Monday, July 3, 2017

जी एस टी बनाम एक्साइज

व्यंग

एक्साईज और सर्विस टैक्स का रिटायरमेंट

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
vivekranjan.vinamra@gmail.com
बंगला नम्बर ऐ १ , विद्युत मंडल कालोनी , शिला कुन्ज , जबलपुर ४८२००८
०९४२५८०६२५२ , ७०००३७५७९८

 महीने का आखिरी दिन मतलब सरकारी दफ्तरो में ढ़ेर सारे रिटायरमेंट और रिटायर होते लोगो की जगह इक्के दुक्के एपांइंटमेंट . बचे खुचे अफसरो को ही मल्टीपल चार्ज दिये जा रहे हैं , सरकारी विभागो में इन दिनो लोगो के रावण जैसे कई कई सिर उगाये जा रहे हैं   . रिटायर होने वाला खुश होता है कि चलो  सही सलामत कट गई .  फैक्ट्री या दफ्तरो के मुख्य दरवाजे पर आजकल  महीने के आखिरी दिन बारात जैसा वातावरण होता है .बैंड , फूलो से सजी गाड़ी , रास्ता जाम ,फटाको का शोर ,  गुलाल उड़ाते लोग एक साथ ही होली दीवाली सब आ जाती है . इससे पहले हर रिटायर होते कर्मचारी अफसर को सर्वश्रेष्ठ इम्पलायी बताते हुये भाषण होते हैं . शाल , श्रीफल , स्मृति चिंह , एकाध प्रशस्ति पत्र , रिटायर होकर बिदा होने वाले के ओहदे के अनुरूप कोई उपहार पकड़ाकर उसे उसके परिवार के हवाले कर दिया जाता है . पत्नी भी घर पहुंचे पति की आरती उतारती है . दो एक दिनो पहले से रिटायरमेंट के बाद तक रात को होटलो में पार्टियां लेने देने  का दौर होता है . कई बार तो जब बिदाई भाषणो में रिटायर व्यक्ति के गुण सुनने को मिलते हैं तो लगता है कि क्या यह उसी आदमी के विषय में बोला जा रहा है , जिस खडूस को हम इतने  दिनो से झेल रहे थे . खैर परिवर्तन प्रकृति का नियम है , एक के जाते ही दूसरा आ जाता है . नये अफसर का स्वागत होता है . अखबारो में विज्ञप्तियां छपती हैं जिनमें नये प्रभारी  मुस्कराती फोटो के साथ अपनी कार्य शैली और लक्ष्य उद्घोषित करते हैं .
 कुछ इसी तरह तीस जून को एक्साईज और सर्विस टैक्स , एंट्री टैक्स वगैरह भी रिटायर हो गये . दोनो देश और राज्यो के कमाऊ पुत्र थे .केवल सरकारो के ही नही , एक्साईज और सर्विस टैक्स से जुड़े छोटे बड़े अफसरों , और वकीलो की भी तिजोरी भरने में इन्होंने कहीं कोई कमी नही छोड़ी .सफेद को काला बनाने में इन टैक्सो का योगदान याद किया जाता रहेगा .  एक जुलाई रात बारह बजे समारोह पूर्वक इनकी जगह आम जनता का कर मुंडन करने जी एस टी ने प्रभार ले लिया है . सरकार की पौ बारह है , ऐसा माना जा रहा है.  मुझे तो उन पत्नियो की चिंता हो रही है , जिनकी शादी ही उनके पिताजी ने अच्छे खासे प्रोफेसर का रिश्ता ठुकराकर एक्साईज इंस्पेक्टर से कर दी थी . बेचारे इंस्पेक्टर साहब जगह जगह सेमीनार करते हुये लोगो में नये गुड्स एन्ड सर्विस टैक्स के लिये एक्सैप्टिबिलिटी का वातावरण बनाते घूम रहे हैं . वकील , चार्टेड एकाउंटेंट जी एस टी के  लूप होल तलाश रहे हैं . चांदी तो साफ्टवेयर बनाने और बेचने वालों की है , बौद्धिक संपदा की वैल्यू की ही जानी चाहिये .
 जैसे रिटायर होते अफसर पर पुरानी फाइलो को निपटाने का प्रैशर होता है , कुछ उसी तरह जगह जगह प्री जीएसटी सेल लगीं . स्टाक क्लियेरेंस के लिये औने पौने दामो चीजें बेंची गईं . नया अफसर पहले माहौल समझता है तब काम शुरू होता है , इसी तरह जी एस टी लग तो गया है पर अभी  समझा समझी का दौर है .
 जीएसटी पूरी तरह कम्प्यूटरी कृत व्यवस्था है . मतलब साफ है कि यदि अगला विश्वयुद्ध लड़ा जायेगा तो वह साइबर युद्ध होगा . किसी भी देश के मुख्य सर्वर्स के हार्डवेयर्स डिस्ट्राय कर दिये जायें , या उस देश का इंटरनेट क्रेश कर दिया जाये , कम्प्यूटर्स हैक कर लिये जायें , साफ्टवेयर्स में वायरस डाल दिये जायें तो देशो की व्यवस्थायें चकनाचूर होते देर नहीं लगेगी . खैर अच्छा अच्छा सोचना चाहिये . यह तो मैने केवल इसलिये लिख दिया कि बाद में मत कहना कि बताया नही था .
 जीएसटी को समझाने के लिये व्हाट्सअप ज्ञानियो ने तरह तरह के मैसेज किये ,  वित्त मंत्री ने कहा कि जीएसटी प्रणाली में गरीब और अमीर एक दर से कर देंगे , मैसेज आया , सुपर मार्केट में चीज़ें सस्ती होगी, मोहल्ले की परचून की दुकान, यहाँ तक कि पटरी वाले की चीज़ें भी महँगी होगी , सुपर मार्केट वाले इनपुट क्रेडिट का भरपूर लाभ लेंगे, परचूनिया कुछ नहीं ले पायेगा . मानो  गरीब सुपर मार्केट में नहीं जाते . एक मेसेज आया कि  शादी से पहले देर रात लौटने पर घर पर हरेक को जबाब देना होता था , पर शादी के बाद केवल पत्नी को जबाब देना पड़ता है , कुछ इसी तरह जी एस टी में केवल एक बिंदु पर टैक्स देना होगा . एक मैसेज आया कि जीएसटी में नमक पर टेक्स नही है , इसलिये सत्ता और विरोधी राजनीति एक दूसरे पर खूब नमक छिड़क रहे हैं . एक और मैसेज मिला कि जीएसटी में सस्ते हुये सामानो के लिये सरकार समर्थक फलाना चैनल देखिये , और महंगे हुये सामानो के लिये फलाना चैनल . खैर मैसेज तो बहुत से आप के पास भी आये होंगे , एक आखिरी मैसेज  शेयर कर रहा हूं ,जिससे आप जीएसटी को अच्छी तरह समझ सकें .  टीचर ने पूछा एक आम के पेड़ पर १२ केले लगे हैं , उनमें से ७ अमरूद तोड़ लिये गये तो बताओ कितने चीकू बचे ? छात्र ने उत्तर दिया सर ८ पपीते . शिक्षक ने कहा अरे वाह तुम्हें कैसे पता ? छात्र ने उत्तर दिया सर क्योकि मैं आज पराठे खाकर आया हूं . मारेल आफ दि स्टोरी यह है कि हमें रोज ब्रश करना चाहिये वरना जीएसटी की दरें  बढ़ सकती है .तो सारा देश जीएसटी को समझने में लगा है , आप भी समझिये . पर एक्साईज और सर्विस टैक्स के सुनहरे युग को मत भूलियेगा .

Tuesday, June 13, 2017

ऋण कृत्वा घृतं पिबेत


व्यंग 
"ॠणं कृत्वा घृतं पिवेत "

विवेक रंजन  श्रीवास्तव 
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , शिला कुन्ज
जबलपुर                                                                                                       
मो ९४२५८०६२५२ , vivek1959@yahoo.co.in

आकासवाणी का यह खेती चैनल है . कृषि विश्वविद्यालय से सरमन बोल रहा हूं  . "ॠणं कृत्वा घृतं पिवेत ", " संगठन का महत्व " , खेती ही नही आंदोलन और धरने की कला भी , वोट को कैसे बनायें लाभकारी , आत्महत्या क्यो और कैसे ? , फसल का उचित मूल्य पाने के तरीके , जैसे खेती को लेकर कुछ नये विषय पाठ्यक्रम में , जोड़े जा रहे हैं . जल्दी ही उपवास का महत्व , बयान कैसे दें , घोषणा पत्र के वादो से कैसे पलटी मारें वगैरह विषयो को भी सेमीनार के लिये जोड़ा जायेगा . खेती किसानी रही ना पुरानी जमाने के संग संग बढ़ने लगी है . 
वो गुजरे जमाने की बातें हो गईं जब कृषि दर्शन देखने के लिये भी दूरदर्शन के श्वेत श्याम पटल पर लोग आंखे गड़ाये रहते थे और एंटीना  हिला कर , घुमा कर सिगनल सैट किया करते थे . तब खेत खलिहान के कार्यक्रम में फसलो की बातें होती थीं . चौपाल में लोकभाषा में गीत वगैरह गाये जाते थे . फसल आने पर खुशियो के त्योहार होते थे . तब कृषि विश्वविद्यालयो में उर्वरको के विषय में पढ़ाया जाता था , उन्नत कृषि के विषय में जानकारी दी जाती थी . जमीन को उपजाऊ बनाने के उपायो पर चर्चा होती थी . विदेशी नस्लो के बीजो की बातें होती थीं . पुराने जमाने में हमारे दूध वाले से यदि गंजी में नापते वक्त बूंद दो बूंद दूध जमीन पर गिर जाता था तो वह उसे अपने हाथो से पोंछकर सिर पर लगा लेता था , इससे उसके मन में गोरस के प्रति अपार श्रद्धा का भाव प्रदर्शित होता था . 
अब जमाना बदल चुका है . खेती किसानी बैकवर्ड होने जैसी वाली बात ना रही . किसान मेले लगते हैं . किसानो के दल देश विदेश नई खेती सीखने के लिये यात्रा पर जाते हैं  , धार्मिक पर्यटन भ्रमण के सरकारी आयोजन होते हैं . किसानो की मुस्कराती तस्वीरें खिंचती हैं सरकारी पत्रिकाओ के अंकों के कवर पेज बन जाते हैं . सरकार को कृषि कर्मण अवार्ड मिलता है . अब किसान जींस पहनते हैं . नई नई जींस उपजाते हैं . 
अब सड़को पर दूध लुढ़काकर , दूधवाले सरकार के प्रति अपना गुस्सा जाहिर करते हैं . मतलब ये कि भारत में दूध की नदियां बहती हैं . किताबो को छोड़कर प्रायः वस्तुओ की कीमत इकानामिक्स का डिमांड  और सप्लाई का रूल तय करता है , पर जब किसान को इस नियम से उसकी मर्जी का दाम नहीं मिलता तो उसे गुस्सा आता है . वह सड़को पर आंदोलन करता है . अब किसान संगठित हैं . उनके पीछे अदृश्य राजनैतिक हाथ हैं . अब किसान केवल खेतीहर नहीं रहा वह वोट बैंक है . अब किसान को जीरो प्रतिशत ब्याज पर ‌ॠण मिलता है , नेताओ के रहते ॠण वापस करना किसान को बड़ा अपमानजनक लगता है . किसान  आत्महत्या करना पसंद करता है पर "ॠणं कृत्वा घृतं पिवेत " के चार्वाक दर्शन  को झुठलाना  उसे बिलकुल पसंद नहीं है . 
चार्वाक दर्शन के भरोसे ही लोन इकानामी चल रही है ,डाउन पेमेंट की व्यवस्था होते ही  ऐसो के दरवाजे पर नई नई फोर व्हीलर नजर आती हैं , किस्त दो किश्त चुकाने के बाद गाड़ी जब्त की जाती है , फिर वह नीलाम होती है . गाड़ी कम्पनी के उत्पादन का आंकड़ा  ,विज्ञापन ,  सेल्स ,फाईनेंस , वसूली वालो को काम  जाने कितनो को रोजगार केवल  "ॠणं कृत्वा घृतं पिवेत " को मानने वालो के भरोसे मिलता है . सड़क पर जब भी एक्सीडेंट होता है  तो जो बड़े वाहन पर सवार होता है , गलती उसकी ही मानी जाती है , लोगो की सारी सेम्पेथी छोटे वाहन मालिक के साथ ही होती है , ठीक कुछ उसी तरह सारे बुद्धिजीवीयो , लेखको , सारे राजनैतिज्ञो , सारे जनमानस , सारे सोशल मीडीया की सेम्पेथी किसान आंदोलनो के समय सरकार के खिलाफ और किसानो के साथ होना बहुत स्वाभाविक है , होना भी चाहिये . किसान हमारे अन्नदाता हैं . सरकार को लगना ही चाहिये कि यदि किसानो का वोट बैंक सरक गया तो , चुनावो में क्या हो सकता है . इसलिये पश्चाताप के आंसू बहाना जरूरी है , उपवास करके मन साफ करना जरूरी है , बैंक खाली होते हों तो हों जायें , इनकम टैक्स देने वाले खत्म थोड़े ही हो गये हैं , लेकिन खेती का ॠण तुरंत माफ किया जाये , जिससे योजना बदलकर , नाम बदलकर अगले ॠणो की स्वीकृति का रास्ता बने . मंत्री जी आश्वस्त रहें कि बड़ा सारा वोट बैंक उनके पास है . बैंक मैनेजर सुसंपन्न होवें . गांवो का विकास हो . किसान खुशहाल होवें , सब सदा सरकार के ॠणी बने रहें .
 

vivek ranjan shrivastava

Wednesday, June 7, 2017

फार्मूले टॉपर बनने के


व्यंग 
लल्लन टाप

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
vivekranjan.vinamra@gmail.com
बंगला नम्बर ऐ १ , विद्युत मंडल कालोनी , शिला कुन्ज , जबलपुर ४८२००८
०९४२५८०६२५२ , ७०००३७५७९८

              "अगर आप समाज का विकास करना चाहते हैं तो आप आईएएस बनकर ही  कर सकते हैं ", यहां समाज का भावार्थ खुद के व अपने  परिवार से होता है , यह बात मुझे अपने सुदीर्घ अनुभव से बहुत लम्बे समय में ज्ञात हो पाई है . 
यदि हर माता पिता , हर बच्चे का सपना सच हो सकता तो भारत की आधी आबादी आई ए एस ही होती ,  कोई भी न मजदूर होता न किसान , न कुछ और बाकी के जो आई ए एस न होते वे सब इंजीनियर , डाक्टर , अफसर ही होते . धैर्य, कड़ी मेहनत , अनुशासन और हिम्मत न हारना , उम्मीद न छोड़ना , परीक्षा की टेंशन से बचना और खुद पर भरोसा रखना , नम्बर के लिये नहीं ज्ञानार्जन के लिये रोज 10 या 20 घंटे पढ़ना जैसे गुण टापर बनाने के सैद्धांतिक तरीके हैं . प्रैक्टिकल तरीको में नकल , पेपर आउट करवा पाने के मुन्नाभाई एमबीबीएस वाले फार्मूले भी अब सेकन्ड जनरेशन के पुराने कम्प्यूटर जैसे पुराने हो चले  हैं .पढ़ाई के साथ साथ  तन , मन , धन से गुरु सेवा भी आपको टापर बनाने में मदद कर सकता है , कहा भी है जो करे सेवा वो पाये मेवा . 
             एक बार एक अंधा व्यक्ति सड़क किनारे खड़ा था . वह राह देख रहा था कि कोई आने जाने वाला उसे सड़क पार करवा दे . इतने में एक व्यक्ति ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा कि कृपया मुझे सड़क पार करवा दें मैं अंधा हूँ . पहले अंधे ने दूसरे को सहारा दिया और चल निकला , दोनो ने सड़क पार कर ली . यह सत्य घटना जार्ज पियानिस्ट के साथ घटी थी . शायद सचमुच भगवान  उन्ही की मदद करता है जो खुद अपनी मदद करने को तैयार होते हैं .मतलब अपने लक को भी कुछ करने का अवसर दें , निगेटिव मार्किंग के बावजूद  सारे सवाल अटैम्प्ट कीजीए  जवाब सही निकले तो बल्ले बल्ले . 
            टापर बनाने के लेटेस्ट  फार्मूले की खोज बिहार में हुई है .कुछ स्कूल अपनी दूकान चलाने के लिये तो कुछ कोचिंग संस्थान अपनी साख बनाने के लिये शर्तिया टाप करवाने की फीस लेते हैं . उनके लल्लन छात्र  भी टाप कर जाते हैं .  नितांत नये आविष्कार हैं . कापी बदलना , टैब्यूलेशन शीट बदलवाना , टाप करने के ठेके के कुछ हिस्से हैं  कुछ नये नुस्खे धीरे धीरे मीडीया को समझ आ रहे हैं . यही कारण है कि बिहार में टापर होने में आजकल बड़े रिस्क हैं जाने कब मीडीया फिर से परीक्षा लेने मुंह में माईक ठूंसने लगे . जिस तेजी से बिहार के टापर्स एक्सपोज हो रहे  है , अब गोपनीय रूप से टाप कराने के तरीको पर खोज का काम बिहार टापर इंडस्ट्री को शुरू करना पड़ेगा .कुछ ऐसी खोज करनी पड़ेगी की कोई टाप ही न करे , सब नेक्सट टु  टाप हों जिससे यदि मीडीया ट्रायल में कुछ न बने तो बहाना तो रहे . या फिर रिजल्ट निकलते ही टापर को गायब करने की व्यवस्था बनानी पड़ेगी , जिससे ये इनटरव्यू वगैरह का बखेड़ा ही न हो .
            एक पाकिस्तानी जनरल को हमेशा टाप पर रहने का जुनून था . वे कभी परेड में भी किसी को अपने से आगे बर्दाश्त नही कर पाते थे . एक बार वे परेड में लास्ट रो में तैनात किये गये , पर वे कहां मानने वाले थे , धक्का मुक्की करते हुये तेज चलते हुये  जैसे तैसे वे सबसे आगे पहुंच ही गये , पर जैसे ही वे फर्स्ट लाईन तक पहुंचे कमांडिंग अफसर ने एबाउट टर्न का काशन दे दिया . और वे बेचारे जैसे थे वाली पोजीशन में आ गये . कुछ यही हालत बिहार के टापर्स की होती दिख रही है .  
            बच्चे के पैदा होते ही उसे टापर बनाने के लिये हमारा समाज एक दौड़ में प्रतियोगी बना देता है .सबसे पहले तो स्वस्थ शिशु प्रतियोगिता में बच्चे के वजन को लेकर ही ट्राफी बंट जाती है ,विजयी बच्चे की माँ फेसबुक पर अपने नौनिहाल की फोटो अपलोड करके निहाल हो जाती है . फिर कुछ बड़े होते ही बच्चे को यदि कुर्सी दौड़ प्रतियोगिता में  चेयर न मिल पाये तो आयोजक पर चीटिंग तक का आरोप लगाने में माता पिता नही झिझकते . स्कूल में यदि बच्चे को एक नम्बर भी कम मिल जाता है तो टीचर की शामत ही आ जाती थी . इसीलिये स्कूलो को मार्किंग सिस्टम ही बदलना पड़ गया . अब नम्बर की जगह ग्रेड दिये जाते हैं . सभी फर्स्ट आ जाते हैं .
              जैसे ही बच्चा थोड़ा बड़ा होता है , उसे इंजीनियर डाक्टर या आई ए एस बनाने की घुट्टी पिलाना हर भारतीय पैरेंट्स की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है . इसके लिये कोचिंग , ट्यूशन , टाप करने पर बच्चे को उसके मन पसंद मंहगे मोबाईल , बाईक वगैरह दिलाने के प्रलोभन देने में हर माँ बाप अपनी हैसियत के अनुसार चूकते नहीं हैं . वैसे सच तो यह है कि हर शख्स अपने आप में किसी न किसी विधा में टाप ही होता है , जरूरत है कि  हर किसी को अपनी वह क्वालिटी पहचानने का मौका दिया जाये जिसमें वह टापर हो .  
           





vivek ranjan shrivastava

Saturday, May 27, 2017

मानहानि का मुकदमा यानी मुंह की कालिख से तुरंत निपटने का फेसवाश

मानहानि का मुकदमा यानी मुंह की कालिख से तुरंत निपटने का फेसवाश

विवेक रंजन  श्रीवास्तव
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , शिला कुन्ज
जबलपुर                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                 
मो ९४२५८०६२५२ , vivek1959@yahoo.co.in

        व्यंग के हर पंच पर किसी न किसी की मानहानि ही की जाती है , ये और बात है कि सामने वाला उसका नोटिस लेता है या नही , और व्यंगकार को मानहानि का नोटिस भेजता है या नही . व्यंगकार अपनी बात का सार्वजनिककरण इनडायरेक्ट टेंस में कुछ इस तरह करता है कि सामने वाला टेंशन में तो होता है पर मुस्करा कर टालने के सिवाय उसके पास दूसरा चारा नहीं होता .लेकिन जब बात सीधी टक्ककर की ही हो जाये तो मानहानि का मुकदमा बड़े काम आता है . सार्वजनिक जीवन में स्वयं को बहुचर्चित व अति लोकप्रिय होने का भ्रम पाले हुये किसी शख्सियत को जब कोई सीधे ही मुंह पर कालिख मल जाये तो तुरंत डैमेज कंट्रोल में , बतौर फेसवाश  मानहानि का मुकदमा किया जाता है . जब  समय के साथ मुकदमें की पेशी दर पेशी ,मुंह की कालिख कुछ कम हो जाये , लोग मामला भूल जायें तो आउट आफ कोर्ट माफी वगैरह के साथ मामला सैट राइट हो ही जाता है . लेकिन यह तय है कि रातो रात शोहरत पाने के रामबाण नुस्खों में से एक है मानहानि के मुकदमें में किसी पक्ष का हिस्सा बन सकना .  मैं भी बड़े दिनो से लगा हुआ हूं कि कोई तो मुझे मानहानि का नोटिस भेजे और अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर छपते व्यंगो में बतौर लेखक मेरा नाम  अंदर के पन्ने से उठकर कवर पेज पर बाक्स न्यूज में  पढ़ा जाये . पर  मेरी तमाम कोशिशो के बाद भी मेरी पत्नी के सिवाय कोई अब तक मुझसे खफा ही नही हुआ . और पत्नी से तो मैं सारे मुकदमें पहले ही हारा हुआ हूं . पुराने समय में साले सालियो की तमाम सावधानियो के बाद भी जीजा और फूफा  वगैरह की मानहानि हर वैवाहिक आयोजन का एक अनिवार्य हिस्सा होता था . मामला घरेलू होने के कारण मानहानि के मुकदमें के बदले रूठने , और मनाने का सिलसिला चलता था . किसकी शादी में कौन से जीजा कैसे रूठे और कैसे माने थे यह चर्चा का विषय रहता था .
        लोक जीवन में देख लेने की धमकी ,धौंस जमाकर निकल लेना आदि  मानहानि के मुकदमें से बचने के सरल उपाय हैं . सामान्यतः जब यह लगभग तय हो कि मानहानि के मुकदमें में सामने वाला कोर्ट ही नही आयेगा तो उसे देख लेने की धमकी देकर छोड़ दिया जाता है . देख लेने की धमकी से बेवजह उलझ रहे दोनो पक्ष अपनी अपनी इज्जत समेट कर पतली गली से निकल लेने का एक रास्ता पा जाते हैं .  देख लेने की धमकी कुछ कुछ लोक अदालत के समझौते सा व्यवहार करती है . इसी तरह जब खुद की औकात ही किसी अपने की औकात पर टिकी हो जैसे आपका कोई नातेदार थानेदार हो , बड़ा अफसर हो या मंत्री वंत्री हो , विपक्ष का कद्दावर नेता हो तो भले ही आपका स्वयं  का  कुछ मान न हो पर आप अपना सम्मान अपने  उस  महान रिश्तेदार के मान से जोड़ सकते हैं और सड़क पर गलत ड्राइविंग या गलत पार्किंग करते पाये जाने पर , बिना रिजर्वेशन आक्यूपाइड अनआथराइज्ड बर्थ पर लेटे लेटे , किसी शो रूम में मोलभाव करते हुये  बेझिझक अपनी रिलेशन शिप को जताते हुये , धौंस जमाने के यत्न कर सकते हैं . धौंस जम गई और आपका काम निकल गया तो बढ़िया . वरना आप जो हैं वह तो हैं ही .  तुलसी बाबा बहुत पहले चित्रकूट के घाट पर गहन चिंतन मनन के बाद लिख गये हैं " लाभ हानि जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ " . तुलसी की एक एक चौपाई की व्याख्या में , बड़े बड़े शोध ग्रंथ लिखे जा चुके हैं . कथित विद्वानो ने  डाक्टरेट की उपाधियां लेकर  यश अर्जित किया है , और इस लायक हुये हैं कि उनकी मानहानि हो सके , वरना तो देश के करोड़ो लोगो का मान है ही कहाँ कि उनकी मानहानि हो  . तो जब आपकी भी धौंस न चले , देख लेने की धमकी काम न आवे तो बेशक आप विधाता को अपने मान के अपमान के लिये दोषी ठहरा कर स्वयं खुश रह सकते हैं .  तुलसी की चौपाई का स्पष्ट अर्थ है कि यश और अपयश विधि के हाथो में है , फिर भी जाने क्यो लोग मान अपमान की गांठें बाधें अपने जीवन को कठिन बना लेते हैं . देश की अदालत में वैसे ही बहुत सारे केस हैं सुनवाई को . ए सी लगे कमरो के बाद भी कोर्ट को गर्मी की छुट्टियां भी मनानी पड़ती है ,  इसलिये हमारी विनम्र गुजारिश है कि कम से कम मान हानि के मुकदमें दर्ज करने पर रोक लगा दी जाये अध्ययन किया जाये कि क्या इसकी जगह अपनी ऐंठ में जी रहे नेता धमकी , धौंस , बयान वगैरह से काम चला सकते हैं  ?
       
       
       

Sunday, May 21, 2017

तर्जनी बनाम अनामिका



व्यंग
अनामिका 

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
, ७०००३७५७९८

मेरी एक अकविता याद आ रही है ,जिसका शीर्षक ही है "शीर्षक".कविता छोटी सी है , कुछ यूं

एक कविता
एक नज्म  
एक गजल हो 
तुम तरन्नुम में 
और मैं 
महज कुछ शब्द बेतरतीब से 
जिन्हें नियति ने बना दिया है 
तुम्हारा शीर्षक 
और यूं
मिल गया है मुझे अर्थ 
 जबसे मैने अपनी एकमेव पत्नी को अपनी यह कविता सुनाई है , उसे मेरा लिखा अच्छा लगने लगा है . और मुझे सचमुच जीवन सार्थक लगने लगा है . मतलब शीर्षक ही होता है जो हमें अर्थ देता है .मैं फेमनिस्ट हूं  इसलिये जब बिना शीर्षक के लिखने का शीर्षक तय करना था तो हमने अनामिका पर लिखने का फैसला किया . अनामिका मतलब बिना नाम   यूँ  तो सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का कविता संग्रह "अनामिका" बरसो पहले ही आ चुका है और जाने कितनी ही लड़कियो का नाम अनामिका रखा चुका है . अनामिका नाम की फिल्म भी बन चुकी है  शायद इसलिये क्योकि इस शब्द में किंचित ध्वनि की मधुरता भी है . तो जब कुछ न सूझे और कुछ नामकरण जरूरी हो तो अनामिका शीर्षक उपयुक्त लगता है .  
 दुनिया भर में अनामिका यानी रिंग फिंगर में  इंगेजमेंट रिंग पहनकर पत्नियां अपने पतियो को तर्जनी के इशारो पर नचाने की ताकत रखती हैं . ये और बात है कि फेमनिस्ट होने के नाते मैं पूरी शिद्दत से मानता हूं कि महिलायें अपनी इस अपार शक्ति का पूरा उपयोग नहीं करती या नही कर पातीं वरना ... एनी वे . 
 लेखक , वकील और नेता शब्दो के बाजीगर होते हैं , वे किसी भी विषय पर स्वप्न बुन सकते हैं . लेखक अपने वाक्जाल से रची  अपनी रचना पढ़कर खुद की पीठ थपथपाता है वकील भरी अदालत में अपने शब्दो के माया जाल से सच को झूठ और झूठ को सच साबित कर देता है , न्याय की मूर्ति आँखो पर काली पट्टी बांधे वही ठीक मान लेती है जो बड़ा वकील बोलता है . जैसे बेचारा पाकिस्तान इकबालिया बयान लिये बैठा रह गया और साल्वे जी इंटरनेशनल अदालत में हमारे लिये मैदान जीत आये . नेता तो बिना लिखे ही अपने भाषणो से शब्दो का जाल फैलाकर उसमें वोट फांस लेता है .शब्दो से स्वप्न दिखाकर जनता को मीठी नींद सुला देता है उनके सारे गम भुलाकर उनहें अपने पक्ष में हिप्नोटाइज कर लेता है और खुद जनता के कंधो पर चढ़कर सत्ता के शीर्ष तक पहुंच जाता है , जहाँ मख्खन की मटकी बंधी होती है .  आजकल तो और भी नये प्रयोग चल रहे हैं पड़ोसियो के एटमी बमो तक को  शब्दो से मात देने के लिये नेता जी के व्यक्तव्य गढ़े जा रहे हैं . बयान छप रहे हैं. इस कला पर सोढ़ की जरूरत है . 
 शोध कर्ता भी तरह तरह के शोध करते हैं , सच पूछा जाये तो सारे ढ़ंग तरीके के शोध हो ही चुके हैं , इसलिये इन दिनो  शोधकर्ता पुरानी किसी थीसिस का टाइटिल बदलकर , दस पांच संबंधित शोध कार्य मिलाकर बिबलियो ग्राफी बनाकर अपनी नई थीसिस तैयार करते पाये जाते हैं जैसा हमारे देश के विश्वविद्यालयो में होता है . या फिर पश्चिम के स्वनाम ख्यात यूनिवर्सिटीज में शोध के नाम पर बाल की खाल निकाली जाती है . हाल ही फ्लोरिडा विश्वविद्यालय में  रिंग फिंगर को लेकर ऐसा ही शोध कार्य सम्पन्न हुआ है . जिसके अनुसार अनामिका अंगुली को शुक्राणुओं की संख्या, आक्रामक व्यवहार, यौन अनुकूलन और खेल कौशल से जोड़ा गया है.   ऐसा पाया गया कि पुरुष की तर्जनी की अपेक्षा अनामिका की लम्बाई  का संबंध उसकी उच्च सेक्स रुचि से है। 
 जो भारतीय हर बात में अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं और मानते हैं कि पुष्पक विमान तो उनके पास रामायण काल से ही है , या संजय ने महाभारत के युद्ध का लाइव  टेलीविजन प्रसारण किया था जैसा आजकल के दीपक चौरसिया डायरेक्ट जीरो पाइंट से रिपोर्टिंग करते पाये जाते हैं , उनके लिये गर्व का विषय हो सकता है कि भारतीय ज्योतिष के अनुसार पहले से ही अनामिका के नीचे सूर्य पर्वत माना जाता है .धार्मिक मान्यता के अनुसार अनामिका अंगुली पर स्वयं भगवान शंकर का वास माना जाता है. इसी कारण अनामिका अंगुली को सर्वथा धार्मिक रूप से पवित्र कहा गया है और  पूजा अनुष्ठान आदि धार्मिक कार्यों में अनामिका उंगली में कुशा से बनी पवित्री धारण करने की परम्परा है . अनामिका उंगली से ही देवगणों को गंध और अक्षत अर्पित किया जाता है. यही उंगली मान, धन ,संतान , यश और कीर्ति की सूचक है .  इसलिये महिलाओ को अपनी बिन मांगी सलाह है कि यदि उन्हें अपनी तर्जनी पर पुरुष को नचाना है तो उसकी अनामिका पर ध्यान दीजीये .

Wednesday, May 17, 2017

सिफारिशी घंटी का सवाल है बाबा

व्यंग
एक सिफारिशी घंटी का सवाल है बाबा

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
vivekranjan.vinamra@gmail.com


        अब तो मोबाईल का जमाना आ गया है , वरना टेलीफोन के जमाने में हमारे जैसो को भी लोगो को नौकरी पर रखने के अधिकार थे . और उन दिनो नौकरी के इंटरव्यू से पहले अकसर सिफारिशी टेलीफोन आना बड़ी कामन बात थी . सेलेक्शन का एक क्राइटेरिया यह भी रखना पड़ता था कि सिफारिश किसकी है . मंत्री जी की सिफारिश , बड़े साहब की सिफारिश   और रिश्तेदारो की सिफारिश में संतुलन बनाना पड़ता था . एक सिफारिशी घंटी केंडीडेट का भाग्य बदलने की ताकत रखती थी . अक्सर नेता जी से संबंध टेलीफोन की सिफारिशी घंटी बजवाने के काम आते थे .
        आज भी विजिटिंग कार्ड का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है टेलीफोन नम्बर , और टेबिल का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण होता है टेलीफोन . टेलीफोन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य होता है सिफारिश . टेलीफोन की घंटी से सामने बैठा व्यक्ति गौण हो जाता है , दूर टेलीफोन के दूसरे छोर पर बैठा व्यक्ति महत्वपूर्ण हो जाता है . जिस तरह पानी उंचाई से नीचे की ओर प्रवाहित होता है उसी तरह टेलीफोन में हुई वार्तालाप का नियम है कि इसमें हमेशा ज्यादा महत्वपूर्ण आदमी , कम महत्वपूर्ण आदमी को इंस्ट्रक्शन देता है . उदाहरण के तौर पर मेरी पत्नी मुझे घर के टेलीफोन से आफिस के टेलीफोन पर इंस्ट्रक्शन्स देती है . मंत्री जी बड़े साहब को और बड़े साहब अपने मातहतो को महत्वपूर्ण या गैर महत्वपूर्ण कार्यो हेतु भी महत्वपूर्ण तरीके से आदेशित करते हैं . टेलीफोन के संदर्भ में एक नियम और भी है , ज्यादा बड़े लोग अपना टेलीफोन स्वयं नहीं उठाते . इसके लिये उनके पास पी ए टाइप की कोई सुंदरी होती है जो बाजू के कमरे में बैठ कर उनके लिये यह महत्वपूर्ण कार्य करती है और एक्सटेंशन टेलीफोन पर महत्वपूर्ण काल ही फारवर्ड करती है . टेलीफोन एटीकेट्स के अनुसार मातहत को अफसर की बात सुनाई दे या न दे , समझ आये या न आये , किन्तु सर ! सर !  कहते हुये आदेश स्वीकार्यता का संदेश अपने बड़े साहब को देना होता है . मुझे गर्व है कि अपनी लम्बी नौकरी में मैने ऐसे लोग भी देखे हैं जो बड़े साहब का टेलीफोन आने पर अपनी सीट पर खड़े होकर बात करते हैं . ऐसे लोगो को नये इलेक्ट्रानिक टेलीफोन में कालर आई डी लग जाने से बड़ा लाभ हुआ है .  आजकल बड़े साहब का मोबाईल आने पर ऐसे लोग तुरंत सीट से उठकर गतिमान हो जाते हैं . यह बाडी लेंगुएज उनकी भारी दबाव में आने वाली मानसिक स्थिति की द्योतक होती है .
        हमारी पीढ़ी ने चाबी भरकर चार्ज कर बात करने के हैंडिल वाले टेलीफोन के समय से आज के टच स्क्रीन मोबाईल तक का सफर तय किया है . इस बीच डायलिग करने वाले मेकेनिकल फोन आये जिनकी वही रिटी पिटी ट्रिन ट्रिन वाली घंटी होती थी जैसे आजकल आधे कटे सेव वाले मंहगे एप्पल मोबाईल की  एक ही सुर की घंटी होती है . समय के साथ की पैड वाले इलेक्ट्रानिक फोन आये . और अब हर हाथ में मोबाईल का नारा सच हो रहा है , लगभग हर व्यक्ति के पास दो मोबाइल या कमोबेश दो सिम तो हैं ही . एक समय था जब टेलीफोन आपरेटर की शहर में बड़ी पहचान और इज्जत होती थी , क्योकि वह  ट्रंक काल पर मिनटो में किसी से भी बात करवा सकता था . शहर के सारे सटोरिये रात ठीक आठ बजे क्लोज और ओपन के नम्बर जानने के लिये मटका किंग से हुये इशारो के लिये इन्हीं आपरेटरो पर निर्भर होते थे . आज तो पत्नी भी पसंद नही करती कि पति का काल उसके मोबाईल पर आ जाये , पर मुझे स्मरण है उन दिनो हमारे घर पर पड़ोसियो के फोन साधिकार आ जाते थे . लाइटनिंग काल के चार्ज आठ गुने  लगते थे अतः लाइटनिंग काल आते ही लोग सशंकित हो जाते थे .
        मैं विद्युत विभाग में अधिकारी हूं , हमारे विभाग में बिजली की हाई टेंशन लाइन पर पावर लाइन कम्युनिकेशन कैरियर की अतिरिक्त सुविधा होती है , जिस पर हम हाट लाइन की तरह बातें कर सकते हैं , बातें करने की ठीक इसी तरह रेलवे की भी अपनी समानांतर व्यवस्था है . पुराने दिनो में कभी जभी अच्छे बुरे महत्वपूर्ण समाचारो के लिये हम लोग भी अनधिकृत रूप से अपनी इस समानांतर व्यवस्था का लाभ मित्र मण्डली को दे दिया करते थे . बातो के भी पैसे लगते हैं और बातो से भी पैसे बनाये जा सकते हैं यह सिखाता है टेलीफोन . यह बात मेरी पत्नी सहित महिलाओ की समझ आ जाये तो दोपहर में क्या बना है से लेकर पति और बच्चो की लम्बी लम्बी बातें करने वाली हमारे देश की महिलायें बैठे बिठाये ही अमीर हो सकती हैं . खैर महिलायें जब बातो से पेसे बनायेंगी तब की तब देखेंगे फिलहाल तो मायावती की माया टेलीफोन पर हुई उनकी बातो की रिकार्डिंग सुनाकर लुटती दिख रहि है .

Saturday, May 6, 2017

खीरा सर से काटिये, मलिये नमक लगाए, देख कबीरा यह कहे, कड़वन यही सुहाए

व्यंग्य

गनीमत है वे अंखियो से गोली नही

विवेक रंजन  श्रीवास्तव
 vivek1959@yahoo.co.in

 हम सब बहुत नादान हैं . इधर पाकिस्तान ने दो चार फटाके फोड़े नहीं कि  हमारा मीडीया हो हल्ला मचाने लगता है . जनता नेताओ को याद दिलाने लगती है कि तुमको चुना ही इसलिये था कि तुम पाकिस्तान को सबक सिखाओगे , बदला लो .  धिक्कार है हम पर जो अपने ही चुने गये नेताओ से सवाल करते हैं . दरअसल हमारे राजनेता बड़े साहित्यिक किस्म के हैं . जरूर उन्होने यह दोहा पढ़ा होगा " अस्त्र-शस्त्र के वार शत, करते कम आघात , वार जीभ का जब लगे, समझो पाई मात ".  यही कारण है कि जब जब बाजू वाला अपने बमो से वार करता है नेता जी कड़े शब्दो में जुबानी जंग लड़ते नजर आते हैं . कठोर शब्दो में भर्तस्ना करते हैं . विरोध दर्ज करते हैं .
 मुश्किल समय में विचलित न होने का संदेश भी चाणक्य नीति है . हमारे नेता भी असीम धैर्य का परिचय देते हैं वे दिलासा देते हैं कि शहीदो  का खून बेकार नही जायेगा . हमें गर्व करना चाहिये अपने ऐसे स्थित प्रज्ञ नेताओ पर . और भगवान का शुक्र मनाना चाहिये कि इन नेताओ ने यह नही पढ़ा  "तेरे कटाक्ष , ले लेते  हैं मेरे प्राण, चितवन को भेद जाते हैं , तेरे नयनों के तीर कमान " .  भले ही उन्होने यह पढ़ा हो और सुना भी हो कि "अँखियन से गोली मारे" पर कम से कम उस पर अनुसरण तो नही करते . वरना कल्पना कीजीये आपको कैसा लगता जब सीमा पर पाकिस्तान की बमबारी के बाद नेशनल चैनल में ब्रेकिंग न्यूज पर विशेष प्रसारण की घोषणा होती  और फिर नेता जी के दर्शन होते , वे कहते भाईयो और बहनो और फिर बाईं आँख बन्द कर पाकिस्तान को जबाब देते उसकी कायराना हरकत का . हो सकता था कि वे सारे देश वासियो से भी आग्रह करते कि आईये हम सब एक साथ अपनी बाईं आँख बन्द कर सबक सिखा दें पड़ोसी को . ऐसा नही हो रहा , इसलिये गर्व करिये अपने चुने हुये जन प्रतिनिधियो पर .
      जब आपने उन्हें चुन ही लिया है अगली बार फिर से बेवकूफ बनने तक के लिये तो जो कुछ वे कर रहे हैं उसमे हाँ में हाँ मिलाइये और खुश रहिये . विकास का स्वागत कीजीये . अंतरिक्ष की ओर निहारिये , वैज्ञानिको पर गर्व कीजीये . शहीदो को श्रद्धांजली दीजीये . संवेदना का ट्वीट कीजीये . कूटनीति की प्रशंसा कीजीये . अपना पूरा टैक्स अदा कीजीये . जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय दीजीये .मीडिया में हैं तो जन भावनाओ में उबाल भरिये .  यदि विपक्ष में हैं तो निश्चिंत होकर सरकार की कड़ी आलोचना कीजीये , यदि कभी आप सत्ता में लौट आये तो  उच्च कोटि के आई ए एस और भाषा विद सचिव आपके लिये अपनी बात से पलटी खाने के कई रास्ते निकाल देंगे . नई शब्दावली ढ़ूंढ़कर कठोर शब्दो में निंदा का नया जुमला गढ़ देंगे . शब्द की शक्ति असीम है . इससे तीर और तलवार भी हार जाते थे .  हिन्दी में एक कहावत है - बातन हाथी पाईये, बातन हाथी पांव .  अर्थात आपके द्वारा कहे गये शब्दों से प्रभावित होकर आपको हाथी के पैरों तले रौंदे  जाने का निर्णय भी लिया जा  सकता है और आपके द्वारा कहे गये शब्दों से प्रसन्न होकर  आपको हाथी के ऊपर बैठाया भी जा सकता है . शब्द इतने गहरे घाव देते हैं कि वे जीवन भर नहीं भरते. इसलिये नेताओ के शाब्दिक प्रहारो का समर्थन कीजीये . पाकिस्तान की नापाक हरकतो का यही तो सच्चा जबाब है कि उनको इतने गहरे घाव लगें जो कभी भरें नही . मुझे लगता है कि इतने बढ़िया शब्द बाणो के बाद भी जो असर पड़ोसी पर होना चाहिये वो यदि नही हो रहा ,तो  इसका मूल कारण यह हो सकता है कि पड़ोसी हिन्दी नही जानता . भैंस के आगे बीन बजाओ भैंस खड़ी पगुराये वाली स्थिति हो रही है .या फिर नेताओ की कड़ी निंदा की भाषा में दम नहीं है , यदि ऐसा है तो मेरे जैसे व्यंगकारो का एक पैनल नेता जी के बयान बनाने के लिये नियुक्त किया जाना जरूरी है .
 जबाब की भाषा वो ही ठीक होती है जो सामने वाला समझे ,मद्रासी को भोजपुरी में जबाब देना बेकार है .  तो यदि बम की भाषा ही उन्हें समझ में आती है तो उन्हें उसी भाषा में जबाब देने का पाठ हमारे  नेताओ को सिखाना ही  पड़ेगा और इस काम के लिये कबीर का एक ही दोहा काफी है खीरा सर से काटिये, मलिये नमक लगाए, देख कबीरा यह कहे, कड़वन  यही सुहाए ..