीतों , भोजन , व अन्य विषयो के उप शीर्षको क्रमशः साहबनामा में १८ व्यंग्य , पतिनामा में ८ , गीतनामा में १० , स्वादनामा में १० , और संसारनामा में १६ व्यंग्य लेख , इस तरह कुल जमा ६२ छोटे छोटे ,विषय केंद्रित सारगर्भित व्यंग्य लेखो का संग्रह है साहबनामा .
यह लिखकर कि वे कम से कम काम कर सरकारी नौकरी के मजे लूटते हैं , एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी होते हुये भी लेखकीय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जो साहस मुकेश जी ने दिखाया है मैं  उसकी प्रशंसा करता हूं . दुख इस बात का है कि यह आइडिया मुझे अब मिल रहा है जब सेवा पूर्णता की कगार पर हूं  .
किताब के व्यंग्य लेखों की तारीफ में या बड़े आलोचक का स्वांग भरने के लिये व्यंग्य के प्रतिमानो के उदाहरण देकर सच्ची झूठी कमी बेसी निकालना बेकार लगता है . क्योंकि, इस किताब से  लेखक का उद्देश्य स्वयं को परसाई जैसा स्थापित करना नही है . पढ़िये और मजे लीजीये . मुस्कराये बिना आप रह नही पायेंगे इतना तय है . साहबनामा गुदगुदाते व्यंग्य लेखो का संग्रह है .
इस पुस्तक से स्पष्ट है कि फेसबुक का हस्य , मनोरंजन वाला लेखन भी साहित्य का गंभीर हिस्सा बन सकता है . इस प्रवेशिका से अपनी अगली किताबों में  कमजोर के पक्ष में खड़े गंभीर साहित्य के व्यंग्य लेखन की जमीन मुकेश जी ने बना ली है . उनकी कलम संभावनाओ से भरपूर है .
रिकमेंडेड टू रीड वन्स.
 चर्चाकार विवेक रंजन श्रीवास्तव , शिला कुंज , नयागांव ,जबलपुर ४८२००८

Tuesday, December 29, 2020

पुस्तक चर्चा अब तक ७५ , श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें


 

पुस्तक चर्चा
अब तक ७५ , श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें
संचयन व संपादन डा लालित्य ललित और डा हरीश कुमार सिंह
पृष्ठ २३६ , मूल्य ३०० रु
इंडिया नेट बुक्स गौतम बुद्ध नगर , दिल्ली
चर्चाकार .. विवेक रंजन श्रीवास्तव , शिला कुंज , नयागांव ,जबलपुर ४८२००८

लाकडाउन अप्रत्याशित अभूतपूर्व घटना थी . सब हतप्रभ थे . किंकर्त्व्यविमूढ़ थे . कहते हैं यदि हिम्मत न हारें तो जब एक खिड़की बंद होती है तो कई दरवाजे खुल जाते हैं . लाकडाउन से जहां एक ओर रचनाकारो को समय मिला , वैचारिक स्फूर्ति मिली वहीं उसे अभिव्यक्त करने के लिये इंटरनेट के सहारे सारी दुनियां का विशाल कैनवास मिला . डा लालित्य ललित वह नाम है जो अकेले बढ़ने की जगह अपने समकालीन मित्रो को साथ लेकर दौड़ना जानते हैं . वे सक्रिय व्यंग्यकारो का एक व्हाट्सअप समूह चला रहे हैं . देश परदेश के सैकड़ो व्यंग्यकार इस समूह में उनके सहगामी हैं . इस समूह ने अभिनव आयोजन शुरू किये . प्रतिदिन एक रचनाकार द्वारा नियत समय पर एक व्यंग्यकार की नयी रचना की वीडीयो रिकार्डिंग पोस्त की जाने लगी . उत्सुकता से हर दिन लोग नयी रचना की प्रतीक्षा करने लगे , सबको लिखने , सुनने , टिप्पणिया करने में आनंद आने लगा . यह आयोजन ३ महीने तक अविराम चलता रहा . रचनायें उत्कृष्ट थी . तय हुआ कि क्यो न लाकडाउन की इस उपलब्धि को किताब का स्थाई स्वरूप दिया जाये , क्योंकि मल्टी मीडिया के इस युग में भी किताबों का महत्व यथावत बना हुआ है . ललित जी की अगुआई में हरीश जी ने सारी पढ़ी गई रचनायें संग्रहित की गईं , वांछित संपादन किया गया . इस किताब में स्थान पाना व्यंग्यकारो में प्रतिष्ठा प्रश्न बन गया . इ्डिया नेटबु्क्स ने प्रकाशन भार संभाला , निर्धारित समय पर महाकाल की नगरी उज्जैन में भव्य आयोजन में विमोचन भी संपन्न हुआ . देश भर के समाचारो में किताब बहुचर्चित रही .
अब तक पचहत्तर में अकारादि क्रम में अजय अनुरागी की रचना लॉकडाउन में फंसे रहना , अजय जोशी की छपाक लो एक और आ गया,  अतुल चतुर्वेदी की कैरियर है तो जहान है,  अनीता यादव की रचना ऑनलाइन कवि सम्मेलन के साइड इफेक्ट , अनिला चाड़क की रचना करोना का रोना , अनुराग बाजपाई की रचना प्रश्न प्रदेश बनाम उत्तर प्रदेश , अमित श्रीवास्तव की भैया जी ऑनलाइन , अरविंद तिवारी की खुद मुख्तारी के दिन , अरुण अरुण खरे की रचना साब का मूड ,  अलका अग्रवाल नोट नोटा और लोटा , अशोक अग्रोही की रचना करोना के सच्चे योद्धा , अशोक व्यास चुप बहस चालू है , आत्माराम भाटी सपने में कोरोना ,आशीष दशोत्तर संक्रमित समय और नाक का सवाल , मेरी राजनीतिक समझ कमलेश पांडे , मेरा अभिनंदन कुंदन सिंह परिहार , 21वीं सदी का ट्वेंटी ट्वेंटी  केपी सक्सेना दूसरे , मैं तो पति परमेश्वर हूं जी गुरमीत बेदी , नाम में क्या रखा है चन्द्रकान्ता , चीन की लुगाई हमार गांव आई जय प्रकाश पांडे ,  अगले जन्म मोहे खंबानी कीजो जवाहर चौधरी , बाप रे इतना बुरा था आदमी टीका राम साहू , टथोफ्रोबिया  दिलीप तेतरवे , जाने पहचाने चेहरे दीपा गुप्ता शामिल हैं .
कहानी कान की देवकिशन पुरोहित , हे कोरोना कब तक रोएं तेरा रोना देवेंद्र जोशी , पिंजरा बंद आदमी और खुले में टहलते जानवर निर्मल गुप्त , टांय टांय फिस्स नीरज दैया , हिंदी साहित्य का नया वाद कोरोनावाद पिलकेंद्र अरोड़ा , बहुमत की बकरी प्रभात गोस्वामी , स्थानांतरण मस्तिष्क का प्रमोद तांबट , सुन बे रक्तचाप प्रेम जनमेजय , यस बास प्रेमविज , सेवानिवृति का संक्रमण काल बल्देव त्रिपाठी , मन के खुले कपाट बुलाकी शर्मा , मेरा स्कूल ब्युटीफुल भरत चंदानी , जी की बात मलय जैन , आवश्यकता गरीब बस्ती की मीनू अरोड़ा , हिंदी साहित्य की मदद मुकेश नेमा , श्रद्धांजलि की ब्रेकिंग न्यूज़ मुकेश राठौर , छबि की हत्या मृदुल कश्यप , और सपने को सिर पर लादे चल पड़ा रामखेलावन गांव की ओर रण विजय राव , यमलोक में सन्नाटा रतन जेसवानी , चालान रमाकांत ताम्रकार , छूमंतर काली कंतर रमेश सैनी , बुरी नजर वाले रवि शर्मा मधुप ,  झक्की मथुरा प्रसाद रश्मि चौधरी , डरना मना है राकेश अचल , करोना से मरो ना राजशेखर चौबे,  वाह री किस्मत राजेंद्र नागर ,  स्वच्छ भारत राजेश कुमार,  लॉकडाउन में आत्मकथा लिखने का टाइम रामविलास जांगिड़,  पांडेय जी बन बैठे जिलाधिकारी गाजियाबाद लालित्य ललित , कोरोना वायरस वर्षा रावल के लेख हैं
फॉर्मेट करना पड़ेगा वायरस वाला 2020 विवेक रंजन श्रीवास्तव , आई एम अनमैरिड वीणा सिंग , सरकार से सरकार तक वेद प्रकाश भारद्वाज , रतन झटपट आ और करोड़पति बन वेद माथुर , दीपिका आलिया और मेरी मजबूरी शरद उपाध्याय , नैनं छिद्यन्ति शस्त्राणि श्याम सखा श्याम , करोना तुम कब जाओगे संजय जोशी , टीपूजी से कपेजी संजय पुरोहित , अंगुलीमाल का अहिंसा का नया फंडा संजीव निगम , मैडम करुणा की प्रेस कान्फ्रेंस संदीप सृजन,  हमाई मजबूरी जो है समीक्षा तैलंग , तस्वीर बदलनी चाहिये  सुदर्शन वशिष्ठ , रुपया और करोना सुधर केवलिया , लॉकडाउन के घर में सुनीता शानू , मन लागा यार फकीरी में सुनील सक्सेना , तुम क्या जानो पीर पराई सुषमा राजनीति व्यास, लाकडाउन में तफरी सूरत ठाकुर , भाया बजाते रहो स्वाति श्वेता , क्वारंटाइन वार्ड स्वर्ग में हनुमान मुक्त , मैं तो अपनी बैंक खोलूंगा पापा हरीश कुमार सिंह और अस्पताल में एंटरटेनमेंट हरीश नवल के व्यंग्य सम्मलित हैं .
जैसा कि व्यंग्य लेखों के शीर्षक ही स्पष्ट कर रहे हैं किताब के अधिकांश  व्यंग्य करोना पर केंद्रित तत्कालीन पृष्ठभूमि के हैं . जब भी भविष्य में हिन्दी साहित्य में कोरोना काल के सृजन पर शोध कार्य होंगे इस किताब को संदर्भ ग्रंथ के रूप में लिया ही जायेगा यह तय मानिये . आप को इन व्यंग्य लेखो को पढ़ना चाहिये . देखना सुनना हो तो यूट्यूब खंगालिये शायद लेखक के नाम या व्यंग्य के नाम से कहीं न कही ये व्यंग्य सुलभ हों . क्योकि हर व्यंग्य का वीडियो पाठ मैंने व्हाट्सअप ग्रुप पर कौतुहल से देखा सुना है . बधाई सभी सम्मलित रचनाकारो को , जिनमें वरिष्ठ , कनिष्ठ , नियमित सक्रिय , कभी जभी लिखने वाले , महिलायें , इंजीनियर, डाक्टर , संपादक , सभी शामिल हैं . बधाई संपादक द्वय को और प्रकाशक जी को .
 चर्चाकार विवेक रंजन श्रीवास्तव , शिला कुंज , नयागांव ,जबलपुर ४८२००८

Tuesday, December 22, 2020

आदमी होने की तमीज सिखाता व्यंग्य संग्रह// ‘‘समस्या का पंजीकरण व अन्य व्यंग्य’’

 //आदमी होने की तमीज सिखाता व्यंग्य संग्रह//

‘‘समस्या का पंजीकरण व अन्य व्यंग्य’’



श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव व्यंग्य लेखन जगत का जाना माना नाम है । पेशे से इंजीनियर होते हुए भी भाषा और साहित्य में मजबूत पकड़ रखते हैं । यही कारण है कि लंबी सी बात को कम से कम शब्दों में कह देना उनके लेखन की विशेषता है । उनका मानना है कि कोई भी व्यंग्य रचना अपने आप में इतनी चुटीली हो कि उसे प्रभावशाली बनाने के लिए शाब्दिक साज-सज्जा की जरूरत ही न पड़े । सौम्य स्वभाव के विवेक रंजन का यही स्वभाव रचनाओं में देखा जा सकता है । वे बड़ी से बड़ी विसंगति को बिना आक्रोषित हुए बहुत ही सौम्यता से सामने रखने में महारथी हैं । अर्थात ‘‘जोर का झटका धीरे से’’ वाली कथनी चरितार्थ होती सी लगती है । संग्रह की दसवें नंबर की रचना ‘‘समस्या का पंजीकरण व अन्य व्यंग्य’’ जो पुस्तक का शीर्षक भी है रचनाकार की इसी गंभीरता को उजागर करती है । लेखक का आशय है कि अक्सर लोगों की भलाई के लिए बनाये गये कानून भी आदमी के लिये समस्या बन चुके हैं । संक्षेप में कहें तो इस संग्रह की सभी  रचनाऐं अव्यवस्थित व्यवस्था को आगाह करती नजर आती हैं । 


व्यंग्य का उद्देश्य है नकारात्मकता से सकारात्मका की ओर चलना । गलत का प्रतिकार करने की ताकत समाज को देना । आज पूरा देश आँकड़ेबाजी के खेल में मस्त है । आँकड़ेबाजी का यह खेल जिस  मजबूती से अपनी जड़ें जमा रहा है उसके सामने मुँह से निकले आश्वासन भी निरर्थक साबित हो रहे हैं । आज पूरा देश इसी आँकड़ेबाजी के मोहजाल में घिरकर अपनी पीठ ठोंक रहा है । टी.वी. पर आने वाला घटिया से घटिया उत्पाद भी मार्केटिंग की इसी चाल से प्रभावित होकर अपने पांसे फेंक रहा है।  ।  ताज्जुब की बात है कि रंग बदलते माहौल में आम आदमी झूठ को ही सच समझकर कठपुतली की तरह नाच रहा है । वह हतप्रभ है आंकड़ेबाजी के इस मायाजाल से, मगर चाहकर भी इससे मुक्त नहीं हो सकता । क्योंकि चाटुकारिता से बजबजाती आज के राजनीतिक जलाशय के किनारे कोई कबीर खड़ा दिखाई नहीं देता जो ललकार कर आवाज बुलंद करने का हौंसला रखता हो । ‘‘जो घर जारे आपना सो चले हमारे साथ’’


आज का समाज ऐसी विषम स्थिति में जीने को मजबूर है, जिसे बार बार हर जरूरत के लिए पंजीकृत होने के अगम्य और दुष्कर रास्तों से होकर गुजरना पड़ रहा है । रह रह कर मन में आशंका जन्म ले रही कि आने वाले समय में शायद आम आदमी को अपने पेट के भूख की पंजीयन के लिये भी मजबूर कर दिया जायेगा । ताकि वह साबित कर सके कि भगवान ने उसे भी वह पेट दिया है जिसमें भूख लगती है । ‘‘व्यंग्यकार समस्या का पंजीकरण में एक जगह लिखता है कि अगले बरस चुनाव होने वाले है । राम भरोसे को उम्मीद है कि कठिनाइयों का कुछ न कुछ तो हल निकलेगा ही । मगर समस्या यह कि जब तक वह समस्या का पंजीकरण नहीं करवायेगा तब तक उसकी समस्या दर्ज ही नहीं होगी । इस पंजीयन के लिये रामभरोसे खिड़की दर खिड़की झांकता फिरता है मगर हर खिड़की  बंद होने के कारण उसे निराश कर देती है । तात्पर्य यह है कि रामभरोसे का भूखे रहना भी पंजीयन के बिना मान्य नहीं है । साथ में पेट की फोटोकापी भी जमा करनी होगी जो डाक्टर द्वारा सत्यापति हो कि यह रामभरोसे का ही पेट है । इतनी जिल्लतों के बाद भी आम आदमी बुरा नहीं मानता । क्योंकि सरकारी फरमान का बुरा मानना भी राष्ट्रद्रोह मान लिया गया है ।


आज की राजनीति की गाड़ी ठकुर सुहाती के पेट्रोल से चलती है । जी हुजूरी में ही पैसा है, रूतवा है और शांति है । इसमें पंजीयन के लिये जिल्लत नहीं उठानी पड़ती । पेट की भूख शांत करना है तो जी हुजूरी का चिमटा बजाकर भजन गाना क्या बुरा है? प्रभु ‘‘मेरे अवगुण चित न 

धरो’’ । इसमें शर्म किस बात की । आज की राजनीति में शर्म नामक शब्द सिरे से बर्खास्त कर दिया गया है । हमारे पूर्वज भी कह गये हैं कि ‘‘जिसने की शरम उसके फूटे करम’’ आज की व्यवस्था ने उसे जस का तस अपना लिया है । ‘‘शर्म तुम जहाँ कहीं भी हो लौट आओ’’ शीर्षक व्यंग्य संग्रह में दर्ज है । आज के अपडेट होते समय में पुरानी हिदायतों को वापस लाना आउट डेटेड मान लिया गया है । जो शर्म पहले जीवन का आभूषण मानी जाती थी आज वही अभ्रदता और किस्से कहानियों का हिस्सा बन गई है । आज अपनी गलती पर शर्मसार होना अभद्रता की कैटेगरी में शामिल हो गया है, चाहे जितना झूठ बोलो । चाहे जितना दूसरों का सुख छीनकर अपना घर भर लो मगर शर्म मत करो । कुर्सी की खातिर अपने आपको बेंच दो । कोई कुछ नहीं कहेगा । क्योंकि बिकना तो हमारी परंपरा है । जो सदियों से चली आ रही है।


विवेक रंजन जी गांधी और कबीर के सिद्धांतो के हिमायती हैं । एक जगह वे अति संवेदनशील होकर लिखते हैं कि आज खैर मांगने से भी किसी कमजोर की मजबूरी कम नहीं हो सकती । और न ही किसी भूखे को रोटी मिल सकती है । रचनाकार का मानना है कि मांगना केवल एक शब्द मात्र नहीं है । एक आशा है । विश्वास है । प्रार्थना है ।जो किसी मजबूर की हारी हुई आंखों से निकलती है । अतः जब तक व्यवस्था इस मजबूरी को दूर करने का प्रण अपने आचरण में नहीं उतारेगी तब तक किसी रामभरोसे का जीवन सुधर नहीं सकता । आज दिखावे का दौर चल रहा है । जिसमें खाली वायदों के गुब्बारे उड़ाते रहो, समस्यायें वहीं की वहीं रहेंगी । आशय यह है कि जब तक उन गुब्बारों में संवेदनशीलता की हवा नहीं भरी जायेगी तब तक दूर के ढोल सुहावने ही रहेंगे ।


उनके संग्रह में संग्रहीत सभी रचनाएँ सामयिक समस्याओं को लेकर लिखी गई हैं । फिर चाहे शराब की समस्या हो या मास्क की । सीबीआई की बात हो या स्वर्ग के द्वार पर कोरोना टेस्ट की । बिना पंजीकरण के तो आप बीमार भी नहीं पड़ सकते । इस प्रकार हम देखते हैं कि इन रचनाओं को आकार देते समय रचनाकार की पारखी नजर ऊंचाई पर उड़ते द्रोण की तरह चहुँतरफा देखती और परखती है । न केवल देखती है बल्कि उसमें निहित विसंगतियों का विरोध भी करती है । आम आदमी को सचेत करती है । उसे अधिकारों के प्रति सजग होना सिखाती है । लेखक की नजर चाहती है कि जीवन में चारों ओर समरसता का फैलाव हो । ताकि हर आदमी को वे सारे अधिकार मिल सकें जिनका वह अधिकारी होता है । 


संक्षेप में कह सकते हैं कि व्यंग्य लेखन ऐसा पाना है जिसकी सहायता से समाज में फैली  बुराइयों को उखाड़ फेंका जा सकता है । परसाई के शब्दों में व्यंग्य एक ऐसी स्पिरिट है जो समाज को अंधेरे से उजाले की ओर प्रेरित करता है । इसी उद्देश्य के साथ संग्रह की सभी रचनाएँ आदमी को आदमी होने की तमीज सिखाती हुई आगे बढ़ती हैं । पेशे से इंजीनियर होने के नाते उनका संग्रह इस बात की पुरजोर वकालत करता है कि रचनायें लिखी नहीं जाती गढ़ी जाती हैं । वह अपनी वैचारिक छैनी और हथौड़ी से एक एक शब्द के अर्थ और प्रसंग को 

ध्यान में रखते हुये इस प्रकार गढ़ता है कि कोई भी रचना व्यर्थ के शब्दों से बोझीली न होने पाये । उनकी छोटे छोटे कलेवर वाली हर रचना ‘‘देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर’’ वाली बिहारी के दृष्टिकोण को साबित करती है । यही कारण है कि उनकी हर रचना शुरू से अंत तक एक माला में, गुंथे हुये फूलों सी लगती है । समीक्षक यदि संग्रह में किसी त्रुटि का उल्लेख न करें तो उसकी ईमानदारी पर शक होता है । अतः एक बात कहना चाहूंगी कि संग्रह के शीर्षक में जुड़े ‘‘व अन्य व्यंग्य’’ शब्द पढ़ते हुये किसी आधार पाठ्य पुस्तक सा भ्रम होने लगता है । अतः ये शब्द व्यंग्य संग्रह के लिए सार्थक से नहीं लग रहे।


इन्हीं शब्दों के साथ व्यंग्यकार को शुभकामनाएँ देती हूँ और आशा करती हूँ कि उनका यह व्यंग्य संग्रह अपने उद्देश्य में सफल होकर व्यंग्य जगत में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करेगा । 


लेखक - विवेक रंजन श्रीवास्तव    

प्रकाशन- इंडिया नेट बुक्स, दिल्ली

मूल्य - 300/- हार्ड बाउंड

200/- पेपर बैक


          समीक्षाकार

डा. स्नेहलता पाठक

9406351567

नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन

 

वर्ष 2021 के आगमन के अवसर पर
 नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदन
प्रोफ़ेसर चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध A1 शिला कुंज जबलपुर

सदियों से जग करता आया नववर्ष तुम्हारा अभिनंदन 
नई आशा ले करता आया पूजन आराधन विनत नमन
 सबके मन में है उत्सुकता नववर्ष तुम्हारे आने की 
सुख प्रद नवीनता की खुशियां अपने संग संग में लाने की

आओ दे जाओ नवल दृष्टि इस जग में रहने वालों को
 बेमतलब छोटे स्वार्थो हित आपस में उलझने वालों को
 आओ लेकर नूतन प्रकाश इस जग को स्वर्ग बनाने को
 जो दीन दुखी शोषित वंचित उन सब को सुखी बनाने को

 आवश्यक लगता, हो परिवर्तन जन मन के सोच विचारों में
 विद्वेश ना हो सद्भाव बढे आपस के सब व्यवहारों में 
उन्नति हो सबको मिले सफलता सब शुभ कारोबारों  में 
आनंद दायिनी खबरें ही पढ़ने को मिले अखबारों में 

जो कामनाएं पूरी न हुई उनको अब नव आकाश मिले 
जो बंद अंधेरे कमरे हैं उनको सुखदाई प्रकाश मिले 
जो विजय न पाए उनके माथे पर विजय का हो चंदन 
सब जग को सुखप्रद शांति मिले नववर्ष तुम्हारा अभिनंदन

Sunday, December 20, 2020

विश्व सिटिजिन शिप की मांग का समय है आज



विश्व शांति के लिए दुनिया के पदयात्री--- प्रेमकुमार , 21 वी सदी के साहित्यकारों के मंच पर , प्रो राजेशकुमार से विस्तृत बातचीत

विश्व सिटिजिन शिप की मांग का समय है आज 


        आज "21वीं सदी के साहित्यकार" के बैनर तले "दुनिया मेरे कदमों में" कार्यक्रम के अंतर्गत 'दुनिया को पैदल नापने वाली शख्सियत से मुलाकात' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे, विश्व पदयात्री प्रेम कुमार। इनसे बातचीत की वरिष्ठ साहित्यकार और भाषाविद डॉ. राजेशकुमार ने। कार्यक्रम की अध्यक्षता की वरिष्ठ व्यंग्यकार और व्यंग्य यात्रा के संपादक डॉ. प्रेम जनमेजय ने।

          कार्यक्रम का संचालन प्रतिष्ठित व्यंग्यकार परवेश जैन ने किया और दीपा स्वामीनाथन से इष्ट वंदना की। विशिष्ट अतिथियों और श्रोताओं के स्वागत किया दुबई से कवियित्री स्नेहा देव ने। 

         1421 दिन पैदल 17000 किलोमीटर पैदल चलने वाले विश्व पदयात्री प्रेम कुमार  के बारे में विशिष्ट जानकारी दी, वरिष्ठ व्यंग्यकार प्रभात गोस्वामी ने। उन्होंने बताया कि पैदल चलकर दुनिया नापने और विश्व शांति कायम करने के सपने को पूरा करने वाले अहमदाबाद निवासी प्रेम कुमार  भौतिक शास्त्र और दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी रहे हैं। उन्होंने विभिन्न देशों की यात्रा की और "फ्रेंड्स ऑफ ऑल" नामक संगठन का गठन किया । इन्होंने 2 अक्तूबर,1982 से यात्रा शुरू की जो 6 अगस्त, 1986 तक चली। यह यात्रा यूरोप के विभिन्न देशों से होते हुए अमेरिका, जापान के साथ-साथ देश के अनेक राज्यों की यात्रा की। इस दौरान प्रेम कुमार  को पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी, हरिवंश राय बच्चन, अमृता प्रीतम, अरुणा आसिफ अली का आशीर्वाद मिला। कई पुरस्कारों से सम्मानित भी हुए और सम्मान स्वरूप इन्हें अमरीका के बाल्टीमोर की नागरिकता भी मिली। 

        कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए प्रेम कुमार  से बातचीत आरम्भ की राजेश कुमार  ने। पैदल चलने की सार्थकता के सवाल के जवाब में प्रेम कुमार  ने कहा कि चलना इंसान की स्वाभाविक प्रक्रिया है। किसी भी मकसद के लिए, दुनिया तक अपनी बात पहुंचाने के लिए पदयात्रा करना, लोगों को जानना और भाषा-संस्कृति को समझना एक बहुत ही दिलचस्प बात है। इसके पूर्व भी बुद्ध, जैन, विनोबा भावे, महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग ने भी यात्राएं कीं और उनके जो अनुभव रहे उससे उन्हें तो लाभ हुआ ही, दुनिया को भी काफी लाभ मिला। उन्होंने केवल दुनिया को जाना और समझा ही नहीं बल्कि दुनिया को बदलने को भी भरपूर कोशिश की और काफी हद तक अपने मकसद में सफल भी रहे। उन्होंने सबसे महत्वपूर्ण बात कही कि किसी उद्देश्य के साथ चलने की बात ही कुछ और होती है।

         राजेश जी के एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा कि हमने मैंने किसी से पानी के अलावा कुछ नहीं मांगा और कभी पैसा अपने पास नहीं रखा। जब राजेश  ने पूछा कि आपके मन में चलने का ख्याल क्यों आया, इस पर प्रेम कुमार  ने जवाब दिया कि कुछ लोग किताबें लिखते हैं, और कुछ के ऊपर किताबों लिखी जाती हैं, तो मेरे मन में कुछ ऐसा ख्याल आया कि हमें कुछ अलग करना चाहिए। कुछ ऐसा करें कि लोग आपके बारे में किताबें लिखना शुरू करें। मैं किताब क्यों लिखूं, दूसरे लोग हमारे बारे में लिखें तो यह एक बड़ी बात होगी। उन्होंने कहा कि यदि विज्ञान और आध्यात्मिकता - दोनों को जोड़ दिया जाए तो इससे बढ़िया और कुछ नहीं। 

         अपनी यात्रा के अनुभवों के बारे में उन्होंने कहा कि दुनिया के सामने चार प्रश्न हैं -- राष्ट्रवाद, अमीर-गरीब की खाई, रंग-नस्ल का भेद और धार्मिक असहिष्णुता। यदि इन चारों को दुनिया से दूर करना है, मिटाना है तो हमें पहले दुनिया को समझना पड़ेगा। दुनिया को बहुत करीब से देखना पड़ेगा। दुनिया के अधिकांश देश चाहे एक प्रश्न से या दो प्रश्न से या चारों -- इन्हीं प्रश्नों से जूझ रहे हैं। हमें इनका हल निकालना पड़ेगा। उन्होंने अमेरिका की स्थिति के बारे में भी बात की कि किस तरह से वहां लोग परेशान हैं। 

         जब राजेश  ने कुछ रोचक संस्मरण के बारे में पूछा तो उन्होंने चेकोस्लोवाकिया के एक ट्रक ड्राइवर का उल्लेख करते हुए कहा कि मिखाइल मावलोविच नामक एक ट्रक ड्राइवर का उल्लेख किया। रास्ते में जब 'विश्व शांति के लिए पदयात्रा' बैनर लेकर आगे बढ़ रहे थे, तो रुक कर उसने उन्हें पानी पिलाया, साथ पैदल चलने के लिए उसकी कंपनी ने उसे छुट्टी दी और वह 10 दिनों तक उनके साथ पैदल चलता रहा। उन्होंने अमेरिका में पैदल यात्रा की रोचक दास्तान सुनाई। एक छोटे लड़के दोस्ती बढ़ाने के लिए उनकी तरफ हाथ बढ़ाया। उन्होंने कहा कि पैदल यात्रा दोस्ती बढ़ाने की यात्रा है, दोस्ती का पुल बनाने की यात्रा है।

       बातचीत के उपरांत प्रश्न-उत्तर में सत्र रामस्वरूप  के प्रश्न के जवाब में प्रेम कुमार  ने कहा कि दो प्रकार की ताकते हैं --- एक जोड़ने की और दूसरा तोड़ने की। हमें इन्हीं दो प्रश्नों से, इन्हीं दो ताकतों से पार पाना होगा। उन्होंने कहा कि उन्हीं देशों ने प्रगति की है जिन्होंने दूसरों के लिए दरवाजे खोले हैं। 

विवेक रंजन श्रीवास्तव ने विश्व शांति के उद्देश्य से की गई उनकी पदयात्रा  के संदर्भ में कहा कि अब ग्लोबल सिटीजन शिप की जरूरत लगती है , पक्षी तो मुक्त गगन में बिना वीसा या पासपोर्ट के साइबेरिया से भारत की यात्रा करते हैं पर इंसानो के लिए बार्डर हैं सरकारें हैं । आज आवश्यकता है कि अंतरिक्ष , विज्ञान , अन्वेषण आविष्कार पर मानव मात्र का अधिकार घोषित हो । यह समय विश्व सरकार का समय है ।  जिससे प्रेमकुमार जी ने समर्थन व्यक्त किया ।

           रणविजय राव के प्रश्न के जवाब में प्रेम कुमार  ने कहा कि रास्ते में कठिनाइयां आती हैं और बहुत आती हैं, लेकिन जब हम किसी उद्देश्य को लेकर चलते हैं तो वे कठिनाइयां बहुत छोटी लगने लगती हैं। उन्होंने कहा कि लोग मदद के लिए आते हैं और अपनी इतनी रातों में उन्हें केवल आठ रातें सड़कों पर गुजारनी पड़ीं।

         प्रेम कुमार ने 'प्याज' पर व्यंग्य कविता सुनाकर अपनी काव्य प्रतिभा का भी परिचय दिया। प्याज के छिलके, प्याज की उपयोगिता और प्याज के घटते-बढ़ते दामों पर बहुत ही रोचक और उम्दा कविता सुनाई।

वरिष्ठ कवि डॉ. संजीव कुमार ने कोरोना से पीड़ित होते हुए भी कार्यक्रम में शिरकत करके अपना जज़्बा दिखाया, और कहा कि प्रेम कुमार जी के संस्मरण अद्भुत और विरल हैं, और वे उन्हें प्रकाशित करके लोगों के हित के लिए सामने लाना चाहेंगे।


         अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. प्रेम जनमेजय ने कहा कि प्रेम कुमार  के सामने जो उद्देश्य हैं, जो उद्देश्य लेकर वह चल रहे हैं, हम सब उनके सामने बौने हैं। उन्होंने कहा कि प्रेम कुमार  एक पाठशाला हैं और हम सब उस पाठशाला के विद्यार्थी। उन्होंने कहा कि पर्यटन हमारा स्वार्थ होता है, पर पदयात्रा के लिए हमारा कोई मकसद होता है। प्रेम कुमार  पहाड़ों और जंगलों में पगडंडियां बनाने वाले हैं। वे अपने हाथ में कुदाल लेकर चलते हैं जो एक बहुत बड़ी बात है। उन्होंने कहा कि पदयात्रा हमें श्रमशील होना सिखाती है और जिम्मेदारियों का एहसास कराती है। 


         जापान की राजधानी टोकियो से प्रेम कुमार  की अर्धांगिनी तोमो  ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने प्रेम  के बारे में कई रोचक दास्तान सुनाए। उन्होंने बड़ी बेबाकी से अपने अनुभव हिंदी भाषा में साझा की जिसे सुनकर हम सभी दर्शकों को बहुत खुशी हुई। कार्यक्रम में प्रेम कुमार  की तीनों बेटियां अलग-अलग देशों --- कनाडा, फ़्रांस और जापान से जुड़ी थीं। 

          धन्यवाद ज्ञापन किया वरिष्ठ व्यंग्यकार और कवि डॉ. लालित्य ललित ने। ललित  ने प्रेम कुमार  के दोस्ती के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने भी अपने घर का पता बताया जिसे सुनकर हम सभी मुस्कुराए बिना नहीं रहे। उन्होंने कहा कि यह बहुत ही अनोखा और अनूठा कार्यक्रम रहा, आज देश और दुनिया के अनेक जगहों से लोग जुड़े और एक रोचक संस्मरण हमें सुनने को मिला। 


          तकनीकी सहयोग दिया लोकप्रिय साहित्यकार सुरेश कुमार मिश्र  ने। कार्यक्रम में देश और दुनिया सहित समूह के सदस्य बड़ी संख्या में जुड़े रहे।

बता दूं क्या / पुस्तक चर्चा

 पुस्तक चर्चा

बता दूं क्या...

व्यंग्य संग्रह  

संपादन .. डा प्रमोद पाण्डेय

सह संपादक .. राम कुमार

पृष्ठ १४४ , मूल्य २९९ रु हार्ड कापी

ISBN 9788194815273

वर्ष २०२०

आर के पब्लिकेशन , मुम्बई

चर्चाकार .. विवेक रंजन श्रीवास्तव , जबलपुर


महाराष्ट्र के राजभवन में , राज्यपाल कोशियारी जी ने विगत दिनो आर के पब्लिकेशन , मुम्बई

से सद्यः प्रकाशित व्यंग्य संग्रह बता दूं क्या... का विमोचन किया . संग्रह में देश के चोटी के पंद्रह व्यंग्यकारो के महत्वपूर्ण पचास सदाबहार व्यंग्य लेख संकलित हैं . एक मराठी भाषी प्रदेश से प्रकाशन और फिर बड़े गरिमामय तरीके से राज्यपाल जी द्वारा विमोचन यह रेखांकित करने को पर्याप्त है कि हिन्दी साहित्य में व्यंग्य की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है . लगभग सभी समाचार माध्यमो से इस किताब के विमोचन की व्यापक चर्चा देश भर में हो रही है .

पाठक व्यंग्य पढ़ना पसंद कर रहे हैं . लगभग प्रत्येक समकालीन घटना पर व्यंग्य लेखन , त्वरित प्रतिक्रिया व आक्रोश की अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में पहचान स्थापित कर चुका है . यह समय सामाजिक , राजनैतिक , साहित्यिक विसंगतियो का समय है . जहां कहीं विडम्बना परिलक्षित होती है , वहां व्यंग्य का प्रस्फुटन स्वाभाविक है . हर अखबार संपादकीय पन्नो पर प्रमुखता से रोज ही स्तंभ के रूप में व्यंग्य प्रकाशन करते हैं . ये और बात है कि तब व्यंग्य बड़ा असमर्थ नजर आता है जब उस विसंगति के संपोषक जिस पर व्यंग्यकार प्रहार करता है , व्यंग्य से परिष्कार करने की अपेक्षा , उसकी उपेक्षा करते हुये , व्यंग्य को परिहास में उड़ा देते हैं . ऐसी स्थितियों में सतही व्यंग्यकार भी व्यंग्य को छपास का एक माध्यम मात्र समझकर रचना करते दिखते हैं . पर इन सारी परिस्थितियो के बीच चिरकालिक विषयो पर भी क्लासिक व्यंग्य लेखन हो रहा है . यह तथ्य बता दूं क्या... में संकलन हेतु चुने गये व्यंग्य लेख स्वयमेव उद्घोषित करते हैं . जिसके लिये युवा संपादक द्वय बधाई के सुपात्र है .

बता दूं क्या... पर टीप लिखते हुये प्रख्यात रचनाकार सूर्यबाला जी आश्वस्ति व्यक्त करती है कि अपनी कलम की नोंक तराशते वरिष्ठ व युवा व्यंग्यकारो का यह संग्रह व्यंग्य की उर्वरा भूमि बनाती है . निश्चित ही इस कृति में पाठको को व्यंग्य के कटाक्ष का आनंद मिलेगा , विडम्बनाओ पर शब्दो का अकाट्य प्रहार मिलेगा , व्यंग्य के प्रति रुचि जागृत करने और व्यंग्य के शिल्प सौष्ठव को समझने में भी यह कृति सहायक होगी . हय संग्रह किसी भी महाविद्यालयीन पाठ्य क्रम का हिस्सा बनने की क्षमता रखती है क्योंकि इसमें में पद्मश्री डा ज्ञान चतुर्वेदी , डा हरीश नवल , डा सुधीर पचौरी , श्री संजीव निगम , श्री सुभाष काबरा , श्री सुधीर ओखदे , श्री शशांक दुबे , श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव , डा वागीश सारस्वत , सुश्री मीना अरोड़ा , डा पूजा कौशिक , श्री धर्मपाल महेंद्र जैन , श्री देवेंद्रकुमार भारद्वाज , डा प्रमोद पाण्डेय व श्री रामकुमार जैसे मूर्धन्य , बहु प्रकाशित व्यंग्य के महारथियो सहित युवा व्यंग्य शिल्पियो के स्थाई महत्व के दीर्घ कालिक व्यंग्य प्रकाशित किये गये हैं . व्यंग्यकारो में व्यवसाय से चिकित्सक , इंजीनियर , बैंककर्मी , शिक्षाविद , राजनेता , लेखक , संपादक , महिलायें , मीडीयाकर्मी , विदेश में हिन्दी व्यंग्य की ध्वजा लहराते व्यंग्यकार सभी हैं , स्वाभाविक रूप से इसके चलते रचनाओ में शैलीगत भाषाई विविधता है , जो पाठक को एकरसता से विमुक्त करती है .

किताब का शीर्षक व्यंग्य युवा समीक्षक डा प्रमोद पाण्डेय व कृति के संपादक का है , जिसमें उन्होने एक प्रश्न वाचक भाव बता दूं क्या .. को लेकर मजेदार व्यंग्य रचा है .आज जब सूचना के अधिकार से सरकार पारदर्शिता का स्वांग रच रही है ,एक क्लिक पर सब कुछ स्वयं अनावृत होने को उद्यत है , तब भी  सस्पेंस , ब्लैकमेल से भरा हुआ यह वाक्य बता दूं क्या किसी की भी धड़कने बढ़ाने को पर्याप्त है , क्योकि विसंगति यह है कि हम भीतर बाहर वैसे हैं नही जैसा स्वयं को दिखाते हैं . डा प्रमोद पाण्डेय के ही अन्य व्यंग्य भावना मर गई तथा गाली भी किताब का हिस्सा हैं . केनेडा के धर्मपाल महेंद्र जैन की तीन रचनायें साहब के दस्तखत , कलमकार नारे रचो व महालक्षमी जी की दिल्ली यात्रा प्रस्तुत की गई हैं . श्री देवेनद्र कुमार भारद्वाज की रचनायें काला धन , कलम किताब और स्त्री नरक में परसू , इश्तिहारी शव यात्रा व किट का कमाल , और रिटेलर चीफ गेस्ट का जमाना हैं .विवेक रंजन श्रीवास्तव देश के एक सशक्त व्यंग्यकार के रूप में स्थापित हैं  उनकी कई किताबें छप चुकी हैं कुछ व्यंग्य संकलनो का संपादन भी किया है उनकी पकड़ व संबंध वैश्विक हैं ,दृष्टि गंभीर है " आत्मनिर्भरता की उद्घोषणा करती सेल्फी" , "आभार की प्रतीक्षा" , और "श्रेष्ठ रचनाकारो वाली किताब के लिये व्यंग्य " उनकी प्रस्तुत रचनायें हैं . जिन अति वरिष्ठ व्यंग्य कारो से संग्रह स्थाई महत्व का बन गया है उनमें सबसे बड़ी उपलब्धि पद्मश्री डा ज्ञान चतुर्वेदी जी के व्यंग्य " मार दिये जाओगे भाई साब " एवं "सुअर के बच्चे और आदमी के" हैं ये व्यंग्य इंटरनेट या अन्य स्थानो पर पूर्व सुलभ स्थाई महत्व की उल्लेखनीय रचनायें हैं  . डा हरीश नवल जी की छोटी हाफ लाइनर ,बड़े प्रभाव वाली रचनायें हैं " गांधी जी का चश्मा" , लाल किला और खाई , चलती ट्रेन से बरसती शुचिता , वर्तमान समय और हम , अमेरिकी प्याले में भारतीय चाय . ये रचनायें वैचारिक द्वंद छेड़ते हुये गुदगुदाती भी हैं . डा सुधीश पचौरी साहित्यकार बनने के नुस्खे बताते हैं , हवा बांधने की कला सिखाते और हिन्दी हेटर को प्रणाम करते दिखते हें .  गहरे कटाक्ष करते हुये संजीव निगम ने "ताजा फोटो ताजी खबर" लिखा है , उनकी "अन्न भगवान हैं हम पक्के पुजारी" तथा तारीफ की तलवार , स्पीड लेखन की पैंतरेबाजी , एवं तकनीकी युग के श्रवण कुमार पढ़कर समझ आता है कि वे बदलते समय के सूक्ष्म साक्षी ही नही बने हुये हैं अभिव्यक्ति की उनकी क्षमतायें भी उन्हें लिख्खाड़ सिद्ध करती हैं . सुभाष काबरा जी वरिष्ठ बहु प्रकाशित व्यंग्यकार हैं , उनके तीन व्यंग्य संकलन में शामिल हैं , बोरियत के बहाने , अपना अपना बसंत एवं विक्रम बेताल का फाइनल किस्सा . सुधीर ओखदे जी बेहद परिपक्व व्यंग्यकार हैं , उनकी रचना सिगरेट और मध्यमवर्गीय , ईनामी प्रतियोगिता , व आगमन नये साहब का  पठनीय रचनायें हैं . शशांक दुबे व्यंग्य के क्षेत्र में जाना पहचाना स्थापित नाम हैं . दाल रोटी खाओ , आपरेशन कवर , रद्दी तो रद्दी है उनकी महत्वपूर्ण रचनाये ली गई हैं . डा वागीश सारस्वत परिपक्व संपादक संयोजक व स्वतंत्र रचनाकार हैं , उन्होंने अपने व्यंग्य दीपक जलाना होगा , होली उर्फ इंडियन्स लवर्स डे , चमचई की जय हो , बेचारे हम के माध्यम से स्थितियों का रोचक वर्णन कर पठनीय व्यंग्य प्रस्तुत किये हैं .

महिला रचनाकारो की भागीदारी भी उल्लेखनीय है . मीना अरोड़ा के व्यंग्य जिन चाटा तिन पाईयां , भविष्य की योजना , योजना में भविष्य अलबेला सजन आयो रे , हेकर्स , टैगर्स , हैंगर्स उल्लेखनीय है . डा पूजा कौशिक बेचारे चिंटुकेश्वर दत्त , बुरे फंसे महाराज , पर्स की आत्मकथा लिखकर सहभागी हैं .

पुस्तक में व्यंग्य लेखों के एवं लेखको के चयन हेतु संपादक डा प्रमोद पाणडेय  व प्रकाशक तथा सह संपादक श्री रामकुमार बधाई के पात्र हैं .  सार्थक , दीर्घकालिक चुनिंदा व्यंग्य पाठको को सुलभ करवाने की दृष्टि से सामूहिक  संग्रह का अपना अलग महत्व होता है , जिसे दशको पहले तारसप्तक ने हिन्दी जगत में स्थापित कर दिखाया था , उम्मीद जागती है कि यह व्यंग्य संग्रह , व्यंग्य जगत में चौदहवी का चांद साबित होगा और ऐसे और भी संग्रह संपादक मण्डल के माध्यम से हिन्दी पाठको को मिलेंगे  . शुभेस्तु .