Wednesday, January 14, 2026

पुस्तक चर्चा:पाखंड के विरुद्ध विजी श्रीवास्तव का निर्भीक शब्द-युद्ध .. "ए जी! सुनते हो' (व्यंग्य संग्रह)

 पुस्तक चर्चा 


  पाखंड के विरुद्ध विजी श्रीवास्तव का निर्भीक शब्द-युद्ध .. "ए जी! सुनते हो' (व्यंग्य संग्रह)


चर्चा.. विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 विजी श्रीवास्तव का सद्यः प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ए जी सुनते हो , समकालीन हिंदी साहित्य में व्यंग्य की एक ऐसी मशाल बन कर प्रस्तुत हो रहा है जो समाज के अंधेरे कोनों को उजागर करता दिखता है। यह पुस्तक शीर्षक के अनुरूप मात्र हल्का फुल्का हँसाने का साधन नहीं, बल्कि समाज के सामूहिक पाखंड और नैतिक पतन का एक गहरा अन्वेषण है । यह संग्रह पाठकों से कहता है, ए जी सुनते हो? पढ़ो, सुनो , गुनो, और हो सके तो कुछ करो भी ।


लेखक ने माइनिंग में होते व्यापक भ्रष्टाचार को समझाने के लिए शब्दों को ही प्रयोगशाला बना दिया है। वे 'खान' को (यानी खाते रहना) और 'खनिज' को 'निज' (स्वयं का) में बदलकर यह बताते हैं कि कैसे सार्वजनिक खनिज संपदा माफिया की निजी लूट का साधन बन गई है।


 लेखक ने उधारी का शहीद, इस नवाचारी पदबंध के माध्यम से पूँजीवादी व्यवस्था पर प्रहार किया है। जो व्यक्ति कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या करता है, वह व्यवस्था के लिए केवल ' शहीद' बनकर रह जाता है।


 'कफ़न चाहिए तो बोलो' रचना में दिखाया गया है कि भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि सरकारी तंत्र मृतकों को मुफ्त कफ़न बाँटने की योजना में भी अपने लिए 'कमीशन' की गुंजाइश ढूँढ लेता है।


 चम्मच घुमाना , का रोचक प्रयोग लेखक की शैली बताता है। एक सड़क ठेकेदार का यह कहना कि उसने ठेका लेने के लिए 'कितनी ही जगह चम्मच घुमाया था' (रिश्वत दी थी), शासन प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार की परतें खोलता मारक स्टेटमेंट है।


 'ए जी! सुनते हो' , पाखंड के विरुद्ध एक निर्भीक शब्द-युद्ध है। 

विजी श्रीवास्तव का यह व्यंग्य-संग्रह आधुनिक जीवन की विसंगतियों का एक 'सोशल क्रॉस-सेक्शन' है। 

यह पुस्तक अपनी भाषा की मारक क्षमता और शिल्प की नवीनता के कारण विशिष्ट बन पड़ी है। 

शब्द-कीमियागरी और भाषाई प्रहार जबर्दस्त हैं।

लेखक के पास शब्दों का 'संप्रभु अधिकार' है। वे 'चूना लगाना' जैसे लोक-मुहावरों को राजनीतिक विचारधारा के स्तर तक ले जाते हैं। 'चूना मंत्री' या 'विशेष अतिथि' जैसे शब्दों के माध्यम से वे समाज के उस वर्ग पर चोट करते हैं जो बिना किसी उपयोगिता के केवल 'मंच का बैलेंस' (फोटो खिंचवाने) के लिए मौजूद रहता है।

संस्थागत पाखंड का पर्दाफाश करने में लेखक सफल है। 

'चरण रज का अभिलाषी' में लेखक ने साहित्यिक और अकादमिक बाज़ार के पतन को दिखाया है। जहाँ योग्यता की जगह 'नेटवर्किंग' और चाटुकारिता ने ले ली है। जब एक युवक भ्रष्ट लोगों की चरण रज इकट्ठा करके बंजर खेत को उर्वर बनाने का दावा करता है, तो यह इस बात का प्रतीक है कि भ्रष्टाचार ही हमारा नया जीवन-स्रोत बन चुका है । लेखक मीडिया और तकनीक पर कटाक्ष करने में पीछे नहीं रहते । 

'आत्मा से मिलाप' में टीआरपी की दौड़ , अंधी होती पत्रकारिता को निशाना बनाया गया है। वहीं 'ओटीपी आ गया' और 'कस्टमर केयर के चक्रव्यूह में फँसा अभिमन्यु' जैसी रचनाएँ दिखाती हैं कि कैसे आधुनिक तकनीक ने जीवन को सुलभ बनाने के बजाय उसे अधिक खीज भरा और जटिल बना दिया है।

 मानवीय संवेदनाओं का क्षरण लेखक के निशाने पर है। लेखक इस बात से व्यथित हैं कि आज का मनुष्य संवेदना शून्य होता जा रहा है। 'कल शायद श्मशान जाना पड़े' जैसी सूचना पर व्यक्ति दुखी होने के बजाय अपने 'अपॉइंटमेंट' बिगड़ने की चिंता करता है। जब समाज में न्याय और रोटी की खबरें छोटे कॉलम में सिमट जाती हैं और जूता उछालने जैसी घटनाएँ 'हेडलाइन' बनती हैं, तो लेखक की निराशा एक तीखे व्यंग्य के रूप में फूटती है।


'एजी! सुनते हो' एक अत्यंत सजग और सतर्क, सतत् व्यंग्य दृष्टि का परिणामी ,सुदृढ़ लेखन है। विजी श्रीवास्तव ने उपदेश देने के बजाय हास्य और फंतासी के माध्यम से पाठकों को चेताया है। यह पुस्तक समकालीन समय के कठिन सवालों से मुठभेड़ करती है और हमें अपने भीतर झाँकने पर विवश करती है।


 पार्टी के अनुशासित सिपाहियों की महफिल,

लिव इन की कहानी का अंत,चूने की लकीर,और सुनाओ भाभी कैसी हैं,

कृषि दर्शन में जूते की खेती,क्या डिलिट किया,शोक सभा की तैयारियाँ,सावधान ! खाँसना मना है,स्वतंत्रता दिवस की बूंदी और ट्रिलियन के शून्य,कुत्तों का नामकरण , अपनी पर आने वालो अब आ ही जाओ ,बिल्ली की शिट्टी-न लीपने की न पोतने की, तेल, तेल की धार और फैट-फ्री आम आदमी , हिंदी संस्थान का कुत्ता,अपने पाले में हमें तो मत गिनो यार..,

उल्लू के पट्टे कभी कम न होंगे,स्वदेशी मुर्गी का हिंदी दर्शन,विशेष-अतिथि, पतन के मार्गों पर गड्ढों का नामकरण,समर्थन का मूल्य,इन्साफ का तलबगार,ग्लूकोज के बिस्कुट का साहित्य के विकास में योगदान,

नींद में बिकती इन्सानियत,लोकतंत्र घायल है,अच्छे डॉक्टर से इलाज कराओ,हुआ हुआ न हुआ हमला,हलो चेक हलो,कोरोना वायरस का अभिनंदन समारोह,हैरान हैं सड़कें,साढ़े इक्कीसवीं सदी में सब्जी की साहसिक खरीदी,शांति के मसीहा के बहुरंगी रूमाल,

 जैसे अपेक्षाकृत लंबे शीर्षकों वाली किन्तु गहरे मंतव्य की , हर वाक्य में सार्थक कटाक्ष से भरी रचनाएं एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर वैचारिक संप्रेषण करती हैं। सारी किताब विजी श्रीवास्तव की परिपक्व लेखनी से परिचित करवाती है। किताब पाठक को व्यंग्य का आनंद प्रदान करने वाली है। भाषा , शैली , अभिव्यक्ति, संप्रेषण सधा हुआ है। इसे पढ़कर मैं आश्वस्त हूं कि पुस्तक एजी सुनते हो , समकालीन व्यंग्य जगत में विशिष्ट पहचान स्थापित करेगी ही करेगी। पुस्तक वनिका पब्लिकेशन से प्रकाशित हुई है, और नई दिल्ली पुस्तक मेले में हाल ही कृति का विमोचन हुआ है। 


चर्चा .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

Wednesday, January 7, 2026

फैशन बनाम फ्रीडम

 व्यंग्य 

फैशन बनाम फ्रीडम 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से



स्त्री विमर्श की आड़ में नया बौद्धिक फैशन चला है , “कपड़ों में खराबी नहीं, तुम्हारी नज़र में खराबी है!” सुनने में यह वाक्य बड़ा आधुनिक और आत्मनिर्भर लगता है, पर असल में यह एक ऐसा नारा है, जो सोच की बहस को एक ही दिशा में मोड़ देता है। सवाल यह नहीं कि कौन क्या पहनता है ? सवाल यह है कि सोच किसकी बदलनी चाहिए, देखने वाले की या दिखाने वाले की?  

पहले भी लोग कपड़े पहनते थे, आज भी पहनते हैं। फर्क बस इतना है कि तब वस्त्र देह को ढंकने के लिए होते थे, अब फैशनेबल वस्त्र चर्चा में रहने के साधन बना लिए गए हैं ।

 चाणक्य ने वासना को सबसे बड़ा नशा कहा था। आज वही नशा “बॉडी पॉजिटिविटी” के नाम से सभ्यता की थाली में परोसा जा रहा है। 

 “हम क्या पहनेंगे, यह हम तय करेंगे।” बिल्कुल ठीक है! पर यह भी उतना ही सच है कि “दूसरे हमें कैसे देखेंगे, यह भी वे ही तय करेंगे।” दोनों अर्ध सत्य हैं, पर मिलकर एक पूरा सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य बनाते हैं । सम्मान मांगने से नहीं, व्यवहार से अर्जित होता है। समस्या कपड़ों की नहीं, उस विचार की है जो कपड़ों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा रहा है।

 “आधुनिकता” की परिभाषा कुछ ऐसी हो गई है कि जितना कम कपड़ा, उतनी ज़्यादा प्रगति। तो क्या जंगलों में रहने वाले साधन हीन आदिवासी सबसे आधुनिक थे ? अगर सभ्यता का पैमाना वस्त्रों की लंबाई है, तो यह पैमाना तो काफ़ी गड़बड़ा गया लगता है।  

 फैशन जगत “स्वतंत्रता” बेचता है और समाज उसे “प्रगतिशीलता” के दाम पर खरीद लेता है। स्त्री देह का नैसर्गिक सौंदर्य विज्ञापन की भेंट चढ़ रहा है। अब वस्तु से अधिक उसका प्रमोशन महत्वपूर्ण बना दिया गया है। इंस्टाग्राम पर फोटो को विचार समझ लिया गया है, और सोच को ‘लाइक’ के पैमाने पर नापा जाता है। सब तरफ एक ही आवाज़ “सोच बदलो!” मगर सवाल वही पुराना “किसकी सोच?”  


कभी हमारे यहाँ लाज, मर्यादा, शालीनता को नारी का आभूषण कहा गया था। आज ब्रांडेड कपड़े उस आभूषण के प्रतिस्पर्धी बन बैठे हैं। पहले माँ अपनी बेटी से कहती थी “बेटी, ऐसा पहन जो तुझे शोभा दे।” अब बेटी कहती है “माँ, ऐसा पहन जो ट्रेंड में हो।” फर्क वक्त का नहीं, दृष्टि का है।  


फैशन के विरोध में कोई नहीं किन्तु विसंगति उस सोच से है जहाँ “दिखने” का अर्थ “होने” से बड़ा हो गया है। वस्त्र तभी खूबसूरत लगते हैं जब वे व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाते हैं, उसे वस्तु में नहीं बदलते । संस्कृति और सभ्यता को कपड़ों से नहीं, सोच से जाना जाता है।  


आधुनिकता को त्याग नहीं, चयन बनाइए। न दृष्टि को दूषित करें, न अभिव्यक्ति को अशोभन। वस्त्र सौंदर्य का प्रतीक रहें, संस्कार का विकल्प नहीं, फैशन की आज़ादी बुरा विचार नहीं, पर सोच की गुलामी बुरी ज़रूर है।  

कपड़े बदलिए जितना चाहे , पर सोच ऐसी रखिए जो सभ्यता न उतारे, उसे शालीनता से धारण करे।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

पहचाना?

 पहचाना आप ने ? 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


पहचाना आप ने ? ...

, अरे कैसी बात करते हैं, आप भी! संकोच में ऐसा कह चुकने के बाद , वे बातों बातों में वह सूत्र ढूंढते हैं कि किसी तरह मिलने वाले का नाम याद आ जाए ? दरअसल, 

नाम आदमी की पहचान है, पर याददाश्त के साथ उसका रिश्ता हमेशा लुका-छुपी का ही रहा है। चेहरा तो लोग पहचान लेते हैं, पर नाम जैसे हमारी स्मृति से सबसे पहले पलायन कर जाता है। किसी को फोन करना हो तो याद ही नहीं आता कि बंदे का नंबर किस नाम से सेव किया था । 

एक विवेक ढूंढो तो तीन निकल आते हैं, इसलिए रिफरेंस या शहर का नाम साथ लिखना पड़ता है।

किसी पार्टी या सभा में मिलते समय नाम स्मरण की यह समस्या सबसे अधिक होती है। सामने वाला मुस्कराते हुए "कैसे हैं आप" कहता है और हम भी उतनी ही आत्मीयता से "अरे आप!" कह देते हैं। इस "आप" के पीछे कितनी मजबूरी और कितना अपराध बोध छुपा होता है, यह वही समझ सकता है जिसने मिलने वाले का नाम दिमाग की हार्ड डिस्क से डिलीट कर ‘रीसायकल बिन’ में पहुंचा दिया होता है। और रिसाइकिल बिन क्लीन कर दी होती है। दिमाग को सारे खाए हुए बादाम की कसम देते रहो पर नाम याद ही नहीं आते, तब सभ्यता के नाते दिमाग से काम लेना पड़ता है , और पहचानने की एक्टिंग करनी पड़ती है।


शशि कपूर साहब ने इस विसंगति का हल खोज निकाला था। वे मिलते ही सामने वाले से कहते, "हाय, आई एम शशि कपूर।" सामने वाला भी शिष्टाचार निभाने के चक्कर में अपना परिचय दे देता। यह फार्मूला कलाकारों और सेलिब्रिटीज के लिए तो ठीक है, पर अगर मोहल्ले का गजोधर प्रसाद या हरिप्रसाद यही तरीका अपनाए तो सामने वाला शक करने लगेगा कि कहीं यह बीमा बेचने वाला एजेंट तो नहीं।


कुछ लोग इस समस्या को छिपाने के लिए ऐसे रचनात्मक वाक्य गढ़ते हैं कि सुनकर हंसी भी आए और दया भी। जैसे कोई कहे "भाई साहब, आप तो बिल्कुल नहीं बदले!" अब सामने वाला सोचता है कि मैं पचास साल से यही हूँ, बदली तो तुम्हारी याददाश्त है। या फिर लोग बचने के लिए रिश्तों का सहारा लेते हैं "भाभी जी", "भाई साहब", "चाचा जी"। यही तो भारतीय संस्कृति का अद्भुत चमत्कार है। जब नाम याद न आए तो रिश्ते का लेबल चिपका दो, सामने वाला खुद ही नाम बता देगा।


हमारे एक अंकल ने इस समस्या को सीधे ईमानदारी से हल किया। वे मिलते ही कहते, "बेटा, याददाश्त कमजोर हो चुकी है, बातें करने से पहले नाम और पता बता दीजिए।" अब उनकी इस सादगी में न दिखावा है, न शिष्टाचार का जाल। सामने वाला झट से नाम बता देता है, जैसे परीक्षा हॉल में अपना एडमिशन कार्ड दिखा रहा हो।


नाम भूलने की समस्या अक्सर हास्यास्पद हालात पैदा कर देती है। शादी ब्याह में रिश्तेदार एक-दूसरे से टकराते हैं, पर नाम भूलने का अपराधबोध दोनों ओर इतना गहरा होता है कि बातचीत का सारांश यही रह जाता है "अरे आप!" और "जी, वही!" 

ऑफिस पार्टियों में तो यह विसंगति और भी दिलचस्प हो जाती है। कोई पूरे आत्मविश्वास से पांच मिनट तक बतियाता रहता है और फिर पूछ बैठता है "वैसे आपने मेरा नाम तो नहीं भुलाया?" तब तक नाम सचमुच स्मृति की फाइलों से प्रसंगवश रिकवर हो गया तो हम पूरे आत्मीय भाव से मुस्कराते हुए कहते हैं , अरे फलां जी कैसी बात करते हैं आप भी ।

वरना बाद में सिर खुजाते मिलने वाले का नाम स्मृति पटल पर खोजना होता है। 

सच यह है कि नाम भूलना कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है, यह भीड़ में घुल जाने की कला है। हम रोज़ इतने चेहरों से मिलते हैं कि दिमाग भी कभी-कभी ‘सिस्टम हैंग’ कर देता है। और तब "अरे आप" या "भाई साहब" जैसे संबोधन जीवनरक्षक ऐप साबित होते हैं।


अब समय आ गया है कि सरकार आधार कार्ड में एक नया फीचर जोड़ दे। जैसे ही हम किसी से मिलें, दोनों के मोबाइल पास लाते ही ब्लूटूथ से स्क्रीन पर स्वयं ही नाम चमक उठे। पर तब तक हमें अंकल की ही ईमानदार शैली अपनानी होगी कहना होगा "ओ मिलने वाले, जरा अपना नाम तो बता।" क्योंकि बिना नाम का संदर्भ समझे बातचीत करना वैसा ही है जैसे अंधेरे में रेडियो सुनना । आवाज तो आती है, मज़ा भी आता है, लेकिन यह समझ ही नहीं पड़ता कि प्रसारण किस स्टेशन से चल रहा है।

मैं एक सज्जन के यहां, रात्रि भोज पर निमंत्रित था , भोजन कर आया । उनकी पत्नी से यह पहली भेंट थी । सभ्यता से भाभी जी की ओर बहुत ध्यान से देखा भी नहीं । अगले दिन जब बाजार में जब एक महिला मेरी ओर देख कर मुस्करा रही थी, तो मुझे समझ ही नहीं आया कि यह क्या और क्यों हो रहा है । मुझे अजनबी सा देखते पा कर देवी जी बोली , अरे खाना खाकर भी आपने पहचाना नही , झेंपने के सिवा क्या कर सकता था मैं । दरअसल महिलाएं हेयर स्टाइल बदल दें, या देसी परिधान की जगह पाश्चात्य ड्रेस पहन लें तो उन्हें पहचानना मेरे लिए वैसे भी कठिन हो जाता है । सच तो यह है कि एक नग अपनी पत्नी के मूड तक को भी अब तक कभी पहचान नहीं पाया! 

खैर आप ही बताइए , किस को कितना पहचाना आप ने? आभासी दुनिया के ढेरों मित्र बड़े मिले मिले से लगते हैं, पर आसपास के कई लोग भी बहुत अनजाने होते हैं।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 भोपाल

Tuesday, January 6, 2026

नंबर वन का 'अमृत' और नरक का ड्रेनेज

 व्यंग्य

नंबर वन का 'अमृत' और नरक का ड्रेनेज


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


इंदौर में इन दिनों गजब का द्वंद्व चल रहा है। एक तरफ आसमान से टपकती स्वच्छता की 'नंबर वन' की ट्राफियां हैं और दूसरी तरफ जमीन फाड़कर निकलता 'भागीरथपुरा' का सच। सूचना मिली है कि प्रशासन ने अपनी चिर-परिचित फुर्ती दिखाते हुए कुछ अधिकारियों का 'स्थानांतरण' कर दिया है। वाह! क्या गजब का इलाज है। जैसे किसी का अपेंडिक्स फट गया हो और डॉक्टर उसका बिस्तर बदल दे। साहब यहाँ से वहाँ हुए नहीं कि सिस्टम का पाप धुल गया! सुना है नए साहब के आते ही पुरानी पाइप लाइन ने शर्म के मारे जहर उगलना बंद कर दिया है।


भागीरथपुरा, नाम कितना पवित्र है। महाराज भगीरथ ने गंगा लाने के लिए अंगूठे पर खड़े होकर तपस्या की थी ताकि पूर्वजों को तार सकें, पर हमारे आधुनिक भगीरथों (इंजीनियरों) ने पाइपलाइन बिछाते समय ऐसी 'तपस्या' की कि अमृत योजना की नली को सीधे ड्रेनेज की नाली से 'कनेक्ट' कर दिया। अब पुरखे तरें न तरें, मोहल्ले वाले सीधे इस लोक को छोड़  मोक्ष की यात्रा पर निकल पड़े। यह सरकारी मोक्ष ही है, बस फर्क इतना है कि यह यमराज द्वारा नहीं, बल्कि नगर निगम द्वारा 'स्पॉन्सर्ड' है।

इस पूरी त्रासदी के पीछे जो 'महान कलाकार' छिपा है, वह है, सरकारी ठेकेदार। यह वह प्रजाति है जो लोहे के पाइप को कागज की तरह मोड़ सकती है और कंक्रीट में इतनी रेत मिला सकती है कि रेगिस्तान को भी शर्म आ जाए। ठेकेदार साहब का गणित एकदम स्पष्ट है, "ऊपर की सड़क ऐसी बनाओ कि मुख्यमंत्री का काफिला निकले तो झटका न लगे, और नीचे पाइप ऐसा डालो कि अगली बारिश तक गायब हो जाए।" टेंडर की मलाई और कमीशन के खेल में पाइपलाइन की मोटाई इतनी कम रह गई कि सीवेज के कीड़ों ने उसे 'डोरस्टेप डिलीवरी' का रास्ता समझ लिया। ठेकेदार के लिए 'अमृत' का मतलब वह 'प्रसाद' है जो उसे फाइल पास होने के बाद मिलता है, जनता का गला सूखे या सड़े, इससे उसके बैंक बैलेंस का 'फ्लो' नहीं रुकता।

शहर का चेहरा तो इतना चमकीला है कि आप अपनी शक्ल डिवाइडर पर देख लें। दीवारों पर नाचते मोर हैं, स्वच्छता के गान गाती गाड़ियाँ हैं और हर खंभे पर मुस्कराते नेताओं के पोस्टर हैं। पर इस चमक-धमक के नीचे शहर क्या 'पाल' रहा है, यह तब पता चलता है जब अस्पताल के बेड कम पड़ जाते हैं। यहाँ मोहल्ला राजनीति का भी अपना स्वैग है। "हमारे भाईसाहब" का वोट बैंक बना रहे, इसलिए पाइपलाइन चाहे गटर के भीतर से निकले या शौचालय के नीचे से, बस 'नल' चलना चाहिए। पार्षद जी को चिंता इस बात की नहीं थी कि पानी में बैक्टीरिया हैं, उन्हें चिंता इस बात की थी कि उद्घाटन के पत्थर पर उनका नाम बड़ा है या नहीं। चुनावी गणित में 'शुद्ध पेयजल' से ज्यादा जरूरी 'मुफ्त का टैंकर' होता है, ताकि संकट के समय मसीहा बना जा सके।

जब जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँचा, तो नेताओं ने अपना अचूक ब्रह्मास्त्र निकाला, 'स्थानांतरण'। कलेक्टर साहब हटा दिए गए, कमिश्नर साहब विदा कर दिए गए। जनता दुख भूल कर फटाफट खुश हो गई! उसे लगा  कि 'न्याय' हो गया। अरे भाई, साहब तो बदल गए, पर वह सड़ा हुआ सिस्टम और वह लीकेज वाली पाइपलाइन तो वहीं है जो पिछले दस सालों से ड्रेनेज को चूम रही है। यह तो वही बात हुई कि इंजन खराब है और आप बार-बार ड्राइवर बदल रहे हैं। राजनेता जानते हैं कि पब्लिक की याददाश्त और पानी का स्वाद, दोनों बहुत जल्दी बदल जाते हैं।

रही बात समाधान की, तो हुजूर! समाधान किसी फाइल या तबादले में नहीं, बल्कि इस 'स्मार्ट' चश्मे को उतारने में है। जल्दी ही मजबूर जनता जीने के लिए अपने घरों में यूरेका के असरदार वाटर फिल्टर खुद लगा ही लेगी । तब तक बिसलेरी की बोतलों से नहाने का सौभाग्य मिलेगा । 

पर यह कौन बताए कि असली 'अमृत' जल तब बरसेगा जब ड्रेनेज और पेयजल की लाइनों के बीच की दूरी कम से कम उतनी कर दी जाएगी जितनी एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच नेता और जनता की होती है। बेहतर होगा कि अगली बार 'स्मार्ट सिटी' का तमगा देने से पहले दीवारों के पेंट की जगह पाइपों के 'प्रेसर' की जाँच की जाए। समाधान तो यह भी है कि जिस ठेकेदार और इंजीनियर ने यह महान 'जुगलबंदी' की है, उन्हें तब तक उसी मोहल्ले का पानी पिलाया जाए जब तक वे खुद न मान लें कि अमृत योजना में 'विष' का मिश्रण सरकारी गाइडलाइन का हिस्सा नहीं है। बड़े अधिकारियों के तबादलों के इस सर्कस को बंद कर अगर 'जवाबदेही' को भी 'नंबर वन' बना दिया जाए, तो शायद किसी और भगीरथ को अपने मोहल्ले के पुरखों को तारने के लिए श्मशान न जाना पड़े। वरना याद रखिए, इतिहास केवल आपके रंगे-पुते डिवाइडर याद नहीं रखेगा, वह उन पाइपों के बारे में भी लिखेगा जिन्होंने शहर की साख को गटर में बहा दिया। आज इंदौर कल कोई दूसरा शहर लीकेज का माइलेज अखबार की इबारत बनता रहने से रोकना है तो तकनीकी प्रोजेक्ट्स को राजनीति से दूर करना होगा । 


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Tuesday, December 30, 2025

कटाक्ष की कसौटी पर दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें

 कटाक्ष की कसौटी पर दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


दुष्यन्त कुमार (1933-1975) आधुनिक हिन्दी साहित्य के ऐसे विशिष्ट ग़ज़लकार हैं, जिन्होंने ग़ज़ल को रूमानियत और श्रृंगार के परम्परागत दायरे से निकालकर समकालीन यथार्थ, सामाजिक विसंगतियों और राजनीतिक विद्रूपताओं के चित्रण का माध्यम बनाया। उनकी काव्य चेतना का केन्द्र 'आम आदमी' की पीड़ा, आकांक्षा और संघर्ष है। इसी चेतना को अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने हिंदी ग़ज़ल को एक सशक्त अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया। ग़ज़लों में उनका कटाक्ष , व्यंग्यात्मक प्रहार और तंज  सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था की जड़ता, संवेदनहीनता और विडम्बनाओं के प्रति तीखा प्रहार तथा जन चेतना जगाने का प्रयास  सिद्ध हुआ है।

दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों में निहित व्यंग्य के स्वरूप, विषय वस्तु और अभिव्यक्ति का विवेचन महत्वपूर्ण है। 


दुष्यन्त कुमार के कटाक्ष की जड़ें उनकी गहन सामाजिक प्रतिबद्धता में निहित हैं।  उनकी ग़ज़लों में "सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक विसंगतियों को बेबाकी से उभारने" के व्यापक उदाहरण हैं।  वे 'साये में धूप' जैसे संग्रह के माध्यम से आज़ाद भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की विडंबनाओं को उजागर करते हैं और "जनता की सुप्त संवेदनाओं को जागृत करते हैं"। उनका व्यंग्य दो स्तरों पर काम करता है , एक ओर वे शोषित जनता से सहानुभूति रखते हैं, तो दूसरी ओर "उसकी संवेदनहीनता और जड़ता पर व भी कटाक्ष में गजल कहते हैं"। इस प्रकार उनकी ग़ज़ल केवल विरोध तक सीमित नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक चेतना के निर्माण का छंद बद्ध आह्वान है।


 राजनीतिक व्यवस्था और खोखले वादों पर कटाक्ष उनकी लोकप्रियता की ताकत बना दिखाई देता है। 

दुष्यन्त कुमार की सबसे प्रसिद्ध  ग़ज़लों में से एक है  "कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए"...। इस ग़ज़ल में राजनीतिज्ञों के कथनी और करनी के अन्तर पर करारा कटाक्ष है। वे कहते हैं कि नेताओं ने हर घर को रोशन करने (सुख-सुविधा देने) का सपना दिखाया, लेकिन वास्तविकता यह है कि "कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए"। यहाँ 'चिराग़' सुविधाओं और विकास का प्रतीक है।  "दुष्यंत जी  राजनीति पर व्यंग करते हुए कहते हैं कि राजनीति लोगों को बड़े-बड़े लुभाने सपने दिखाती है... आज स्थिति यह है कि शहरों में भी चिराग़ अर्थात् सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, नेताओं की घोषणा कागज़ी है"। यह ग़ज़ल राजनीतिक व्यवस्था के थोथे आश्वासनों और जनता के साथ धोखे के उनके अनुभव का जीवन्त भावनात्मक दस्तावेज है, इसी तेवर से वे आम आदमी में लोकप्रिय हुए। 


ग़ज़ल "मत कहो, आकाश में कुहरा घना है" सामाजिक यथार्थ की कड़वी सच्चाई को व्यंग्य के माध्यम से पेश करती है। कवि कहता है कि सड़क पर इतना कीचड़ है कि हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है, लेकिन "पक्ष और’ प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं, बात इतनी है कि कोई पुल बना है"। यहाँ संसद में होने वाली खोखली बहस और जमीनी हकीकत (सड़कों की बदहाली) के बीच की विसंगति पर तीखा तंज है। वे आगे कहते हैं कि "रक्त वर्षों से नसों में खौलता है, आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है" , यह समाज में जमी हुई पीड़ा और उसे हल्के में लेने की प्रवृत्ति पर चोट है। अंत में, "दोस्तो! अब मंच पर सुविधा नहीं है, आजकल नेपथ्य में संभावना है" पंक्ति सत्ता और अवसर के केन्द्रों से सामान्य जन के हटाए जाने की विडम्बना को दर्शाती है।


ग़ज़ल "वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है" सत्ता के एक ऐसे कृत्रिम, दम्भी और खोखले प्रतिनिधि का चित्रण करती है, जो असलियत में कुछ नहीं है, बस एक 'बयान' मात्र है। उसके "झोले में कोई संविधान है" जैसी पंक्ति शासन के नाममात्र के औपचारिक ढाँचे और उसकी वास्तविक निरंकुशता के बीच के अन्तर को उजागर करती है। यह चित्रण उन तथाकथित 'विकास' और 'कानून' के ठेकेदारों की पोल खोलता है, जिनका असली चरित्र जनता से कोसों दूर है।

आज भी राजनेता अपने भाषणों में झोले से संविधान निकाल कर जन सभाओं में लहराते नजर आते हैं, और ये स्थिति दुष्यन्त को प्रासंगिक बनाए हुए है।


"कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं" ग़ज़ल में समकालीन समाज में व्याप्त विसंगतियों का चित्रण है। "गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं", "वो सलीबों के क़रीब आए तो हम को क़ायदे क़ानून समझाने लगे हैं" जैसी पंक्तियाँ धर्म और कानून के नाम पर होने वाले पाखण्ड पर प्रहार करती हैं। "अब नई तहज़ीब के पेश-ए-नज़र हम आदमी को भून कर खाने लगे हैं" , यह पंक्ति नवीन सभ्यता के नाम पर मनुष्यता के भक्षण (शोषण) की ओर संकेत करती है, जो आधुनिकता के नकली आवरण में छिपे बर्बरता भरे व्यवहार पर गहरा व्यंग्य है। 

अब विद्रूप स्थिति तो ये हो रही है कि सचमुच तंदूर कांड , या बोटियां काटकर फ्रिज में रखने जैसी वीभत्स्व घटनाएं समाज में हो रही हैं, पर कोई दुष्यन्त कुछ वैसा लिख नहीं रहा, जैसा उस दुष्यन्त ने तात्कालिक परिस्थित पर लिख लिया। 


दुष्यन्त कुमार के व्यंग्य की प्रभावोत्पादकता उनकी भाषा-शैली में निहित है। वे उर्दू-हिन्दी के मिश्रित, सहज लेकिन चुभते हुए शब्दों का प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा में एक विशिष्ट 'बेचैनी' और 'बेलौस मस्ती' है, जो सामाजिक विसंगतियों को देखकर भीतर ही भीतर सुलगने वाले व्यक्ति की आग को दर्शाती है। वे प्रतीकों और विरोधाभासों का सटीक इस्तेमाल करते हैं, जैसे 'दरख़्तों के साये में धूप लगती है'। यह विरोधाभासी प्रतीक एक ऐसी व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जो शरण तो देना चाहती है, लेकिन उसमें भी कष्ट ही है। इस तरह उनकी भाषा व्यंग्य को स्मरणीय और प्रभावशाली बना देती है।


दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों में व्यंग्य कोरी आलोचना या नकारात्मकता नहीं है, बल्कि यह एक रचनात्मक विरोध और सकारात्मक परिवर्तन का आह्वान है। उन्होंने ग़ज़ल की कोमल तान को समाज के कठोर यथार्थ और उसके प्रति तीखे प्रतिरोध की धार दी। राजनीतिक व्यवस्था की खोखली, सामाजिक विडम्बनाओं, जनता की जड़ता और नैतिक मूल्यों के क्षरण पर उनकी व्यंग्यदृष्टि ने हिन्दी ग़ज़ल को एक नया विस्तार और गरिमा प्रदान की। उनका काव्य-संसार इस बात का प्रमाण है कि साहित्य यदि जन-पक्षधर है, तो उसका व्यंग्य केवल विध्वंसक नहीं, बल्कि एक नई चेतना के निर्माण का सृजनात्मक औज़ार भी हो सकता है।

दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि उनमें चित्रित विसंगतियाँ और उन पर किया गया व्यंग्य समय के साथ और भी स्पष्ट होता गया है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

प्रबुद्ध व्यंग्यकार और समालोचक

( व्यंग्य कल आज और कल के लेखक )

Thursday, December 25, 2025

काश कि सांता सचमुच खुशियां बांट सकता

व्यंग्य

 “सांता, सेल और हम”


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


लाल टोपी वाला सांता इस बार देर से आया   शायद उसे पेट्रोल महंगा पड़ रहा हो, या फिर रूस-यूक्रेन की बर्फ में उसका रेनडियर फँस गया। चिमनी से उतरने की जहमत भी अब कौन उठाए, जब दरवाज़े पर “नो ट्रेसपासिंग” की चेतावनी लगी हो और सुरक्षा कैमरे रिकॉर्डिंग कर रहे हों।


बच्चों को अब चाकलेट और कुकीज़ से ज़्यादा डेटा पैक चाहिए  ताकि वे ऑनलाइन गिफ्ट ट्रैक कर सकें। और बड़ों की  हालत ये है कि उन्होंने क्रिसमस ट्री को भी ईएमआई पर लिया हुआ है। क्रिसमस ट्री पर  लगी लाइटें ऐसे टिमटिमाती हैं, जैसे अर्थव्यवस्था , या शेयर मार्केट और सोने की कीमत के ग्राफ। 


सांता की स्लेज़ पर अब कॉर्पोरेट विज्ञापनों के लोगो लगे हैं  । वह अब जादू की थैली नहीं खोलता । कार्ड स्वाइप करता है। या डायरेक्ट एकाउंट में मनी ट्रांसफर करता है जिससे वोट सुनिश्चित किए जा सकें।गरीब इलाकों में जिस दिन सांता आता है, उसी दिन बिजली चली जाती है। कुछ बच्चों को लगता है कि अंधेरा ही उनका “गिफ्ट रैपर” है।


दुनिया भर के नेता हर साल सांता की तरह भाषण देते हैं ,  मीठी आवाज़, लाल कपड़े, खाली थैला। कोई वादा करता है “शांति लाने” का, कोई “सुधार” का, पर हिरन उन्हीं मैदानों में घास ढूंढ रहे होते हैं जहाँ पहले से ही कुछ नहीं बचा।


सांता अब “ग्लोबल वार्मिंग” से परेशान है । बर्फ पिघल रही है और उसके रहने की जगह कम होती जा रही है। शायद इसलिए उसने उत्तरी ध्रुव छोड़कर स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिया। अब वह शेयर की गिरावट में उतरता है, और भरोसे की चिमनी में फँस जाता है।


पर असली सवाल यह नहीं कि सांता आएगा या नहीं । असली सवाल यह है कि हम अब भी किसी “सांता” की प्रतीक्षा क्यों कर रहे हैं?  

क्या हमें सच में जादुई टोपी वाला कोई चाहिए जो हमारी बर्फबारी रोके और महंगाई घटाए ?  या हमें चाहिए वो आत्म विश्वास जो हमें मेहनत का यथार्थ याद दिलाए?


क्योंकि सांता का काम तो बस प्रेरणा देना था, स्थाई सुविधाएं नहीं देना। उसने गिफ्ट का रास्ता दिखाया था, पर उससे हम मेहनत से अर्जित करना भूल रहे हैं , हमें हर मुसीबत में सांता या कोई संत की ओर देखने की आदत पड़ गई है, जबकि वास्तव में ये हम ही हैं जो खुद रैप कर के गिफ्ट क्रिसमस ट्री के नीचे रख लेते हैं।  इस तरह बच्चों को तो बहलाया जा सकता है पर पल भर की झूठी खुशी सच्चाई नहीं बदल सकती । 

अब अगर सांता सचमुच आ भी आए, तो शायद मुस्कुराएगा और कहेगा  “मैं तो बस  प्रतीक हूं , खुशी , दुनियां में शांति, गरीबी दूर करना , मंहगाई से निपटना सब हमें खुद करना है।”

इस सबके साथ इन दिनों के वास्तविक सांता वे डिलीवरी बॉय हैं जो कड़कती ठंड , चिलचिलाती धूप में दुनियां भर में घर घर हमारे पैकेट्स हमे पहुंचा रहे हैं, क्या इन सांता के लिए कभी हमने कोई चाकलेट रखी है, दरवाजे के पास, या उन्हें मात्र डीलवरी नोटिफिकेशन की तरह स्वाइप कर हम दरवाजे बंद कर देते हैं? 


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Wednesday, December 24, 2025

बैठे बैठे

 व्यंग्य 

बैठे बैठे


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


"बैठे बैठे क्या करें, करना है कुछ काम” टाइम पास के लिए, बोर होते समूह की अंताक्षरी की शुरुआत के लिए सिर्फ पंक्ति नहीं, बल्कि आज के डिजिटल, सोशल-मीडिया-व्यस्त, पर फिर भी बेरोजगार दिखते समाज का सटीक रूपक है। “बैठे बैठे क्या करें…” यह आज के समाज की स्थायी प्लेलिस्ट बन चुकी है। फर्क बस इतना है कि पहले यह शाम को छतों पर गाई जाती थी, अब यह मोबाइल की स्क्रीन पर स्क्रॉल करते  लोगों के मन वचन कर्म में दिखती  है।  

सोशल मीडिया पर कई लोग इन दिनों ‘कंटेंट’ पर बहस कर रहे हैं ,कोई रो रहा है कि लोग बेवजह रील बना रहे हैं, तो कोई कह रहा है, “कुछ तो करो!”और ये “कुछ”प्रायः टच स्क्रीन पर नाचती हुई अंगुलियों में सिमट जाता है।  


ऑफिस में भी दृश्य समान है ,  ज़ूम मीटिंग का कैमरा बंद हुआ , और कर्मचारी का मन दिमाग सब टिकटॉक मोड में कुछ करने लगता है। बॉस पूछे, “फाइल भेजी?” तो आत्मा जवाब देती है, “सावन आया, बदरा छाए…”  क्योंकि फाइल निपटाने से ज़्यादा भावना का भोजन ज़रूरी है।  


‘बैठे बैठे कुछ करें’ का नया संस्करण ए आई पर भी चल पड़ा है । “कुछ वायरल कंटेंट बना दो…” मतलब ‘करना है कुछ काम’, लेकिन खुद से नहीं, मशीन से, हो तो और बेहतर! आलस्य अब  अपडेट हो चुका है और उसमें भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फिट हो रहा है।  

इस आलस्य में भी अच्छाई है। बैठे-बैठे कुछ सोचना, खुद से बातें करना, या समाज की नई तस्वीरें बनाना यही रचनात्मकता की जड़ है। कबीर भी तो कहते थे, “साधो, यही शरीर है”  यानी भीतर झांको, बाहर भागो मत।  

तो अगर सच में "करना है कुछ काम", तो ज़रा मन का वाई-फाई ऑन करो। किताब उठाओ, पौधा लगाओ, किसी को देख  मुस्करा दो, या बस किसी पुराने दोस्त को याद कर उसे फोन मिला लो। सब कामों में ऊर्जा है । बस ट्रेंड की जगह थोड़ा अर्थ चुनना होगा।  


क्योंकि कुछ काम यही है कि हँसते-हँसते कट जाएं रस्ते। राम का नाम सदा सुखदाई , वरना राम नाम सत्य तो शाश्वत है ही । 

तो शुरू करो अंत्याक्षरी, लेकर प्रभु का नाम, जीवन जीने के लिए करना है कुछ काम।


विवेक रंजन श्रीवास्तव