प्रेमचंद के साहित्य में निहित व्यंग्य
विवेक रंजन श्रीवास्तव
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कथा सम्राट का व्यंग्यबोध
मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६) हिंदी साहित्य के इतिहास में एक युगप्रवर्तक रचनाकार के रूप में स्थापित हुए हैं। उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता आदर्शोन्मुख यथार्थवाद रहा, जिसके अंतर्गत उन्होंने भारतीय समाज के यथार्थ चित्रण के साथ-साथ उसमें सकारात्मक परिवर्तन की रचनाएं की हैं , जो क्रिएटिव हिंदी कथा साहित्य की धरोहर है। उनकी रचनाओं में व्यंग्य की एक अंतर्निहित सशक्त धारा विद्यमान है, जो सामाजिक कुरीतियों, राजनीतिक विसंगतियों, धार्मिक पाखंड और मानवीय दुर्बलताओं पर करारी चोट करती दिखती है।
प्रेमचंद का सम्पूर्ण साहित्य 1906 से 1936 के बीच लिखा गया, जो उस दौर का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक दस्तावेज है।
प्रेमचंद के लेखन की विशेषता यह है कि वह कटु और आक्रामक होने के बजाय रचनात्मक और सकारात्मक है, जिसका उद्देश्य पाठक की विवेकशीलता को जगाना और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणा देना है। इस हेतु उन्होंने व्यंग्य के उपालंभों का खूबसूरत उपयोग किया है।
व्यंग्य का सैद्धांतिक आधार और प्रेमचंदीय लेखन...
व्यंग्य साहित्य की वह विधा है जो विडंबना, कटाक्ष और हास्य के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक विसंगतियों पर प्रहार करती है। प्रेमचंद के साहित्य में व्यंग्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और नैतिक जागरण का माध्यम बना है।
प्रेमचंद के व्यंग्य के प्रमुख लक्ष्यों में धार्मिक आडंबर, सामंती मानसिकता, नौकरशाही भ्रष्टाचार, पूँजीवादी शोषण, जातिगत भेदभाव और स्त्री के प्रति अन्याय पर सतत प्रहार शामिल हैं। उन्होंने अपने व्यंग्य प्रयोग से किसी व्यक्ति विशेष के बजाय पूरी सामाजिक व्यवस्था और मानसिकता पर केंद्रित लेखन किया है।
धार्मिक आडंबर और पाखंड पर व्यंग्य ..
प्रेमचंद के साहित्य में धार्मिक अनुष्ठानों और धर्मगुरुओं के पाखंड पर करारा व्यंग्य मिलता है। उनके विचार में धर्म मनुष्य की आंतरिक नैतिकता और सामाजिक समरसता का मार्गदर्शक होना चाहिए, बाहरी दिखावा नहीं।
प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'सवा सेर गेहूँ' में एक ब्राह्मण पंडित और कुम्हार के माध्यम से धार्मिक पाखंड, छुआछूत और जातिगत भेदभाव पर गहरा प्रहार किया गया है। पंडित का चरित्र उन तथाकथित धर्माचार्यों का प्रतीक है, जो धर्म को स्वार्थ सिद्धि का साधन बना लेते हैं।
इसी प्रकार 'मंदिर और मस्जिद' कहानी में सांप्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता पर जबर्दस्त व्यंग्य है। दरवेश का कथन कि "मंदिर और मस्जिद तो ईंधन-पत्थर के ढेर हैं, असली ईश्वर तो तुम्हारे हृदय में बसता है" धर्म की वास्तविक भावना को उजागर करता है।
नौकरशाही और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर व्यंग्य ..
प्रेमचंद के साहित्य में तत्कालीन ब्रिटिश शासन और नौकरशाही तंत्र पर भी जमकर व्यंग्य किया गया है। उनकी रचनाओं में अधिकारियों के ढुलमुल व्यवहार, रिश्वतखोरी और जनता के प्रति उदासीनता का मार्मिक चित्रण मिलता है।
'नमक का दरोगा' कहानी हिंदी साहित्य में नौकरशाही पर व्यंग्य की क्लासिक कहानी मानी जाती है। इस कहानी का नायक वंशीधर एक ईमानदार नमक इंपेक्टर है, जो रिश्वत लेने से इनकार कर देता है। कहानी का अंत इस व्यंग्य के साथ होता है कि पूँजीपति वर्ग अंततः ईमानदारी का उपयोग अपने हितों की रक्षा के लिए ही करता है। यह सब आज भी प्रासंगिक लगता है।
प्रेमचंद की 'ओझा' कहानी में न्यायिक व्यवस्था पर जबर्दस्त व्यंग्य कटाक्ष है। इस कहानी में वकीलों को "ओझा" कहकर संबोधित किया गया है, जो उनके समकाल का अंधविश्वास और ढोंग से जुड़ा शब्द है। प्रेमचंद लिखते हैं "ये ओझा लोग न्याय की देवी के पुजारी हैं, इनकी पूजा-अर्चना किए बिना न्याय की देवी प्रसन्न नहीं होती।"
आर्थिक शोषण और सामंतवाद पर व्यंग्य ..
प्रेमचंद के साहित्य में आर्थिक विषमता और सामंतवादी शोषण पर गहरा व्यंग्य पठनीय है। उनके उपन्यास 'गोदान', 'रंगभूमि' और 'प्रेमाश्रम' में किसान जीवन की त्रासदी और पूँजीवादी शोषण का मार्मिक चित्रण है।
'गोदान' प्रेमचंद का सर्वाधिक चर्चित उपन्यास है, जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक संबंधों का यथार्थ चित्रण है। इस उपन्यास का नायक होरी एक गरीब किसान है, जो अपने छोटे से खेत में जीवनयापन करता है, किन्तु कर्ज़ और लगान के बोझ तले दबकर अंततः उसकी मृत्यु हो जाती है।
इसी तरह 'पूस की रात' कहानी में किसान जीवन की विवशता और शोषण पर मार्मिक व्यंग्य है। कहानी का नायक हाल्कू एक गरीब किसान है, जिसके पास रात में ओढ़ने के लिए कंबल नहीं है। इस कहानी में हल्कू का कुत्ता कर्मरत और भोला प्राणी है, जिसके अपने मालिक के साथ सहयोग और वफादारी का संबंध प्रस्तुत किया गया है। यह चित्रण मानवीय संबंधों की कटुता और सामंती व्यवस्था की क्रूरता पर गहरा व्यंग्य है।
स्त्री-पुरुष असमानता और पितृसत्ता पर व्यंग्य...
प्रेमचंद के साहित्य में तब की स्त्री जीवन की व्यथा और पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर तीक्ष्ण व्यंग्य मिलता है। उन्होंने दहेज प्रथा, विधवा विवाह निषेध, स्त्री शिक्षा का अभाव, बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों पर कटाक्ष किया है।
'निर्मला' उपन्यास में दहेज प्रथा और अनमेल विवाह पर करारा व्यंग्य है। निर्मला एक सुशिक्षित और सुंदर युवती है, जिसका विवाह एक वृद्ध विधुर के साथ कर दिया जाता है। इस अनमेल विवाह के कारण निर्मला का जीवन नर्क बन जाता है और अंततः वह आत्महत्या कर लेती है।
'बड़े घर की बेटी' कहानी में प्रेमचंद ने स्त्री शिक्षा और नारी स्वतंत्रता पर बल दिया है। कहानी की नायिका बेनी एक उच्च कुल की लड़की है, जो शिक्षित और स्वतंत्रचेता है। इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद ने उन उच्च कुलीन परिवारों पर व्यंग्य किया है, जो दिखावटी शिष्टता और रूढ़िवादिता में जकड़े हुए हैं।
प्रेमचंद के व्यंग्य की साहित्यिक विशेषताएँ...
प्रेमचंद के व्यंग्य की कुछ विशिष्ट साहित्यिक विशेषताएँ हैं, जो उनके साहित्य को विशिष्ट और प्रभावशाली बनाती हैं...
चरित्र चित्रण की यथार्थपरकता..
प्रेमचंद के व्यंग्य की पहली विशेषता है चरित्र चित्रण की यथार्थपरकता है। उनके व्यंग्य प्रयोग में लालित्य है। वे व्यंग्य को मूल कहानी के अभिव्यति के एक उपकरण के रूप में उपयोग करते हैं। उन्होंने आजकल प्रचलित स्वतंत्र व्यंग्य लेख की तरह नहीं लिखा । उनके कथा पात्र जीवंत और सहज हैं, जो अपने व्यवहार और वाणी के माध्यम से स्वयं ही व्यंग्य प्रस्तुत कर देते हैं। उदाहरण के लिए, 'शतरंज के खिलाड़ी' कहानी में मिर्ज़ा सज्जाद अली और मीर रौशन अली का चरित्र नवाबी शानोशौकत और आलस्य का प्रतीक है।
भाषा शैली की सहजता और प्रवाह ..
प्रेमचंद के व्यंग्य की दूसरी विशेषता है भाषा शैली की सहजता और प्रवाह। उनकी भाषा सरल, बोधगम्य और जनसामान्य की भाषा है, जिसमें मुहावरों और लोकोक्तियों का सुंदर प्रयोग है। उदाहरण के लिए, 'कफन' कहानी में घीसू और माधव का चित्रण गरीबी और अकर्मण्यता का प्रतीक है।
हास्य और व्यंग्य का सन्तुलन...
प्रेमचंद के व्यंग्य की तीसरी विशेषता है हास्य और व्यंग्य का सन्तुलन। उनके व्यंग्य में कटुता नहीं है, बल्कि विनोदी स्वर में गंभीर बात कही गई है। उदाहरण के लिए, 'बूढ़ी काकी' कहानी में बूढ़ी विधवा की उपेक्षा और अनादर का चित्रण है।
नैतिकता और मानवीय मूल्यों का समर्थन..
प्रेमचंद के व्यंग्य की चौथी विशेषता है नैतिकता और मानवीय मूल्यों का समर्थन। उनका व्यंग्य नकारात्मक आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि सकारात्मक मूल्यों की स्थापना की ओर उन्मुख है। उदाहरण के लिए, 'ईदगाह' कहानी में हामिद का चरित्र मानवीय संबंधों की महत्ता को उजागर करता है। यह कारुणिक कहानी है।
प्रेमचंद के व्यंग्य की सार्वकालिक प्रासंगिकता..
मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में निहित व्यंग्य एक सशक्त सामाजिक हस्तक्षेप है, जो रूढ़िवादिता, अन्याय और शोषण के विरुद्ध खड़ा होता है। उनका व्यंग्य नैतिक चेतना और सामाजिक दायित्व से अनुप्राणित है, जिसका उद्देश्य मनुष्य के आंतरिक परिवर्तन के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देना है।
प्रेमचंद का साहित्यिक दृष्टिकोण सर्वहारा वर्ग के प्रति सहानुभूति और शोषक वर्ग के प्रति विरोध से परिभाषित होता है। उन्होंने गरीबों, किसानों, मजदूरों और स्त्रियों की व्यथा को अपने साहित्य का विषय बनाया और उनके अधिकारों और गरिमा के लिए आवाज उठाई।
प्रेमचंद की साहित्यिक विरासत आज भी प्रगतिशील जनवादी साहित्य के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई है। आज के भौतिकवादी युग में, जब नैतिक मूल्य और मानवीय संबंध तेजी से क्षरित हो रहे हैं, प्रेमचंद का साहित्य हमें आत्ममंथन और सामाजिक सुधार की प्रेरणा देता है। प्रेमचंद के शब्दों में "साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का मार्गदर्शन करना है।" और उनका व्यंग्य इस उद्देश्य की पूर्ति का एक सशक्त माध्यम है। वर्तमान व्यंग्यकार प्रेमचंद के लेखन में व्यंग्य प्रयोग के अध्ययन से बहुत कुछ सीख सकते हैं।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
इन दिनों दुबई में
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कैसा लगा ..! जानकर प्रसन्नता होगी !