Wednesday, January 7, 2026

पहचाना?

 पहचाना आप ने ? 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


पहचाना आप ने ? ...

, अरे कैसी बात करते हैं, आप भी! संकोच में ऐसा कह चुकने के बाद , वे बातों बातों में वह सूत्र ढूंढते हैं कि किसी तरह मिलने वाले का नाम याद आ जाए ? दरअसल, 

नाम आदमी की पहचान है, पर याददाश्त के साथ उसका रिश्ता हमेशा लुका-छुपी का ही रहा है। चेहरा तो लोग पहचान लेते हैं, पर नाम जैसे हमारी स्मृति से सबसे पहले पलायन कर जाता है। किसी को फोन करना हो तो याद ही नहीं आता कि बंदे का नंबर किस नाम से सेव किया था । 

एक विवेक ढूंढो तो तीन निकल आते हैं, इसलिए रिफरेंस या शहर का नाम साथ लिखना पड़ता है।

किसी पार्टी या सभा में मिलते समय नाम स्मरण की यह समस्या सबसे अधिक होती है। सामने वाला मुस्कराते हुए "कैसे हैं आप" कहता है और हम भी उतनी ही आत्मीयता से "अरे आप!" कह देते हैं। इस "आप" के पीछे कितनी मजबूरी और कितना अपराध बोध छुपा होता है, यह वही समझ सकता है जिसने मिलने वाले का नाम दिमाग की हार्ड डिस्क से डिलीट कर ‘रीसायकल बिन’ में पहुंचा दिया होता है। और रिसाइकिल बिन क्लीन कर दी होती है। दिमाग को सारे खाए हुए बादाम की कसम देते रहो पर नाम याद ही नहीं आते, तब सभ्यता के नाते दिमाग से काम लेना पड़ता है , और पहचानने की एक्टिंग करनी पड़ती है।


शशि कपूर साहब ने इस विसंगति का हल खोज निकाला था। वे मिलते ही सामने वाले से कहते, "हाय, आई एम शशि कपूर।" सामने वाला भी शिष्टाचार निभाने के चक्कर में अपना परिचय दे देता। यह फार्मूला कलाकारों और सेलिब्रिटीज के लिए तो ठीक है, पर अगर मोहल्ले का गजोधर प्रसाद या हरिप्रसाद यही तरीका अपनाए तो सामने वाला शक करने लगेगा कि कहीं यह बीमा बेचने वाला एजेंट तो नहीं।


कुछ लोग इस समस्या को छिपाने के लिए ऐसे रचनात्मक वाक्य गढ़ते हैं कि सुनकर हंसी भी आए और दया भी। जैसे कोई कहे "भाई साहब, आप तो बिल्कुल नहीं बदले!" अब सामने वाला सोचता है कि मैं पचास साल से यही हूँ, बदली तो तुम्हारी याददाश्त है। या फिर लोग बचने के लिए रिश्तों का सहारा लेते हैं "भाभी जी", "भाई साहब", "चाचा जी"। यही तो भारतीय संस्कृति का अद्भुत चमत्कार है। जब नाम याद न आए तो रिश्ते का लेबल चिपका दो, सामने वाला खुद ही नाम बता देगा।


हमारे एक अंकल ने इस समस्या को सीधे ईमानदारी से हल किया। वे मिलते ही कहते, "बेटा, याददाश्त कमजोर हो चुकी है, बातें करने से पहले नाम और पता बता दीजिए।" अब उनकी इस सादगी में न दिखावा है, न शिष्टाचार का जाल। सामने वाला झट से नाम बता देता है, जैसे परीक्षा हॉल में अपना एडमिशन कार्ड दिखा रहा हो।


नाम भूलने की समस्या अक्सर हास्यास्पद हालात पैदा कर देती है। शादी ब्याह में रिश्तेदार एक-दूसरे से टकराते हैं, पर नाम भूलने का अपराधबोध दोनों ओर इतना गहरा होता है कि बातचीत का सारांश यही रह जाता है "अरे आप!" और "जी, वही!" 

ऑफिस पार्टियों में तो यह विसंगति और भी दिलचस्प हो जाती है। कोई पूरे आत्मविश्वास से पांच मिनट तक बतियाता रहता है और फिर पूछ बैठता है "वैसे आपने मेरा नाम तो नहीं भुलाया?" तब तक नाम सचमुच स्मृति की फाइलों से प्रसंगवश रिकवर हो गया तो हम पूरे आत्मीय भाव से मुस्कराते हुए कहते हैं , अरे फलां जी कैसी बात करते हैं आप भी ।

वरना बाद में सिर खुजाते मिलने वाले का नाम स्मृति पटल पर खोजना होता है। 

सच यह है कि नाम भूलना कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है, यह भीड़ में घुल जाने की कला है। हम रोज़ इतने चेहरों से मिलते हैं कि दिमाग भी कभी-कभी ‘सिस्टम हैंग’ कर देता है। और तब "अरे आप" या "भाई साहब" जैसे संबोधन जीवनरक्षक ऐप साबित होते हैं।


अब समय आ गया है कि सरकार आधार कार्ड में एक नया फीचर जोड़ दे। जैसे ही हम किसी से मिलें, दोनों के मोबाइल पास लाते ही ब्लूटूथ से स्क्रीन पर स्वयं ही नाम चमक उठे। पर तब तक हमें अंकल की ही ईमानदार शैली अपनानी होगी कहना होगा "ओ मिलने वाले, जरा अपना नाम तो बता।" क्योंकि बिना नाम का संदर्भ समझे बातचीत करना वैसा ही है जैसे अंधेरे में रेडियो सुनना । आवाज तो आती है, मज़ा भी आता है, लेकिन यह समझ ही नहीं पड़ता कि प्रसारण किस स्टेशन से चल रहा है।

मैं एक सज्जन के यहां, रात्रि भोज पर निमंत्रित था , भोजन कर आया । उनकी पत्नी से यह पहली भेंट थी । सभ्यता से भाभी जी की ओर बहुत ध्यान से देखा भी नहीं । अगले दिन जब बाजार में जब एक महिला मेरी ओर देख कर मुस्करा रही थी, तो मुझे समझ ही नहीं आया कि यह क्या और क्यों हो रहा है । मुझे अजनबी सा देखते पा कर देवी जी बोली , अरे खाना खाकर भी आपने पहचाना नही , झेंपने के सिवा क्या कर सकता था मैं । दरअसल महिलाएं हेयर स्टाइल बदल दें, या देसी परिधान की जगह पाश्चात्य ड्रेस पहन लें तो उन्हें पहचानना मेरे लिए वैसे भी कठिन हो जाता है । सच तो यह है कि एक नग अपनी पत्नी के मूड तक को भी अब तक कभी पहचान नहीं पाया! 

खैर आप ही बताइए , किस को कितना पहचाना आप ने? आभासी दुनिया के ढेरों मित्र बड़े मिले मिले से लगते हैं, पर आसपास के कई लोग भी बहुत अनजाने होते हैं।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 भोपाल

Tuesday, January 6, 2026

नंबर वन का 'अमृत' और नरक का ड्रेनेज

 व्यंग्य

नंबर वन का 'अमृत' और नरक का ड्रेनेज


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


इंदौर में इन दिनों गजब का द्वंद्व चल रहा है। एक तरफ आसमान से टपकती स्वच्छता की 'नंबर वन' की ट्राफियां हैं और दूसरी तरफ जमीन फाड़कर निकलता 'भागीरथपुरा' का सच। सूचना मिली है कि प्रशासन ने अपनी चिर-परिचित फुर्ती दिखाते हुए कुछ अधिकारियों का 'स्थानांतरण' कर दिया है। वाह! क्या गजब का इलाज है। जैसे किसी का अपेंडिक्स फट गया हो और डॉक्टर उसका बिस्तर बदल दे। साहब यहाँ से वहाँ हुए नहीं कि सिस्टम का पाप धुल गया! सुना है नए साहब के आते ही पुरानी पाइप लाइन ने शर्म के मारे जहर उगलना बंद कर दिया है।


भागीरथपुरा, नाम कितना पवित्र है। महाराज भगीरथ ने गंगा लाने के लिए अंगूठे पर खड़े होकर तपस्या की थी ताकि पूर्वजों को तार सकें, पर हमारे आधुनिक भगीरथों (इंजीनियरों) ने पाइपलाइन बिछाते समय ऐसी 'तपस्या' की कि अमृत योजना की नली को सीधे ड्रेनेज की नाली से 'कनेक्ट' कर दिया। अब पुरखे तरें न तरें, मोहल्ले वाले सीधे इस लोक को छोड़  मोक्ष की यात्रा पर निकल पड़े। यह सरकारी मोक्ष ही है, बस फर्क इतना है कि यह यमराज द्वारा नहीं, बल्कि नगर निगम द्वारा 'स्पॉन्सर्ड' है।

इस पूरी त्रासदी के पीछे जो 'महान कलाकार' छिपा है, वह है, सरकारी ठेकेदार। यह वह प्रजाति है जो लोहे के पाइप को कागज की तरह मोड़ सकती है और कंक्रीट में इतनी रेत मिला सकती है कि रेगिस्तान को भी शर्म आ जाए। ठेकेदार साहब का गणित एकदम स्पष्ट है, "ऊपर की सड़क ऐसी बनाओ कि मुख्यमंत्री का काफिला निकले तो झटका न लगे, और नीचे पाइप ऐसा डालो कि अगली बारिश तक गायब हो जाए।" टेंडर की मलाई और कमीशन के खेल में पाइपलाइन की मोटाई इतनी कम रह गई कि सीवेज के कीड़ों ने उसे 'डोरस्टेप डिलीवरी' का रास्ता समझ लिया। ठेकेदार के लिए 'अमृत' का मतलब वह 'प्रसाद' है जो उसे फाइल पास होने के बाद मिलता है, जनता का गला सूखे या सड़े, इससे उसके बैंक बैलेंस का 'फ्लो' नहीं रुकता।

शहर का चेहरा तो इतना चमकीला है कि आप अपनी शक्ल डिवाइडर पर देख लें। दीवारों पर नाचते मोर हैं, स्वच्छता के गान गाती गाड़ियाँ हैं और हर खंभे पर मुस्कराते नेताओं के पोस्टर हैं। पर इस चमक-धमक के नीचे शहर क्या 'पाल' रहा है, यह तब पता चलता है जब अस्पताल के बेड कम पड़ जाते हैं। यहाँ मोहल्ला राजनीति का भी अपना स्वैग है। "हमारे भाईसाहब" का वोट बैंक बना रहे, इसलिए पाइपलाइन चाहे गटर के भीतर से निकले या शौचालय के नीचे से, बस 'नल' चलना चाहिए। पार्षद जी को चिंता इस बात की नहीं थी कि पानी में बैक्टीरिया हैं, उन्हें चिंता इस बात की थी कि उद्घाटन के पत्थर पर उनका नाम बड़ा है या नहीं। चुनावी गणित में 'शुद्ध पेयजल' से ज्यादा जरूरी 'मुफ्त का टैंकर' होता है, ताकि संकट के समय मसीहा बना जा सके।

जब जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँचा, तो नेताओं ने अपना अचूक ब्रह्मास्त्र निकाला, 'स्थानांतरण'। कलेक्टर साहब हटा दिए गए, कमिश्नर साहब विदा कर दिए गए। जनता दुख भूल कर फटाफट खुश हो गई! उसे लगा  कि 'न्याय' हो गया। अरे भाई, साहब तो बदल गए, पर वह सड़ा हुआ सिस्टम और वह लीकेज वाली पाइपलाइन तो वहीं है जो पिछले दस सालों से ड्रेनेज को चूम रही है। यह तो वही बात हुई कि इंजन खराब है और आप बार-बार ड्राइवर बदल रहे हैं। राजनेता जानते हैं कि पब्लिक की याददाश्त और पानी का स्वाद, दोनों बहुत जल्दी बदल जाते हैं।

रही बात समाधान की, तो हुजूर! समाधान किसी फाइल या तबादले में नहीं, बल्कि इस 'स्मार्ट' चश्मे को उतारने में है। जल्दी ही मजबूर जनता जीने के लिए अपने घरों में यूरेका के असरदार वाटर फिल्टर खुद लगा ही लेगी । तब तक बिसलेरी की बोतलों से नहाने का सौभाग्य मिलेगा । 

पर यह कौन बताए कि असली 'अमृत' जल तब बरसेगा जब ड्रेनेज और पेयजल की लाइनों के बीच की दूरी कम से कम उतनी कर दी जाएगी जितनी एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच नेता और जनता की होती है। बेहतर होगा कि अगली बार 'स्मार्ट सिटी' का तमगा देने से पहले दीवारों के पेंट की जगह पाइपों के 'प्रेसर' की जाँच की जाए। समाधान तो यह भी है कि जिस ठेकेदार और इंजीनियर ने यह महान 'जुगलबंदी' की है, उन्हें तब तक उसी मोहल्ले का पानी पिलाया जाए जब तक वे खुद न मान लें कि अमृत योजना में 'विष' का मिश्रण सरकारी गाइडलाइन का हिस्सा नहीं है। बड़े अधिकारियों के तबादलों के इस सर्कस को बंद कर अगर 'जवाबदेही' को भी 'नंबर वन' बना दिया जाए, तो शायद किसी और भगीरथ को अपने मोहल्ले के पुरखों को तारने के लिए श्मशान न जाना पड़े। वरना याद रखिए, इतिहास केवल आपके रंगे-पुते डिवाइडर याद नहीं रखेगा, वह उन पाइपों के बारे में भी लिखेगा जिन्होंने शहर की साख को गटर में बहा दिया। आज इंदौर कल कोई दूसरा शहर लीकेज का माइलेज अखबार की इबारत बनता रहने से रोकना है तो तकनीकी प्रोजेक्ट्स को राजनीति से दूर करना होगा । 


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Tuesday, December 30, 2025

कटाक्ष की कसौटी पर दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें

 कटाक्ष की कसौटी पर दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


दुष्यन्त कुमार (1933-1975) आधुनिक हिन्दी साहित्य के ऐसे विशिष्ट ग़ज़लकार हैं, जिन्होंने ग़ज़ल को रूमानियत और श्रृंगार के परम्परागत दायरे से निकालकर समकालीन यथार्थ, सामाजिक विसंगतियों और राजनीतिक विद्रूपताओं के चित्रण का माध्यम बनाया। उनकी काव्य चेतना का केन्द्र 'आम आदमी' की पीड़ा, आकांक्षा और संघर्ष है। इसी चेतना को अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने हिंदी ग़ज़ल को एक सशक्त अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया। ग़ज़लों में उनका कटाक्ष , व्यंग्यात्मक प्रहार और तंज  सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था की जड़ता, संवेदनहीनता और विडम्बनाओं के प्रति तीखा प्रहार तथा जन चेतना जगाने का प्रयास  सिद्ध हुआ है।

दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों में निहित व्यंग्य के स्वरूप, विषय वस्तु और अभिव्यक्ति का विवेचन महत्वपूर्ण है। 


दुष्यन्त कुमार के कटाक्ष की जड़ें उनकी गहन सामाजिक प्रतिबद्धता में निहित हैं।  उनकी ग़ज़लों में "सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक विसंगतियों को बेबाकी से उभारने" के व्यापक उदाहरण हैं।  वे 'साये में धूप' जैसे संग्रह के माध्यम से आज़ाद भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की विडंबनाओं को उजागर करते हैं और "जनता की सुप्त संवेदनाओं को जागृत करते हैं"। उनका व्यंग्य दो स्तरों पर काम करता है , एक ओर वे शोषित जनता से सहानुभूति रखते हैं, तो दूसरी ओर "उसकी संवेदनहीनता और जड़ता पर व भी कटाक्ष में गजल कहते हैं"। इस प्रकार उनकी ग़ज़ल केवल विरोध तक सीमित नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक चेतना के निर्माण का छंद बद्ध आह्वान है।


 राजनीतिक व्यवस्था और खोखले वादों पर कटाक्ष उनकी लोकप्रियता की ताकत बना दिखाई देता है। 

दुष्यन्त कुमार की सबसे प्रसिद्ध  ग़ज़लों में से एक है  "कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए"...। इस ग़ज़ल में राजनीतिज्ञों के कथनी और करनी के अन्तर पर करारा कटाक्ष है। वे कहते हैं कि नेताओं ने हर घर को रोशन करने (सुख-सुविधा देने) का सपना दिखाया, लेकिन वास्तविकता यह है कि "कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए"। यहाँ 'चिराग़' सुविधाओं और विकास का प्रतीक है।  "दुष्यंत जी  राजनीति पर व्यंग करते हुए कहते हैं कि राजनीति लोगों को बड़े-बड़े लुभाने सपने दिखाती है... आज स्थिति यह है कि शहरों में भी चिराग़ अर्थात् सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, नेताओं की घोषणा कागज़ी है"। यह ग़ज़ल राजनीतिक व्यवस्था के थोथे आश्वासनों और जनता के साथ धोखे के उनके अनुभव का जीवन्त भावनात्मक दस्तावेज है, इसी तेवर से वे आम आदमी में लोकप्रिय हुए। 


ग़ज़ल "मत कहो, आकाश में कुहरा घना है" सामाजिक यथार्थ की कड़वी सच्चाई को व्यंग्य के माध्यम से पेश करती है। कवि कहता है कि सड़क पर इतना कीचड़ है कि हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है, लेकिन "पक्ष और’ प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं, बात इतनी है कि कोई पुल बना है"। यहाँ संसद में होने वाली खोखली बहस और जमीनी हकीकत (सड़कों की बदहाली) के बीच की विसंगति पर तीखा तंज है। वे आगे कहते हैं कि "रक्त वर्षों से नसों में खौलता है, आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है" , यह समाज में जमी हुई पीड़ा और उसे हल्के में लेने की प्रवृत्ति पर चोट है। अंत में, "दोस्तो! अब मंच पर सुविधा नहीं है, आजकल नेपथ्य में संभावना है" पंक्ति सत्ता और अवसर के केन्द्रों से सामान्य जन के हटाए जाने की विडम्बना को दर्शाती है।


ग़ज़ल "वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है" सत्ता के एक ऐसे कृत्रिम, दम्भी और खोखले प्रतिनिधि का चित्रण करती है, जो असलियत में कुछ नहीं है, बस एक 'बयान' मात्र है। उसके "झोले में कोई संविधान है" जैसी पंक्ति शासन के नाममात्र के औपचारिक ढाँचे और उसकी वास्तविक निरंकुशता के बीच के अन्तर को उजागर करती है। यह चित्रण उन तथाकथित 'विकास' और 'कानून' के ठेकेदारों की पोल खोलता है, जिनका असली चरित्र जनता से कोसों दूर है।

आज भी राजनेता अपने भाषणों में झोले से संविधान निकाल कर जन सभाओं में लहराते नजर आते हैं, और ये स्थिति दुष्यन्त को प्रासंगिक बनाए हुए है।


"कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं" ग़ज़ल में समकालीन समाज में व्याप्त विसंगतियों का चित्रण है। "गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं", "वो सलीबों के क़रीब आए तो हम को क़ायदे क़ानून समझाने लगे हैं" जैसी पंक्तियाँ धर्म और कानून के नाम पर होने वाले पाखण्ड पर प्रहार करती हैं। "अब नई तहज़ीब के पेश-ए-नज़र हम आदमी को भून कर खाने लगे हैं" , यह पंक्ति नवीन सभ्यता के नाम पर मनुष्यता के भक्षण (शोषण) की ओर संकेत करती है, जो आधुनिकता के नकली आवरण में छिपे बर्बरता भरे व्यवहार पर गहरा व्यंग्य है। 

अब विद्रूप स्थिति तो ये हो रही है कि सचमुच तंदूर कांड , या बोटियां काटकर फ्रिज में रखने जैसी वीभत्स्व घटनाएं समाज में हो रही हैं, पर कोई दुष्यन्त कुछ वैसा लिख नहीं रहा, जैसा उस दुष्यन्त ने तात्कालिक परिस्थित पर लिख लिया। 


दुष्यन्त कुमार के व्यंग्य की प्रभावोत्पादकता उनकी भाषा-शैली में निहित है। वे उर्दू-हिन्दी के मिश्रित, सहज लेकिन चुभते हुए शब्दों का प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा में एक विशिष्ट 'बेचैनी' और 'बेलौस मस्ती' है, जो सामाजिक विसंगतियों को देखकर भीतर ही भीतर सुलगने वाले व्यक्ति की आग को दर्शाती है। वे प्रतीकों और विरोधाभासों का सटीक इस्तेमाल करते हैं, जैसे 'दरख़्तों के साये में धूप लगती है'। यह विरोधाभासी प्रतीक एक ऐसी व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जो शरण तो देना चाहती है, लेकिन उसमें भी कष्ट ही है। इस तरह उनकी भाषा व्यंग्य को स्मरणीय और प्रभावशाली बना देती है।


दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों में व्यंग्य कोरी आलोचना या नकारात्मकता नहीं है, बल्कि यह एक रचनात्मक विरोध और सकारात्मक परिवर्तन का आह्वान है। उन्होंने ग़ज़ल की कोमल तान को समाज के कठोर यथार्थ और उसके प्रति तीखे प्रतिरोध की धार दी। राजनीतिक व्यवस्था की खोखली, सामाजिक विडम्बनाओं, जनता की जड़ता और नैतिक मूल्यों के क्षरण पर उनकी व्यंग्यदृष्टि ने हिन्दी ग़ज़ल को एक नया विस्तार और गरिमा प्रदान की। उनका काव्य-संसार इस बात का प्रमाण है कि साहित्य यदि जन-पक्षधर है, तो उसका व्यंग्य केवल विध्वंसक नहीं, बल्कि एक नई चेतना के निर्माण का सृजनात्मक औज़ार भी हो सकता है।

दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि उनमें चित्रित विसंगतियाँ और उन पर किया गया व्यंग्य समय के साथ और भी स्पष्ट होता गया है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

प्रबुद्ध व्यंग्यकार और समालोचक

( व्यंग्य कल आज और कल के लेखक )

Thursday, December 25, 2025

काश कि सांता सचमुच खुशियां बांट सकता

व्यंग्य

 “सांता, सेल और हम”


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


लाल टोपी वाला सांता इस बार देर से आया   शायद उसे पेट्रोल महंगा पड़ रहा हो, या फिर रूस-यूक्रेन की बर्फ में उसका रेनडियर फँस गया। चिमनी से उतरने की जहमत भी अब कौन उठाए, जब दरवाज़े पर “नो ट्रेसपासिंग” की चेतावनी लगी हो और सुरक्षा कैमरे रिकॉर्डिंग कर रहे हों।


बच्चों को अब चाकलेट और कुकीज़ से ज़्यादा डेटा पैक चाहिए  ताकि वे ऑनलाइन गिफ्ट ट्रैक कर सकें। और बड़ों की  हालत ये है कि उन्होंने क्रिसमस ट्री को भी ईएमआई पर लिया हुआ है। क्रिसमस ट्री पर  लगी लाइटें ऐसे टिमटिमाती हैं, जैसे अर्थव्यवस्था , या शेयर मार्केट और सोने की कीमत के ग्राफ। 


सांता की स्लेज़ पर अब कॉर्पोरेट विज्ञापनों के लोगो लगे हैं  । वह अब जादू की थैली नहीं खोलता । कार्ड स्वाइप करता है। या डायरेक्ट एकाउंट में मनी ट्रांसफर करता है जिससे वोट सुनिश्चित किए जा सकें।गरीब इलाकों में जिस दिन सांता आता है, उसी दिन बिजली चली जाती है। कुछ बच्चों को लगता है कि अंधेरा ही उनका “गिफ्ट रैपर” है।


दुनिया भर के नेता हर साल सांता की तरह भाषण देते हैं ,  मीठी आवाज़, लाल कपड़े, खाली थैला। कोई वादा करता है “शांति लाने” का, कोई “सुधार” का, पर हिरन उन्हीं मैदानों में घास ढूंढ रहे होते हैं जहाँ पहले से ही कुछ नहीं बचा।


सांता अब “ग्लोबल वार्मिंग” से परेशान है । बर्फ पिघल रही है और उसके रहने की जगह कम होती जा रही है। शायद इसलिए उसने उत्तरी ध्रुव छोड़कर स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिया। अब वह शेयर की गिरावट में उतरता है, और भरोसे की चिमनी में फँस जाता है।


पर असली सवाल यह नहीं कि सांता आएगा या नहीं । असली सवाल यह है कि हम अब भी किसी “सांता” की प्रतीक्षा क्यों कर रहे हैं?  

क्या हमें सच में जादुई टोपी वाला कोई चाहिए जो हमारी बर्फबारी रोके और महंगाई घटाए ?  या हमें चाहिए वो आत्म विश्वास जो हमें मेहनत का यथार्थ याद दिलाए?


क्योंकि सांता का काम तो बस प्रेरणा देना था, स्थाई सुविधाएं नहीं देना। उसने गिफ्ट का रास्ता दिखाया था, पर उससे हम मेहनत से अर्जित करना भूल रहे हैं , हमें हर मुसीबत में सांता या कोई संत की ओर देखने की आदत पड़ गई है, जबकि वास्तव में ये हम ही हैं जो खुद रैप कर के गिफ्ट क्रिसमस ट्री के नीचे रख लेते हैं।  इस तरह बच्चों को तो बहलाया जा सकता है पर पल भर की झूठी खुशी सच्चाई नहीं बदल सकती । 

अब अगर सांता सचमुच आ भी आए, तो शायद मुस्कुराएगा और कहेगा  “मैं तो बस  प्रतीक हूं , खुशी , दुनियां में शांति, गरीबी दूर करना , मंहगाई से निपटना सब हमें खुद करना है।”

इस सबके साथ इन दिनों के वास्तविक सांता वे डिलीवरी बॉय हैं जो कड़कती ठंड , चिलचिलाती धूप में दुनियां भर में घर घर हमारे पैकेट्स हमे पहुंचा रहे हैं, क्या इन सांता के लिए कभी हमने कोई चाकलेट रखी है, दरवाजे के पास, या उन्हें मात्र डीलवरी नोटिफिकेशन की तरह स्वाइप कर हम दरवाजे बंद कर देते हैं? 


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Wednesday, December 24, 2025

बैठे बैठे

 व्यंग्य 

बैठे बैठे


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


"बैठे बैठे क्या करें, करना है कुछ काम” टाइम पास के लिए, बोर होते समूह की अंताक्षरी की शुरुआत के लिए सिर्फ पंक्ति नहीं, बल्कि आज के डिजिटल, सोशल-मीडिया-व्यस्त, पर फिर भी बेरोजगार दिखते समाज का सटीक रूपक है। “बैठे बैठे क्या करें…” यह आज के समाज की स्थायी प्लेलिस्ट बन चुकी है। फर्क बस इतना है कि पहले यह शाम को छतों पर गाई जाती थी, अब यह मोबाइल की स्क्रीन पर स्क्रॉल करते  लोगों के मन वचन कर्म में दिखती  है।  

सोशल मीडिया पर कई लोग इन दिनों ‘कंटेंट’ पर बहस कर रहे हैं ,कोई रो रहा है कि लोग बेवजह रील बना रहे हैं, तो कोई कह रहा है, “कुछ तो करो!”और ये “कुछ”प्रायः टच स्क्रीन पर नाचती हुई अंगुलियों में सिमट जाता है।  


ऑफिस में भी दृश्य समान है ,  ज़ूम मीटिंग का कैमरा बंद हुआ , और कर्मचारी का मन दिमाग सब टिकटॉक मोड में कुछ करने लगता है। बॉस पूछे, “फाइल भेजी?” तो आत्मा जवाब देती है, “सावन आया, बदरा छाए…”  क्योंकि फाइल निपटाने से ज़्यादा भावना का भोजन ज़रूरी है।  


‘बैठे बैठे कुछ करें’ का नया संस्करण ए आई पर भी चल पड़ा है । “कुछ वायरल कंटेंट बना दो…” मतलब ‘करना है कुछ काम’, लेकिन खुद से नहीं, मशीन से, हो तो और बेहतर! आलस्य अब  अपडेट हो चुका है और उसमें भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फिट हो रहा है।  

इस आलस्य में भी अच्छाई है। बैठे-बैठे कुछ सोचना, खुद से बातें करना, या समाज की नई तस्वीरें बनाना यही रचनात्मकता की जड़ है। कबीर भी तो कहते थे, “साधो, यही शरीर है”  यानी भीतर झांको, बाहर भागो मत।  

तो अगर सच में "करना है कुछ काम", तो ज़रा मन का वाई-फाई ऑन करो। किताब उठाओ, पौधा लगाओ, किसी को देख  मुस्करा दो, या बस किसी पुराने दोस्त को याद कर उसे फोन मिला लो। सब कामों में ऊर्जा है । बस ट्रेंड की जगह थोड़ा अर्थ चुनना होगा।  


क्योंकि कुछ काम यही है कि हँसते-हँसते कट जाएं रस्ते। राम का नाम सदा सुखदाई , वरना राम नाम सत्य तो शाश्वत है ही । 

तो शुरू करो अंत्याक्षरी, लेकर प्रभु का नाम, जीवन जीने के लिए करना है कुछ काम।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Thursday, December 18, 2025

व्यंग्य कल आज और कल

 *पुस्तक चर्चा- 'व्यंग्य कल आज और कल'* 

‎ _लेखक- श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

‎प्रकाशक- न्यू वर्ल्ड पब्लीकेशन, नई दिल्ली

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‎नामचीन व्यंग्यकार श्री विवेक; रंजन श्रीवास्तव जी की पुस्तक 'व्यंग्य: कल आज और कल' इस मायने में विशिष्ठ है कि यह व्यंग्य विधा के सृजनात्मक पहलुओं की गहराई में घुसकर पड़ताल करते हुए उस पर विस्तृत प्रकाश डालती है। जैसा कि पुस्तक का शीर्षक है तथा स्वयं उन्होने अपनी भूमिका मे स्पष्ट किया है " व्यंग्य समालोचना शास्त्र अभी भी विकास क्रम में है।..... यह पुस्तक इसी जटिल,सूक्ष्म और अत्यंत प्रभावशाली साहित्यिक विषय के बहुआयामी विश्लेषण पर केन्द्रित लेखों का एक महत्वपूर्ण संकलन है। यह पुस्तक व्यंग्य को केवल रचना के स्तर पर ही नहीं बल्कि उसके सैद्धांतिक आधारों, ऐतिहासिक विकास यात्रा,विविध साहित्यिक विधाओं में उसकी अभिव्यक्ति और सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में उसकी भूमिका को गहराई से समझने का एक सुविचारित प्रयास है।"

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‎इस पुस्तक में उन्होने व्यंग्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सिद्धांतों, विभिन्न साहित्यिक विधाओं में व्यंग्य की उपस्थिति और सामाजिक- सांस्कृतिक प्रश्नों पर तर्कपरक भूमिका पर इक्कीस विभिन्न अध्यायों में विस्तृत विवेचना की है। यह पुस्तक ऐसे समय पर आई है जब सोशल मीडिया की सुलभ सुविधा के कारण नये लेखकों को अपनी रचनाएं प्रदर्शित करने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हो गये हैं। विभिन्न विधाओं में लिखा भी बहुत जा रहा है जिसके अच्छे व बुरे दोनो ही रह के प्रभाव सामने आ रहे हैं। एक ओर जहाँ प्रतिभाशाली लोगों को अपने लेखन प्रदर्शन का अवसर मिला है वहीं अनेक शौकिया लेखकों की न सिर्फ बाढ़ सी आ गयी है बल्कि कुछ पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं को स्थान भी मिल जाता है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि ऐसे लेखक अपनी गैर स्तरीय रचनाओं को श्रेष्ठ मानकार अपने लेखन कौशल से संतुष्ट हो जाते हैं और गम्भीर पाठकों को स्तरीय रचनाओं की उपलब्धता सीमित हो जाती है। इन परिस्थियों में चर्चाधीन यह पुस्तक न सिर्फ नये व्यंग्य लेखकों के लिये वरन् निष्पक्ष समीक्षकों के लिये एक मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वाह करती है।वर्तमान में अनेक लेखक लोकप्रियता के लिये हास्यपूर्ण मनोरंजक लेख लिख रहे हैं और उन्हे पत्र-पत्रिकाओं में स्थान व प्रशंसा भी मिल रही है, शायद इसलिये भी पुस्तक लेखक श्री विवेक जी को अपनी पुस्तक का आरम्भ ही इस वाक्य के साथ करना पड़ गया होगा, " व्यंग्य साहित्य की वह सशक्त विधा है जो समाज के ताने-बाने में गुथी विसंगतियों, विडम्बनाओं और कुरीतियों को उधेड़ने का साहस रखती है। यह मात्र हास्य नहीं, वरन हँसी के पीछे छुपे एक तीखे प्रहार की लेखकीय कला है,जो पाठक को झकझोरती है, सोचने को मजबूर करती है और परिवर्तन की ओर उन्मुख करती है।" स्पष्ट है कि व्यंग्य की प्रहारक शक्ति ही उसे सशक्त बनाती है। हास्यरहित व्यंग्य एक कटु व्यंग्य बन जाता है और व्यंग्यरहित हास्य एक उद्देश्यहीन रचना ही कहलाएगी। यह व्यंग्यकार के रचना कौशल पर निर्भर करता है कि वह अपनी रचना को कितना सार्थक, सुस्पष्ट और रोचक बना पाता है। श्री विवेक जी ने अपने आरम्भिक चरण में ही व्यंग्य लेखन के सैद्धांतिक ढ़ाँचे व मूल्यांकन हेतु एक सुष्पष्ट मानदण्डों की जमीन तैयार कर दी है।

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‎'व्यंग्य आलोचना के लिये वर्गीकरण बिंदु' में समस्त आवश्यक बिन्दुओं को इंगित करते हुए विवेक जी एक महत्वपूर्ण बात करते हुए अपनी चिंता व्यक्त करते हैं - " व्यंग्य का स्वतंत्र आलोचना शास्त्र अब तक निर्धारित नहीं है। एक दूसरे की जो व्यंग्य समीक्षा इन दिनों हो रही है उसमें मापदण्डों पर आधारित वास्तविक आलोचना की जगह इतनी प्रशंसा भर दी जाती है कि लेखक परिष्कार की जगह स्वयं को व्यंग्य का महारथी मानने की भूल कर बैठता है। इसलिये निबंधात्मक सपाटबयानी को भी आज व्यंग्य समझा जा रहा है।" 

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‎उपरोक्त उल्लेख पहले किया जा चुका है और देखने में भी आ रहा है     कि नये व्यंग्य लेखक भले ही व्यंग्य के शीर्ष पुरुष परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्र नाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल आदि के लेखन की पूँछ पकड़ कर उनका अनुसरण कर रहे हों पर उनके लेखन में निरन्तर परिष्करण का अभाव स्पष्ट प्रतीत होता है। पुस्तक में रचनाओं के व्यंग्य लेखन में अपेक्षित सुधार‌ व इस विकास हेतु परसाई, शरद जोशी की रचनाओं का  अवलम्बन लेकर कुछ संरचनात्मक मानदण्ड तय किये गये हैं जिसकी कसौटी पर व्यंग्य रचना की गुणवत्ता निर्धारित की जा सकती है। यह कसौटी किसी यांत्रिक उपकरण की तरह नहीं है कि नाप-तौल से निर्धारित हो जावे बल्कि यह रचना कौशल की कलात्मक अभिव्यक्ति भी है जो सिर्फ महसूस की जा सके। इसलिये पुस्तक यह प्रश्न भी उठाती है - " क्या व्यंग्य समस्या की जड़ तक पहुँचता है या सतही है ? क्या भाषा और शैली संदेश के अनुरूप है ? क्या यह पाठक को सोचने के लिये प्रेरित करता है या सिर्फ हँसाता है ? क्या यह सामाजिक परिवर्तन की सम्भावना जगाता है ? 

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‎वैज्ञानिक दष्टिकोण में मानव विकास में हँसी का मूल सामाजिक बंधन में है वहीं कथा साहित्य में पौराणिक दृष्टिकोण से ब्रम्हा द्वारा सृष्टि की रचना उपरान्त उनके हँसने से हास्य उत्पन्न होना बताया गया है। तात्पर्य यह कि हास्य एक मानवीय प्रवृत्ति है, जिसे साहित्य के नौ विभिन्न रसों के अंतर्गत माना गया है। इस पुस्तक के एक पृथक अध्याय में हास्य व्यंग्य को वे एक सहज मानवीय प्रवृत्ति बताया गया है और सहित्य क्षेत्र में हास्य का महत्व बताते हुए हास्य के भिन्न प्रकारों पर भी प्रकाश डाला गया है साथ ही साथ हास्य रचना के पाँच प्रकारों ह्यूमर, विट, सेटायर, आयरनी, और फार्स पर भी बात की गयी है। पुस्तक में हास्य रस/ मानवीय प्रवृत्ति पर पृथक अध्याय सार्थकता इसलिये भी है कि हास्य व्यंग्य का समावेश लगभग हर साहित्यिक विधा में किया गया है। व्यंग्य विधा में तो हास्य का अभाव बेस्वाद भोजन ही माना जाएगा‌ जिसमें पौष्टिकता भले हो पर तृप्ति न मिल सकेगी।  

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‎समाज व्यंग्य रचना की जमीन भी है और उसका केन्द्रीय स्तम्भ भी।

‎'व्यंग्य और समाज के अंतर्सम्बंध' नामक अध्याय में लेखक ने लिखा है, " समाज व्यंग्य को जन्म देता है, पोषित करता है और कभी-कभी दबाने का प्रयास भी करता है।" यह लेख व्यंग्यकार को उसकी जिम्मेवारी के प्रति भी आगाह करता है जिसका अभाव समाज की आहत प्रतिक्रिया के तौर पर सामने आ सकता है। 

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‎'व्यंग्य में महिला हस्तक्षेप' पर व्यापक चर्चा की गई है और इस क्षेत्र में सक्रिय महिला रचनाकारों का उल्लेख किया गया है, जिस कारण समाज के प्रति उनका दृष्टिकोण व अवलोकन की एक नवीन दृष्टि व अनछुए पहलुओं से परिचय होना सम्भव है।

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‎'व्यंग्य के विविध आयाम' पर विस्तारपूर्क चर्चा करते हुए रचना की प्रहारक क्षमता व सफलता पर प्रस्तुतीकरण के कला पक्ष पर प्रकाश डाला गया है।

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‎हिंदी व्यंग्य जगत के मूर्धन्य रचनाकार कबीर, परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्र नाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल, नरेन्द्र कोहली, नागार्जुन की रचनाओं  उनके लेखकीय शिल्प पर व्यापक चर्चा की गयी है जो एक व्यंग्यकार को अपनी कलम तराशने और समीक्षक को अपनी समझ का दायरा बढ़ाने के पर्याप्त अवसर प्रदान करती है। 

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‎'विसंगतियों के युग में व्यंग्य का भविष्य'  पर यह पुस्तक तर्कसम्मत व्याख्या करते हुए रचनाकार को उसकी जिम्मेवारी का आभास भी कराती है और बदलते हुए समय अनुरूप मार्गदर्शन भी देती है।

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‎पुस्तक के अंतिम पृष्ठों में विभिन्न प्रश्नकर्ताओं द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तर भी दिये गये हैं जो पाठकों की रही-सही जिज्ञासाओं/शंकाओं का समाधान करते हैं।

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‎सरल एवं ग्राह्य भाषा में लिखी गयी इस पुस्तक में व्यंग्य लेखन के समस्त मानदण्डों की विस्तृत व्याख्या है, शीर्ष व्यंग्यकारों की विशिष्ठ शैलियों की चर्चा है, व्यंग्य के विभिन्न उदाहरण हैं और सबसे बड़ी बात यह कि यह साहित्य के हर फार्म में व्यंग्य के समावेश पर लागू है। विवेक जी की यह पुस्तक व्यंग्य लेखकों, समीक्षकों व नये व्यंग्य रचनाकारों के लिये काफी उपयोगी है।

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‎उम्मीद है कि पुस्तक के माध्यम से लेखक का यह प्रयास निश्चित ही व्यंग्य विधा को सशक्त बनाने के लिये लेखकों के लिये सहायक सिद्ध होगा ।

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‎शारदा दयाल श्रीवास्तव

‎भोपाल

अकादमी सम्मान की रुकी हुई घोषणा

त्वरित व्यंग्य 

अकादमी सम्मान की रुकी हुई घोषणा


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


सचिव का इंतजार था जो संस्कृति मंत्रालय में निदेशक भी हैं।अकादमी सम्मान घोषित होने थे । इंतजार सिर्फ एक घोषणा का नहीं था , उस व्यवस्था का था जो कहती है कि साहित्य स्वायत्त है । देश दुनियां में साहित्य के मेरे जैसे जागरूक पाठक , सुधी रचनाकार , साहित्यिक पत्रकार सब इंतजार करते रह गए और कोई ब्यूरोक्रेट गले में आई कार्ड डाले हाल में आया , दबी जुबान में कह गया कि आज घोषणा नहीं होगी । 

शब्द सहम जाते हैं,  दृश्य किसी रंगमंच का लगता है, पर है देश की साहित्य अकादमी का। काना फूसी है ऊपर से आदेश आया दो नाम जोड़ो किसी ने कहा जूरी और सरकार में टकराव हुआ है,  किसी ने कहा नाम तय है पर घोषणा रुकी है। इस सारी गासिप में सच्चाई कहीं बीच में छिपी बैठी जरूर होगी पर उसे कुर्सी नहीं मिली, और सब हाल की कुर्सियां खाली होते देखते रहे।

जिस हाल में कैमरे सज चुके हों , सवालों की फेहरिस्त तैयार हों और समय की सुई प्रेस कांफ्रेंस के तय समय पर अटक गई हो , वहां  पर्दा उठने से पहले ही गिरा दिया गया और दर्शक तालियां बजाने के बजाय सिर खुजाते हाल से बाहर निकलने के लिए मजबूर हुए। साहित्य अकादमी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि न प्रेस कांफ्रेंस हुई न प्रेस रिलीज जारी की गई। 

पत्रकार घर लौट आया पर खबर वहीं की वहीं अटकी रह गई। भीतर क्या हुआ यह कोई बताने को तैयार नहीं पर बाहर बैठे हर आदमी को पता है कि भीतर कुछ न कुछ जरूर हुआ है। मंत्री जी, सफेद शर्ट वाले आका जी , बड़े प्रकाशक, कोई ना कोई तो है जो घोषणा रोकने की ताकत रखता है। सरकारी गलियारों की यह खासियत होती है कि वहां जब कुछ नहीं होता तब भी भीतर ही भीतर बहुत कुछ हो रहा होता है और जब बहुत कुछ होता है तब भी उसे कुछ भी नहीं कहा जाता । 

सवाल है कि  इस उठापटक के बाद जो पुरस्कार घोषित होंगे , उन्हें सम्मान कहा जाए या जुगाड़ , प्रेशर पॉलिटिक्स या प्रतिभा , कलम का अपमान अथवा समझौता,  उपलब्धि या अनुकंपा। 

साहित्य का मौलिक स्वभाव प्रश्न करना है पर पुरस्कार का स्वभाव अक्सर चुप करा देना होता है। जो कल तक व्यवस्था की विसंगतियों पर कलम चलाता था आज उसी व्यवस्था की चुप्पी पर मौन साध ले तो आम पाठक के भीतर का आदमी सरे आम ठगा ठगा सा रह जाता है। 

यह वह बिंदु है जहां व्यंग्य जन्म लेता है , और रोता नहीं हंसता है ताकि रोने की आवाज कहीं दब न जाए।


नोबेल पुरस्कार की राजनीति की बातें अब फुसफुसाहट नहीं रहीं। साम दाम दंड भेद के सूत्र वहां भी खुली किताब की तरह पढ़े जा रहे हैं। जब विश्व का सबसे प्रतिष्ठित मंच भी सत्ता समीकरणों से अछूता नहीं तो अपने यहां के छोटे बड़े मंचों से मासूमियत की उम्मीद करना बाल सुलभ ही है। उत्तर प्रदेश राज्य सरकार के सम्मान , पुरस्कार वर्षों से लंबित हैं और फाइलें धूल खा रहीं हैं। सम्मान अब महज योग्यता का नहीं धैर्य का इम्तहान भी बन गये है।


इस पूरी कथा में सबसे रोचक यह है कि सबको सब पता है पर कोई कुछ नहीं जानता। यह अनभिज्ञता नहीं एक संस्थागत अभिनय है। जब अकादमी जैसे मंच पर  प्रेस कांफ्रेंस का रद्द होना एक रहस्य बने , तो समझ लेना चाहिए कि साहित्य से ज्यादा राजनीति और साहित्य की जुगलबंदी की गोपनीयता फलफूल रही है।


 समाधान क्या है? समाधान वही पुराना है। पुरस्कारों की प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाए , जूरी की राय को संक्षेप में सामने रखा जाए , सरकार का दखल अगर है तो उसे स्वीकार कर ,  स्पष्ट वैधानिक नामांकन नीति बनाई जाए ताकि पर्दे के पीछे की फुसफुसाहट मंच के खुले संवाद में बदल सके। और सबसे जरूरी यह कि लेखक पुरस्कार को अंतिम सत्य न माने बल्कि पाठक को ही अपना स्थायी निर्णायक समझे।


व्यंग्यकार के लिए यह समय उपजाऊ है क्योंकि विसंगति खुलेआम मुस्कुरा रही है। यह पूरा प्रसंग किसी प्रहसन से कम नहीं जहां पात्र गंभीर हैं, संवाद गुप्त हैं और मंच पर अंधेरा है। फर्क बस इतना है कि यहां शो के प्रवेश पत्र पाठक ने, लेखकों ने और साहित्य प्रेमियों ने ले रखे हैं पर शो रद्द कर दिया गया है। ऐसे में हंसी ही बचाव है और सवाल ही उम्मीद है। साहित्य अगर जीवित है तो वह इन रहस्यों पर हंसेगा भी और उन्हें उजागर भी करेगा। यही साहित्य की सदा से  जिद रही है ,यही उसका दायित्व भी है ।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क