Tuesday, July 25, 2017

#व्यंग
नैनो में बदरा ,  नदियो में बाढ़

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र

    जहाँ पानी में जीवन सृजित करने की क्षमता होती है वहीं यह विनाशकारी भी होता है . पानी मतलब जीवन की संभावना , इसीलिये दूसरे गृहो में भी वैज्ञानिक सबसे पहले पानी की ही तलाश करते दीखते हैं .  प्रायः धर्मो में पानी  का प्रतीकात्मक महत्व  है . पौराणिक आख्यानो में  ॠषि मुनियो को अंजुरी भर पानी छींटकर बड़े बड़े श्राप या वरदान देने वाले वृतांत आपने जरूर पढ़े या सुने होंगे . सृष्टि का प्रारंभ ही अपार , अथाह जलराशि की परिकल्पना है . ब्रम्हाण्ड की संरचना और जीवन का आधार भूत तत्व पानी ही है . यही नहीं सृजन के विपरीत सृष्टि के महाविनाश की कल्पना भी महासागरीय जल प्लावन ही है . दुनिया की सारी सभ्यतायें नदियो के तटो पर ही विकसित हुईं हैं .
        दुनिया में बढ़ती आबादी को जीवनोपयोगी पानी की समुचित आपूर्ति भविष्य की एक बड़ी वैश्विक चुनौती है . तीसरे विश्व युद्ध की परिकल्पनाओ में यह भी कहा जाता  है कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिये ही लड़ा जायेगा . जब से मैने यह पढ़ा है ,  मै जब जब अपने यहां  तटबंध तोड़ती नदियो से आई बाढ़ के पानी की विभीषिका  देखता हूं ,पानी के लिये होते तीसरे विश्व युद्ध की कल्पना कर स्वयं को सांत्वना दे लेता हूं .मुझे अपने देश के बाढ़ पीड़ित रामू ,कालू वगैरह  सफेद चोले में सर से पैर तक ढ़के मुंदे ,तेल के कुंओ पर इतराते आज के अरब शेखों से दिखने लगते है .कल्पना कीजीये  हमारी सरकार के एक इशारे पर पानी से भरे विशाल गुब्बारो का रुख अमेरिका की ओर से वापस कही और मोड़ा जा सकता है , इसलिये अमेरिकन राष्ट्रपति हमारे प्रधानमंत्री से जब तब मिलने लालायित रहे ,  पाकिस्तान अपने आतंकवादियो को कुछ क्युसेक पानी के बदले काश्मीर से वापस बुलाने की पेशकश करता दिखे ,  या चीन हूं हां हाउं करते हुये डोकलांग पर केवल इसलिये कब्जा जमाना चाहता हो कि उसे ब्रम्हपुत्र की बाढ़ का पानी मिल जाये और हम बड़ी उदारता से बीजिंग तक वाटर लाइन डालने का प्रस्ताव रख सकते हों .  सोचिये कि वैज्ञानिक अनुसंधान इस दिशा में  केंद्रित करने पड़ें कि कैसे निश्चित क्षेत्र में बारम्बार बादलो के फटने और अति वर्षा की प्राकृतिक परिस्थितियां पैदा की जायें . भीषण वर्षा से देश का आर्थिक बजट ही सुधर जाये . वर्षा जल के बहाव के सारे मार्ग धरती के भीतर बने  विशालकाय पानी संग्रहण टेंको की ओर मोड़ दिये जाने की बड़ी बड़ी परियोजनायें चल रही हों  , विश्व की बड़ी आबादी पीने के पानी के लिये हमारे देश पर ही निर्भर हो  तो बताईये ऐसी वैस्विक परिस्थितियो में बाढ़ भी भला क्या बुरी है .
        पर फिलहाल  तो बाढ़ विभीषिका है , ताण्डवकारी है . बाढ़ से से बचने के लिये नदियो को जोड़ने की परियोजनाओ पर काम होना बाकी है . पर्यावरणीय असंतुलन से कही सूखा तो कही अति वर्षा हो रही है . वैज्ञानिक तकनीकी समाधानो के लिये  अनुसंधान कर रहे हैं . विशेषज्ञ बताते हैं कि जल आपदा से बचने हेतु हमें जल उपयोग के अपने आचरण बदलने चाहिये , जल उपयोग में मितव्ययता बरतनी चाहिये . किन्तु वास्तव में हम किस दिशा की ओर अग्रसर हैं ? बोतल बंद पानी बिक रहा है और लोगो की आंखो का पानी मर रहा है , और नदियो की बाढ़ विभिषिक है .    
    "सावन आया झूम के" ... नैनो में बदरा छाये बिजली सी चमके हाय " ..... "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम " ... फिल्मी सैट्स की आर्टिफीशियल बारिश में भले ही इंद्रधनुष की आभा में हीरो ,हीरोइन सफेद गीले वस्त्रो में विलेन के नफरत के सैलाब को पार कर जाते हों पर अति वर्षा से पीड़ित किसानो  की आंखों के खून के आंसू कोई पानी नही धो सकता .किसानो की मेहनत पर पानी फेरने वाली बाढ़ ऐसी प्राकृतिक आपदा है जिसे रोकने के हर संभव उपाय जरूरी हैं ,महज हास्य या व्यंग में बाढ़ को हल्के में अखबार की दिन भर की जिंदगी सा उड़ाया नही जा सकता , बल्कि व्यंग से भी यही संदेश जरूरी है कि हर साल देश की अरबो की संपत्ति का विनाश , बार बार बाढ़ आपदा पर राहत में करोड़ो का आकस्मिक व्यय , विकास हेतु होती बरसो की मेहनत पर पानी फिरने से देश को बचाना है तो बाढ़ नियंत्रण के सर्वागीण प्रयास अनिवार्य हैं .

Tuesday, July 18, 2017

भारत मे चीन


व्यंग
भारत में चीन

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
vivekranjan.vinamra@gmail.com
बंगला नम्बर ऐ १ , विद्युत मंडल कालोनी , शिला कुन्ज , जबलपुर ४८२००८
०९४२५८०६२५२ , ७०००३७५७९८

        मेरा अनुमान है कि इन दिनो चीन के कारखानो में तरह तरह के सुंदर स्टिकर और बैनर बन बन रहे होंगे  जिन पर लिखा होगा " स्वदेशी माल खरीदें " , या फिर लिखा हो सकता है    " चीनी माल का बहिष्कार करें " . ये सारे बैनर हमारे ही व्यापारी चीन से थोक में बहुत सस्ते में खरीद कर हमारे बाजारो के जरिये हम देश भक्ति का राग अलापने वालो को जल्दी ही बेचेंगे . हमारे नेताओ और अधिकारियो की टेबलो पर चीन में बने भारतीय झंडे के साथ ही बाजू में एक सुंदर सी कलाकृति होगी जिस पर लिखा होगा "आई लव माई नेशन" ,  उस कलाकृति के नीचे छोटे अक्षरो में लिखा होगा मेड इन चाइना . आजकल भारत सहित विश्व के किसी भी देश में जब चुनाव होते हैं तो  वहां की पार्टियो की जरूरत के अनुसार वहां का बाजार चीन में बनी चुनाव सामग्री से पट जाता है .दुनिया के किसी भी देश का कोई त्यौहार हो उसकी जरूरतो के मुताबिक सामग्री बना कर समय से पहले वहां के बाजारो में पहुंचा देने की कला में चीनी व्यापारी निपुण हैं . वर्ष के प्रायः दिनो को भावनात्मक रूप से किसी विशेषता से जोड़ कर उसके बाजारीकरण में भी चीन का बड़ा योगदान है . 
        चीन में वैश्विक बाजार की जरूरतो को समझने का अदभुत गुण है . वहां मशीनी श्रम का मूल्य नगण्य है .उद्योगो के लिये पर्याप्त बिजली है . उनकी सरकार आविष्कार के लिये अन्वेषण पर बेतहाशा खर्च कर रही है . वहां ब्रेन ड्रेन नही है . इसका कारण है वे चीनी भाषा में ही रिसर्च कर रहे हैं . वहां वैश्विक स्तर के अनुसंधान संस्थान हैं . उनके पास वैश्विक स्तर का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले अपने होनहार युवको को देने के लिये उस स्तर के रोजगार भी हैं . इसके विपरीत भारत में देश से युवा वैज्ञानिको का विदेश पलायन एक बड़ी समस्या है . इजराइल जैसे छोटे देश में स्वयं के इनोवेशन हो रहे हैं किन्तु हमारे देश में हम बरसो से ब्रेन ड्रेन की समस्या से ही जूझ रहे हैं .  देश में आज  छोटे छोटे क्षेत्रो में मौलिक खोज को बढ़ावा  दिया जाना जरूरी है . वैश्विक स्तर की शिक्षा प्राप्त करके भी युवाओ को देश लौटाना बेहद जरूरी है . इसके लिये देश में ही उन्हें विश्वस्तरीय सुविधायें व रिसर्च का वातावरण दिया जाना आवश्यक है . और उससे भी पहले दुनिया की नामी युनिवर्सिटीज में कोर्स पूरा करने के लिये आर्थिक मदद भी जरूरी है . वर्तमान में ज्यादातर युवा बैंको से लोन लेकर विदेशो में उच्च शिक्षा हेतु जा रहे हैं , उस कर्ज को वापस करने के लिये मजबूरी में ही उन्हें उच्च वेतन पर विदेशी कंपनियो में ही नौकरी करनी पड़ती है , फिर वे वही रच बस जाते हैं . जरूरी है कि इस दिशा में चिंतन मनन , और  निर्णय तुरन्त लिए जावें , तभी हमारे देश से ब्रेन ड्रेन रुक सकता है .
        निश्चित ही विकास हमारी मंजिल है . इसके लिये  लंबे समय से हमारा देश  "वसुधैव कुटुम्बकम" के सैद्धांतिक मार्ग पर , अहिंसा और शांति पर सवार धीरे धीरे चल रहा था .  अब नेतृत्व बदला है , सैद्धांतिक टारगेट भी शनैः शनैः बदल रहा है . अब  "अहम ब्रम्हास्मि" का उद्घोष सुनाई पड़ रहा है . देश के भीतर और दुनिया में भारत के इस चेंज आफ ट्रैक से खलबली है . आतंक के बमों के जबाब में अब अमन के फूल  नही दिये जा रहे . भारत के भीतर भी मजहबी किताबो की सही व्याख्या पढ़ाई जा रही है . बहुसंख्यक जो  बेचारा सा बनता जा रहा था और उससे वसूल टैक्स से जो वोट बैंक और तुष्टीकरण की राजनीति चल रही थी , उसमें बदलाव हो रहा है . ट्रांजीशन का दौर है .
        इंटरनेट का ग्लोबल जमाना है . देशो की  वैश्विक संधियो के चलते  ग्लोबल बाजार  पर सरकार का नियंत्रण बचा नही है . ऐसे समय में जब हमारे घरो में विदेशी बहुयें आ रही हैं , संस्कृतियो का सम्मिलन हो रहा है . अपनी अस्मिता की रक्षा आवश्यक है . तो भले ही चीनी मोबाईल पर बातें करें किन्तु कहें यही कि आई लव माई इंडिया . क्योकि जब मैं अपने चारो ओर नजरे दौड़ाता हूं तो भले ही मुझे ढ़ेर सी मेड इन चाइना वस्तुयें दिखती हैं , पर जैसे ही मैं इससे थोड़ा सा शर्मसार होते हुये अपने दिल में झांकता हूं तो पाता हूं कि सारे इफ्स एण्ड बट्स के बाद " फिर भी दिल है हिंदुस्तानी " . तो चिंता न कीजीये बिसारिये ना राम नाम , एक दिन हम भारत में ही चीन बना लेंगें हम विश्व गुरू जो ठहरे . और जब वह समय आयेगा  तब मेड इन इंडिया की सारी चीजें दुनियां के हर देश में नजर आयेंगी चीन में भी , जमाना ग्लोबल जो है . तब तक चीनी मीट्टी से बने , मेड इन चाइना गणेश भगवान की मूर्ति के सम्मुख बिजली की चीनी झालर जलाकर नत मस्तक मूषक की तरह प्रार्थना कीजीये कि हे प्रभु ! सरकार को , अल्पसंख्यको को , गोरक्षको को , आतंकवादियो को ,काश्मीरीयो को ,  पाकिस्तानियो को , चीनियो को सबको सद्बुद्धि दो .
       
       
         
vivek ranjan shrivastava

Friday, July 7, 2017

बरसात और ब्रेकिंग न्यूज

व्यंग
बरसात और ब्रेकिंग न्यूज
विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
vivekranjan.vinamra@gmail.com


       टी वी समाचार जगत को उस अज्ञात महान पत्रकार का सदैव आभारी होना चाहिये जिसने  "ब्रेकिंग न्यूज" जैसी महत्वपूर्ण शब्दावली का सर्वप्रथम प्रयोग किया .  चैनल कोई भी हो दस पांच मिनट में ब्रेकिंग न्यूज दिखाये बिना मानता ही नहीं . दूरदर्शन जैसा धीर गंभीर चैनल भी जो कभी " एक आवश्यक उद्घोषणा " के लिये तैयार रहने की हिदायत दिया करता था अब ब्रेकिंग न्यूज दिखाने लगा है . सच्ची ब्रेकिंग न्यूज सालो में कभी कभार ही ब्रेक हो सकती है . ब्रेकिंग न्यूज का मतलब होता है अनायास घटी घटना की सूचना .  जैसे ओसामाबिन लादेन ने ट्विन टावर तोड़े थे या अमेरिका ने लादेन को पाकिस्तान में घुसकर मार डाला था . भला हो मोदी जी का जिन्होने नोट बंदी की घोषणा करके वास्तव में ब्रेकिंग न्यूज बनाई थी . उस रात उन्होने न्यूज ही नही कईयो का बहुत कुछ ब्रेक कर दिया था . पर समाचार चैनलो की पारस्परिक प्रतिस्पर्धा ने ब्रेकिंग न्यूज जैसे सनसनी खेज मसले को भी इस हद तक डायलूट कर दिया है कि कल बरसात के मौसम में भी बम्बई में बारिश ब्रेकिंग न्यूज के रूप में दिखाई जा रही थी . और तो और मौसम वैज्ञानिक से चर्चा के अगले प्रसारण की सूचना भी ब्रेकिंग न्यूज की लाल रंग की पट्टी के साथ  रनिंग डिस्प्ले  में चलाई जा रही थी .
        तमाम सेटेलाइट से प्राप्त सूचनाओ के कंप्यूटराइज्ड विश्लेषण के बाद भी मौसम विभाग का गणित भगवान इंद्र के गणित से ज्यादा तेज नही हो पाया है , इसलिये मई के महीने से शुरू ब्रेकिंग न्यूज कि मानसून समय पर आयेगा , औसत से ज्यादा बारिश होगी , वगैरह बिना सच हुये ही ब्रेक हो जाते हैं .कृषि प्रधान भारत में कहीं किसान मेंढ़क मेंढ़की  की शादी रचाते हैं , कहीं निर्वस्त्र महिला हल लेकर गांव की परिक्रमा करती है , चाय की गुमटियो पर कम वर्षा के लिये मुखिया मंत्री जी के आचरण पर चर्चाये होती हैं , क्योकि प्रजा का मानना है कि राजा के व्यवहार का प्रभाव जनता पर पड़ता है . गनीमत है कि मंत्री जी  अपने भाषणो में वर्षा की कमी या बाढ़ के लिये वनो के संरक्षण , पर्यावरण , पेड लगाने पर ही बोलते हैं विपक्ष पर दोषारोपण नही करते . मंत्री जी के भाषण ब्रेकिंग न्यूज बनते हैं . बरसात हो न हो , हर बार वर्षा ॠतु में वृक्षारोपण समारोह होते हैं . माननीय जन प्रतिनिधियो और  बड़े अधिकारियो की  पौधा लगाते हुये अधिकार पूर्वक फोटो खिंचती है .पौधे बचें न बचें ये और बात है , पर इस बहाने नई पीढ़ी को हरियाली का महत्व समझने का पूरा मौका मिलता है . बाय प्राडक्ट के रूप में ब्रेकिंग न्यूज बनती है सो अलग .
        एक और बात मेरी समझ से परे है , सुबह उठते ही जब मैं टी वी चलाता हूं , कोई भी चैनल लगा लूं हर चैनल में लगभग समान समय में पहले भक्ति , फिर व्यायाम और फिर भविष्यफल दिखाया जाता है . यहां तक कि विज्ञापनो के ब्रेक का भी वही समय होता है , चैनल बदलने का कोई लाभ नही होता . केवल चेहरे अलग होते हैं , आधारभूत सामग्री वही होती है . हर चैनल  युवा एंकर लडकियो और अपने अपने विशेषज्ञो के साथ लगातार बार बार लगभग एक सा ब्रेकिंग न्यूज दिखा रहा होता है . जिसे मिनट दो मिनट आगे या पीछे एक्सक्लुजिव कवरेज क्लेम करता है .
दोपहर जब मैं लंच पर घर आता हूं तो मन करता है कि किसी चैनल पर कोई नया ताजा समाचार मिल जाये पर मजाल है कि मैं रिमोट से चैनल बदल कर अपने मिशन में कामयाब हो सकूं , वह समय होता जब सारे देश को आने वाले टी वी सीरियल्स और फिल्मो , छोटे और बड़े पर्दे के कलाकारो के व्यक्तिगत किस्सो के  ब्रेकिंग न्यूज  मिलते जुलते नामो वाले कार्यक्रमों के अंतर्गत देखना बेहद जरुरी होता है . शाम जब आफिस से लौटो तो गर्म नाश्ता मिले न मिले पर हर चैनल पर सामयिक मुद्दे पर लाइव गर्मा गरम बहस हो रही होती है . टी आर पी की तलाश में जुटे चैनल्स यदि अपने मौलिक शिड्यूल भी बना लें तो शायद मेरे जैसे दर्शक रिमोट से उन तक पहुंचने में कोई लाभ देखें .  
 

Monday, July 3, 2017

जी एस टी बनाम एक्साइज

व्यंग

एक्साईज और सर्विस टैक्स का रिटायरमेंट

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
vivekranjan.vinamra@gmail.com
बंगला नम्बर ऐ १ , विद्युत मंडल कालोनी , शिला कुन्ज , जबलपुर ४८२००८
०९४२५८०६२५२ , ७०००३७५७९८

 महीने का आखिरी दिन मतलब सरकारी दफ्तरो में ढ़ेर सारे रिटायरमेंट और रिटायर होते लोगो की जगह इक्के दुक्के एपांइंटमेंट . बचे खुचे अफसरो को ही मल्टीपल चार्ज दिये जा रहे हैं , सरकारी विभागो में इन दिनो लोगो के रावण जैसे कई कई सिर उगाये जा रहे हैं   . रिटायर होने वाला खुश होता है कि चलो  सही सलामत कट गई .  फैक्ट्री या दफ्तरो के मुख्य दरवाजे पर आजकल  महीने के आखिरी दिन बारात जैसा वातावरण होता है .बैंड , फूलो से सजी गाड़ी , रास्ता जाम ,फटाको का शोर ,  गुलाल उड़ाते लोग एक साथ ही होली दीवाली सब आ जाती है . इससे पहले हर रिटायर होते कर्मचारी अफसर को सर्वश्रेष्ठ इम्पलायी बताते हुये भाषण होते हैं . शाल , श्रीफल , स्मृति चिंह , एकाध प्रशस्ति पत्र , रिटायर होकर बिदा होने वाले के ओहदे के अनुरूप कोई उपहार पकड़ाकर उसे उसके परिवार के हवाले कर दिया जाता है . पत्नी भी घर पहुंचे पति की आरती उतारती है . दो एक दिनो पहले से रिटायरमेंट के बाद तक रात को होटलो में पार्टियां लेने देने  का दौर होता है . कई बार तो जब बिदाई भाषणो में रिटायर व्यक्ति के गुण सुनने को मिलते हैं तो लगता है कि क्या यह उसी आदमी के विषय में बोला जा रहा है , जिस खडूस को हम इतने  दिनो से झेल रहे थे . खैर परिवर्तन प्रकृति का नियम है , एक के जाते ही दूसरा आ जाता है . नये अफसर का स्वागत होता है . अखबारो में विज्ञप्तियां छपती हैं जिनमें नये प्रभारी  मुस्कराती फोटो के साथ अपनी कार्य शैली और लक्ष्य उद्घोषित करते हैं .
 कुछ इसी तरह तीस जून को एक्साईज और सर्विस टैक्स , एंट्री टैक्स वगैरह भी रिटायर हो गये . दोनो देश और राज्यो के कमाऊ पुत्र थे .केवल सरकारो के ही नही , एक्साईज और सर्विस टैक्स से जुड़े छोटे बड़े अफसरों , और वकीलो की भी तिजोरी भरने में इन्होंने कहीं कोई कमी नही छोड़ी .सफेद को काला बनाने में इन टैक्सो का योगदान याद किया जाता रहेगा .  एक जुलाई रात बारह बजे समारोह पूर्वक इनकी जगह आम जनता का कर मुंडन करने जी एस टी ने प्रभार ले लिया है . सरकार की पौ बारह है , ऐसा माना जा रहा है.  मुझे तो उन पत्नियो की चिंता हो रही है , जिनकी शादी ही उनके पिताजी ने अच्छे खासे प्रोफेसर का रिश्ता ठुकराकर एक्साईज इंस्पेक्टर से कर दी थी . बेचारे इंस्पेक्टर साहब जगह जगह सेमीनार करते हुये लोगो में नये गुड्स एन्ड सर्विस टैक्स के लिये एक्सैप्टिबिलिटी का वातावरण बनाते घूम रहे हैं . वकील , चार्टेड एकाउंटेंट जी एस टी के  लूप होल तलाश रहे हैं . चांदी तो साफ्टवेयर बनाने और बेचने वालों की है , बौद्धिक संपदा की वैल्यू की ही जानी चाहिये .
 जैसे रिटायर होते अफसर पर पुरानी फाइलो को निपटाने का प्रैशर होता है , कुछ उसी तरह जगह जगह प्री जीएसटी सेल लगीं . स्टाक क्लियेरेंस के लिये औने पौने दामो चीजें बेंची गईं . नया अफसर पहले माहौल समझता है तब काम शुरू होता है , इसी तरह जी एस टी लग तो गया है पर अभी  समझा समझी का दौर है .
 जीएसटी पूरी तरह कम्प्यूटरी कृत व्यवस्था है . मतलब साफ है कि यदि अगला विश्वयुद्ध लड़ा जायेगा तो वह साइबर युद्ध होगा . किसी भी देश के मुख्य सर्वर्स के हार्डवेयर्स डिस्ट्राय कर दिये जायें , या उस देश का इंटरनेट क्रेश कर दिया जाये , कम्प्यूटर्स हैक कर लिये जायें , साफ्टवेयर्स में वायरस डाल दिये जायें तो देशो की व्यवस्थायें चकनाचूर होते देर नहीं लगेगी . खैर अच्छा अच्छा सोचना चाहिये . यह तो मैने केवल इसलिये लिख दिया कि बाद में मत कहना कि बताया नही था .
 जीएसटी को समझाने के लिये व्हाट्सअप ज्ञानियो ने तरह तरह के मैसेज किये ,  वित्त मंत्री ने कहा कि जीएसटी प्रणाली में गरीब और अमीर एक दर से कर देंगे , मैसेज आया , सुपर मार्केट में चीज़ें सस्ती होगी, मोहल्ले की परचून की दुकान, यहाँ तक कि पटरी वाले की चीज़ें भी महँगी होगी , सुपर मार्केट वाले इनपुट क्रेडिट का भरपूर लाभ लेंगे, परचूनिया कुछ नहीं ले पायेगा . मानो  गरीब सुपर मार्केट में नहीं जाते . एक मेसेज आया कि  शादी से पहले देर रात लौटने पर घर पर हरेक को जबाब देना होता था , पर शादी के बाद केवल पत्नी को जबाब देना पड़ता है , कुछ इसी तरह जी एस टी में केवल एक बिंदु पर टैक्स देना होगा . एक मैसेज आया कि जीएसटी में नमक पर टेक्स नही है , इसलिये सत्ता और विरोधी राजनीति एक दूसरे पर खूब नमक छिड़क रहे हैं . एक और मैसेज मिला कि जीएसटी में सस्ते हुये सामानो के लिये सरकार समर्थक फलाना चैनल देखिये , और महंगे हुये सामानो के लिये फलाना चैनल . खैर मैसेज तो बहुत से आप के पास भी आये होंगे , एक आखिरी मैसेज  शेयर कर रहा हूं ,जिससे आप जीएसटी को अच्छी तरह समझ सकें .  टीचर ने पूछा एक आम के पेड़ पर १२ केले लगे हैं , उनमें से ७ अमरूद तोड़ लिये गये तो बताओ कितने चीकू बचे ? छात्र ने उत्तर दिया सर ८ पपीते . शिक्षक ने कहा अरे वाह तुम्हें कैसे पता ? छात्र ने उत्तर दिया सर क्योकि मैं आज पराठे खाकर आया हूं . मारेल आफ दि स्टोरी यह है कि हमें रोज ब्रश करना चाहिये वरना जीएसटी की दरें  बढ़ सकती है .तो सारा देश जीएसटी को समझने में लगा है , आप भी समझिये . पर एक्साईज और सर्विस टैक्स के सुनहरे युग को मत भूलियेगा .

Tuesday, June 13, 2017

ऋण कृत्वा घृतं पिबेत


व्यंग 
"ॠणं कृत्वा घृतं पिवेत "

विवेक रंजन  श्रीवास्तव 
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , शिला कुन्ज
जबलपुर                                                                                                       
मो ९४२५८०६२५२ , vivek1959@yahoo.co.in

आकासवाणी का यह खेती चैनल है . कृषि विश्वविद्यालय से सरमन बोल रहा हूं  . "ॠणं कृत्वा घृतं पिवेत ", " संगठन का महत्व " , खेती ही नही आंदोलन और धरने की कला भी , वोट को कैसे बनायें लाभकारी , आत्महत्या क्यो और कैसे ? , फसल का उचित मूल्य पाने के तरीके , जैसे खेती को लेकर कुछ नये विषय पाठ्यक्रम में , जोड़े जा रहे हैं . जल्दी ही उपवास का महत्व , बयान कैसे दें , घोषणा पत्र के वादो से कैसे पलटी मारें वगैरह विषयो को भी सेमीनार के लिये जोड़ा जायेगा . खेती किसानी रही ना पुरानी जमाने के संग संग बढ़ने लगी है . 
वो गुजरे जमाने की बातें हो गईं जब कृषि दर्शन देखने के लिये भी दूरदर्शन के श्वेत श्याम पटल पर लोग आंखे गड़ाये रहते थे और एंटीना  हिला कर , घुमा कर सिगनल सैट किया करते थे . तब खेत खलिहान के कार्यक्रम में फसलो की बातें होती थीं . चौपाल में लोकभाषा में गीत वगैरह गाये जाते थे . फसल आने पर खुशियो के त्योहार होते थे . तब कृषि विश्वविद्यालयो में उर्वरको के विषय में पढ़ाया जाता था , उन्नत कृषि के विषय में जानकारी दी जाती थी . जमीन को उपजाऊ बनाने के उपायो पर चर्चा होती थी . विदेशी नस्लो के बीजो की बातें होती थीं . पुराने जमाने में हमारे दूध वाले से यदि गंजी में नापते वक्त बूंद दो बूंद दूध जमीन पर गिर जाता था तो वह उसे अपने हाथो से पोंछकर सिर पर लगा लेता था , इससे उसके मन में गोरस के प्रति अपार श्रद्धा का भाव प्रदर्शित होता था . 
अब जमाना बदल चुका है . खेती किसानी बैकवर्ड होने जैसी वाली बात ना रही . किसान मेले लगते हैं . किसानो के दल देश विदेश नई खेती सीखने के लिये यात्रा पर जाते हैं  , धार्मिक पर्यटन भ्रमण के सरकारी आयोजन होते हैं . किसानो की मुस्कराती तस्वीरें खिंचती हैं सरकारी पत्रिकाओ के अंकों के कवर पेज बन जाते हैं . सरकार को कृषि कर्मण अवार्ड मिलता है . अब किसान जींस पहनते हैं . नई नई जींस उपजाते हैं . 
अब सड़को पर दूध लुढ़काकर , दूधवाले सरकार के प्रति अपना गुस्सा जाहिर करते हैं . मतलब ये कि भारत में दूध की नदियां बहती हैं . किताबो को छोड़कर प्रायः वस्तुओ की कीमत इकानामिक्स का डिमांड  और सप्लाई का रूल तय करता है , पर जब किसान को इस नियम से उसकी मर्जी का दाम नहीं मिलता तो उसे गुस्सा आता है . वह सड़को पर आंदोलन करता है . अब किसान संगठित हैं . उनके पीछे अदृश्य राजनैतिक हाथ हैं . अब किसान केवल खेतीहर नहीं रहा वह वोट बैंक है . अब किसान को जीरो प्रतिशत ब्याज पर ‌ॠण मिलता है , नेताओ के रहते ॠण वापस करना किसान को बड़ा अपमानजनक लगता है . किसान  आत्महत्या करना पसंद करता है पर "ॠणं कृत्वा घृतं पिवेत " के चार्वाक दर्शन  को झुठलाना  उसे बिलकुल पसंद नहीं है . 
चार्वाक दर्शन के भरोसे ही लोन इकानामी चल रही है ,डाउन पेमेंट की व्यवस्था होते ही  ऐसो के दरवाजे पर नई नई फोर व्हीलर नजर आती हैं , किस्त दो किश्त चुकाने के बाद गाड़ी जब्त की जाती है , फिर वह नीलाम होती है . गाड़ी कम्पनी के उत्पादन का आंकड़ा  ,विज्ञापन ,  सेल्स ,फाईनेंस , वसूली वालो को काम  जाने कितनो को रोजगार केवल  "ॠणं कृत्वा घृतं पिवेत " को मानने वालो के भरोसे मिलता है . सड़क पर जब भी एक्सीडेंट होता है  तो जो बड़े वाहन पर सवार होता है , गलती उसकी ही मानी जाती है , लोगो की सारी सेम्पेथी छोटे वाहन मालिक के साथ ही होती है , ठीक कुछ उसी तरह सारे बुद्धिजीवीयो , लेखको , सारे राजनैतिज्ञो , सारे जनमानस , सारे सोशल मीडीया की सेम्पेथी किसान आंदोलनो के समय सरकार के खिलाफ और किसानो के साथ होना बहुत स्वाभाविक है , होना भी चाहिये . किसान हमारे अन्नदाता हैं . सरकार को लगना ही चाहिये कि यदि किसानो का वोट बैंक सरक गया तो , चुनावो में क्या हो सकता है . इसलिये पश्चाताप के आंसू बहाना जरूरी है , उपवास करके मन साफ करना जरूरी है , बैंक खाली होते हों तो हों जायें , इनकम टैक्स देने वाले खत्म थोड़े ही हो गये हैं , लेकिन खेती का ॠण तुरंत माफ किया जाये , जिससे योजना बदलकर , नाम बदलकर अगले ॠणो की स्वीकृति का रास्ता बने . मंत्री जी आश्वस्त रहें कि बड़ा सारा वोट बैंक उनके पास है . बैंक मैनेजर सुसंपन्न होवें . गांवो का विकास हो . किसान खुशहाल होवें , सब सदा सरकार के ॠणी बने रहें .
 

vivek ranjan shrivastava

Wednesday, June 7, 2017

फार्मूले टॉपर बनने के


व्यंग 
लल्लन टाप

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
vivekranjan.vinamra@gmail.com
बंगला नम्बर ऐ १ , विद्युत मंडल कालोनी , शिला कुन्ज , जबलपुर ४८२००८
०९४२५८०६२५२ , ७०००३७५७९८

              "अगर आप समाज का विकास करना चाहते हैं तो आप आईएएस बनकर ही  कर सकते हैं ", यहां समाज का भावार्थ खुद के व अपने  परिवार से होता है , यह बात मुझे अपने सुदीर्घ अनुभव से बहुत लम्बे समय में ज्ञात हो पाई है . 
यदि हर माता पिता , हर बच्चे का सपना सच हो सकता तो भारत की आधी आबादी आई ए एस ही होती ,  कोई भी न मजदूर होता न किसान , न कुछ और बाकी के जो आई ए एस न होते वे सब इंजीनियर , डाक्टर , अफसर ही होते . धैर्य, कड़ी मेहनत , अनुशासन और हिम्मत न हारना , उम्मीद न छोड़ना , परीक्षा की टेंशन से बचना और खुद पर भरोसा रखना , नम्बर के लिये नहीं ज्ञानार्जन के लिये रोज 10 या 20 घंटे पढ़ना जैसे गुण टापर बनाने के सैद्धांतिक तरीके हैं . प्रैक्टिकल तरीको में नकल , पेपर आउट करवा पाने के मुन्नाभाई एमबीबीएस वाले फार्मूले भी अब सेकन्ड जनरेशन के पुराने कम्प्यूटर जैसे पुराने हो चले  हैं .पढ़ाई के साथ साथ  तन , मन , धन से गुरु सेवा भी आपको टापर बनाने में मदद कर सकता है , कहा भी है जो करे सेवा वो पाये मेवा . 
             एक बार एक अंधा व्यक्ति सड़क किनारे खड़ा था . वह राह देख रहा था कि कोई आने जाने वाला उसे सड़क पार करवा दे . इतने में एक व्यक्ति ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा कि कृपया मुझे सड़क पार करवा दें मैं अंधा हूँ . पहले अंधे ने दूसरे को सहारा दिया और चल निकला , दोनो ने सड़क पार कर ली . यह सत्य घटना जार्ज पियानिस्ट के साथ घटी थी . शायद सचमुच भगवान  उन्ही की मदद करता है जो खुद अपनी मदद करने को तैयार होते हैं .मतलब अपने लक को भी कुछ करने का अवसर दें , निगेटिव मार्किंग के बावजूद  सारे सवाल अटैम्प्ट कीजीए  जवाब सही निकले तो बल्ले बल्ले . 
            टापर बनाने के लेटेस्ट  फार्मूले की खोज बिहार में हुई है .कुछ स्कूल अपनी दूकान चलाने के लिये तो कुछ कोचिंग संस्थान अपनी साख बनाने के लिये शर्तिया टाप करवाने की फीस लेते हैं . उनके लल्लन छात्र  भी टाप कर जाते हैं .  नितांत नये आविष्कार हैं . कापी बदलना , टैब्यूलेशन शीट बदलवाना , टाप करने के ठेके के कुछ हिस्से हैं  कुछ नये नुस्खे धीरे धीरे मीडीया को समझ आ रहे हैं . यही कारण है कि बिहार में टापर होने में आजकल बड़े रिस्क हैं जाने कब मीडीया फिर से परीक्षा लेने मुंह में माईक ठूंसने लगे . जिस तेजी से बिहार के टापर्स एक्सपोज हो रहे  है , अब गोपनीय रूप से टाप कराने के तरीको पर खोज का काम बिहार टापर इंडस्ट्री को शुरू करना पड़ेगा .कुछ ऐसी खोज करनी पड़ेगी की कोई टाप ही न करे , सब नेक्सट टु  टाप हों जिससे यदि मीडीया ट्रायल में कुछ न बने तो बहाना तो रहे . या फिर रिजल्ट निकलते ही टापर को गायब करने की व्यवस्था बनानी पड़ेगी , जिससे ये इनटरव्यू वगैरह का बखेड़ा ही न हो .
            एक पाकिस्तानी जनरल को हमेशा टाप पर रहने का जुनून था . वे कभी परेड में भी किसी को अपने से आगे बर्दाश्त नही कर पाते थे . एक बार वे परेड में लास्ट रो में तैनात किये गये , पर वे कहां मानने वाले थे , धक्का मुक्की करते हुये तेज चलते हुये  जैसे तैसे वे सबसे आगे पहुंच ही गये , पर जैसे ही वे फर्स्ट लाईन तक पहुंचे कमांडिंग अफसर ने एबाउट टर्न का काशन दे दिया . और वे बेचारे जैसे थे वाली पोजीशन में आ गये . कुछ यही हालत बिहार के टापर्स की होती दिख रही है .  
            बच्चे के पैदा होते ही उसे टापर बनाने के लिये हमारा समाज एक दौड़ में प्रतियोगी बना देता है .सबसे पहले तो स्वस्थ शिशु प्रतियोगिता में बच्चे के वजन को लेकर ही ट्राफी बंट जाती है ,विजयी बच्चे की माँ फेसबुक पर अपने नौनिहाल की फोटो अपलोड करके निहाल हो जाती है . फिर कुछ बड़े होते ही बच्चे को यदि कुर्सी दौड़ प्रतियोगिता में  चेयर न मिल पाये तो आयोजक पर चीटिंग तक का आरोप लगाने में माता पिता नही झिझकते . स्कूल में यदि बच्चे को एक नम्बर भी कम मिल जाता है तो टीचर की शामत ही आ जाती थी . इसीलिये स्कूलो को मार्किंग सिस्टम ही बदलना पड़ गया . अब नम्बर की जगह ग्रेड दिये जाते हैं . सभी फर्स्ट आ जाते हैं .
              जैसे ही बच्चा थोड़ा बड़ा होता है , उसे इंजीनियर डाक्टर या आई ए एस बनाने की घुट्टी पिलाना हर भारतीय पैरेंट्स की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है . इसके लिये कोचिंग , ट्यूशन , टाप करने पर बच्चे को उसके मन पसंद मंहगे मोबाईल , बाईक वगैरह दिलाने के प्रलोभन देने में हर माँ बाप अपनी हैसियत के अनुसार चूकते नहीं हैं . वैसे सच तो यह है कि हर शख्स अपने आप में किसी न किसी विधा में टाप ही होता है , जरूरत है कि  हर किसी को अपनी वह क्वालिटी पहचानने का मौका दिया जाये जिसमें वह टापर हो .  
           





vivek ranjan shrivastava

Saturday, May 27, 2017

मानहानि का मुकदमा यानी मुंह की कालिख से तुरंत निपटने का फेसवाश

मानहानि का मुकदमा यानी मुंह की कालिख से तुरंत निपटने का फेसवाश

विवेक रंजन  श्रीवास्तव
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , शिला कुन्ज
जबलपुर                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                 
मो ९४२५८०६२५२ , vivek1959@yahoo.co.in

        व्यंग के हर पंच पर किसी न किसी की मानहानि ही की जाती है , ये और बात है कि सामने वाला उसका नोटिस लेता है या नही , और व्यंगकार को मानहानि का नोटिस भेजता है या नही . व्यंगकार अपनी बात का सार्वजनिककरण इनडायरेक्ट टेंस में कुछ इस तरह करता है कि सामने वाला टेंशन में तो होता है पर मुस्करा कर टालने के सिवाय उसके पास दूसरा चारा नहीं होता .लेकिन जब बात सीधी टक्ककर की ही हो जाये तो मानहानि का मुकदमा बड़े काम आता है . सार्वजनिक जीवन में स्वयं को बहुचर्चित व अति लोकप्रिय होने का भ्रम पाले हुये किसी शख्सियत को जब कोई सीधे ही मुंह पर कालिख मल जाये तो तुरंत डैमेज कंट्रोल में , बतौर फेसवाश  मानहानि का मुकदमा किया जाता है . जब  समय के साथ मुकदमें की पेशी दर पेशी ,मुंह की कालिख कुछ कम हो जाये , लोग मामला भूल जायें तो आउट आफ कोर्ट माफी वगैरह के साथ मामला सैट राइट हो ही जाता है . लेकिन यह तय है कि रातो रात शोहरत पाने के रामबाण नुस्खों में से एक है मानहानि के मुकदमें में किसी पक्ष का हिस्सा बन सकना .  मैं भी बड़े दिनो से लगा हुआ हूं कि कोई तो मुझे मानहानि का नोटिस भेजे और अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर छपते व्यंगो में बतौर लेखक मेरा नाम  अंदर के पन्ने से उठकर कवर पेज पर बाक्स न्यूज में  पढ़ा जाये . पर  मेरी तमाम कोशिशो के बाद भी मेरी पत्नी के सिवाय कोई अब तक मुझसे खफा ही नही हुआ . और पत्नी से तो मैं सारे मुकदमें पहले ही हारा हुआ हूं . पुराने समय में साले सालियो की तमाम सावधानियो के बाद भी जीजा और फूफा  वगैरह की मानहानि हर वैवाहिक आयोजन का एक अनिवार्य हिस्सा होता था . मामला घरेलू होने के कारण मानहानि के मुकदमें के बदले रूठने , और मनाने का सिलसिला चलता था . किसकी शादी में कौन से जीजा कैसे रूठे और कैसे माने थे यह चर्चा का विषय रहता था .
        लोक जीवन में देख लेने की धमकी ,धौंस जमाकर निकल लेना आदि  मानहानि के मुकदमें से बचने के सरल उपाय हैं . सामान्यतः जब यह लगभग तय हो कि मानहानि के मुकदमें में सामने वाला कोर्ट ही नही आयेगा तो उसे देख लेने की धमकी देकर छोड़ दिया जाता है . देख लेने की धमकी से बेवजह उलझ रहे दोनो पक्ष अपनी अपनी इज्जत समेट कर पतली गली से निकल लेने का एक रास्ता पा जाते हैं .  देख लेने की धमकी कुछ कुछ लोक अदालत के समझौते सा व्यवहार करती है . इसी तरह जब खुद की औकात ही किसी अपने की औकात पर टिकी हो जैसे आपका कोई नातेदार थानेदार हो , बड़ा अफसर हो या मंत्री वंत्री हो , विपक्ष का कद्दावर नेता हो तो भले ही आपका स्वयं  का  कुछ मान न हो पर आप अपना सम्मान अपने  उस  महान रिश्तेदार के मान से जोड़ सकते हैं और सड़क पर गलत ड्राइविंग या गलत पार्किंग करते पाये जाने पर , बिना रिजर्वेशन आक्यूपाइड अनआथराइज्ड बर्थ पर लेटे लेटे , किसी शो रूम में मोलभाव करते हुये  बेझिझक अपनी रिलेशन शिप को जताते हुये , धौंस जमाने के यत्न कर सकते हैं . धौंस जम गई और आपका काम निकल गया तो बढ़िया . वरना आप जो हैं वह तो हैं ही .  तुलसी बाबा बहुत पहले चित्रकूट के घाट पर गहन चिंतन मनन के बाद लिख गये हैं " लाभ हानि जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ " . तुलसी की एक एक चौपाई की व्याख्या में , बड़े बड़े शोध ग्रंथ लिखे जा चुके हैं . कथित विद्वानो ने  डाक्टरेट की उपाधियां लेकर  यश अर्जित किया है , और इस लायक हुये हैं कि उनकी मानहानि हो सके , वरना तो देश के करोड़ो लोगो का मान है ही कहाँ कि उनकी मानहानि हो  . तो जब आपकी भी धौंस न चले , देख लेने की धमकी काम न आवे तो बेशक आप विधाता को अपने मान के अपमान के लिये दोषी ठहरा कर स्वयं खुश रह सकते हैं .  तुलसी की चौपाई का स्पष्ट अर्थ है कि यश और अपयश विधि के हाथो में है , फिर भी जाने क्यो लोग मान अपमान की गांठें बाधें अपने जीवन को कठिन बना लेते हैं . देश की अदालत में वैसे ही बहुत सारे केस हैं सुनवाई को . ए सी लगे कमरो के बाद भी कोर्ट को गर्मी की छुट्टियां भी मनानी पड़ती है ,  इसलिये हमारी विनम्र गुजारिश है कि कम से कम मान हानि के मुकदमें दर्ज करने पर रोक लगा दी जाये अध्ययन किया जाये कि क्या इसकी जगह अपनी ऐंठ में जी रहे नेता धमकी , धौंस , बयान वगैरह से काम चला सकते हैं  ?
       
       
       

Sunday, May 21, 2017

तर्जनी बनाम अनामिका



व्यंग
अनामिका 

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
, ७०००३७५७९८

मेरी एक अकविता याद आ रही है ,जिसका शीर्षक ही है "शीर्षक".कविता छोटी सी है , कुछ यूं

एक कविता
एक नज्म  
एक गजल हो 
तुम तरन्नुम में 
और मैं 
महज कुछ शब्द बेतरतीब से 
जिन्हें नियति ने बना दिया है 
तुम्हारा शीर्षक 
और यूं
मिल गया है मुझे अर्थ 
 जबसे मैने अपनी एकमेव पत्नी को अपनी यह कविता सुनाई है , उसे मेरा लिखा अच्छा लगने लगा है . और मुझे सचमुच जीवन सार्थक लगने लगा है . मतलब शीर्षक ही होता है जो हमें अर्थ देता है .मैं फेमनिस्ट हूं  इसलिये जब बिना शीर्षक के लिखने का शीर्षक तय करना था तो हमने अनामिका पर लिखने का फैसला किया . अनामिका मतलब बिना नाम   यूँ  तो सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का कविता संग्रह "अनामिका" बरसो पहले ही आ चुका है और जाने कितनी ही लड़कियो का नाम अनामिका रखा चुका है . अनामिका नाम की फिल्म भी बन चुकी है  शायद इसलिये क्योकि इस शब्द में किंचित ध्वनि की मधुरता भी है . तो जब कुछ न सूझे और कुछ नामकरण जरूरी हो तो अनामिका शीर्षक उपयुक्त लगता है .  
 दुनिया भर में अनामिका यानी रिंग फिंगर में  इंगेजमेंट रिंग पहनकर पत्नियां अपने पतियो को तर्जनी के इशारो पर नचाने की ताकत रखती हैं . ये और बात है कि फेमनिस्ट होने के नाते मैं पूरी शिद्दत से मानता हूं कि महिलायें अपनी इस अपार शक्ति का पूरा उपयोग नहीं करती या नही कर पातीं वरना ... एनी वे . 
 लेखक , वकील और नेता शब्दो के बाजीगर होते हैं , वे किसी भी विषय पर स्वप्न बुन सकते हैं . लेखक अपने वाक्जाल से रची  अपनी रचना पढ़कर खुद की पीठ थपथपाता है वकील भरी अदालत में अपने शब्दो के माया जाल से सच को झूठ और झूठ को सच साबित कर देता है , न्याय की मूर्ति आँखो पर काली पट्टी बांधे वही ठीक मान लेती है जो बड़ा वकील बोलता है . जैसे बेचारा पाकिस्तान इकबालिया बयान लिये बैठा रह गया और साल्वे जी इंटरनेशनल अदालत में हमारे लिये मैदान जीत आये . नेता तो बिना लिखे ही अपने भाषणो से शब्दो का जाल फैलाकर उसमें वोट फांस लेता है .शब्दो से स्वप्न दिखाकर जनता को मीठी नींद सुला देता है उनके सारे गम भुलाकर उनहें अपने पक्ष में हिप्नोटाइज कर लेता है और खुद जनता के कंधो पर चढ़कर सत्ता के शीर्ष तक पहुंच जाता है , जहाँ मख्खन की मटकी बंधी होती है .  आजकल तो और भी नये प्रयोग चल रहे हैं पड़ोसियो के एटमी बमो तक को  शब्दो से मात देने के लिये नेता जी के व्यक्तव्य गढ़े जा रहे हैं . बयान छप रहे हैं. इस कला पर सोढ़ की जरूरत है . 
 शोध कर्ता भी तरह तरह के शोध करते हैं , सच पूछा जाये तो सारे ढ़ंग तरीके के शोध हो ही चुके हैं , इसलिये इन दिनो  शोधकर्ता पुरानी किसी थीसिस का टाइटिल बदलकर , दस पांच संबंधित शोध कार्य मिलाकर बिबलियो ग्राफी बनाकर अपनी नई थीसिस तैयार करते पाये जाते हैं जैसा हमारे देश के विश्वविद्यालयो में होता है . या फिर पश्चिम के स्वनाम ख्यात यूनिवर्सिटीज में शोध के नाम पर बाल की खाल निकाली जाती है . हाल ही फ्लोरिडा विश्वविद्यालय में  रिंग फिंगर को लेकर ऐसा ही शोध कार्य सम्पन्न हुआ है . जिसके अनुसार अनामिका अंगुली को शुक्राणुओं की संख्या, आक्रामक व्यवहार, यौन अनुकूलन और खेल कौशल से जोड़ा गया है.   ऐसा पाया गया कि पुरुष की तर्जनी की अपेक्षा अनामिका की लम्बाई  का संबंध उसकी उच्च सेक्स रुचि से है। 
 जो भारतीय हर बात में अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं और मानते हैं कि पुष्पक विमान तो उनके पास रामायण काल से ही है , या संजय ने महाभारत के युद्ध का लाइव  टेलीविजन प्रसारण किया था जैसा आजकल के दीपक चौरसिया डायरेक्ट जीरो पाइंट से रिपोर्टिंग करते पाये जाते हैं , उनके लिये गर्व का विषय हो सकता है कि भारतीय ज्योतिष के अनुसार पहले से ही अनामिका के नीचे सूर्य पर्वत माना जाता है .धार्मिक मान्यता के अनुसार अनामिका अंगुली पर स्वयं भगवान शंकर का वास माना जाता है. इसी कारण अनामिका अंगुली को सर्वथा धार्मिक रूप से पवित्र कहा गया है और  पूजा अनुष्ठान आदि धार्मिक कार्यों में अनामिका उंगली में कुशा से बनी पवित्री धारण करने की परम्परा है . अनामिका उंगली से ही देवगणों को गंध और अक्षत अर्पित किया जाता है. यही उंगली मान, धन ,संतान , यश और कीर्ति की सूचक है .  इसलिये महिलाओ को अपनी बिन मांगी सलाह है कि यदि उन्हें अपनी तर्जनी पर पुरुष को नचाना है तो उसकी अनामिका पर ध्यान दीजीये .

Wednesday, May 17, 2017

सिफारिशी घंटी का सवाल है बाबा

व्यंग
एक सिफारिशी घंटी का सवाल है बाबा

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
vivekranjan.vinamra@gmail.com


        अब तो मोबाईल का जमाना आ गया है , वरना टेलीफोन के जमाने में हमारे जैसो को भी लोगो को नौकरी पर रखने के अधिकार थे . और उन दिनो नौकरी के इंटरव्यू से पहले अकसर सिफारिशी टेलीफोन आना बड़ी कामन बात थी . सेलेक्शन का एक क्राइटेरिया यह भी रखना पड़ता था कि सिफारिश किसकी है . मंत्री जी की सिफारिश , बड़े साहब की सिफारिश   और रिश्तेदारो की सिफारिश में संतुलन बनाना पड़ता था . एक सिफारिशी घंटी केंडीडेट का भाग्य बदलने की ताकत रखती थी . अक्सर नेता जी से संबंध टेलीफोन की सिफारिशी घंटी बजवाने के काम आते थे .
        आज भी विजिटिंग कार्ड का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है टेलीफोन नम्बर , और टेबिल का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण होता है टेलीफोन . टेलीफोन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य होता है सिफारिश . टेलीफोन की घंटी से सामने बैठा व्यक्ति गौण हो जाता है , दूर टेलीफोन के दूसरे छोर पर बैठा व्यक्ति महत्वपूर्ण हो जाता है . जिस तरह पानी उंचाई से नीचे की ओर प्रवाहित होता है उसी तरह टेलीफोन में हुई वार्तालाप का नियम है कि इसमें हमेशा ज्यादा महत्वपूर्ण आदमी , कम महत्वपूर्ण आदमी को इंस्ट्रक्शन देता है . उदाहरण के तौर पर मेरी पत्नी मुझे घर के टेलीफोन से आफिस के टेलीफोन पर इंस्ट्रक्शन्स देती है . मंत्री जी बड़े साहब को और बड़े साहब अपने मातहतो को महत्वपूर्ण या गैर महत्वपूर्ण कार्यो हेतु भी महत्वपूर्ण तरीके से आदेशित करते हैं . टेलीफोन के संदर्भ में एक नियम और भी है , ज्यादा बड़े लोग अपना टेलीफोन स्वयं नहीं उठाते . इसके लिये उनके पास पी ए टाइप की कोई सुंदरी होती है जो बाजू के कमरे में बैठ कर उनके लिये यह महत्वपूर्ण कार्य करती है और एक्सटेंशन टेलीफोन पर महत्वपूर्ण काल ही फारवर्ड करती है . टेलीफोन एटीकेट्स के अनुसार मातहत को अफसर की बात सुनाई दे या न दे , समझ आये या न आये , किन्तु सर ! सर !  कहते हुये आदेश स्वीकार्यता का संदेश अपने बड़े साहब को देना होता है . मुझे गर्व है कि अपनी लम्बी नौकरी में मैने ऐसे लोग भी देखे हैं जो बड़े साहब का टेलीफोन आने पर अपनी सीट पर खड़े होकर बात करते हैं . ऐसे लोगो को नये इलेक्ट्रानिक टेलीफोन में कालर आई डी लग जाने से बड़ा लाभ हुआ है .  आजकल बड़े साहब का मोबाईल आने पर ऐसे लोग तुरंत सीट से उठकर गतिमान हो जाते हैं . यह बाडी लेंगुएज उनकी भारी दबाव में आने वाली मानसिक स्थिति की द्योतक होती है .
        हमारी पीढ़ी ने चाबी भरकर चार्ज कर बात करने के हैंडिल वाले टेलीफोन के समय से आज के टच स्क्रीन मोबाईल तक का सफर तय किया है . इस बीच डायलिग करने वाले मेकेनिकल फोन आये जिनकी वही रिटी पिटी ट्रिन ट्रिन वाली घंटी होती थी जैसे आजकल आधे कटे सेव वाले मंहगे एप्पल मोबाईल की  एक ही सुर की घंटी होती है . समय के साथ की पैड वाले इलेक्ट्रानिक फोन आये . और अब हर हाथ में मोबाईल का नारा सच हो रहा है , लगभग हर व्यक्ति के पास दो मोबाइल या कमोबेश दो सिम तो हैं ही . एक समय था जब टेलीफोन आपरेटर की शहर में बड़ी पहचान और इज्जत होती थी , क्योकि वह  ट्रंक काल पर मिनटो में किसी से भी बात करवा सकता था . शहर के सारे सटोरिये रात ठीक आठ बजे क्लोज और ओपन के नम्बर जानने के लिये मटका किंग से हुये इशारो के लिये इन्हीं आपरेटरो पर निर्भर होते थे . आज तो पत्नी भी पसंद नही करती कि पति का काल उसके मोबाईल पर आ जाये , पर मुझे स्मरण है उन दिनो हमारे घर पर पड़ोसियो के फोन साधिकार आ जाते थे . लाइटनिंग काल के चार्ज आठ गुने  लगते थे अतः लाइटनिंग काल आते ही लोग सशंकित हो जाते थे .
        मैं विद्युत विभाग में अधिकारी हूं , हमारे विभाग में बिजली की हाई टेंशन लाइन पर पावर लाइन कम्युनिकेशन कैरियर की अतिरिक्त सुविधा होती है , जिस पर हम हाट लाइन की तरह बातें कर सकते हैं , बातें करने की ठीक इसी तरह रेलवे की भी अपनी समानांतर व्यवस्था है . पुराने दिनो में कभी जभी अच्छे बुरे महत्वपूर्ण समाचारो के लिये हम लोग भी अनधिकृत रूप से अपनी इस समानांतर व्यवस्था का लाभ मित्र मण्डली को दे दिया करते थे . बातो के भी पैसे लगते हैं और बातो से भी पैसे बनाये जा सकते हैं यह सिखाता है टेलीफोन . यह बात मेरी पत्नी सहित महिलाओ की समझ आ जाये तो दोपहर में क्या बना है से लेकर पति और बच्चो की लम्बी लम्बी बातें करने वाली हमारे देश की महिलायें बैठे बिठाये ही अमीर हो सकती हैं . खैर महिलायें जब बातो से पेसे बनायेंगी तब की तब देखेंगे फिलहाल तो मायावती की माया टेलीफोन पर हुई उनकी बातो की रिकार्डिंग सुनाकर लुटती दिख रहि है .

Saturday, May 6, 2017

खीरा सर से काटिये, मलिये नमक लगाए, देख कबीरा यह कहे, कड़वन यही सुहाए

व्यंग्य

गनीमत है वे अंखियो से गोली नही

विवेक रंजन  श्रीवास्तव
 vivek1959@yahoo.co.in

 हम सब बहुत नादान हैं . इधर पाकिस्तान ने दो चार फटाके फोड़े नहीं कि  हमारा मीडीया हो हल्ला मचाने लगता है . जनता नेताओ को याद दिलाने लगती है कि तुमको चुना ही इसलिये था कि तुम पाकिस्तान को सबक सिखाओगे , बदला लो .  धिक्कार है हम पर जो अपने ही चुने गये नेताओ से सवाल करते हैं . दरअसल हमारे राजनेता बड़े साहित्यिक किस्म के हैं . जरूर उन्होने यह दोहा पढ़ा होगा " अस्त्र-शस्त्र के वार शत, करते कम आघात , वार जीभ का जब लगे, समझो पाई मात ".  यही कारण है कि जब जब बाजू वाला अपने बमो से वार करता है नेता जी कड़े शब्दो में जुबानी जंग लड़ते नजर आते हैं . कठोर शब्दो में भर्तस्ना करते हैं . विरोध दर्ज करते हैं .
 मुश्किल समय में विचलित न होने का संदेश भी चाणक्य नीति है . हमारे नेता भी असीम धैर्य का परिचय देते हैं वे दिलासा देते हैं कि शहीदो  का खून बेकार नही जायेगा . हमें गर्व करना चाहिये अपने ऐसे स्थित प्रज्ञ नेताओ पर . और भगवान का शुक्र मनाना चाहिये कि इन नेताओ ने यह नही पढ़ा  "तेरे कटाक्ष , ले लेते  हैं मेरे प्राण, चितवन को भेद जाते हैं , तेरे नयनों के तीर कमान " .  भले ही उन्होने यह पढ़ा हो और सुना भी हो कि "अँखियन से गोली मारे" पर कम से कम उस पर अनुसरण तो नही करते . वरना कल्पना कीजीये आपको कैसा लगता जब सीमा पर पाकिस्तान की बमबारी के बाद नेशनल चैनल में ब्रेकिंग न्यूज पर विशेष प्रसारण की घोषणा होती  और फिर नेता जी के दर्शन होते , वे कहते भाईयो और बहनो और फिर बाईं आँख बन्द कर पाकिस्तान को जबाब देते उसकी कायराना हरकत का . हो सकता था कि वे सारे देश वासियो से भी आग्रह करते कि आईये हम सब एक साथ अपनी बाईं आँख बन्द कर सबक सिखा दें पड़ोसी को . ऐसा नही हो रहा , इसलिये गर्व करिये अपने चुने हुये जन प्रतिनिधियो पर .
      जब आपने उन्हें चुन ही लिया है अगली बार फिर से बेवकूफ बनने तक के लिये तो जो कुछ वे कर रहे हैं उसमे हाँ में हाँ मिलाइये और खुश रहिये . विकास का स्वागत कीजीये . अंतरिक्ष की ओर निहारिये , वैज्ञानिको पर गर्व कीजीये . शहीदो को श्रद्धांजली दीजीये . संवेदना का ट्वीट कीजीये . कूटनीति की प्रशंसा कीजीये . अपना पूरा टैक्स अदा कीजीये . जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय दीजीये .मीडिया में हैं तो जन भावनाओ में उबाल भरिये .  यदि विपक्ष में हैं तो निश्चिंत होकर सरकार की कड़ी आलोचना कीजीये , यदि कभी आप सत्ता में लौट आये तो  उच्च कोटि के आई ए एस और भाषा विद सचिव आपके लिये अपनी बात से पलटी खाने के कई रास्ते निकाल देंगे . नई शब्दावली ढ़ूंढ़कर कठोर शब्दो में निंदा का नया जुमला गढ़ देंगे . शब्द की शक्ति असीम है . इससे तीर और तलवार भी हार जाते थे .  हिन्दी में एक कहावत है - बातन हाथी पाईये, बातन हाथी पांव .  अर्थात आपके द्वारा कहे गये शब्दों से प्रभावित होकर आपको हाथी के पैरों तले रौंदे  जाने का निर्णय भी लिया जा  सकता है और आपके द्वारा कहे गये शब्दों से प्रसन्न होकर  आपको हाथी के ऊपर बैठाया भी जा सकता है . शब्द इतने गहरे घाव देते हैं कि वे जीवन भर नहीं भरते. इसलिये नेताओ के शाब्दिक प्रहारो का समर्थन कीजीये . पाकिस्तान की नापाक हरकतो का यही तो सच्चा जबाब है कि उनको इतने गहरे घाव लगें जो कभी भरें नही . मुझे लगता है कि इतने बढ़िया शब्द बाणो के बाद भी जो असर पड़ोसी पर होना चाहिये वो यदि नही हो रहा ,तो  इसका मूल कारण यह हो सकता है कि पड़ोसी हिन्दी नही जानता . भैंस के आगे बीन बजाओ भैंस खड़ी पगुराये वाली स्थिति हो रही है .या फिर नेताओ की कड़ी निंदा की भाषा में दम नहीं है , यदि ऐसा है तो मेरे जैसे व्यंगकारो का एक पैनल नेता जी के बयान बनाने के लिये नियुक्त किया जाना जरूरी है .
 जबाब की भाषा वो ही ठीक होती है जो सामने वाला समझे ,मद्रासी को भोजपुरी में जबाब देना बेकार है .  तो यदि बम की भाषा ही उन्हें समझ में आती है तो उन्हें उसी भाषा में जबाब देने का पाठ हमारे  नेताओ को सिखाना ही  पड़ेगा और इस काम के लिये कबीर का एक ही दोहा काफी है खीरा सर से काटिये, मलिये नमक लगाए, देख कबीरा यह कहे, कड़वन  यही सुहाए ..

Friday, April 14, 2017

नाच न आवे आंगन टेढ़ा

व्यंग्य

नाच न आवे आंगन टेढ़ा 

विवेक रंजन श्रीवास्तव

 vivekranjan.vinamra@gmail.com 

बचपन में कभी न कभी "खेलेंगे या खेल बिगाड़ेंगे " का नारा बुलंद किया ही होगा आपने  . मैंने भी किया है . मेरी समझ में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह पहला प्रयोग बड़ा सफल रहा था . मुझे मेरी बड़ी बहन ने वापस चोर सिपाही के खेल में शामिल कर लिया था . यह और बात है कि कई दिनो बाद मुझे पता चल ही गया  कि इस तरह का शोर मचाने पर माँ की घुड़की से बचने के लिये मुझे "दूध भात" खिलाड़ी के रूप में खिलाया जाता था . मतलब मैं अपने आप में ही फुदकता रहता था खेल पर मेरे प्रयासो का कोई असर नही माना जाता था . यानी कुछ कुछ एक्स्ट्रा खिलाड़ी जैसी औकात बना दी जाती थी , छोटे से प्यारे से नन्हें से अपन की . खैर समय भाप की तरह उड़ता गया और हम बच्चे से बड़े बनते गये . ये और बात है कि आज तक "बड़े" बन नही पाये हैं , और यह भी और बात ही है कि लोग अपने को बड़े साहब वगैरह मानते हैं कभी जभी जब ड्राइवर हमें बड़ा मानता है तो कार का दरवाजा खोल देता है , जब कभी मुख्य अतिथि बनाकर कोई संस्था किसी आयोजन में बुला लेती है तो पत्नी जानबूझकर मुझे समय से कुछ विलंब से घर से रवाना करती है , और सचमुच अपने पहुंचते ही जब आयोजक लेने के लिये कार की ओर बढ़ते हैं या सभा कक्ष में  उपस्थित लोग खड़े होकर अपन को कथित सम्मान देते हैं तब भी बड़े होने की भ्रांति पालने में बुरा नही लगता . पर जल्दी ही मैं अपने आप को नैतिक शिक्षा के पाठ याद दिला देता हूं और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करता हूं  कि हे प्रभु मुझे मैं ही बना दे , ये बड़े वड़े के चक्कर में कहीं ऐसा न हो कि न घर का रहूं और न ही घाट का .  स्कूल में हिंदी में अपने भरपूर नम्बर आते थे . जो यह लेख पढ़ रहे हों उनके लिये अपनी सफलता का राज डिस्क्लोज कर  रहा हूं , निबंध में लोकप्रिय कवियो की पंक्तियां जरूर उधृत करता था और मौका मिल जाये तो गीता या राम चरित मानस से भी कोई उध्वरण कोट कर देता था . महात्मा गांधी और भारतीय संस्कृति के कुछ महत्वपूर्ण नायको की जीवनियां मैने एक्स्ट्रा करीक्युलर रूप से पढ़ रखी थीं ,  तो उसमें से भी कुछ कोट कर देने पर निबंध में भी मास्साब पूरे नम्बर दे देते थे .  मैं अपने उत्तरो में कहावतो तथा मुहावरो का भरपूर प्रयोग किया करता था .  नाच न आवे आंगन टेढ़ा ,  न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी , खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे , अंगूर खट्टे हैं वगैरह मुहावरो की याद है न आपको ! देश में ईवीएम को लेकर  कुछ उन खिलाड़ियो ने  उछल कूद लगा रखी है जो खेल नही पा रहे हैं . उनकी काठ की हांडी दो एक बार चढ़कर राख हो चुकी है . अब जनता के सामने अपना काला मुंह छिपाने के लिये मजबूरी में उन्होने राग ई वी एम छेड़ रखा है .चोर चोर मौसेरे भाईयो की तरह ऐसे सारे हारे हुये महारथी एक हो गये हैं . यदि ये हारे हुये धुरंधर देर आये दुरुस्त आये को चरितार्थ करते हुये अभी भी जनता के मत को स्वीकार कर लें तो बुरा नही . चुनाव आयोग भी कम नहीं है . आयोग ने ताल ठोंककर खुली चुनौती दे दी है , जिसने अपनी माँ का दूध पिया हो वो किसी  मशीन में हेरा फेरी करके दिखाये . और इसके लिये स्वयंवर जैसा कोई आयोजन किया जा रहा है . राजनीति का चीरहरण वगैरह जारी है . देखना है क्या होता है , खोदा पहाड़ निकली चुहिया जैसा ही  कुछ  होगा या जहां आग होती है , धुंआ वहीं उठता है की तर्ज पर कुछ गड़बड़ी भी मिलेगी ?  कुछ गड़बड़ी न मिली तो हम चुनाव आयोग का लोहा मान लेंगे .   फिलहाल उठा पटक जारी है . देखें ऊंट किस करवट बैठता है . ं अपने भरपूर नम्बर आते थे . जो यह लेख पढ़ रहे हों उनके लिये अपनी सफलता का राज डिस्क्लोज कर  रहा हूं , निबंध में लोकप्रिय कवियो की पंक्तियां जरूर उधृत करता था और मौका मिल जाये तो गीता या राम चरित मानस से भी कोई उध्वरण कोट कर देता था . महात्मा गांधी और भारतीय संस्कृति के कुछ महत्वपूर्ण नायको की जीवनियां मैने एक्स्ट्रा करीक्युलर रूप से पढ़ रखी थीं ,  तो उसमें से भी कुछ कोट कर देने पर निबंध में भी मास्साब पूरे नम्बर दे देते थे .  मैं अपने उत्तरो में कहावतो तथा मुहावरो का भरपूर प्रयोग किया करता था .  नाच न आवे आंगन टेढ़ा ,  न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी , खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे , अंगूर खट्टे हैं वगैरह मुहावरो की याद है न आपको ! देश में ईवीएम को लेकर  कुछ उन खिलाड़ियो ने  उछल कूद लगा रखी है जो खेल नही पा रहे हैं . उनकी काठ की हांडी दो एक बार चढ़कर राख हो चुकी है . अब जनता के सामने अपना काला मुंह छिपाने के लिये मजबूरी में उन्होने राग ई वी एम छेड़ रखा है .चोर चोर मौसेरे भाईयो की तरह ऐसे सारे हारे हुये महारथी एक हो गये हैं . यदि ये हारे हुये धुरंधर देर आये दुरुस्त आये को चरितार्थ करते हुये अभी भी जनता के मत को स्वीकार कर लें तो बुरा नही . चुनाव आयोग भी कम नहीं है . आयोग ने ताल ठोंककर खुली चुनौती दे दी है , जिसने अपनी माँ का दूध पिया हो वो किसी  मशीन में हेरा फेरी करके दिखाये . और इसके लिये स्वयंवर जैसा कोई आयोजन किया जा रहा है . राजनीति का चीरहरण वगैरह जारी है . देखना है क्या होता है , खोदा पहाड़ निकली चुहिया जैसा ही  कुछ  होगा या जहां आग होती है , धुंआ वहीं उठता है की तर्ज पर कुछ गड़बड़ी भी मिलेगी ?  कुछ गड़बड़ी न मिली तो हम चुनाव आयोग का लोहा मान लेंगे .   फिलहाल उठा पटक जारी है . देखें ऊंट किस करवट बैठता है .

Saturday, April 8, 2017

अथ सेल्फी कथा

जैसे शीला की सेल्फी हिट हुई ऐसी सबकी हो

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
vivekranjan.vinamra@gmail.com

 "स्वाबलंब की एक झलक पर न्यौछावर कुबेर का कोष " राष्ट्र कवि मैथली शरण गुप्त की ये पंक्तियां सेल्फी फोटो कला के लिये प्रेरणा हैं . ये और बात है कि कुछ दिल जले  कहते हैं कि सेल्फी आत्म मुग्धता को प्रतिबिंबित करती हैं . ऐसे लोग यह भी कहते हैं कि सेल्फी मनुष्य के वर्तमान व्यस्त एकाकीपन को दर्शाती है . जिन्हें सेल्फी लेनी नही आती ऐसी प्रौढ़ पीढ़ी सेल्फी को आत्म प्रवंचना का प्रतीक बताकर अंगूर खट्टे हैं वाली कहानी को ही चरितार्थ करते दीखते हैं .
 अपने एलबम को पलटता हूं तो नंगधुड़ंग नन्हें बचपन की उन श्वेत श्याम  फोटो पर दृष्टि पड़ती हैं जिन्हें मेरी माँ या पिताजी ने आगफा कैमरे की सेल्युलर रील घुमा घुमा कर खींचा रहा होगा . अपनी यादो में खिंचवाई गई पहली तस्वीर में मैं गोल मटोल सा हूं , और शहर के स्टूडियो के मालिक और प्रोफेशनल फोटोग्राफर कम शूट डायरेक्टर लड़के ने घर पर आकर , चादर का बैकग्राउंड बनवाकर सैट तैयार करवाया था , हमारी फेमली फोटोग्राफ के साथ ही मेरी कुछ सोलो फोटो भी खिंची थीं . मुझे हिदायत दी थी कि मैं कैमरे के लैंस में देखूं , वहाँ से चिड़िया निकलने वाली है . घर के कम्पाउंड में वह जगह चुनी गई थी जिससे सूरज की रोशनी मुझ पर पड़े  और पिताजी के इकलौते बेटे का  बढ़िया सा फोटो बन सके . फोटो अच्छा ही है , क्योकि वह फ्रेम करवाया गया और बड़े सालों तक हमारे ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाता रहा .अब वह फोटो मेरी पत्नी और बच्चो के लिये आर्काईव महत्व का बन चुका है .
 यादो के एलबम को और पलटें तो स्कूल , कालेज के वे ग्रुप फोटो मिलते हैं जिन्हें हार्ड दफ्ती पर माउंट करके नीचे नाम लिखे होते थे कि बायें से दायें कौन कहां खड़ा है . मानीतर होने के नाते मैं मास्साब के बाजू में सामने की पंक्ति पर ही सेंटर फारवार्ड पोजीशन पर मौजूद जरूर हूं पर यदि नाम न लिखा हो तो शायद खुद को भी आज पहचानना कठिन हो . वैसे सच तो यह है कि मरते दम तक हम खुद को कहाँ पहचान पाते हैं , प्याज के छिलको या कहें गिरगिटान की तरह हर मौके पर अलग रंग रूप के साथ हम खुद को बदलते रहते हैं . आफिस के खुर्राट अधिकारी भी बीबी और बास के सामने दुम दबाते नजर आते हैं . शादी में जयमाला की रस्मो के सूत्रधार फोटोग्राफर ही होते हैं वे चाहें तो गले में पड़ी हुई माला उतरवा कर फिर से डलवा दें . शादी का हार गले में क्या पड़ता है , पत्नी जीवन भर शीशे में उतारकर फोटू खींचती रहती है ये और बात है कि वे फोटू दिखती नही जीवन शैली में ढ़ल जाती हैं .
  कालेज के दिन वे दिन होते हैं जब आसमान भी लिमिट नही होता . अपने कालेज के दिनो में हम स्टडी ट्रिप पर दक्षिण भारत गये थे . ऊटी के बाटनिकल गार्डेन के सामने खिंचवाई गई उस फोटो का जिक्र जरूरी लगता है जिसे निगेटिव प्लेट पर काले कपड़े से ढ़ांक कर बड़े से ट्रिपाईड पर लगे  कैमरे के सामने लगे ढ़क्ककन को हटाकर खींचा गया था , और फिर केमिकल ट्रे में धोकर कोई घंटे भर में तैयार कर हमें सुलभ करवा दिया गया था . कालेज के दिनो में हम फोटो ग्राफी क्लब के मेंम्बर रहे हैं . डार्क रूम में लाल लाइट के जीरो वाट बल्ब की रोशनी में हमने सिल्वर नाइत्रेट के सोल्यूशन में सधे हाथो से सैल्युलर फिल्में धोई और याशिका कैमरे में डाली हैं . आज भी वे निगेटिव हमारे पास सुरक्षित हैं , पर शायद ही उनसे अब फोटो बनवाने की दूकाने हों .
 डिजिटल टेक्नीक की क्रांति नई सदी में आई . पिछली सदी के अंत में तस्करी से आये जापानी आटोमेटिक टाइमर कैमरे को सामने सैट करके रख कर मिनिट भर के निश्चित समय के भीतर कैमरे के सम्मुख पोज बनाकर सेल्फी हमने खींची है , पर तब उस फोटो को सेल्फी कहने का प्रचलन नहीं था . सेल्फी शब्द की उत्पत्ति मोबाइल में कैमरो के कारण हुई . यूं तो मोबाईल बाते करने के लिये होता है पर इंटनेट , रिकार्डिग सुविधा , और बढ़िया कैमरे के चलते अब हर हाथ में मोबाईल , कम्प्यूटर से कहीं बढ़कर बन चुके हैं . जब हाथ में मोबाईल हो , फोटोग्राफिक सिचुएशन हो , सिचुएसन न भी हो तो खुद अपना चेहरा किसे बुरा दिखता है .  ग्रुप फोटो में भी लोग अपना ही चेहरा ज्यादा देखते हैं . हर्रा लगे न फिटकरी रंग चोखा आये की शैली में सेल्फी खींचो और डाल दो इंस्टाग्राम या फेसबुक पर लाईक ही लाईक बटोर लो . अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ साधन हैं सेल्फी . मेरे फेसबुक डाटा बताते हैं कि मेरी नजर में मेरे अच्छे से अच्छे व्यंग को भी उतने लाइक नही मिलते जितने मेरी खराब से खराब प्रोफाइल पिक को लोड करते ही मिल जाते हैं . शायद पढ़ने का समय नही लगाना पड़ता , नजर मारो और लाइक करो इसलिये . शायद इस भावना से भी कि सामने वाला  भी लाइक रेसीप्रोकेट करेगा . यूं लड़कियो को यह प्रकृति प्रदत्त सुविधा है कि वे किसी को लाइक करें न करें उनकी फोटो हर कोई लाइक करता है .
 सेल्फी से ही रायल जमाने के तैल चित्र बनवाने के मजे लेने हो तो अब आपको घंटो एक ही पोज पर चित्रकार के सामने स्थिर मुद्रा में बैठने की कतई जरूरत नहीं है . प्रिज्मा जैसे साफ्टवेयर मोबाईल पर उपलब्ध हैं , सेल्फी लोड करिये और अपना राजसी तैल चित्र बना लीजीये वह भी अलग अलग स्टाइल में मिनटो में .
 जब सस्ती सरल सुलभ सेल्फी टेक्नीक हर हाथ में हो तो उसके व्यवसायिक उपयोग केसे न हों . कुछ इनोवेटिव एम बी ए पढ़े प्रोडक्ट मेनेजर्स ने उनके उत्पाद के साथ  सेल्फी लोड करने  पर पुरस्कार योजनायें भी बना डालीं . परसाई जी , शरद जी , श्रीलाल शुक्ल व्यंग लिखते रहे हम आप ज्ञान चतुर्वेदी ,आलोक पुराणिक , अनूप शुक्ल और टैग किये गये सारे व्यंगकारों सहित कई मित्र  व्यंग लिख रहे हैं  पर व्यंग को हास्य में ढ़ालकर रुपये बना रहे हैं कपिल शर्मा अपने टीवी शो के जरिये . वे भी लावा सेल्फी धड़्ड़ले से खिंचे जा रहे हैं . तो अपनी ढ़ेर सी शुभकामनायें . सैल्फी युग में सब कुछ हो . भगवान से यही दुआ है कि हम सैल्फिश होने से बचें और खतरनाक सेल्फी लेते हुये  किसी पहाड़ की चोटी ,  बहुमंजिला इमारत , चलती ट्रेन , या बाइक पर स्टंट की सेल्फी लेते किसी की जान न जावें .

Saturday, March 4, 2017

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक हमारी पत्नी

व्यंग लेख
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक हमारी पत्नी
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , नयागांव जबलपुर
९४२५८०६२५२ , ७०००३७५७९८
vivek1959@yahoo.co.in

        उनकी सब सुनना पड़ती है अपनी सुना नही सकते , ये बात रेडियो और बीबी दोनो पर लागू होती है . रेडियो को तो बटन से बंद भी किया जा सकता है पर बीबी को तो बंद तक नही किया जा सकता . मेरी समझ में भारतीय पत्नी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा प्रतीक है .
        क्रास ब्रीड का एक बुलडाग सड़क पर आ गया , उससे सड़क के  देशी कुत्तो ने पूछा, भाई आपके वहाँ बंगले में कोई कमी है जो आप यहाँ आ गये ? उसने कहा,  वहाँ का रहन सहन , वातावरण, खान पान, जीवन स्तर सब कुछ बढ़िया है , लेकिन बिना वजह भौकने की जैसी आजादी यहाँ है ऐसी वहाँ कहाँ ?  अभिव्यक्ति की आज़ादी जिंदाबाद .
        अस्सी के दशक के पूर्वार्ध में ,जब हम कुछ अभिव्यक्त करने लायक हुये , हाईस्कूल में थे . तब एक फिल्म आई थी "कसौटी" जिसका एक गाना बड़ा चल निकला था , गाना क्या था संवाद ही था ... हम बोलेगा तो बोलोगे के बोलता है एक मेमसाब है, साथ में साब भी है मेमसाब सुन्दर-सुन्दर है, साब भी खूबसूरत है दोनों पास-पास है, बातें खास-खास है दुनिया चाहे कुछ भी बोले, बोले हम कुछ नहीं बोलेगा हम बोलेगा तो...हमरा एक पड़ोसी है, नाम जिसका जोशी है ,वो पास हमरे आता है, और हमको ये समझाता है जब दो जवाँ दिल मिल जाएँगे, तब कुछ न कुछ तो होगा
जब दो बादल टकराएंगे, तब कुछ न कुछ तो होगा दो से चार हो सकते है, चार से आठ हो सकते हैं, आठ से साठ हो सकते हैं जो करता है पाता है, अरे अपने बाप का क्या जाता है ?
जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले,  हम तो कुछ नहीं बोलेगा , हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है .
        अभिव्यक्ति की आजादी और उस पर रोक लगाने की कोशिशो पर यह बहुत सुंदर अभिव्यक्ति थी . यह गाना हिट ही हुआ था कि आ गया था १९७५ का जून और देश ने देखा आपातकाल , मुंह में पट्टी बांधे सारा देश समय पर हाँका जाने लगा . रचनाकारो , विशेष रूप से व्यंगकारो पर उनकी कलम पर जंजीरें कसी जाने लगीं .  रेडियो बी बी सी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया . मैं  इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ रहा था ,उन दिनो हमने जंगल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा लगाई , स्थानीय समाचारो के साइक्लोस्टाइल्ड पत्रक बांटे . सूचना की ऐसी  प्रसारण विधा की साक्षी बनी थी हमारी पीढ़ी .  "अमन बेच देंगे,कफ़न बेच देंगे , जमीं बेच देंगे, गगन बेच देंगे कलम के सिपाही अगर सो गये तो, वतन के मसीहा,वतन बेच देंगे" ये पंक्तियां खूब चलीं तब . खैर एक वह दौर था जब विशेष रूप से राष्ट्र वादियो पर , दक्षिण पंथी कलम पर रोक लगाने की कोशिशें थीं .
        अब पलड़ा पलट सा गया है . आज  देश के खिलाफ बोलने वालो पर उंगली उठा दो तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन कहा जाने का फैशन चल निकला है . राजनैतिक दलो के  स्वार्थ तो समझ आते हैं पर विश्वविद्यालयो , और कालेजो में भी पाश्चात्य धुन के साथ मिलाकर राग अभिव्यक्ति गाया जाने लगा है  इस मिक्सिंग से जो सुर निकल रहे हैं उनसे देश के धुर्र विरोधियो , और पाकिस्तान को बैठे बिठाये मुफ्त में  मजा आ रहा है . दिग्भ्रमित युवा इसे समझ नही पा रहे हैं .
        गांवो में बसे हमारे भारत पर दिल्ली के किसी टी वी चैनल  में हुई किसी छोटी बड़ी बहस से या बहकावे मे आकर  किसी कालेज के सौ दो सौ युवाओ की  नारेबाजी करने से कोई अंतर नही पड़ेगा . अभिव्यक्ति का अधिकार प्रकृति प्रदत्त है , उसका हनन करके किसी के मुंह में कोई पट्टी नही चिपकाना चाहता  पर अभिव्यक्ति के सही उपयोग के लिये युवाओ को दिशा दिखाना गलत नही है , और उसके लिये हमें बोलते रहना होगा फिर चाहे जोशी पड़ोसी कुछ बोले या नानी , सबको अनसुना करके  सही आवाज सुनानी ही होगी कोई सुनना चाहे या नही .शायद यही वर्तमान स्थितियो में  अभिव्यक्ति के सही मायने होंगे .  हर गृहस्थ जानता है कि  पत्नी की बड़ बड़  लगने वाली अभिव्यक्ति परिवार के और घर के हित के लिये ही होती हैं . बीबी की मुखर अभिव्यक्ति से ही बच्चे सही दिशा में बढ़ते हैं और पति समय पर घर लौट आता है ,  तो अभिव्यक्ति की प्रतीक पत्नी को नमन कीजीये और दैस हित में जो भी हो उसे अभिव्यक्त करने में संकोच न कीजीये . कुछ तो लोग कहेंगे लोगो का काम है कहना , छोड़ो बेकार की बातो में कही बीत न जाये रैना ! टी वी पर तो प्रवक्ता कुछ न कुछ कहेंगे ही उनका काम ही है कहना .

Thursday, March 2, 2017

शराफत छोड़ दी मैने

व्यंग
शराफत छोड़ दी मैने
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , नयागांव जबलपुर
९४२५८०६२५२ , ७०००३७५७९८
vivek1959@yahoo.co.in

  बहुत देख लिया शरीफ बनकर . चाहे जो गदहा बनाकर निकल जाता है . बीबी लल्लू कह कर आंख मार देती है और मै कसमसा कर रह जाता हूं . शराफत के बाने पहने घूमते  हुये बाहर कोई और आंख मारती भी है तो  मै गधा यही समझता हूं कि उनकी आँख फड़क गई होगी ऐसी स्थिति में  वह पक्का उल्लू समझती होगी मुझ शरीफ को . आफिस में हर कोई गदहे की तरह लादे रहता है , कोल्हू के बैल की तरह मैं शराफत का चोला ओढ़े काम में जुटा रहता हूं  . मेट्रो में ट्रेवल करते हुये खाली पड़ी लेडीज या सिनीयर सिटिजन सीट पर  बैठना तो दूर मैं संस्कारी शरीफ अपनी जनरल सीट भी खट से आफर कर देता हूं किसी बुजुर्ग या महिला को  खड़े देख , जिस पर वह बिना थैंन्क्यू बोले धप से बैठ जाने में कतई संकोच नहीं करती .मैं अपनी शराफत के साथ कोने में खड़ा रह जाता हूं .  पिक्चर हाल में इंटरवल में पिज्जा कार्नर पर लगी लाइन में मेरी शराफत के चलते मुझे सबसे अंत में ही मेरा आर्डर मिल पाता है , तब तक इंटरवल समाप्त होकर पिक्चर शुरू हो चुकी होती है . अफिस में किसी विएय पर जब चाय पर चरचा का ग्रुप डिस्कशन होता है तो मुझे प्लीज प्लीज कहती लोकसभा अध्यक्ष और स्वयं की शराफत में अधिक अंतर नही दिखता . शराफत के बीज मुझमें जाने कैसे और कब पड़ गये थे , पर स्कूल में मुझे इनोसेंट , शाई , वगैरह कहा जाता था ,बिनोबा भावे की  संस्कारधानी का निवासी मैं धीरे धीरे अनजाने ही शरीफ बन गया . गांधी की जीवनी पढ़कर अपरोक्ष ही मैं इतना  प्रभावित हो गया लगता हूं कि मैने शराफत का ठेका ही ले लिया .
 मेरी शराफत के चलते जब मैने देखा कि मैं अपने बच्चो का सुपरमैन हीरो नही बन पा रहा हूं , इतना ही नही मंहगाई के इन दिनो में मेरी शराफत मेरे पर्स पर भी भारी पड़ने लगी है तो मेरा दिशा दर्शन किया विविधभारती पर बजते एक फिल्मी गाने ने "शराफत छोड़ दी मैंने " अपने नेताओ के कट्टर अनुयायी  मैने जबसे बड़े बड़े राजनेताओ के चुनावी भाषण सुने हैं , मै शराफत छोड़ने का निर्णय ले लेना चाहता था  . किसी निबंध में पढ़ा यह वाक्य मुझे याद आ रहा है , हमारी फिल्में हमारे अवचेतन मन पर गहन प्रभाव छोड़ती है , मुझ सरीफ पर भी शराफत छोड़ दी मैने गीत का प्रभाव पड़ता दीखता है . इन दिनो मैने शराफत छोड़ दी है .  पूरी बेशर्मी से अपने सहायक पर अपना सारा काम उंडेलकर मैं गुलछर्रे उड़ाता इस टेबल से उस टेबल पर मटरगश्ती करता रहता हूं इन दिनो आफिस में . कोई कुछ कहता है तो सरेआम घोषणा दोहरा देता हूं अपनी शराफत को तिलांजली दे देने की , सामने वाला शायद मेरी पुरानी शराफत वाले दिनो में किये गये मेरे शोषण को स्मरण कर कुछ नही कहता , मैं मन ही मन हँस लेता हूं . लाइन में धक्का मुक्की करते हुये आगे बढ़ने की मेरी विशुद्ध भारतीय शैली में शराफत छोड़ते ही जबरदस्त इजाफा हुआ है , यह योग्यता नोटबंदी के दिनो में मेरे बहुत काम आई , मैने मन ही मन कहा भी थैंक गाड , मैने शराफत छोड़ दी .
 अब मैं अपनी बीबी का हीमैन बन चुका हूं जो उसे मोटर साइकल पर पीछे चिपकाये , तेज हार्न मारते हुये कट मारकर आगे ही आगे बढ़ता जाता है बेहिचक .शराफत का नकली चोला छोड़कर बिंदास जी रहा हूं अपनी ठेठ देशी मौलिकता के साथ ठाठ से , बिना बनावटी मुस्कान के .

आंकड़ेबाजी

व्यंग
आंकड़ेबाजी

विवेक रंजन श्रीवास्तव
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , नयागांव जबलपुर
९४२५८०६२५२
vivek1959@yahoo.co.in

        मोदी जी बोलते तो हम ना भी मानते , पर जब आंकड़े बोल रहे हैं कि देश की विकास दर नोट बंदी से कम नही हुई है तो क्या करे ,  मानना ही पड़ेगा . हम तो एक दिन स्टेशन पर अपना मोबाइल वैलेट लेकर स्टाल स्टाल पर चाय ढ़ूंढ़ रहे थे ,पर हमें चाय नसीब नहीं हुई थी , पर एक कप चाय से देश की विकास दर थोड़े ही गिरती है !
        आंकड़ा तो यह भी है कि भीम एप दुनिया का सबसे कम समय में सबसे ज्यादा डाउन लोडेड एप बन चुका है हमने भी इसे डाउन लोड कर रखा है , जाने कब कौन हमें भीम से भीमकाय राशि देने की पेशकश कर दे इस कैश लैस करेंसी के युग में . पर यह बात और है कि न तो आज तक हमने किसी को भीम से एक रुपया दिया है और न ही अब तक हमें किसी ने फूटी कौड़ी भी भीम से  देने की पेशकश ही की है .सच तो यह है कि एक बार देश के बदलते वातावरण से तादात्म्य बनाने के लिये जब पेटीएम का फुल पेज विज्ञापन देखा था तो उत्साह में अपने मोबाईल में पेटीएम पर  ५००० रु शिफ्ट कर लिये थे , जब लम्बे समय तक उनका कोई उपयोग नही हो सका तो बच्चो को दो दो हजार शिफ्ट किये , एक बार  पेटीएम से पिक्चर की टिकिट बुक की , अगले फ्री टिकिट के आफर को इग्नोर किया ,और  बेवजह ओला से थियेटर गये फिर भी एक सौ छियासठ रुपये अभी भी हमारे मोबाईल में बचे हुये हैं , अब उन्हें ठिकाने लगाकर मुक्ति पाने के लिये बिजली बिल की राह देख रहे हैं .
        बात उन दिनो की है जब अमेरिका और रूस में कोल्ड वार हुआ करता था . ओलम्पिक की किसी स्पर्धा में केवल अमेरिका और रूस के ही खिलाड़ी फाइनल में  थे . अमेरिकन बन्दा पहले नम्बर पर आया और रशियन दूसरे नम्बर पर . अब आंकड़ेबाजी की रिपोर्टिंग सुनिये , अमेरिकन रेडियो ने कहा "अमेरिकन वेयर फर्स्ट एन्ड ड़सियन वेयर लास्ट" . रशियन न्यूज ने लिखा , "रशियन वेयर स्टुड सेकेंड , व्हेयर एज अमेरिकनस वेयर लास्ट बट वन " . गलत बिल्कुल नही , शत प्रतिशत सही कहा दोनो ने बस थोड़ा सा केल दिखा दिया आंकड़े बाजी का . 
        किसी अधिकारी को अपने दो मातहत कर्मचारियो की गोपनीय चरित्रावली लिखनी थी , पहला उनका बड़ा प्रिय था उनकी ठकुरसुहाती करता था यद्यपि काम काज में ढ़ीला ढ़ाला था , जबकि दूसरा मेहनती था पर काम से काम रखता था , अफसर की हाँ में हाँ नही मिलाता था . पहले ने कुल जमा दो ही प्रोजेक्ट किये थे , और उससे पिछले साल में तो केवल एक ही प्रोजेक्ट किया था , जबकि दूसरे ने जहाँ पिछले साल दस काम किये थे , वही इस साल और मेहनत करके अपना ही रिकार्ड तोड़कर ११ काम पूरे कर डाले थे . अफसर आंकड़ेबाज था . उसने अपने चहेते की रिपोर्ट में लिखा " ही अचीव्ड १०० परसेंट ग्रोथ " , लिखना न होगा कि दूसरे बन्दे की ग्रोथ केवल १० प्रतिशत दर्ज हुई थी . तो ये मजे होते हैं आंकड़ो के खेल के . स्टेटिस्टिकल आफीसर्स यही करतब करते रहते हैं और सरकारी रिकार्डो में दुखी पीडित जनता की मुस्कराती हुई तस्वीर छपती रहती है .
        आंकड़े केवल संख्याओ के ही नही होते ,  ट्रेन के तो सारे डब्बे ही एक दूसरे से आंकड़ो से फंसे खिंचते चले जाते हैं , आंकड़ो में फंसाकर कुंए में गिरी हुई बाल्टी हमने निकाली है .राजनेता हमेशा अपने आंकड़े खुले रखते हैं जाने कब किसको साथ लेना पड़े सरकार बनाने के लिये और जाने कब किसकी पैंट खींचनी पड़े आंकड़े फंसा कर . हुक अप , हैंगआउट वगैरह तो युवाओ के बड़े उपयोगी जुमले हैं . इन दिनो युवा प्रेमी , प्रेम से पहले हुक अप संस्कार से गुजरते हैं . गूगल हैंग आउट हम सभी ने किया है . लेकिन  आंकड़े बाजी के इस आंतरिक विश्लेषण का यह मतलब कतई नही है कि मुझे देश की विकास दर पर कही से भी जरा भी संशय है . देश बढ़े , आंकड़ो में भी बढ़े और असल में भी बढ़े . खूब बढ़े .

Sunday, February 5, 2017

धन्नो , बसंती और बसंत

धन्नो , बसंती और बसंत
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर
९४२५८०६२५२

                                                    बसंत बहुत फेमस है  पुराने समय से  , बसंती भी धन्नो सहित शोले के जमाने से फेमस हो गई है  .
बसंत हर साल आता है , जस्ट आफ्टर विंटर. उधर कामदेव पुष्पो के बाण चलाते हैं और यहाँ मौसम सुहाना हो जाता है .बगीचो में फूल खिल जाते हैं . हवा में मदमस्त गंध घुल जाती है . भौंरे गुनगुनाने लगते हैं .रंगबिरंगी  तितलियां फूलो पर मंडराने लगती है . जंगल में मंगल होने लगता है . लोग बीबी बच्चो मित्रो सहित पिकनिक मनाने निकल पड़ते हैं .  बसंती के मन में उमंग जाग उठती है .उमंग तो धन्नो के मन में भी जागती ही होगी पर वह बेचारी हिनहिनाने के सिवाय और कुछ नया कर नही पाती .
                                                    कवि और साहित्यकार होने का भ्रम पाले हुये बुद्धिजीवियो में यह उमंग कुछ ज्यादा ही हिलोरें मारती पाई जाती है . वे बसंत को लेकर बड़े सेंसेटिव होते हैं . अपने अपने गुटों में सरस्वती पूजन के बहाने कवि गोष्ठी से लेकर साहित्यिक विमर्श के छोटे बड़े आयोजन कर डालते हैं . डायरी में बंद अपनी  पुरानी कविताओ  को समसामयिक रूपको से सजा कर बसंत के आगमन से १५ दिनो पहले ही उसे महसूस करते हुये परिमार्जित कर डालते हैं और छपने भेज देते हैं . यदि रचना छप गई तब तो इनका बसंत सही तरीके से आ जाता है वरना संपादक पर गुटबाजी के षडयंत्र का आरोप लगाकर स्वयं ही अपनी पीठ थपथपाकर दिलासा देना मजबूरी होती है . चित्रकार बसंत पर केंद्रित चित्र प्रदर्शनी के आयोजन करते हैं . कला और बसंत का नाता बड़ा गहरा  है .
                                                     बरसात होगी तो छाता निकाला ही जायेगा , ठंड पड़ेगी तो स्वेटर पहनना ही पड़ेगा , चुनाव का मौसम आयेगा  तो नेता वोट मांगने आयेंगे ही , परीक्षा का मौसम आयेगा  तो बिहार में नकल करवाने के ठेके होगें ही . दरअसल मौसम का हम पर असर पड़ना स्वाभाविक ही है . सारे फिल्मी गीत गवाह हैं कि बसंत के मौसम से दिल  वेलेंटाइन डे टाइप का हो ही जाता है . बजरंग दल वालो को भी हमारे युवाओ को  संस्कार सिखाने के अवसर  और पिंक ब्रिगेड को  नारी स्वात्रंय के झंडे गाड़ने के स्टेटमेंट देने के मौके मिल जाते हैं . बड़े बुजुर्गो को जमाने को कोसने और दक्षिणपंथी लेखको को नैतिक लेखन के विषय मिल जाते हैं .
                                                    मेरा दार्शनिक चिंतन धन्नो को प्रकृति के मूक प्राणियो का प्रतिनिधि मानता है , बसंती आज की युवा नारी को रिप्रजेंट करती है , जो सारे आवरण फाड़कर अपनी समस्त प्रतिभा के साथ दुनिया में  छा जाना चाहती है . आखिर इंटरनेट पर एक क्लिक पर अनावृत  होती सनी लिओने सी बसंतियां स्वेच्छा से ही तो यह सब कर रही हैं . बसंत प्रकृति पुरुष है . वह अपने इर्द गिर्द रगीनियां सजाना चाहता है , पर प्रगति की कांक्रीट से बनी गगनचुम्बी चुनौतियां , कारखानो के हूटर और धुंआ उगलती चिमनियां बसंत के इस प्रयास को रोकना चाहती है , बसंती के नारी सुलभ परिधान , नृत्य , रोमांटिक गायन को  उसकी कमजोरी माना जाता है . बसंती के कोमल हाथो में फूल नहीं कार की स्टियरिंग थमाकर , जीन्स और टाप पहनाकर उसे जो चैलेंज जमाना दे रहा है , उसके जबाब में नेचर्स एनक्लेव बिल्डिंग के आठवें माले के फ्लैट की बालकनी में लटके गमले में गेंदे के फूल के साथ सैल्फी लेती बसंती ने दे दिया है , हमारी बसंती जानती है कि  उसे बसंत और धन्नो के साथ सामंजस्य बनाते हुये कैसे बजरंग दलीय मानसिकता से जीतते हुये अपना पिंक झंडा लहराना है .