व्यंग्य
सानू की — सभ्यता का नया राग
विवेक रंजन श्रीवास्तव
सानू की , मतलब मुझे क्या , आग लगे बस्ती में मस्त रहो मस्ती में।
जमाना अब किसी भी गंभीर चीज से नहीं, बस आरामदेह अनासक्ति से चलता है। पहले लोग सच को आवाज़ देते थे, जमाने की चिंता में मरा जाता था, अब कहते हैं “सानू की”। यह एक वाक्य नहीं, यह आज के मनुष्य की आत्मा का नया घोषणापत्र है। युद्ध हो, महामारी हो, या किसी देश का मलबा ही क्यों न बन जाए , जब तक हमारी सेल्फी ठीक आ रही है, तब तक दुनिया सुरक्षित है।
कहीं कोई देश धधक रहा है, बच्चे शरणार्थी शिविरों में भूख से तड़प रहे हैं, महिलाएँ सुरक्षा की कगार पर भी असुरक्षित हैं , मगर हमारे लिए यह सब बस “ग्लोबल न्यूज़” है। हम थोड़ी देर हेडलाइन देखेंगे, फिर रिमोट फेक देंगे, क्योंकि इस हालत से “सानू की”! हमारे फ्रिज में कोल्ड ड्रिंक है, नेटफ्लिक्स पर नया शो है, और ट्वीट्स पोस्ट करने के लिए फ्री वाई-फाई है। राजनीति की दुनिया में नेता भाषणों से झाग उड़ा रहे हैं, संसद में आवाज़ें उठती हैं और जल्द ही मोबाइल की रीलों में घुल जाती हैं। जनता के हिस्से में जो रह जाता है, वह है “सानू की” की मानसिक शांति। अब किसी का खून सस्ता है, किसी का झूठ अमूल्य, और किसी की संवेदना ‘डाटा लिमिट’ से बंधी हुई। विपक्ष हो या सत्ताधारी , दोनों के बीच एक अद्भुत एकता है कि जनता को उदासीन बनाकर रखा जाए। और जनता ने भी यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई है । सड़क पर बड़े से बड़ा हादसा हो जाए , उसे अनदेखा कर निकल लेना जमाने की रफ्तार में मज़बूरी है,“सानू की” ।समाज की हालत ऐसी हो गई है कि हर अन्याय, हर अपराध पर उतनी ही प्रतिक्रिया होती है जितनी एक विज्ञापन पर थोड़ी देर में “स्किप ऐड”। स्त्रियों के प्रति हिंसा बढ़ती है, तो कहा जाता है — “क्या कर सकते हैं, अगले ही क्षण सानू की!” ब्रेन रिसेट कर देता है ।दलितों के साथ अत्याचार होता है, तो कहा जाता है , “कहीं न कहीं तो होता ही रहेगा।” पिछड़ों के हक पर राजनीति की बोली बाज़ार में बिकी जा रही है, और हर दर्शक सोचता है, “अरे भाई, सानू की, मैं तो सभ्य नागरिक हूँ।”
अब यह “सभ्यता” किसी संवेदना से नहीं, बल्कि सुविधा से मापी जाती है। किसी ने कहा था, “मनुष्य सामाजिक प्राणी है।” पर आज वह “सोशल मीडिया प्राणी” बन गया है। वह दूसरों की तकलीफ़ पर ‘लाइक’ कर साथ देता है, सैडी इमोशन ढूंढता है मोमबत्ती जलाने से पहले सेल्फी लेता है, और किसी शहीद की ख़बर पर कमेंट लिखता है — “Respect!”, क्योंकि यही डिजिटल युग का नया शोकगीत है छोटा, चुस्त, और भावनाशून्य। साहित्य भी अब इस गहरी नींद में सोया हुआ है। पहले लेखक समाज की नब्ज़ पकड़ता था, अब इंटरनेट की भाषा पकड़ता है। जो लिखेगा वही छपेगा, जो छपेगा वही बिकेगा और जो बिकेगा, वही पुरस्कार पाएगा। जो न बिके, वह “सनातन काल का महान लेखक” घोषित कर दिया जाएगा पर मरने के बाद।
ए आई की इबारत में लोगों के लिखने की शैली गुम हो गई है। पर एक्सप्रेशन में सुविधा कहती है, सानू की।
साहित्यिक सभाओं में अब शब्द नहीं, ‘नेटवर्किंग’ है। पुरस्कार अब प्रतिभा नहीं, सेटिंग से तय होते हैं। जो सही लिखे वह किनारे, जो सही लोगों को सलाम करे वो सितारे। चोरी भी अब सम्मान है ,बस उसे “इंटरटेक्स्चुअल इंफ्लुएंस” कह दीजिए। अगर किसी ने सवाल कर दिया तो तैयार रखिए जवाब, “सानू की?”
मीडिया पहले चौथा स्तंभ था, अब चौथी दीवार बन गया है , जिसके उस पार सच्चाई नहीं दिखती, बस प्रायोजित रोशनी झिलमिलाती है। बहसें मंचित नाटक बन गई हैं जहाँ हर किरदार अपनी चीख के लिए टाइम स्लॉट तय करता है। बीच में कोई दर्शक चैनल बदल देता है , “सानू की, सब तो एक जैसे हैं।” यही है इस शो के निर्देशक का सपना, दर्शक का जीवित रहना, मगर जागृत न रहना।
देखिए, इस व्यंग्य के बीच भी हम कभी यह नहीं कहते कि कुछ बदलिए। नहीं, क्योंकि यह ‘सानू की’ का युग है , आत्मकेंद्रित, आत्ममुग्ध, आत्मनिष्ठ। आदमी अब ब्रह्मांड का केंद्र नहीं, वह अपने मोबाइल स्क्रीन का केंद्र है। उसके लिए न्याय, अन्याय, क्रांति, करुणा , सब लॉक स्क्रीन के नोटिफिकेशन हैं जिन्हें स्वाइप करके हटाया जा सकता है। मनुष्य अब दो रूपों में बंट गया है , एक “ऑनलाइन” आदमी, जो सब कुछ जानता है, और एक “ऑफ़लाइन” आदमी, जो किसी चीज़ से मतलब नहीं रखता। जब दुनिया जल रही होती है, तब भी वह अपने डिजिटल ब्रह्मांड में किसी मीम पर हँस रहा होता है, क्योंकि हँसी ने अब संवेदना को विस्थापित कर दिया है।
यह विसंगति किसी एक देश या समाज की नहीं। यह वैश्विक महामारी है , युद्ध से त्रस्त देश हों या अमन के खांचे में सजे लोकतंत्र, हर जगह मनुष्य की प्राथमिकता बदल चुकी है। पहले कहा जाता था “वसुधैव कुटुम्बकम्।” अब नया सिद्धांत है — “Where is my comfort zone, bro?” यानी — सानू की!
पश्चिम में हथियारों की नीलामी से लेकर पूरब में भूख की चिताओं तक, हर जगह वही दृश्य है , नेता युद्ध का समर्थन करता है, उद्योगपति सौदा करते हैं, मल्टीनेशनल ए आई के चलते बाजू की डेस्क वाले को नौकरी से हटा देता है और आम आदमी सोचता है, “सानू की, मेरी नौकरी तो बची है।” यही वह मौन सहमति है जो आतंक से भी बड़ी है , यह वह स्वीकृति है जो अत्याचार को जीवनशैली में बदल देती है।
आदमी अब अपने भीतर भी नहीं झाँकता। विवेक, करुणा, सवाल , ये सब पुराने ऐप्स की तरह अनइंस्टॉल कर दिए गए हैं। जो बचा है, वह है “मैं”। यह “मैं” अब किसी तत्वमीमांसा का प्रतीक नहीं, बल्कि एक बहुराष्ट्रीय उत्पाद है , जिसका साउंड ब्रांड है “सानू की”।
सभ्यता के इस मोड़ पर इतिहास शायद दुबारा अपने पन्ने पलटेगा और देखेगा कि जिस युग को मानव प्रगति का शिखर कहा गया था, वही सबसे संवेदनहीन निकला। हम अंतरिक्ष में जीवन खोजने निकले थे, मगर अपने पड़ोसी की परेशानी नहीं देख पाए। हमने कृत्रिम बुद्धि (AI) बना ली, मगर प्राकृतिक इंसान खो दिया। शायद भविष्य का कोई पुरातत्ववेत्ता इस युग की खुदाई में हमारे फोन, हमारी रीलें, हमारे 'सानू की' वाले मीम पाएगा और इतिहास में यह युग दर्ज होगा कि “मानव सभ्यता का उदासीन काल”। और तब किसी पुरानी पथरीली लिपि में लिखा मिलेगा, “जब सब कुछ जल रहा था, तब वे हँस रहे थे और कह रहे थे, सानू की।”
विवेक रंजन श्रीवास्तव