पुस्तक चर्चा
पाखंड के विरुद्ध विजी श्रीवास्तव का निर्भीक शब्द-युद्ध .. "ए जी! सुनते हो' (व्यंग्य संग्रह)
चर्चा.. विवेक रंजन श्रीवास्तव
विजी श्रीवास्तव का सद्यः प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ए जी सुनते हो , समकालीन हिंदी साहित्य में व्यंग्य की एक ऐसी मशाल बन कर प्रस्तुत हो रहा है जो समाज के अंधेरे कोनों को उजागर करता दिखता है। यह पुस्तक शीर्षक के अनुरूप मात्र हल्का फुल्का हँसाने का साधन नहीं, बल्कि समाज के सामूहिक पाखंड और नैतिक पतन का एक गहरा अन्वेषण है । यह संग्रह पाठकों से कहता है, ए जी सुनते हो? पढ़ो, सुनो , गुनो, और हो सके तो कुछ करो भी ।
लेखक ने माइनिंग में होते व्यापक भ्रष्टाचार को समझाने के लिए शब्दों को ही प्रयोगशाला बना दिया है। वे 'खान' को (यानी खाते रहना) और 'खनिज' को 'निज' (स्वयं का) में बदलकर यह बताते हैं कि कैसे सार्वजनिक खनिज संपदा माफिया की निजी लूट का साधन बन गई है।
लेखक ने उधारी का शहीद, इस नवाचारी पदबंध के माध्यम से पूँजीवादी व्यवस्था पर प्रहार किया है। जो व्यक्ति कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या करता है, वह व्यवस्था के लिए केवल ' शहीद' बनकर रह जाता है।
'कफ़न चाहिए तो बोलो' रचना में दिखाया गया है कि भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि सरकारी तंत्र मृतकों को मुफ्त कफ़न बाँटने की योजना में भी अपने लिए 'कमीशन' की गुंजाइश ढूँढ लेता है।
चम्मच घुमाना , का रोचक प्रयोग लेखक की शैली बताता है। एक सड़क ठेकेदार का यह कहना कि उसने ठेका लेने के लिए 'कितनी ही जगह चम्मच घुमाया था' (रिश्वत दी थी), शासन प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार की परतें खोलता मारक स्टेटमेंट है।
'ए जी! सुनते हो' , पाखंड के विरुद्ध एक निर्भीक शब्द-युद्ध है।
विजी श्रीवास्तव का यह व्यंग्य-संग्रह आधुनिक जीवन की विसंगतियों का एक 'सोशल क्रॉस-सेक्शन' है।
यह पुस्तक अपनी भाषा की मारक क्षमता और शिल्प की नवीनता के कारण विशिष्ट बन पड़ी है।
शब्द-कीमियागरी और भाषाई प्रहार जबर्दस्त हैं।
लेखक के पास शब्दों का 'संप्रभु अधिकार' है। वे 'चूना लगाना' जैसे लोक-मुहावरों को राजनीतिक विचारधारा के स्तर तक ले जाते हैं। 'चूना मंत्री' या 'विशेष अतिथि' जैसे शब्दों के माध्यम से वे समाज के उस वर्ग पर चोट करते हैं जो बिना किसी उपयोगिता के केवल 'मंच का बैलेंस' (फोटो खिंचवाने) के लिए मौजूद रहता है।
संस्थागत पाखंड का पर्दाफाश करने में लेखक सफल है।
'चरण रज का अभिलाषी' में लेखक ने साहित्यिक और अकादमिक बाज़ार के पतन को दिखाया है। जहाँ योग्यता की जगह 'नेटवर्किंग' और चाटुकारिता ने ले ली है। जब एक युवक भ्रष्ट लोगों की चरण रज इकट्ठा करके बंजर खेत को उर्वर बनाने का दावा करता है, तो यह इस बात का प्रतीक है कि भ्रष्टाचार ही हमारा नया जीवन-स्रोत बन चुका है । लेखक मीडिया और तकनीक पर कटाक्ष करने में पीछे नहीं रहते ।
'आत्मा से मिलाप' में टीआरपी की दौड़ , अंधी होती पत्रकारिता को निशाना बनाया गया है। वहीं 'ओटीपी आ गया' और 'कस्टमर केयर के चक्रव्यूह में फँसा अभिमन्यु' जैसी रचनाएँ दिखाती हैं कि कैसे आधुनिक तकनीक ने जीवन को सुलभ बनाने के बजाय उसे अधिक खीज भरा और जटिल बना दिया है।
मानवीय संवेदनाओं का क्षरण लेखक के निशाने पर है। लेखक इस बात से व्यथित हैं कि आज का मनुष्य संवेदना शून्य होता जा रहा है। 'कल शायद श्मशान जाना पड़े' जैसी सूचना पर व्यक्ति दुखी होने के बजाय अपने 'अपॉइंटमेंट' बिगड़ने की चिंता करता है। जब समाज में न्याय और रोटी की खबरें छोटे कॉलम में सिमट जाती हैं और जूता उछालने जैसी घटनाएँ 'हेडलाइन' बनती हैं, तो लेखक की निराशा एक तीखे व्यंग्य के रूप में फूटती है।
'एजी! सुनते हो' एक अत्यंत सजग और सतर्क, सतत् व्यंग्य दृष्टि का परिणामी ,सुदृढ़ लेखन है। विजी श्रीवास्तव ने उपदेश देने के बजाय हास्य और फंतासी के माध्यम से पाठकों को चेताया है। यह पुस्तक समकालीन समय के कठिन सवालों से मुठभेड़ करती है और हमें अपने भीतर झाँकने पर विवश करती है।
पार्टी के अनुशासित सिपाहियों की महफिल,
लिव इन की कहानी का अंत,चूने की लकीर,और सुनाओ भाभी कैसी हैं,
कृषि दर्शन में जूते की खेती,क्या डिलिट किया,शोक सभा की तैयारियाँ,सावधान ! खाँसना मना है,स्वतंत्रता दिवस की बूंदी और ट्रिलियन के शून्य,कुत्तों का नामकरण , अपनी पर आने वालो अब आ ही जाओ ,बिल्ली की शिट्टी-न लीपने की न पोतने की, तेल, तेल की धार और फैट-फ्री आम आदमी , हिंदी संस्थान का कुत्ता,अपने पाले में हमें तो मत गिनो यार..,
उल्लू के पट्टे कभी कम न होंगे,स्वदेशी मुर्गी का हिंदी दर्शन,विशेष-अतिथि, पतन के मार्गों पर गड्ढों का नामकरण,समर्थन का मूल्य,इन्साफ का तलबगार,ग्लूकोज के बिस्कुट का साहित्य के विकास में योगदान,
नींद में बिकती इन्सानियत,लोकतंत्र घायल है,अच्छे डॉक्टर से इलाज कराओ,हुआ हुआ न हुआ हमला,हलो चेक हलो,कोरोना वायरस का अभिनंदन समारोह,हैरान हैं सड़कें,साढ़े इक्कीसवीं सदी में सब्जी की साहसिक खरीदी,शांति के मसीहा के बहुरंगी रूमाल,
जैसे अपेक्षाकृत लंबे शीर्षकों वाली किन्तु गहरे मंतव्य की , हर वाक्य में सार्थक कटाक्ष से भरी रचनाएं एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर वैचारिक संप्रेषण करती हैं। सारी किताब विजी श्रीवास्तव की परिपक्व लेखनी से परिचित करवाती है। किताब पाठक को व्यंग्य का आनंद प्रदान करने वाली है। भाषा , शैली , अभिव्यक्ति, संप्रेषण सधा हुआ है। इसे पढ़कर मैं आश्वस्त हूं कि पुस्तक एजी सुनते हो , समकालीन व्यंग्य जगत में विशिष्ट पहचान स्थापित करेगी ही करेगी। पुस्तक वनिका पब्लिकेशन से प्रकाशित हुई है, और नई दिल्ली पुस्तक मेले में हाल ही कृति का विमोचन हुआ है।
चर्चा .. विवेक रंजन श्रीवास्तव
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कैसा लगा ..! जानकर प्रसन्नता होगी !