Wednesday, February 11, 2026

बारी बरसी खटन गया सी...

 व्यंग्य 

बारी बरसी खटन गया सी...

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


बारी बरसी खटन गया सी...ये गीत पंजाब के उस मेहनतकश का लोक गीत है, जो बारह साल परदेस में कमाकर लौटा है। हर बार उसकी झोली में कुछ नया गिफ्ट होता है , कभी लोई, कभी सितारा, कभी गहना, कभी चूल्हा-ताला।  ढोल बजता है। भांगड़ा चलता है। और सारा गांव, साले-बिरादरी नाच उठते हैं। क्योंकि मेहनत रंग लाई है। कुछ हाथ लगा है।


अब इसी गीत की रस्म को कांग्रेस पार्टी ने राजनीति का नया मनोरंजक कायदा बना लिया है।


फर्क सिर्फ इतना है कि वहां बारह साल बाद सच में कुछ लेकर , लौटा था। ये लोग रोज़ सुबह उठते हैं, खाली हाथ में थाल सजाते हैं, ऊपर से झूठे सबूत की चटनी परोसते हैं, और ढोल बजवा देते हैं"और अब डांस करेंगे सारे के सारे!"


बारी बरसी खटन गया सी।

हर चुनाव, हर प्रेस कॉन्फ्रेंस, हर बजट सत्र,  यही क्रम है।

हाथ में कुछ ठोस नहीं, मगर उल्लास ऐसा मानो पूरी दिल्ली जीत ली हो।


राफेल डील, आई, देखी, डांस हुआ। सुप्रीम कोर्ट बैठा, CBI बैठी, ED बैठी, सबने कहा, कुछ नहीं। मगर इनकी थिरकन अभी थमी नहीं। अब राफेल आसमान में उड़ते हैं, और ये ज़मीन पर वही स्टेप्स दोहराते हैं। असल ज़िंदगी में रीप्ले नहीं मिलता, पर यहाँ तो हर साल रीमिक्स है।


चौकीदार चोर है, क्या पंचलाइन थी! इतनी जोरदार कि पार्टी कार्यकर्ता झूम उठे। मगर सबूत? वो तो बाद में देखेंगे, पहले डांस। अब सात साल हो गए। अदालत ने कहा, सबूत नहीं मिला। जाँच एजेंसी ने कहा सबूत नहीं मिला। पर ये कहते हैं "हमें तो अब भी यकीन है।"

यकीन है। 


ईवीएम और वोट चोरी , चुनाव हारो, तुरंत मशीन पर ठुमका लगाओ । कभी बैटरी बदली, कभी हैकिंग, कभी हनुमान चालीसा। मगर जब पूछो कि पंजाब, तेलंगाना, हिमाचल में तुम जीते कैसे? तब मशीन ठीक थी या उसमें भी भगवान का चमत्कार? सवाल सुनते ही डांस और तेज़। क्योंकि यह सवालों के जवाब का नहीं, जश्न का मौका है।


संविधान की प्रति, लाल किताब हाथ में, आँखों में नमी, होंठों पर गांधी, मन में नेहरू, और जेब में... खैर। संविधान बचाओ, लोकतंत्र बचाओ, देश बचाओ। तीनों थाली में सजे, वही ठुमके। पर संविधान पढ़ने का वक्त कहाँ? जब तक अनुच्छेद पढ़ोगे, तब तक कोई और डांस शुरू हो जाएगा।


नरवडे जी की अप्रकाशित पुस्तक, ये तो कमाल है।

अप्रकाशित। यानी अभी छपी नहीं। किसी ने पढ़ी नहीं। उसमें है क्या, पता नहीं। मगर प्रेस कॉन्फ्रेंस हो चुकी, आरोप लग चुके, डांस शुरू हो चुका। फेक कापी हवा में लहरा कर डांस किया जा चुका । साहित्य जगत में किताब छपने पर चर्चा होती है, यहाँ किताब छपने से पहले ही चर्चा, आरोप, और भांगड़ा , सब एक साथ।


अमेरिका से डील, अब ये तो सबसे ताज़ा एंट्री है। डील में हुआ क्या, पता नहीं। किसने की, कैसे की, कितने में की , बारीक अध्ययन, , विवेचन, जानकारी शून्य है। मगर आरोप हवा में हैं, अडानी और अंबानी को उछाल कर, हवा हवाई डांस चल रहा है। इतनी ऊर्जा है,  कि पावर  परचेज के टाई-अप करना चाहिए। 


अब सवाल यह नहीं कि इन मुद्दों में दम है या नहीं।

सवाल यह है कि जब हर बार थाल खाली निकलती है, तो फिर भी ढोल क्यों बजता है?

भेड़िया आया भेड़िया आया, आखि़र कब तक?

लकड़ी की हांडी कितनी बार चढ सकती है?

क्योंकि अब आरोप  कोई बहस नहीं, रस्म बन गए है।और रस्में सबूतों की मोहताज नहीं होतीं।


राफेल झूठा, चौकीदार सच्चा, फिर भी नारा वही।

ईवीएम सही, वोट सुरक्षित, फिर भी चीख वही।

किताब अप्रकाशित, आरोप प्रकाशित, फिर भी थिरकन वही।


बारी बरसी खटन गया सी।

हर बार खाली हाथ,पर  हर बार पूरा उल्लास।


सारी दुनिया देख लई, माँ तेरे जेहा न कोई।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

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