Saturday, February 14, 2026

प्रेमचन्द के साहित्य में व्यंग्य

 प्रेमचंद के साहित्य में निहित व्यंग्य


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

ए 233 ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी जे के रोड भोपाल 462023


कथा सम्राट का व्यंग्यबोध


मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६) हिंदी साहित्य के इतिहास में एक युगप्रवर्तक रचनाकार के रूप में स्थापित हुए हैं। उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता आदर्शोन्मुख यथार्थवाद रहा, जिसके अंतर्गत उन्होंने भारतीय समाज के यथार्थ चित्रण के साथ-साथ उसमें सकारात्मक परिवर्तन की रचनाएं की हैं , जो क्रिएटिव हिंदी कथा साहित्य की धरोहर है। उनकी रचनाओं में व्यंग्य की एक अंतर्निहित सशक्त धारा विद्यमान है, जो सामाजिक कुरीतियों, राजनीतिक विसंगतियों, धार्मिक पाखंड और मानवीय दुर्बलताओं पर करारी चोट करती दिखती है।


प्रेमचंद का सम्पूर्ण साहित्य 1906 से 1936 के बीच लिखा गया, जो उस दौर का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक दस्तावेज है। 

प्रेमचंद के लेखन की विशेषता यह है कि वह कटु और आक्रामक होने के बजाय रचनात्मक और सकारात्मक है, जिसका उद्देश्य पाठक की विवेकशीलता को जगाना और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणा देना है। इस हेतु उन्होंने व्यंग्य के उपालंभों का खूबसूरत उपयोग किया है।


व्यंग्य का सैद्धांतिक आधार और प्रेमचंदीय लेखन...


व्यंग्य साहित्य की वह विधा है जो विडंबना, कटाक्ष और हास्य के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक विसंगतियों पर प्रहार करती है। प्रेमचंद के साहित्य में व्यंग्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और नैतिक जागरण का माध्यम बना है।


प्रेमचंद के व्यंग्य के प्रमुख लक्ष्यों में धार्मिक आडंबर, सामंती मानसिकता, नौकरशाही भ्रष्टाचार, पूँजीवादी शोषण, जातिगत भेदभाव और स्त्री के प्रति अन्याय पर सतत प्रहार शामिल हैं। उन्होंने अपने व्यंग्य प्रयोग से किसी व्यक्ति विशेष के बजाय पूरी सामाजिक व्यवस्था और मानसिकता पर केंद्रित लेखन किया है।


धार्मिक आडंबर और पाखंड पर व्यंग्य ..


प्रेमचंद के साहित्य में धार्मिक अनुष्ठानों और धर्मगुरुओं के पाखंड पर करारा व्यंग्य मिलता है। उनके विचार में धर्म मनुष्य की आंतरिक नैतिकता और सामाजिक समरसता का मार्गदर्शक होना चाहिए, बाहरी दिखावा नहीं।


प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'सवा सेर गेहूँ' में एक ब्राह्मण पंडित और कुम्हार के माध्यम से धार्मिक पाखंड, छुआछूत और जातिगत भेदभाव पर गहरा प्रहार किया गया है। पंडित का चरित्र उन तथाकथित धर्माचार्यों का प्रतीक है, जो धर्म को स्वार्थ सिद्धि का साधन बना लेते हैं।


इसी प्रकार 'मंदिर और मस्जिद' कहानी में सांप्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता पर जबर्दस्त व्यंग्य है। दरवेश का कथन कि "मंदिर और मस्जिद तो ईंधन-पत्थर के ढेर हैं, असली ईश्वर तो तुम्हारे हृदय में बसता है" धर्म की वास्तविक भावना को उजागर करता है।


नौकरशाही और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर व्यंग्य ..


प्रेमचंद के साहित्य में तत्कालीन ब्रिटिश शासन और नौकरशाही तंत्र पर भी जमकर व्यंग्य किया गया है। उनकी रचनाओं में अधिकारियों के ढुलमुल व्यवहार, रिश्वतखोरी और जनता के प्रति उदासीनता का मार्मिक चित्रण मिलता है।


'नमक का दरोगा' कहानी हिंदी साहित्य में नौकरशाही पर व्यंग्य की क्लासिक कहानी मानी जाती है। इस कहानी का नायक वंशीधर एक ईमानदार नमक इंपेक्टर है, जो रिश्वत लेने से इनकार कर देता है। कहानी का अंत इस व्यंग्य के साथ होता है कि पूँजीपति वर्ग अंततः ईमानदारी का उपयोग अपने हितों की रक्षा के लिए ही करता है। यह सब आज भी प्रासंगिक लगता है।


प्रेमचंद की 'ओझा' कहानी में न्यायिक व्यवस्था पर जबर्दस्त व्यंग्य कटाक्ष है। इस कहानी में वकीलों को "ओझा" कहकर संबोधित किया गया है, जो उनके समकाल का अंधविश्वास और ढोंग से जुड़ा शब्द है। प्रेमचंद लिखते हैं "ये ओझा लोग न्याय की देवी के पुजारी हैं, इनकी पूजा-अर्चना किए बिना न्याय की देवी प्रसन्न नहीं होती।"


आर्थिक शोषण और सामंतवाद पर व्यंग्य ..


प्रेमचंद के साहित्य में आर्थिक विषमता और सामंतवादी शोषण पर गहरा व्यंग्य पठनीय है। उनके उपन्यास 'गोदान', 'रंगभूमि' और 'प्रेमाश्रम' में किसान जीवन की त्रासदी और पूँजीवादी शोषण का मार्मिक चित्रण है।


'गोदान' प्रेमचंद का सर्वाधिक चर्चित उपन्यास है, जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक संबंधों का यथार्थ चित्रण है। इस उपन्यास का नायक होरी एक गरीब किसान है, जो अपने छोटे से खेत में जीवनयापन करता है, किन्तु कर्ज़ और लगान के बोझ तले दबकर अंततः उसकी मृत्यु हो जाती है।


इसी तरह 'पूस की रात' कहानी में किसान जीवन की विवशता और शोषण पर मार्मिक व्यंग्य है। कहानी का नायक हाल्कू एक गरीब किसान है, जिसके पास रात में ओढ़ने के लिए कंबल नहीं है। इस कहानी में हल्कू का कुत्ता कर्मरत और भोला प्राणी है, जिसके अपने मालिक के साथ सहयोग और वफादारी का संबंध प्रस्तुत किया गया है। यह चित्रण मानवीय संबंधों की कटुता और सामंती व्यवस्था की क्रूरता पर गहरा व्यंग्य है।


स्त्री-पुरुष असमानता और पितृसत्ता पर व्यंग्य...


प्रेमचंद के साहित्य में तब की स्त्री जीवन की व्यथा और पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर तीक्ष्ण व्यंग्य मिलता है। उन्होंने दहेज प्रथा, विधवा विवाह निषेध, स्त्री शिक्षा का अभाव, बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों पर कटाक्ष किया है।


'निर्मला' उपन्यास में दहेज प्रथा और अनमेल विवाह पर करारा व्यंग्य है। निर्मला एक सुशिक्षित और सुंदर युवती है, जिसका विवाह एक वृद्ध विधुर के साथ कर दिया जाता है। इस अनमेल विवाह के कारण निर्मला का जीवन नर्क बन जाता है और अंततः वह आत्महत्या कर लेती है।


'बड़े घर की बेटी' कहानी में प्रेमचंद ने स्त्री शिक्षा और नारी स्वतंत्रता पर बल दिया है। कहानी की नायिका बेनी एक उच्च कुल की लड़की है, जो शिक्षित और स्वतंत्रचेता है। इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद ने उन उच्च कुलीन परिवारों पर व्यंग्य किया है, जो दिखावटी शिष्टता और रूढ़िवादिता में जकड़े हुए हैं।


प्रेमचंद के व्यंग्य की साहित्यिक विशेषताएँ...


प्रेमचंद के व्यंग्य की कुछ विशिष्ट साहित्यिक विशेषताएँ हैं, जो उनके साहित्य को विशिष्ट और प्रभावशाली बनाती हैं...


चरित्र चित्रण की यथार्थपरकता..


प्रेमचंद के व्यंग्य की पहली विशेषता है चरित्र चित्रण की यथार्थपरकता है। उनके व्यंग्य प्रयोग में लालित्य है। वे व्यंग्य को मूल कहानी के अभिव्यति के एक उपकरण के रूप में उपयोग करते हैं। उन्होंने आजकल प्रचलित स्वतंत्र व्यंग्य लेख की तरह नहीं लिखा । उनके कथा पात्र जीवंत और सहज हैं, जो अपने व्यवहार और वाणी के माध्यम से स्वयं ही व्यंग्य प्रस्तुत कर देते हैं। उदाहरण के लिए, 'शतरंज के खिलाड़ी' कहानी में मिर्ज़ा सज्जाद अली और मीर रौशन अली का चरित्र नवाबी शानोशौकत और आलस्य का प्रतीक है।


भाषा शैली की सहजता और प्रवाह ..


प्रेमचंद के व्यंग्य की दूसरी विशेषता है भाषा शैली की सहजता और प्रवाह। उनकी भाषा सरल, बोधगम्य और जनसामान्य की भाषा है, जिसमें मुहावरों और लोकोक्तियों का सुंदर प्रयोग है। उदाहरण के लिए, 'कफन' कहानी में घीसू और माधव का चित्रण गरीबी और अकर्मण्यता का प्रतीक है।


हास्य और व्यंग्य का सन्तुलन...


प्रेमचंद के व्यंग्य की तीसरी विशेषता है हास्य और व्यंग्य का सन्तुलन। उनके व्यंग्य में कटुता नहीं है, बल्कि विनोदी स्वर में गंभीर बात कही गई है। उदाहरण के लिए, 'बूढ़ी काकी' कहानी में बूढ़ी विधवा की उपेक्षा और अनादर का चित्रण है।


नैतिकता और मानवीय मूल्यों का समर्थन..


प्रेमचंद के व्यंग्य की चौथी विशेषता है नैतिकता और मानवीय मूल्यों का समर्थन। उनका व्यंग्य नकारात्मक आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि सकारात्मक मूल्यों की स्थापना की ओर उन्मुख है। उदाहरण के लिए, 'ईदगाह' कहानी में हामिद का चरित्र मानवीय संबंधों की महत्ता को उजागर करता है। यह कारुणिक कहानी है।


प्रेमचंद के व्यंग्य की सार्वकालिक प्रासंगिकता..


मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में निहित व्यंग्य एक सशक्त सामाजिक हस्तक्षेप है, जो रूढ़िवादिता, अन्याय और शोषण के विरुद्ध खड़ा होता है। उनका व्यंग्य नैतिक चेतना और सामाजिक दायित्व से अनुप्राणित है, जिसका उद्देश्य मनुष्य के आंतरिक परिवर्तन के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देना है।


प्रेमचंद का साहित्यिक दृष्टिकोण सर्वहारा वर्ग के प्रति सहानुभूति और शोषक वर्ग के प्रति विरोध से परिभाषित होता है। उन्होंने गरीबों, किसानों, मजदूरों और स्त्रियों की व्यथा को अपने साहित्य का विषय बनाया और उनके अधिकारों और गरिमा के लिए आवाज उठाई।


प्रेमचंद की साहित्यिक विरासत आज भी प्रगतिशील जनवादी साहित्य के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई है। आज के भौतिकवादी युग में, जब नैतिक मूल्य और मानवीय संबंध तेजी से क्षरित हो रहे हैं, प्रेमचंद का साहित्य हमें आत्ममंथन और सामाजिक सुधार की प्रेरणा देता है। प्रेमचंद के शब्दों में "साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का मार्गदर्शन करना है।" और उनका व्यंग्य इस उद्देश्य की पूर्ति का एक सशक्त माध्यम है। वर्तमान व्यंग्यकार प्रेमचंद के लेखन में व्यंग्य प्रयोग के अध्ययन से बहुत कुछ सीख सकते हैं। 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

इन दिनों दुबई में

सानू की

 व्यंग्य 


सानू की — सभ्यता का नया राग


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


सानू की , मतलब मुझे क्या , आग लगे बस्ती में मस्त रहो मस्ती में। 


 जमाना अब किसी भी गंभीर चीज से नहीं, बस आरामदेह अनासक्ति से चलता है। पहले लोग सच को आवाज़ देते थे, जमाने की चिंता में मरा जाता था, अब कहते हैं “सानू की”। यह एक वाक्य नहीं, यह आज के मनुष्य की आत्मा का नया घोषणापत्र है। युद्ध हो, महामारी हो, या किसी देश का मलबा ही क्यों न बन जाए ,  जब तक हमारी सेल्फी ठीक आ रही है, तब तक दुनिया सुरक्षित है।  

कहीं कोई देश धधक रहा है, बच्चे शरणार्थी शिविरों में भूख से तड़प रहे हैं, महिलाएँ सुरक्षा की कगार पर भी असुरक्षित हैं ,  मगर हमारे लिए यह सब बस “ग्लोबल न्यूज़” है। हम थोड़ी देर हेडलाइन देखेंगे, फिर रिमोट फेक देंगे, क्योंकि इस हालत से “सानू की”! हमारे फ्रिज में कोल्ड ड्रिंक है, नेटफ्लिक्स पर नया शो है, और ट्वीट्स पोस्ट करने के लिए फ्री वाई-फाई है।   राजनीति की दुनिया में नेता भाषणों से झाग उड़ा रहे हैं, संसद में आवाज़ें उठती हैं और जल्द ही मोबाइल की रीलों में घुल जाती हैं। जनता के हिस्से में जो रह जाता है, वह है “सानू की” की मानसिक शांति। अब किसी का खून सस्ता है, किसी का झूठ अमूल्य, और किसी की संवेदना ‘डाटा लिमिट’ से बंधी हुई। विपक्ष हो या सत्ताधारी ,  दोनों के बीच एक अद्भुत एकता है कि जनता को उदासीन बनाकर रखा जाए। और जनता ने भी यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई है । सड़क पर बड़े से बड़ा हादसा हो जाए , उसे अनदेखा कर निकल लेना जमाने की रफ्तार में मज़बूरी है,“सानू की” ।समाज की हालत ऐसी हो गई है कि हर अन्याय, हर अपराध पर उतनी ही प्रतिक्रिया होती है जितनी एक विज्ञापन पर  थोड़ी देर में “स्किप ऐड”।   स्त्रियों के प्रति हिंसा बढ़ती है, तो कहा जाता है — “क्या कर सकते हैं, अगले ही क्षण सानू की!” ब्रेन रिसेट कर देता है ।दलितों के साथ अत्याचार होता है, तो कहा जाता है , “कहीं न कहीं तो होता ही रहेगा।” पिछड़ों के हक पर राजनीति की बोली बाज़ार में बिकी जा रही है, और हर दर्शक सोचता है, “अरे भाई, सानू की, मैं तो सभ्य नागरिक हूँ।”  

अब यह “सभ्यता” किसी संवेदना से नहीं, बल्कि सुविधा से मापी जाती है। किसी ने कहा था, “मनुष्य सामाजिक प्राणी है।” पर आज वह “सोशल मीडिया प्राणी” बन गया है। वह दूसरों की तकलीफ़ पर ‘लाइक’ कर साथ  देता है, सैडी इमोशन ढूंढता है मोमबत्ती जलाने से पहले सेल्फी लेता है, और किसी शहीद की ख़बर पर कमेंट लिखता है — “Respect!”, क्योंकि यही डिजिटल युग का नया शोकगीत है  छोटा, चुस्त, और भावनाशून्य। साहित्य भी अब इस गहरी नींद में सोया हुआ है। पहले लेखक समाज की नब्ज़ पकड़ता था, अब इंटरनेट की भाषा पकड़ता है। जो लिखेगा वही छपेगा, जो छपेगा वही बिकेगा  और जो बिकेगा, वही पुरस्कार पाएगा। जो न बिके, वह “सनातन काल का महान लेखक” घोषित कर दिया जाएगा पर मरने के बाद।  

ए आई की इबारत में लोगों के लिखने की शैली गुम हो गई है। पर एक्सप्रेशन में सुविधा कहती है, सानू की। 

 साहित्यिक सभाओं में अब शब्द नहीं, ‘नेटवर्किंग’ है। पुरस्कार अब प्रतिभा नहीं, सेटिंग से तय होते हैं। जो सही लिखे वह किनारे, जो सही लोगों को सलाम करे वो सितारे। चोरी भी अब सम्मान है ,बस उसे “इंटरटेक्स्चुअल इंफ्लुएंस” कह दीजिए। अगर किसी ने सवाल कर दिया तो तैयार रखिए जवाब, “सानू की?”  

 मीडिया पहले चौथा स्तंभ था, अब चौथी दीवार बन गया है , जिसके उस पार सच्चाई नहीं दिखती, बस प्रायोजित रोशनी झिलमिलाती है। बहसें मंचित नाटक बन गई हैं जहाँ हर किरदार अपनी चीख के लिए टाइम स्लॉट तय करता है। बीच में कोई दर्शक चैनल बदल देता है , “सानू की, सब तो एक जैसे हैं।” यही है इस शो के निर्देशक का सपना, दर्शक का जीवित रहना, मगर जागृत न रहना।  

देखिए, इस व्यंग्य के बीच भी हम कभी यह नहीं कहते कि कुछ बदलिए। नहीं, क्योंकि यह ‘सानू की’ का युग है , आत्मकेंद्रित, आत्ममुग्ध, आत्मनिष्ठ। आदमी अब ब्रह्मांड का केंद्र नहीं, वह अपने मोबाइल स्क्रीन का केंद्र है। उसके लिए न्याय, अन्याय, क्रांति, करुणा , सब लॉक स्क्रीन के नोटिफिकेशन हैं जिन्हें स्वाइप करके हटाया जा सकता है।   मनुष्य अब दो रूपों में बंट गया है , एक “ऑनलाइन” आदमी, जो सब कुछ जानता है, और एक “ऑफ़लाइन” आदमी, जो किसी चीज़ से मतलब नहीं रखता। जब दुनिया जल रही होती है, तब भी वह अपने डिजिटल ब्रह्मांड में किसी मीम पर हँस रहा होता है, क्योंकि हँसी ने अब संवेदना को विस्थापित कर दिया है।  

  यह विसंगति किसी एक देश या समाज की नहीं। यह वैश्विक महामारी है , युद्ध से त्रस्त देश हों या अमन के खांचे में सजे लोकतंत्र, हर जगह मनुष्य की प्राथमिकता बदल चुकी है। पहले कहा जाता था “वसुधैव कुटुम्बकम्।” अब नया सिद्धांत है — “Where is my comfort zone, bro?” यानी — सानू की!  

 पश्चिम में हथियारों की नीलामी से लेकर पूरब में भूख की चिताओं तक, हर जगह वही दृश्य है , नेता युद्ध का समर्थन करता है, उद्योगपति सौदा करते हैं, मल्टीनेशनल ए आई के चलते बाजू की डेस्क वाले को नौकरी से हटा देता है और आम आदमी सोचता है, “सानू की, मेरी नौकरी तो बची है।” यही वह मौन सहमति है जो आतंक से भी बड़ी है , यह वह स्वीकृति है जो अत्याचार को जीवनशैली में बदल देती है।  

 आदमी अब अपने भीतर भी नहीं झाँकता। विवेक, करुणा, सवाल , ये सब पुराने ऐप्स की तरह अनइंस्टॉल कर दिए गए हैं। जो बचा है, वह है “मैं”। यह “मैं” अब किसी तत्वमीमांसा का प्रतीक नहीं, बल्कि एक बहुराष्ट्रीय उत्पाद है , जिसका साउंड ब्रांड है “सानू की”।  

सभ्यता के इस मोड़ पर इतिहास शायद दुबारा अपने पन्ने पलटेगा और देखेगा कि जिस युग को मानव प्रगति का शिखर कहा गया था, वही सबसे संवेदनहीन निकला। हम अंतरिक्ष में जीवन खोजने निकले थे, मगर अपने पड़ोसी की परेशानी नहीं देख पाए। हमने कृत्रिम बुद्धि (AI) बना ली, मगर प्राकृतिक इंसान खो दिया।  शायद भविष्य का कोई पुरातत्ववेत्ता इस युग की खुदाई में हमारे फोन, हमारी रीलें, हमारे 'सानू की' वाले मीम पाएगा और इतिहास में यह युग दर्ज होगा कि “मानव सभ्यता का उदासीन काल”। और तब किसी पुरानी पथरीली लिपि में लिखा मिलेगा, “जब सब कुछ जल रहा था, तब वे हँस रहे थे  और कह रहे थे, सानू की।”  


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Wednesday, February 11, 2026

बारी बरसी खटन गया सी...

 व्यंग्य 

बारी बरसी खटन गया सी...

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


बारी बरसी खटन गया सी...ये गीत पंजाब के उस मेहनतकश का लोक गीत है, जो बारह साल परदेस में कमाकर लौटा है। हर बार उसकी झोली में कुछ नया गिफ्ट होता है , कभी लोई, कभी सितारा, कभी गहना, कभी चूल्हा-ताला।  ढोल बजता है। भांगड़ा चलता है। और सारा गांव, साले-बिरादरी नाच उठते हैं। क्योंकि मेहनत रंग लाई है। कुछ हाथ लगा है।


अब इसी गीत की रस्म को कांग्रेस पार्टी ने राजनीति का नया मनोरंजक कायदा बना लिया है।


फर्क सिर्फ इतना है कि वहां बारह साल बाद सच में कुछ लेकर , लौटा था। ये लोग रोज़ सुबह उठते हैं, खाली हाथ में थाल सजाते हैं, ऊपर से झूठे सबूत की चटनी परोसते हैं, और ढोल बजवा देते हैं"और अब डांस करेंगे सारे के सारे!"


बारी बरसी खटन गया सी।

हर चुनाव, हर प्रेस कॉन्फ्रेंस, हर बजट सत्र,  यही क्रम है।

हाथ में कुछ ठोस नहीं, मगर उल्लास ऐसा मानो पूरी दिल्ली जीत ली हो।


राफेल डील, आई, देखी, डांस हुआ। सुप्रीम कोर्ट बैठा, CBI बैठी, ED बैठी, सबने कहा, कुछ नहीं। मगर इनकी थिरकन अभी थमी नहीं। अब राफेल आसमान में उड़ते हैं, और ये ज़मीन पर वही स्टेप्स दोहराते हैं। असल ज़िंदगी में रीप्ले नहीं मिलता, पर यहाँ तो हर साल रीमिक्स है।


चौकीदार चोर है, क्या पंचलाइन थी! इतनी जोरदार कि पार्टी कार्यकर्ता झूम उठे। मगर सबूत? वो तो बाद में देखेंगे, पहले डांस। अब सात साल हो गए। अदालत ने कहा, सबूत नहीं मिला। जाँच एजेंसी ने कहा सबूत नहीं मिला। पर ये कहते हैं "हमें तो अब भी यकीन है।"

यकीन है। 


ईवीएम और वोट चोरी , चुनाव हारो, तुरंत मशीन पर ठुमका लगाओ । कभी बैटरी बदली, कभी हैकिंग, कभी हनुमान चालीसा। मगर जब पूछो कि पंजाब, तेलंगाना, हिमाचल में तुम जीते कैसे? तब मशीन ठीक थी या उसमें भी भगवान का चमत्कार? सवाल सुनते ही डांस और तेज़। क्योंकि यह सवालों के जवाब का नहीं, जश्न का मौका है।


संविधान की प्रति, लाल किताब हाथ में, आँखों में नमी, होंठों पर गांधी, मन में नेहरू, और जेब में... खैर। संविधान बचाओ, लोकतंत्र बचाओ, देश बचाओ। तीनों थाली में सजे, वही ठुमके। पर संविधान पढ़ने का वक्त कहाँ? जब तक अनुच्छेद पढ़ोगे, तब तक कोई और डांस शुरू हो जाएगा।


नरवडे जी की अप्रकाशित पुस्तक, ये तो कमाल है।

अप्रकाशित। यानी अभी छपी नहीं। किसी ने पढ़ी नहीं। उसमें है क्या, पता नहीं। मगर प्रेस कॉन्फ्रेंस हो चुकी, आरोप लग चुके, डांस शुरू हो चुका। फेक कापी हवा में लहरा कर डांस किया जा चुका । साहित्य जगत में किताब छपने पर चर्चा होती है, यहाँ किताब छपने से पहले ही चर्चा, आरोप, और भांगड़ा , सब एक साथ।


अमेरिका से डील, अब ये तो सबसे ताज़ा एंट्री है। डील में हुआ क्या, पता नहीं। किसने की, कैसे की, कितने में की , बारीक अध्ययन, , विवेचन, जानकारी शून्य है। मगर आरोप हवा में हैं, अडानी और अंबानी को उछाल कर, हवा हवाई डांस चल रहा है। इतनी ऊर्जा है,  कि पावर  परचेज के टाई-अप करना चाहिए। 


अब सवाल यह नहीं कि इन मुद्दों में दम है या नहीं।

सवाल यह है कि जब हर बार थाल खाली निकलती है, तो फिर भी ढोल क्यों बजता है?

भेड़िया आया भेड़िया आया, आखि़र कब तक?

लकड़ी की हांडी कितनी बार चढ सकती है?

क्योंकि अब आरोप  कोई बहस नहीं, रस्म बन गए है।और रस्में सबूतों की मोहताज नहीं होतीं।


राफेल झूठा, चौकीदार सच्चा, फिर भी नारा वही।

ईवीएम सही, वोट सुरक्षित, फिर भी चीख वही।

किताब अप्रकाशित, आरोप प्रकाशित, फिर भी थिरकन वही।


बारी बरसी खटन गया सी।

हर बार खाली हाथ,पर  हर बार पूरा उल्लास।


सारी दुनिया देख लई, माँ तेरे जेहा न कोई।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Wednesday, January 14, 2026

पुस्तक चर्चा:पाखंड के विरुद्ध विजी श्रीवास्तव का निर्भीक शब्द-युद्ध .. "ए जी! सुनते हो' (व्यंग्य संग्रह)

 पुस्तक चर्चा 


  पाखंड के विरुद्ध विजी श्रीवास्तव का निर्भीक शब्द-युद्ध .. "ए जी! सुनते हो' (व्यंग्य संग्रह)


चर्चा.. विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 विजी श्रीवास्तव का सद्यः प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ए जी सुनते हो , समकालीन हिंदी साहित्य में व्यंग्य की एक ऐसी मशाल बन कर प्रस्तुत हो रहा है जो समाज के अंधेरे कोनों को उजागर करता दिखता है। यह पुस्तक शीर्षक के अनुरूप मात्र हल्का फुल्का हँसाने का साधन नहीं, बल्कि समाज के सामूहिक पाखंड और नैतिक पतन का एक गहरा अन्वेषण है । यह संग्रह पाठकों से कहता है, ए जी सुनते हो? पढ़ो, सुनो , गुनो, और हो सके तो कुछ करो भी ।


लेखक ने माइनिंग में होते व्यापक भ्रष्टाचार को समझाने के लिए शब्दों को ही प्रयोगशाला बना दिया है। वे 'खान' को (यानी खाते रहना) और 'खनिज' को 'निज' (स्वयं का) में बदलकर यह बताते हैं कि कैसे सार्वजनिक खनिज संपदा माफिया की निजी लूट का साधन बन गई है।


 लेखक ने उधारी का शहीद, इस नवाचारी पदबंध के माध्यम से पूँजीवादी व्यवस्था पर प्रहार किया है। जो व्यक्ति कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या करता है, वह व्यवस्था के लिए केवल ' शहीद' बनकर रह जाता है।


 'कफ़न चाहिए तो बोलो' रचना में दिखाया गया है कि भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि सरकारी तंत्र मृतकों को मुफ्त कफ़न बाँटने की योजना में भी अपने लिए 'कमीशन' की गुंजाइश ढूँढ लेता है।


 चम्मच घुमाना , का रोचक प्रयोग लेखक की शैली बताता है। एक सड़क ठेकेदार का यह कहना कि उसने ठेका लेने के लिए 'कितनी ही जगह चम्मच घुमाया था' (रिश्वत दी थी), शासन प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार की परतें खोलता मारक स्टेटमेंट है।


 'ए जी! सुनते हो' , पाखंड के विरुद्ध एक निर्भीक शब्द-युद्ध है। 

विजी श्रीवास्तव का यह व्यंग्य-संग्रह आधुनिक जीवन की विसंगतियों का एक 'सोशल क्रॉस-सेक्शन' है। 

यह पुस्तक अपनी भाषा की मारक क्षमता और शिल्प की नवीनता के कारण विशिष्ट बन पड़ी है। 

शब्द-कीमियागरी और भाषाई प्रहार जबर्दस्त हैं।

लेखक के पास शब्दों का 'संप्रभु अधिकार' है। वे 'चूना लगाना' जैसे लोक-मुहावरों को राजनीतिक विचारधारा के स्तर तक ले जाते हैं। 'चूना मंत्री' या 'विशेष अतिथि' जैसे शब्दों के माध्यम से वे समाज के उस वर्ग पर चोट करते हैं जो बिना किसी उपयोगिता के केवल 'मंच का बैलेंस' (फोटो खिंचवाने) के लिए मौजूद रहता है।

संस्थागत पाखंड का पर्दाफाश करने में लेखक सफल है। 

'चरण रज का अभिलाषी' में लेखक ने साहित्यिक और अकादमिक बाज़ार के पतन को दिखाया है। जहाँ योग्यता की जगह 'नेटवर्किंग' और चाटुकारिता ने ले ली है। जब एक युवक भ्रष्ट लोगों की चरण रज इकट्ठा करके बंजर खेत को उर्वर बनाने का दावा करता है, तो यह इस बात का प्रतीक है कि भ्रष्टाचार ही हमारा नया जीवन-स्रोत बन चुका है । लेखक मीडिया और तकनीक पर कटाक्ष करने में पीछे नहीं रहते । 

'आत्मा से मिलाप' में टीआरपी की दौड़ , अंधी होती पत्रकारिता को निशाना बनाया गया है। वहीं 'ओटीपी आ गया' और 'कस्टमर केयर के चक्रव्यूह में फँसा अभिमन्यु' जैसी रचनाएँ दिखाती हैं कि कैसे आधुनिक तकनीक ने जीवन को सुलभ बनाने के बजाय उसे अधिक खीज भरा और जटिल बना दिया है।

 मानवीय संवेदनाओं का क्षरण लेखक के निशाने पर है। लेखक इस बात से व्यथित हैं कि आज का मनुष्य संवेदना शून्य होता जा रहा है। 'कल शायद श्मशान जाना पड़े' जैसी सूचना पर व्यक्ति दुखी होने के बजाय अपने 'अपॉइंटमेंट' बिगड़ने की चिंता करता है। जब समाज में न्याय और रोटी की खबरें छोटे कॉलम में सिमट जाती हैं और जूता उछालने जैसी घटनाएँ 'हेडलाइन' बनती हैं, तो लेखक की निराशा एक तीखे व्यंग्य के रूप में फूटती है।


'एजी! सुनते हो' एक अत्यंत सजग और सतर्क, सतत् व्यंग्य दृष्टि का परिणामी ,सुदृढ़ लेखन है। विजी श्रीवास्तव ने उपदेश देने के बजाय हास्य और फंतासी के माध्यम से पाठकों को चेताया है। यह पुस्तक समकालीन समय के कठिन सवालों से मुठभेड़ करती है और हमें अपने भीतर झाँकने पर विवश करती है।


 पार्टी के अनुशासित सिपाहियों की महफिल,

लिव इन की कहानी का अंत,चूने की लकीर,और सुनाओ भाभी कैसी हैं,

कृषि दर्शन में जूते की खेती,क्या डिलिट किया,शोक सभा की तैयारियाँ,सावधान ! खाँसना मना है,स्वतंत्रता दिवस की बूंदी और ट्रिलियन के शून्य,कुत्तों का नामकरण , अपनी पर आने वालो अब आ ही जाओ ,बिल्ली की शिट्टी-न लीपने की न पोतने की, तेल, तेल की धार और फैट-फ्री आम आदमी , हिंदी संस्थान का कुत्ता,अपने पाले में हमें तो मत गिनो यार..,

उल्लू के पट्टे कभी कम न होंगे,स्वदेशी मुर्गी का हिंदी दर्शन,विशेष-अतिथि, पतन के मार्गों पर गड्ढों का नामकरण,समर्थन का मूल्य,इन्साफ का तलबगार,ग्लूकोज के बिस्कुट का साहित्य के विकास में योगदान,

नींद में बिकती इन्सानियत,लोकतंत्र घायल है,अच्छे डॉक्टर से इलाज कराओ,हुआ हुआ न हुआ हमला,हलो चेक हलो,कोरोना वायरस का अभिनंदन समारोह,हैरान हैं सड़कें,साढ़े इक्कीसवीं सदी में सब्जी की साहसिक खरीदी,शांति के मसीहा के बहुरंगी रूमाल,

 जैसे अपेक्षाकृत लंबे शीर्षकों वाली किन्तु गहरे मंतव्य की , हर वाक्य में सार्थक कटाक्ष से भरी रचनाएं एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर वैचारिक संप्रेषण करती हैं। सारी किताब विजी श्रीवास्तव की परिपक्व लेखनी से परिचित करवाती है। किताब पाठक को व्यंग्य का आनंद प्रदान करने वाली है। भाषा , शैली , अभिव्यक्ति, संप्रेषण सधा हुआ है। इसे पढ़कर मैं आश्वस्त हूं कि पुस्तक एजी सुनते हो , समकालीन व्यंग्य जगत में विशिष्ट पहचान स्थापित करेगी ही करेगी। पुस्तक वनिका पब्लिकेशन से प्रकाशित हुई है, और नई दिल्ली पुस्तक मेले में हाल ही कृति का विमोचन हुआ है। 


चर्चा .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

Wednesday, January 7, 2026

फैशन बनाम फ्रीडम

 व्यंग्य 

फैशन बनाम फ्रीडम 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से



स्त्री विमर्श की आड़ में नया बौद्धिक फैशन चला है , “कपड़ों में खराबी नहीं, तुम्हारी नज़र में खराबी है!” सुनने में यह वाक्य बड़ा आधुनिक और आत्मनिर्भर लगता है, पर असल में यह एक ऐसा नारा है, जो सोच की बहस को एक ही दिशा में मोड़ देता है। सवाल यह नहीं कि कौन क्या पहनता है ? सवाल यह है कि सोच किसकी बदलनी चाहिए, देखने वाले की या दिखाने वाले की?  

पहले भी लोग कपड़े पहनते थे, आज भी पहनते हैं। फर्क बस इतना है कि तब वस्त्र देह को ढंकने के लिए होते थे, अब फैशनेबल वस्त्र चर्चा में रहने के साधन बना लिए गए हैं ।

 चाणक्य ने वासना को सबसे बड़ा नशा कहा था। आज वही नशा “बॉडी पॉजिटिविटी” के नाम से सभ्यता की थाली में परोसा जा रहा है। 

 “हम क्या पहनेंगे, यह हम तय करेंगे।” बिल्कुल ठीक है! पर यह भी उतना ही सच है कि “दूसरे हमें कैसे देखेंगे, यह भी वे ही तय करेंगे।” दोनों अर्ध सत्य हैं, पर मिलकर एक पूरा सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य बनाते हैं । सम्मान मांगने से नहीं, व्यवहार से अर्जित होता है। समस्या कपड़ों की नहीं, उस विचार की है जो कपड़ों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा रहा है।

 “आधुनिकता” की परिभाषा कुछ ऐसी हो गई है कि जितना कम कपड़ा, उतनी ज़्यादा प्रगति। तो क्या जंगलों में रहने वाले साधन हीन आदिवासी सबसे आधुनिक थे ? अगर सभ्यता का पैमाना वस्त्रों की लंबाई है, तो यह पैमाना तो काफ़ी गड़बड़ा गया लगता है।  

 फैशन जगत “स्वतंत्रता” बेचता है और समाज उसे “प्रगतिशीलता” के दाम पर खरीद लेता है। स्त्री देह का नैसर्गिक सौंदर्य विज्ञापन की भेंट चढ़ रहा है। अब वस्तु से अधिक उसका प्रमोशन महत्वपूर्ण बना दिया गया है। इंस्टाग्राम पर फोटो को विचार समझ लिया गया है, और सोच को ‘लाइक’ के पैमाने पर नापा जाता है। सब तरफ एक ही आवाज़ “सोच बदलो!” मगर सवाल वही पुराना “किसकी सोच?”  


कभी हमारे यहाँ लाज, मर्यादा, शालीनता को नारी का आभूषण कहा गया था। आज ब्रांडेड कपड़े उस आभूषण के प्रतिस्पर्धी बन बैठे हैं। पहले माँ अपनी बेटी से कहती थी “बेटी, ऐसा पहन जो तुझे शोभा दे।” अब बेटी कहती है “माँ, ऐसा पहन जो ट्रेंड में हो।” फर्क वक्त का नहीं, दृष्टि का है।  


फैशन के विरोध में कोई नहीं किन्तु विसंगति उस सोच से है जहाँ “दिखने” का अर्थ “होने” से बड़ा हो गया है। वस्त्र तभी खूबसूरत लगते हैं जब वे व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाते हैं, उसे वस्तु में नहीं बदलते । संस्कृति और सभ्यता को कपड़ों से नहीं, सोच से जाना जाता है।  


आधुनिकता को त्याग नहीं, चयन बनाइए। न दृष्टि को दूषित करें, न अभिव्यक्ति को अशोभन। वस्त्र सौंदर्य का प्रतीक रहें, संस्कार का विकल्प नहीं, फैशन की आज़ादी बुरा विचार नहीं, पर सोच की गुलामी बुरी ज़रूर है।  

कपड़े बदलिए जितना चाहे , पर सोच ऐसी रखिए जो सभ्यता न उतारे, उसे शालीनता से धारण करे।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

पहचाना?

 पहचाना आप ने ? 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


पहचाना आप ने ? ...

, अरे कैसी बात करते हैं, आप भी! संकोच में ऐसा कह चुकने के बाद , वे बातों बातों में वह सूत्र ढूंढते हैं कि किसी तरह मिलने वाले का नाम याद आ जाए ? दरअसल, 

नाम आदमी की पहचान है, पर याददाश्त के साथ उसका रिश्ता हमेशा लुका-छुपी का ही रहा है। चेहरा तो लोग पहचान लेते हैं, पर नाम जैसे हमारी स्मृति से सबसे पहले पलायन कर जाता है। किसी को फोन करना हो तो याद ही नहीं आता कि बंदे का नंबर किस नाम से सेव किया था । 

एक विवेक ढूंढो तो तीन निकल आते हैं, इसलिए रिफरेंस या शहर का नाम साथ लिखना पड़ता है।

किसी पार्टी या सभा में मिलते समय नाम स्मरण की यह समस्या सबसे अधिक होती है। सामने वाला मुस्कराते हुए "कैसे हैं आप" कहता है और हम भी उतनी ही आत्मीयता से "अरे आप!" कह देते हैं। इस "आप" के पीछे कितनी मजबूरी और कितना अपराध बोध छुपा होता है, यह वही समझ सकता है जिसने मिलने वाले का नाम दिमाग की हार्ड डिस्क से डिलीट कर ‘रीसायकल बिन’ में पहुंचा दिया होता है। और रिसाइकिल बिन क्लीन कर दी होती है। दिमाग को सारे खाए हुए बादाम की कसम देते रहो पर नाम याद ही नहीं आते, तब सभ्यता के नाते दिमाग से काम लेना पड़ता है , और पहचानने की एक्टिंग करनी पड़ती है।


शशि कपूर साहब ने इस विसंगति का हल खोज निकाला था। वे मिलते ही सामने वाले से कहते, "हाय, आई एम शशि कपूर।" सामने वाला भी शिष्टाचार निभाने के चक्कर में अपना परिचय दे देता। यह फार्मूला कलाकारों और सेलिब्रिटीज के लिए तो ठीक है, पर अगर मोहल्ले का गजोधर प्रसाद या हरिप्रसाद यही तरीका अपनाए तो सामने वाला शक करने लगेगा कि कहीं यह बीमा बेचने वाला एजेंट तो नहीं।


कुछ लोग इस समस्या को छिपाने के लिए ऐसे रचनात्मक वाक्य गढ़ते हैं कि सुनकर हंसी भी आए और दया भी। जैसे कोई कहे "भाई साहब, आप तो बिल्कुल नहीं बदले!" अब सामने वाला सोचता है कि मैं पचास साल से यही हूँ, बदली तो तुम्हारी याददाश्त है। या फिर लोग बचने के लिए रिश्तों का सहारा लेते हैं "भाभी जी", "भाई साहब", "चाचा जी"। यही तो भारतीय संस्कृति का अद्भुत चमत्कार है। जब नाम याद न आए तो रिश्ते का लेबल चिपका दो, सामने वाला खुद ही नाम बता देगा।


हमारे एक अंकल ने इस समस्या को सीधे ईमानदारी से हल किया। वे मिलते ही कहते, "बेटा, याददाश्त कमजोर हो चुकी है, बातें करने से पहले नाम और पता बता दीजिए।" अब उनकी इस सादगी में न दिखावा है, न शिष्टाचार का जाल। सामने वाला झट से नाम बता देता है, जैसे परीक्षा हॉल में अपना एडमिशन कार्ड दिखा रहा हो।


नाम भूलने की समस्या अक्सर हास्यास्पद हालात पैदा कर देती है। शादी ब्याह में रिश्तेदार एक-दूसरे से टकराते हैं, पर नाम भूलने का अपराधबोध दोनों ओर इतना गहरा होता है कि बातचीत का सारांश यही रह जाता है "अरे आप!" और "जी, वही!" 

ऑफिस पार्टियों में तो यह विसंगति और भी दिलचस्प हो जाती है। कोई पूरे आत्मविश्वास से पांच मिनट तक बतियाता रहता है और फिर पूछ बैठता है "वैसे आपने मेरा नाम तो नहीं भुलाया?" तब तक नाम सचमुच स्मृति की फाइलों से प्रसंगवश रिकवर हो गया तो हम पूरे आत्मीय भाव से मुस्कराते हुए कहते हैं , अरे फलां जी कैसी बात करते हैं आप भी ।

वरना बाद में सिर खुजाते मिलने वाले का नाम स्मृति पटल पर खोजना होता है। 

सच यह है कि नाम भूलना कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है, यह भीड़ में घुल जाने की कला है। हम रोज़ इतने चेहरों से मिलते हैं कि दिमाग भी कभी-कभी ‘सिस्टम हैंग’ कर देता है। और तब "अरे आप" या "भाई साहब" जैसे संबोधन जीवनरक्षक ऐप साबित होते हैं।


अब समय आ गया है कि सरकार आधार कार्ड में एक नया फीचर जोड़ दे। जैसे ही हम किसी से मिलें, दोनों के मोबाइल पास लाते ही ब्लूटूथ से स्क्रीन पर स्वयं ही नाम चमक उठे। पर तब तक हमें अंकल की ही ईमानदार शैली अपनानी होगी कहना होगा "ओ मिलने वाले, जरा अपना नाम तो बता।" क्योंकि बिना नाम का संदर्भ समझे बातचीत करना वैसा ही है जैसे अंधेरे में रेडियो सुनना । आवाज तो आती है, मज़ा भी आता है, लेकिन यह समझ ही नहीं पड़ता कि प्रसारण किस स्टेशन से चल रहा है।

मैं एक सज्जन के यहां, रात्रि भोज पर निमंत्रित था , भोजन कर आया । उनकी पत्नी से यह पहली भेंट थी । सभ्यता से भाभी जी की ओर बहुत ध्यान से देखा भी नहीं । अगले दिन जब बाजार में जब एक महिला मेरी ओर देख कर मुस्करा रही थी, तो मुझे समझ ही नहीं आया कि यह क्या और क्यों हो रहा है । मुझे अजनबी सा देखते पा कर देवी जी बोली , अरे खाना खाकर भी आपने पहचाना नही , झेंपने के सिवा क्या कर सकता था मैं । दरअसल महिलाएं हेयर स्टाइल बदल दें, या देसी परिधान की जगह पाश्चात्य ड्रेस पहन लें तो उन्हें पहचानना मेरे लिए वैसे भी कठिन हो जाता है । सच तो यह है कि एक नग अपनी पत्नी के मूड तक को भी अब तक कभी पहचान नहीं पाया! 

खैर आप ही बताइए , किस को कितना पहचाना आप ने? आभासी दुनिया के ढेरों मित्र बड़े मिले मिले से लगते हैं, पर आसपास के कई लोग भी बहुत अनजाने होते हैं।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 भोपाल

Tuesday, January 6, 2026

नंबर वन का 'अमृत' और नरक का ड्रेनेज

 व्यंग्य

नंबर वन का 'अमृत' और नरक का ड्रेनेज


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


इंदौर में इन दिनों गजब का द्वंद्व चल रहा है। एक तरफ आसमान से टपकती स्वच्छता की 'नंबर वन' की ट्राफियां हैं और दूसरी तरफ जमीन फाड़कर निकलता 'भागीरथपुरा' का सच। सूचना मिली है कि प्रशासन ने अपनी चिर-परिचित फुर्ती दिखाते हुए कुछ अधिकारियों का 'स्थानांतरण' कर दिया है। वाह! क्या गजब का इलाज है। जैसे किसी का अपेंडिक्स फट गया हो और डॉक्टर उसका बिस्तर बदल दे। साहब यहाँ से वहाँ हुए नहीं कि सिस्टम का पाप धुल गया! सुना है नए साहब के आते ही पुरानी पाइप लाइन ने शर्म के मारे जहर उगलना बंद कर दिया है।


भागीरथपुरा, नाम कितना पवित्र है। महाराज भगीरथ ने गंगा लाने के लिए अंगूठे पर खड़े होकर तपस्या की थी ताकि पूर्वजों को तार सकें, पर हमारे आधुनिक भगीरथों (इंजीनियरों) ने पाइपलाइन बिछाते समय ऐसी 'तपस्या' की कि अमृत योजना की नली को सीधे ड्रेनेज की नाली से 'कनेक्ट' कर दिया। अब पुरखे तरें न तरें, मोहल्ले वाले सीधे इस लोक को छोड़  मोक्ष की यात्रा पर निकल पड़े। यह सरकारी मोक्ष ही है, बस फर्क इतना है कि यह यमराज द्वारा नहीं, बल्कि नगर निगम द्वारा 'स्पॉन्सर्ड' है।

इस पूरी त्रासदी के पीछे जो 'महान कलाकार' छिपा है, वह है, सरकारी ठेकेदार। यह वह प्रजाति है जो लोहे के पाइप को कागज की तरह मोड़ सकती है और कंक्रीट में इतनी रेत मिला सकती है कि रेगिस्तान को भी शर्म आ जाए। ठेकेदार साहब का गणित एकदम स्पष्ट है, "ऊपर की सड़क ऐसी बनाओ कि मुख्यमंत्री का काफिला निकले तो झटका न लगे, और नीचे पाइप ऐसा डालो कि अगली बारिश तक गायब हो जाए।" टेंडर की मलाई और कमीशन के खेल में पाइपलाइन की मोटाई इतनी कम रह गई कि सीवेज के कीड़ों ने उसे 'डोरस्टेप डिलीवरी' का रास्ता समझ लिया। ठेकेदार के लिए 'अमृत' का मतलब वह 'प्रसाद' है जो उसे फाइल पास होने के बाद मिलता है, जनता का गला सूखे या सड़े, इससे उसके बैंक बैलेंस का 'फ्लो' नहीं रुकता।

शहर का चेहरा तो इतना चमकीला है कि आप अपनी शक्ल डिवाइडर पर देख लें। दीवारों पर नाचते मोर हैं, स्वच्छता के गान गाती गाड़ियाँ हैं और हर खंभे पर मुस्कराते नेताओं के पोस्टर हैं। पर इस चमक-धमक के नीचे शहर क्या 'पाल' रहा है, यह तब पता चलता है जब अस्पताल के बेड कम पड़ जाते हैं। यहाँ मोहल्ला राजनीति का भी अपना स्वैग है। "हमारे भाईसाहब" का वोट बैंक बना रहे, इसलिए पाइपलाइन चाहे गटर के भीतर से निकले या शौचालय के नीचे से, बस 'नल' चलना चाहिए। पार्षद जी को चिंता इस बात की नहीं थी कि पानी में बैक्टीरिया हैं, उन्हें चिंता इस बात की थी कि उद्घाटन के पत्थर पर उनका नाम बड़ा है या नहीं। चुनावी गणित में 'शुद्ध पेयजल' से ज्यादा जरूरी 'मुफ्त का टैंकर' होता है, ताकि संकट के समय मसीहा बना जा सके।

जब जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँचा, तो नेताओं ने अपना अचूक ब्रह्मास्त्र निकाला, 'स्थानांतरण'। कलेक्टर साहब हटा दिए गए, कमिश्नर साहब विदा कर दिए गए। जनता दुख भूल कर फटाफट खुश हो गई! उसे लगा  कि 'न्याय' हो गया। अरे भाई, साहब तो बदल गए, पर वह सड़ा हुआ सिस्टम और वह लीकेज वाली पाइपलाइन तो वहीं है जो पिछले दस सालों से ड्रेनेज को चूम रही है। यह तो वही बात हुई कि इंजन खराब है और आप बार-बार ड्राइवर बदल रहे हैं। राजनेता जानते हैं कि पब्लिक की याददाश्त और पानी का स्वाद, दोनों बहुत जल्दी बदल जाते हैं।

रही बात समाधान की, तो हुजूर! समाधान किसी फाइल या तबादले में नहीं, बल्कि इस 'स्मार्ट' चश्मे को उतारने में है। जल्दी ही मजबूर जनता जीने के लिए अपने घरों में यूरेका के असरदार वाटर फिल्टर खुद लगा ही लेगी । तब तक बिसलेरी की बोतलों से नहाने का सौभाग्य मिलेगा । 

पर यह कौन बताए कि असली 'अमृत' जल तब बरसेगा जब ड्रेनेज और पेयजल की लाइनों के बीच की दूरी कम से कम उतनी कर दी जाएगी जितनी एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच नेता और जनता की होती है। बेहतर होगा कि अगली बार 'स्मार्ट सिटी' का तमगा देने से पहले दीवारों के पेंट की जगह पाइपों के 'प्रेसर' की जाँच की जाए। समाधान तो यह भी है कि जिस ठेकेदार और इंजीनियर ने यह महान 'जुगलबंदी' की है, उन्हें तब तक उसी मोहल्ले का पानी पिलाया जाए जब तक वे खुद न मान लें कि अमृत योजना में 'विष' का मिश्रण सरकारी गाइडलाइन का हिस्सा नहीं है। बड़े अधिकारियों के तबादलों के इस सर्कस को बंद कर अगर 'जवाबदेही' को भी 'नंबर वन' बना दिया जाए, तो शायद किसी और भगीरथ को अपने मोहल्ले के पुरखों को तारने के लिए श्मशान न जाना पड़े। वरना याद रखिए, इतिहास केवल आपके रंगे-पुते डिवाइडर याद नहीं रखेगा, वह उन पाइपों के बारे में भी लिखेगा जिन्होंने शहर की साख को गटर में बहा दिया। आज इंदौर कल कोई दूसरा शहर लीकेज का माइलेज अखबार की इबारत बनता रहने से रोकना है तो तकनीकी प्रोजेक्ट्स को राजनीति से दूर करना होगा । 


विवेक रंजन श्रीवास्तव