Thursday, February 19, 2026

धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि

 डॉ धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि


विवेक रंजन श्रीवास्तव


धर्मवीर भारती के लेखन में व्यंग्य उनकी संवेदना के भीतर घुली हुई वह कसक है जो करुणा, नैतिक बेचैनी और उनके लेखन में ऐतिहासिक दृष्टि के साथ मिलकर प्रकट होती है। वे हँसाने वाले व्यंग्यकार नहीं हैं बल्कि मुस्कान के भीतर छिपी हुई पीड़ा दिखाने वाले रचनाकार हैं। उनके नाटक , उपन्यास , कविता में व्यंग्य पात्रों की सहज अभिव्यक्ति से पाठक की अंतरात्मा को कुरेदता है।


उनका काव्य नाटक अंधा युग इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। महाभारत के युद्ध के बाद की कथा के माध्यम से उन्होंने आधुनिक मनुष्य के नैतिक अंधेरे, सत्ता की क्रूरता और विजेताओं की खोखली विजय पर ऐसा व्यंग्य किया है जो सीधे किसी व्यक्ति पर नहीं पूरी सभ्यता पर लक्षित है। उनके ये प्रयोग किसी नितांत व्यंग्य का टैग लगाए आज की कई रचनाओं से अधिक प्रभावी हैं ।

उनकी अभिव्यक्ति में धृतराष्ट्र का अंधापन केवल शारीरिक नहीं रह जाता वह सत्ता में बैठे हर उस व्यक्ति का प्रतीक बन जाता है जो सच जानते हुए भी उसे देखना नहीं चाहता। उदाहरण स्वरूप नाटक में धृतराष्ट्र का संवाद "मैंने कुछ नहीं देखा कुछ नहीं सुना" आधुनिक शासकों की जानबूझकर की अज्ञानता पर तीखा व्यंग्य है जो युद्ध की विभीषिका को नजर अंदाज कर सत्ता की भूलभुलैया में भटकते हैं। गांधारी का क्षोभ और अश्वत्थामा का अंध प्रतिशोध आधुनिक राजनीतिक वर्गों की मानसिकता को उघाड़ते हैं जहाँ एक अन्य पंक्ति "विजय तो हुई पर मनुष्य कहाँ बचा" विजेताओं के खोखले दंभ पर प्रहार करती है। 


उनके उपन्यास गुनाहों का देवता में भी व्यंग्य सामाजिक संरचनाओं पर है। स्वयं उपन्यास के नाम में ही व्यंग्य का कंट्रास्ट दिखता है। यह कृति प्रेमकथा का उपन्यास मानी जाती है किन्तु, इसमें व्यंग्य अंतर्निहित है। प्रेम के नाम पर त्याग का महिमामंडन करने वाला समाज स्वयं प्रेम से डरता है। चंदर और सुधा के संबंधों की विवशताएँ पाठक को द्रवित करती हैं पर साथ ही यह प्रश्न भी उठाती हैं कि क्या हमारी नैतिकता वास्तव में मानवीय है या केवल सामाजिक सुविधा है। एक उदाहरण है चंदर का वह अंतर्मन जहाँ वह सोचता है "प्रेम तो देवत्व है पर समाज इसे गुनाह बना देता है" जो प्रेम को पवित्र बताकर त्याग थोपने वाली सामाजिक मान्यताओं पर सूक्ष्म व्यंग्य है। दूसरा उदाहरण सुधा का विवाह बिंदु है जहाँ प्रेम का बलिदान सामाजिक सम्मान के नाम पर मजबूर किया जाता है यह दर्शाते हुए कि हिन्दू समाज नारी को देवी बनाकर उसी के गुनाहों का देवता कैसे थोप देता है। यहाँ व्यंग्य खुलकर नहीं बोलता बल्कि परिस्थितियों की विडंबना में स्वतः उभरता है।


डॉ भारती की कविताओं विशेषकर कनुप्रिया में भी पारंपरिक प्रेम आख्यानों पर एक सूक्ष्म पुनर्पाठ दिखाई देता है। राधा का स्वर कहीं कहीं उस पुरुष केंद्रित मिथकीय संरचना पर प्रश्न करता हुआ प्रतीत होता है जिसने स्त्री को प्रतीक्षा और विरह की मूर्ति बनाकर स्थापित किया। कनुप्रिया नारी के अंतर्मन की परतें खोलती है जहाँ सुख के क्षणों में घिर आने वाली निर्व्याख्या उदासी और विप्र लब्धा रस की पीड़ा को सौंदर्यपूर्ण ढंग से व्यक्त करती है। यह व्यंग्य आक्रामक नहीं आत्म संवादी है। ठंडा लोहा संग्रह में शहर की उदासीनता अकेलेपन और मूल्य क्षय पर प्रतीकात्मक व्यंग्य है । जैसे मेरी दुखती हुई रगों पर ठंडा लोहा रखना उस व्यवस्था का प्रतीक है जो संवेदनशीलता पर कठोरता चढ़ाती है । 


पत्रकार और संपादक के रूप में जब वे धर्मयुग का संचालन कर रहे थे तब उनके संपादकीय लेखों में सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर संयत किन्तु तीक्ष्ण टिप्पणी मिलती है। वे शोर नहीं मचाते पर शब्दों के बीच ऐसी रिक्ति छोड़ते हैं जहाँ पाठक स्वयं व्यवस्था की विडंबना पहचान लेता है। धर्मयुग के माध्यम से उन्होंने नई पीढ़ी को विसंगति पहचानने की संवेदना दी।


उनके व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह व्यक्ति विरोधी नहीं स्थिति विरोधी है। उसमें क्रोध कम नैतिक पीड़ा अधिक है। वे उपहास नहीं करते बल्कि यह दिखाते हैं कि मनुष्य अपनी ही बनाई संरचनाओं में कैसे फँस गया है। इसलिए उनका व्यंग्य समय के साथ पुराना नहीं पड़ता क्योंकि वह किसी घटना पर नहीं मनुष्य की प्रवृत्ति पर केंद्रित है।


धर्मवीर भारती को पढ़ते हुए लगता है कि व्यंग्य तब सबसे प्रभावी होता है जब वह हँसी पैदा न करे बल्कि भीतर एक असुविधाजनक चुप्पी छोड़ जाए। वही चुप्पी उनकी रचनाओं की वास्तविक शक्ति है और वही उन्हें केवल साहित्यकार नहीं अपने समय का आत्मद्रष्टा बनाती है।

एक प्रसंग डॉ पुष्पा भारती के संस्मरण पढ़ने में मिला , रागदरबारी का प्रारंभिक लेखन श्रीलाल शुक्ल जी ने डॉ 

धर्मवीर भारती के मुंबई के जुहू वाले समुद्र किनारे के फ्लैट में ही किया था। 

पुष्पा जी ने लिखा है, " मुंबई शहर के छोर पर महासागर से अभिप्रेरित ही रागदरबारी की पहली पंक्तियां हैं - महानगर के छोर से ही भारत में देहात का महासागर प्रारंभ हो जाता है...


तो जिन धर्मवीर भारती जी के घर में ही व्यंग्य का राग दरबार उपजा हो , उनके लेखन में व्यंग्य स्वाभाविक रूप से घुला होना स्वाभाविक ही है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Saturday, February 14, 2026

प्रेमचन्द के साहित्य में व्यंग्य

 प्रेमचंद के साहित्य में निहित व्यंग्य


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

ए 233 ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी जे के रोड भोपाल 462023


कथा सम्राट का व्यंग्यबोध


मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६) हिंदी साहित्य के इतिहास में एक युगप्रवर्तक रचनाकार के रूप में स्थापित हुए हैं। उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता आदर्शोन्मुख यथार्थवाद रहा, जिसके अंतर्गत उन्होंने भारतीय समाज के यथार्थ चित्रण के साथ-साथ उसमें सकारात्मक परिवर्तन की रचनाएं की हैं , जो क्रिएटिव हिंदी कथा साहित्य की धरोहर है। उनकी रचनाओं में व्यंग्य की एक अंतर्निहित सशक्त धारा विद्यमान है, जो सामाजिक कुरीतियों, राजनीतिक विसंगतियों, धार्मिक पाखंड और मानवीय दुर्बलताओं पर करारी चोट करती दिखती है।


प्रेमचंद का सम्पूर्ण साहित्य 1906 से 1936 के बीच लिखा गया, जो उस दौर का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक दस्तावेज है। 

प्रेमचंद के लेखन की विशेषता यह है कि वह कटु और आक्रामक होने के बजाय रचनात्मक और सकारात्मक है, जिसका उद्देश्य पाठक की विवेकशीलता को जगाना और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणा देना है। इस हेतु उन्होंने व्यंग्य के उपालंभों का खूबसूरत उपयोग किया है।


व्यंग्य का सैद्धांतिक आधार और प्रेमचंदीय लेखन...


व्यंग्य साहित्य की वह विधा है जो विडंबना, कटाक्ष और हास्य के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक विसंगतियों पर प्रहार करती है। प्रेमचंद के साहित्य में व्यंग्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और नैतिक जागरण का माध्यम बना है।


प्रेमचंद के व्यंग्य के प्रमुख लक्ष्यों में धार्मिक आडंबर, सामंती मानसिकता, नौकरशाही भ्रष्टाचार, पूँजीवादी शोषण, जातिगत भेदभाव और स्त्री के प्रति अन्याय पर सतत प्रहार शामिल हैं। उन्होंने अपने व्यंग्य प्रयोग से किसी व्यक्ति विशेष के बजाय पूरी सामाजिक व्यवस्था और मानसिकता पर केंद्रित लेखन किया है।


धार्मिक आडंबर और पाखंड पर व्यंग्य ..


प्रेमचंद के साहित्य में धार्मिक अनुष्ठानों और धर्मगुरुओं के पाखंड पर करारा व्यंग्य मिलता है। उनके विचार में धर्म मनुष्य की आंतरिक नैतिकता और सामाजिक समरसता का मार्गदर्शक होना चाहिए, बाहरी दिखावा नहीं।


प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'सवा सेर गेहूँ' में एक ब्राह्मण पंडित और कुम्हार के माध्यम से धार्मिक पाखंड, छुआछूत और जातिगत भेदभाव पर गहरा प्रहार किया गया है। पंडित का चरित्र उन तथाकथित धर्माचार्यों का प्रतीक है, जो धर्म को स्वार्थ सिद्धि का साधन बना लेते हैं।


इसी प्रकार 'मंदिर और मस्जिद' कहानी में सांप्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता पर जबर्दस्त व्यंग्य है। दरवेश का कथन कि "मंदिर और मस्जिद तो ईंधन-पत्थर के ढेर हैं, असली ईश्वर तो तुम्हारे हृदय में बसता है" धर्म की वास्तविक भावना को उजागर करता है।


नौकरशाही और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर व्यंग्य ..


प्रेमचंद के साहित्य में तत्कालीन ब्रिटिश शासन और नौकरशाही तंत्र पर भी जमकर व्यंग्य किया गया है। उनकी रचनाओं में अधिकारियों के ढुलमुल व्यवहार, रिश्वतखोरी और जनता के प्रति उदासीनता का मार्मिक चित्रण मिलता है।


'नमक का दरोगा' कहानी हिंदी साहित्य में नौकरशाही पर व्यंग्य की क्लासिक कहानी मानी जाती है। इस कहानी का नायक वंशीधर एक ईमानदार नमक इंपेक्टर है, जो रिश्वत लेने से इनकार कर देता है। कहानी का अंत इस व्यंग्य के साथ होता है कि पूँजीपति वर्ग अंततः ईमानदारी का उपयोग अपने हितों की रक्षा के लिए ही करता है। यह सब आज भी प्रासंगिक लगता है।


प्रेमचंद की 'ओझा' कहानी में न्यायिक व्यवस्था पर जबर्दस्त व्यंग्य कटाक्ष है। इस कहानी में वकीलों को "ओझा" कहकर संबोधित किया गया है, जो उनके समकाल का अंधविश्वास और ढोंग से जुड़ा शब्द है। प्रेमचंद लिखते हैं "ये ओझा लोग न्याय की देवी के पुजारी हैं, इनकी पूजा-अर्चना किए बिना न्याय की देवी प्रसन्न नहीं होती।"


आर्थिक शोषण और सामंतवाद पर व्यंग्य ..


प्रेमचंद के साहित्य में आर्थिक विषमता और सामंतवादी शोषण पर गहरा व्यंग्य पठनीय है। उनके उपन्यास 'गोदान', 'रंगभूमि' और 'प्रेमाश्रम' में किसान जीवन की त्रासदी और पूँजीवादी शोषण का मार्मिक चित्रण है।


'गोदान' प्रेमचंद का सर्वाधिक चर्चित उपन्यास है, जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक संबंधों का यथार्थ चित्रण है। इस उपन्यास का नायक होरी एक गरीब किसान है, जो अपने छोटे से खेत में जीवनयापन करता है, किन्तु कर्ज़ और लगान के बोझ तले दबकर अंततः उसकी मृत्यु हो जाती है।


इसी तरह 'पूस की रात' कहानी में किसान जीवन की विवशता और शोषण पर मार्मिक व्यंग्य है। कहानी का नायक हाल्कू एक गरीब किसान है, जिसके पास रात में ओढ़ने के लिए कंबल नहीं है। इस कहानी में हल्कू का कुत्ता कर्मरत और भोला प्राणी है, जिसके अपने मालिक के साथ सहयोग और वफादारी का संबंध प्रस्तुत किया गया है। यह चित्रण मानवीय संबंधों की कटुता और सामंती व्यवस्था की क्रूरता पर गहरा व्यंग्य है।


स्त्री-पुरुष असमानता और पितृसत्ता पर व्यंग्य...


प्रेमचंद के साहित्य में तब की स्त्री जीवन की व्यथा और पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर तीक्ष्ण व्यंग्य मिलता है। उन्होंने दहेज प्रथा, विधवा विवाह निषेध, स्त्री शिक्षा का अभाव, बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों पर कटाक्ष किया है।


'निर्मला' उपन्यास में दहेज प्रथा और अनमेल विवाह पर करारा व्यंग्य है। निर्मला एक सुशिक्षित और सुंदर युवती है, जिसका विवाह एक वृद्ध विधुर के साथ कर दिया जाता है। इस अनमेल विवाह के कारण निर्मला का जीवन नर्क बन जाता है और अंततः वह आत्महत्या कर लेती है।


'बड़े घर की बेटी' कहानी में प्रेमचंद ने स्त्री शिक्षा और नारी स्वतंत्रता पर बल दिया है। कहानी की नायिका बेनी एक उच्च कुल की लड़की है, जो शिक्षित और स्वतंत्रचेता है। इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद ने उन उच्च कुलीन परिवारों पर व्यंग्य किया है, जो दिखावटी शिष्टता और रूढ़िवादिता में जकड़े हुए हैं।


प्रेमचंद के व्यंग्य की साहित्यिक विशेषताएँ...


प्रेमचंद के व्यंग्य की कुछ विशिष्ट साहित्यिक विशेषताएँ हैं, जो उनके साहित्य को विशिष्ट और प्रभावशाली बनाती हैं...


चरित्र चित्रण की यथार्थपरकता..


प्रेमचंद के व्यंग्य की पहली विशेषता है चरित्र चित्रण की यथार्थपरकता है। उनके व्यंग्य प्रयोग में लालित्य है। वे व्यंग्य को मूल कहानी के अभिव्यति के एक उपकरण के रूप में उपयोग करते हैं। उन्होंने आजकल प्रचलित स्वतंत्र व्यंग्य लेख की तरह नहीं लिखा । उनके कथा पात्र जीवंत और सहज हैं, जो अपने व्यवहार और वाणी के माध्यम से स्वयं ही व्यंग्य प्रस्तुत कर देते हैं। उदाहरण के लिए, 'शतरंज के खिलाड़ी' कहानी में मिर्ज़ा सज्जाद अली और मीर रौशन अली का चरित्र नवाबी शानोशौकत और आलस्य का प्रतीक है।


भाषा शैली की सहजता और प्रवाह ..


प्रेमचंद के व्यंग्य की दूसरी विशेषता है भाषा शैली की सहजता और प्रवाह। उनकी भाषा सरल, बोधगम्य और जनसामान्य की भाषा है, जिसमें मुहावरों और लोकोक्तियों का सुंदर प्रयोग है। उदाहरण के लिए, 'कफन' कहानी में घीसू और माधव का चित्रण गरीबी और अकर्मण्यता का प्रतीक है।


हास्य और व्यंग्य का सन्तुलन...


प्रेमचंद के व्यंग्य की तीसरी विशेषता है हास्य और व्यंग्य का सन्तुलन। उनके व्यंग्य में कटुता नहीं है, बल्कि विनोदी स्वर में गंभीर बात कही गई है। उदाहरण के लिए, 'बूढ़ी काकी' कहानी में बूढ़ी विधवा की उपेक्षा और अनादर का चित्रण है।


नैतिकता और मानवीय मूल्यों का समर्थन..


प्रेमचंद के व्यंग्य की चौथी विशेषता है नैतिकता और मानवीय मूल्यों का समर्थन। उनका व्यंग्य नकारात्मक आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि सकारात्मक मूल्यों की स्थापना की ओर उन्मुख है। उदाहरण के लिए, 'ईदगाह' कहानी में हामिद का चरित्र मानवीय संबंधों की महत्ता को उजागर करता है। यह कारुणिक कहानी है।


प्रेमचंद के व्यंग्य की सार्वकालिक प्रासंगिकता..


मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में निहित व्यंग्य एक सशक्त सामाजिक हस्तक्षेप है, जो रूढ़िवादिता, अन्याय और शोषण के विरुद्ध खड़ा होता है। उनका व्यंग्य नैतिक चेतना और सामाजिक दायित्व से अनुप्राणित है, जिसका उद्देश्य मनुष्य के आंतरिक परिवर्तन के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देना है।


प्रेमचंद का साहित्यिक दृष्टिकोण सर्वहारा वर्ग के प्रति सहानुभूति और शोषक वर्ग के प्रति विरोध से परिभाषित होता है। उन्होंने गरीबों, किसानों, मजदूरों और स्त्रियों की व्यथा को अपने साहित्य का विषय बनाया और उनके अधिकारों और गरिमा के लिए आवाज उठाई।


प्रेमचंद की साहित्यिक विरासत आज भी प्रगतिशील जनवादी साहित्य के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई है। आज के भौतिकवादी युग में, जब नैतिक मूल्य और मानवीय संबंध तेजी से क्षरित हो रहे हैं, प्रेमचंद का साहित्य हमें आत्ममंथन और सामाजिक सुधार की प्रेरणा देता है। प्रेमचंद के शब्दों में "साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का मार्गदर्शन करना है।" और उनका व्यंग्य इस उद्देश्य की पूर्ति का एक सशक्त माध्यम है। वर्तमान व्यंग्यकार प्रेमचंद के लेखन में व्यंग्य प्रयोग के अध्ययन से बहुत कुछ सीख सकते हैं। 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

इन दिनों दुबई में

सानू की

 व्यंग्य 


सानू की — सभ्यता का नया राग


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


सानू की , मतलब मुझे क्या , आग लगे बस्ती में मस्त रहो मस्ती में। 


 जमाना अब किसी भी गंभीर चीज से नहीं, बस आरामदेह अनासक्ति से चलता है। पहले लोग सच को आवाज़ देते थे, जमाने की चिंता में मरा जाता था, अब कहते हैं “सानू की”। यह एक वाक्य नहीं, यह आज के मनुष्य की आत्मा का नया घोषणापत्र है। युद्ध हो, महामारी हो, या किसी देश का मलबा ही क्यों न बन जाए ,  जब तक हमारी सेल्फी ठीक आ रही है, तब तक दुनिया सुरक्षित है।  

कहीं कोई देश धधक रहा है, बच्चे शरणार्थी शिविरों में भूख से तड़प रहे हैं, महिलाएँ सुरक्षा की कगार पर भी असुरक्षित हैं ,  मगर हमारे लिए यह सब बस “ग्लोबल न्यूज़” है। हम थोड़ी देर हेडलाइन देखेंगे, फिर रिमोट फेक देंगे, क्योंकि इस हालत से “सानू की”! हमारे फ्रिज में कोल्ड ड्रिंक है, नेटफ्लिक्स पर नया शो है, और ट्वीट्स पोस्ट करने के लिए फ्री वाई-फाई है।   राजनीति की दुनिया में नेता भाषणों से झाग उड़ा रहे हैं, संसद में आवाज़ें उठती हैं और जल्द ही मोबाइल की रीलों में घुल जाती हैं। जनता के हिस्से में जो रह जाता है, वह है “सानू की” की मानसिक शांति। अब किसी का खून सस्ता है, किसी का झूठ अमूल्य, और किसी की संवेदना ‘डाटा लिमिट’ से बंधी हुई। विपक्ष हो या सत्ताधारी ,  दोनों के बीच एक अद्भुत एकता है कि जनता को उदासीन बनाकर रखा जाए। और जनता ने भी यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई है । सड़क पर बड़े से बड़ा हादसा हो जाए , उसे अनदेखा कर निकल लेना जमाने की रफ्तार में मज़बूरी है,“सानू की” ।समाज की हालत ऐसी हो गई है कि हर अन्याय, हर अपराध पर उतनी ही प्रतिक्रिया होती है जितनी एक विज्ञापन पर  थोड़ी देर में “स्किप ऐड”।   स्त्रियों के प्रति हिंसा बढ़ती है, तो कहा जाता है — “क्या कर सकते हैं, अगले ही क्षण सानू की!” ब्रेन रिसेट कर देता है ।दलितों के साथ अत्याचार होता है, तो कहा जाता है , “कहीं न कहीं तो होता ही रहेगा।” पिछड़ों के हक पर राजनीति की बोली बाज़ार में बिकी जा रही है, और हर दर्शक सोचता है, “अरे भाई, सानू की, मैं तो सभ्य नागरिक हूँ।”  

अब यह “सभ्यता” किसी संवेदना से नहीं, बल्कि सुविधा से मापी जाती है। किसी ने कहा था, “मनुष्य सामाजिक प्राणी है।” पर आज वह “सोशल मीडिया प्राणी” बन गया है। वह दूसरों की तकलीफ़ पर ‘लाइक’ कर साथ  देता है, सैडी इमोशन ढूंढता है मोमबत्ती जलाने से पहले सेल्फी लेता है, और किसी शहीद की ख़बर पर कमेंट लिखता है — “Respect!”, क्योंकि यही डिजिटल युग का नया शोकगीत है  छोटा, चुस्त, और भावनाशून्य। साहित्य भी अब इस गहरी नींद में सोया हुआ है। पहले लेखक समाज की नब्ज़ पकड़ता था, अब इंटरनेट की भाषा पकड़ता है। जो लिखेगा वही छपेगा, जो छपेगा वही बिकेगा  और जो बिकेगा, वही पुरस्कार पाएगा। जो न बिके, वह “सनातन काल का महान लेखक” घोषित कर दिया जाएगा पर मरने के बाद।  

ए आई की इबारत में लोगों के लिखने की शैली गुम हो गई है। पर एक्सप्रेशन में सुविधा कहती है, सानू की। 

 साहित्यिक सभाओं में अब शब्द नहीं, ‘नेटवर्किंग’ है। पुरस्कार अब प्रतिभा नहीं, सेटिंग से तय होते हैं। जो सही लिखे वह किनारे, जो सही लोगों को सलाम करे वो सितारे। चोरी भी अब सम्मान है ,बस उसे “इंटरटेक्स्चुअल इंफ्लुएंस” कह दीजिए। अगर किसी ने सवाल कर दिया तो तैयार रखिए जवाब, “सानू की?”  

 मीडिया पहले चौथा स्तंभ था, अब चौथी दीवार बन गया है , जिसके उस पार सच्चाई नहीं दिखती, बस प्रायोजित रोशनी झिलमिलाती है। बहसें मंचित नाटक बन गई हैं जहाँ हर किरदार अपनी चीख के लिए टाइम स्लॉट तय करता है। बीच में कोई दर्शक चैनल बदल देता है , “सानू की, सब तो एक जैसे हैं।” यही है इस शो के निर्देशक का सपना, दर्शक का जीवित रहना, मगर जागृत न रहना।  

देखिए, इस व्यंग्य के बीच भी हम कभी यह नहीं कहते कि कुछ बदलिए। नहीं, क्योंकि यह ‘सानू की’ का युग है , आत्मकेंद्रित, आत्ममुग्ध, आत्मनिष्ठ। आदमी अब ब्रह्मांड का केंद्र नहीं, वह अपने मोबाइल स्क्रीन का केंद्र है। उसके लिए न्याय, अन्याय, क्रांति, करुणा , सब लॉक स्क्रीन के नोटिफिकेशन हैं जिन्हें स्वाइप करके हटाया जा सकता है।   मनुष्य अब दो रूपों में बंट गया है , एक “ऑनलाइन” आदमी, जो सब कुछ जानता है, और एक “ऑफ़लाइन” आदमी, जो किसी चीज़ से मतलब नहीं रखता। जब दुनिया जल रही होती है, तब भी वह अपने डिजिटल ब्रह्मांड में किसी मीम पर हँस रहा होता है, क्योंकि हँसी ने अब संवेदना को विस्थापित कर दिया है।  

  यह विसंगति किसी एक देश या समाज की नहीं। यह वैश्विक महामारी है , युद्ध से त्रस्त देश हों या अमन के खांचे में सजे लोकतंत्र, हर जगह मनुष्य की प्राथमिकता बदल चुकी है। पहले कहा जाता था “वसुधैव कुटुम्बकम्।” अब नया सिद्धांत है — “Where is my comfort zone, bro?” यानी — सानू की!  

 पश्चिम में हथियारों की नीलामी से लेकर पूरब में भूख की चिताओं तक, हर जगह वही दृश्य है , नेता युद्ध का समर्थन करता है, उद्योगपति सौदा करते हैं, मल्टीनेशनल ए आई के चलते बाजू की डेस्क वाले को नौकरी से हटा देता है और आम आदमी सोचता है, “सानू की, मेरी नौकरी तो बची है।” यही वह मौन सहमति है जो आतंक से भी बड़ी है , यह वह स्वीकृति है जो अत्याचार को जीवनशैली में बदल देती है।  

 आदमी अब अपने भीतर भी नहीं झाँकता। विवेक, करुणा, सवाल , ये सब पुराने ऐप्स की तरह अनइंस्टॉल कर दिए गए हैं। जो बचा है, वह है “मैं”। यह “मैं” अब किसी तत्वमीमांसा का प्रतीक नहीं, बल्कि एक बहुराष्ट्रीय उत्पाद है , जिसका साउंड ब्रांड है “सानू की”।  

सभ्यता के इस मोड़ पर इतिहास शायद दुबारा अपने पन्ने पलटेगा और देखेगा कि जिस युग को मानव प्रगति का शिखर कहा गया था, वही सबसे संवेदनहीन निकला। हम अंतरिक्ष में जीवन खोजने निकले थे, मगर अपने पड़ोसी की परेशानी नहीं देख पाए। हमने कृत्रिम बुद्धि (AI) बना ली, मगर प्राकृतिक इंसान खो दिया।  शायद भविष्य का कोई पुरातत्ववेत्ता इस युग की खुदाई में हमारे फोन, हमारी रीलें, हमारे 'सानू की' वाले मीम पाएगा और इतिहास में यह युग दर्ज होगा कि “मानव सभ्यता का उदासीन काल”। और तब किसी पुरानी पथरीली लिपि में लिखा मिलेगा, “जब सब कुछ जल रहा था, तब वे हँस रहे थे  और कह रहे थे, सानू की।”  


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Wednesday, February 11, 2026

बारी बरसी खटन गया सी...

 व्यंग्य 

बारी बरसी खटन गया सी...

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


बारी बरसी खटन गया सी...ये गीत पंजाब के उस मेहनतकश का लोक गीत है, जो बारह साल परदेस में कमाकर लौटा है। हर बार उसकी झोली में कुछ नया गिफ्ट होता है , कभी लोई, कभी सितारा, कभी गहना, कभी चूल्हा-ताला।  ढोल बजता है। भांगड़ा चलता है। और सारा गांव, साले-बिरादरी नाच उठते हैं। क्योंकि मेहनत रंग लाई है। कुछ हाथ लगा है।


अब इसी गीत की रस्म को कांग्रेस पार्टी ने राजनीति का नया मनोरंजक कायदा बना लिया है।


फर्क सिर्फ इतना है कि वहां बारह साल बाद सच में कुछ लेकर , लौटा था। ये लोग रोज़ सुबह उठते हैं, खाली हाथ में थाल सजाते हैं, ऊपर से झूठे सबूत की चटनी परोसते हैं, और ढोल बजवा देते हैं"और अब डांस करेंगे सारे के सारे!"


बारी बरसी खटन गया सी।

हर चुनाव, हर प्रेस कॉन्फ्रेंस, हर बजट सत्र,  यही क्रम है।

हाथ में कुछ ठोस नहीं, मगर उल्लास ऐसा मानो पूरी दिल्ली जीत ली हो।


राफेल डील, आई, देखी, डांस हुआ। सुप्रीम कोर्ट बैठा, CBI बैठी, ED बैठी, सबने कहा, कुछ नहीं। मगर इनकी थिरकन अभी थमी नहीं। अब राफेल आसमान में उड़ते हैं, और ये ज़मीन पर वही स्टेप्स दोहराते हैं। असल ज़िंदगी में रीप्ले नहीं मिलता, पर यहाँ तो हर साल रीमिक्स है।


चौकीदार चोर है, क्या पंचलाइन थी! इतनी जोरदार कि पार्टी कार्यकर्ता झूम उठे। मगर सबूत? वो तो बाद में देखेंगे, पहले डांस। अब सात साल हो गए। अदालत ने कहा, सबूत नहीं मिला। जाँच एजेंसी ने कहा सबूत नहीं मिला। पर ये कहते हैं "हमें तो अब भी यकीन है।"

यकीन है। 


ईवीएम और वोट चोरी , चुनाव हारो, तुरंत मशीन पर ठुमका लगाओ । कभी बैटरी बदली, कभी हैकिंग, कभी हनुमान चालीसा। मगर जब पूछो कि पंजाब, तेलंगाना, हिमाचल में तुम जीते कैसे? तब मशीन ठीक थी या उसमें भी भगवान का चमत्कार? सवाल सुनते ही डांस और तेज़। क्योंकि यह सवालों के जवाब का नहीं, जश्न का मौका है।


संविधान की प्रति, लाल किताब हाथ में, आँखों में नमी, होंठों पर गांधी, मन में नेहरू, और जेब में... खैर। संविधान बचाओ, लोकतंत्र बचाओ, देश बचाओ। तीनों थाली में सजे, वही ठुमके। पर संविधान पढ़ने का वक्त कहाँ? जब तक अनुच्छेद पढ़ोगे, तब तक कोई और डांस शुरू हो जाएगा।


नरवडे जी की अप्रकाशित पुस्तक, ये तो कमाल है।

अप्रकाशित। यानी अभी छपी नहीं। किसी ने पढ़ी नहीं। उसमें है क्या, पता नहीं। मगर प्रेस कॉन्फ्रेंस हो चुकी, आरोप लग चुके, डांस शुरू हो चुका। फेक कापी हवा में लहरा कर डांस किया जा चुका । साहित्य जगत में किताब छपने पर चर्चा होती है, यहाँ किताब छपने से पहले ही चर्चा, आरोप, और भांगड़ा , सब एक साथ।


अमेरिका से डील, अब ये तो सबसे ताज़ा एंट्री है। डील में हुआ क्या, पता नहीं। किसने की, कैसे की, कितने में की , बारीक अध्ययन, , विवेचन, जानकारी शून्य है। मगर आरोप हवा में हैं, अडानी और अंबानी को उछाल कर, हवा हवाई डांस चल रहा है। इतनी ऊर्जा है,  कि पावर  परचेज के टाई-अप करना चाहिए। 


अब सवाल यह नहीं कि इन मुद्दों में दम है या नहीं।

सवाल यह है कि जब हर बार थाल खाली निकलती है, तो फिर भी ढोल क्यों बजता है?

भेड़िया आया भेड़िया आया, आखि़र कब तक?

लकड़ी की हांडी कितनी बार चढ सकती है?

क्योंकि अब आरोप  कोई बहस नहीं, रस्म बन गए है।और रस्में सबूतों की मोहताज नहीं होतीं।


राफेल झूठा, चौकीदार सच्चा, फिर भी नारा वही।

ईवीएम सही, वोट सुरक्षित, फिर भी चीख वही।

किताब अप्रकाशित, आरोप प्रकाशित, फिर भी थिरकन वही।


बारी बरसी खटन गया सी।

हर बार खाली हाथ,पर  हर बार पूरा उल्लास।


सारी दुनिया देख लई, माँ तेरे जेहा न कोई।


विवेक रंजन श्रीवास्तव