Sunday, May 21, 2017

तर्जनी बनाम अनामिका



व्यंग
अनामिका 

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
, ७०००३७५७९८

मेरी एक अकविता याद आ रही है ,जिसका शीर्षक ही है "शीर्षक".कविता छोटी सी है , कुछ यूं

एक कविता
एक नज्म  
एक गजल हो 
तुम तरन्नुम में 
और मैं 
महज कुछ शब्द बेतरतीब से 
जिन्हें नियति ने बना दिया है 
तुम्हारा शीर्षक 
और यूं
मिल गया है मुझे अर्थ 
 जबसे मैने अपनी एकमेव पत्नी को अपनी यह कविता सुनाई है , उसे मेरा लिखा अच्छा लगने लगा है . और मुझे सचमुच जीवन सार्थक लगने लगा है . मतलब शीर्षक ही होता है जो हमें अर्थ देता है .मैं फेमनिस्ट हूं  इसलिये जब बिना शीर्षक के लिखने का शीर्षक तय करना था तो हमने अनामिका पर लिखने का फैसला किया . अनामिका मतलब बिना नाम   यूँ  तो सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का कविता संग्रह "अनामिका" बरसो पहले ही आ चुका है और जाने कितनी ही लड़कियो का नाम अनामिका रखा चुका है . अनामिका नाम की फिल्म भी बन चुकी है  शायद इसलिये क्योकि इस शब्द में किंचित ध्वनि की मधुरता भी है . तो जब कुछ न सूझे और कुछ नामकरण जरूरी हो तो अनामिका शीर्षक उपयुक्त लगता है .  
 दुनिया भर में अनामिका यानी रिंग फिंगर में  इंगेजमेंट रिंग पहनकर पत्नियां अपने पतियो को तर्जनी के इशारो पर नचाने की ताकत रखती हैं . ये और बात है कि फेमनिस्ट होने के नाते मैं पूरी शिद्दत से मानता हूं कि महिलायें अपनी इस अपार शक्ति का पूरा उपयोग नहीं करती या नही कर पातीं वरना ... एनी वे . 
 लेखक , वकील और नेता शब्दो के बाजीगर होते हैं , वे किसी भी विषय पर स्वप्न बुन सकते हैं . लेखक अपने वाक्जाल से रची  अपनी रचना पढ़कर खुद की पीठ थपथपाता है वकील भरी अदालत में अपने शब्दो के माया जाल से सच को झूठ और झूठ को सच साबित कर देता है , न्याय की मूर्ति आँखो पर काली पट्टी बांधे वही ठीक मान लेती है जो बड़ा वकील बोलता है . जैसे बेचारा पाकिस्तान इकबालिया बयान लिये बैठा रह गया और साल्वे जी इंटरनेशनल अदालत में हमारे लिये मैदान जीत आये . नेता तो बिना लिखे ही अपने भाषणो से शब्दो का जाल फैलाकर उसमें वोट फांस लेता है .शब्दो से स्वप्न दिखाकर जनता को मीठी नींद सुला देता है उनके सारे गम भुलाकर उनहें अपने पक्ष में हिप्नोटाइज कर लेता है और खुद जनता के कंधो पर चढ़कर सत्ता के शीर्ष तक पहुंच जाता है , जहाँ मख्खन की मटकी बंधी होती है .  आजकल तो और भी नये प्रयोग चल रहे हैं पड़ोसियो के एटमी बमो तक को  शब्दो से मात देने के लिये नेता जी के व्यक्तव्य गढ़े जा रहे हैं . बयान छप रहे हैं. इस कला पर सोढ़ की जरूरत है . 
 शोध कर्ता भी तरह तरह के शोध करते हैं , सच पूछा जाये तो सारे ढ़ंग तरीके के शोध हो ही चुके हैं , इसलिये इन दिनो  शोधकर्ता पुरानी किसी थीसिस का टाइटिल बदलकर , दस पांच संबंधित शोध कार्य मिलाकर बिबलियो ग्राफी बनाकर अपनी नई थीसिस तैयार करते पाये जाते हैं जैसा हमारे देश के विश्वविद्यालयो में होता है . या फिर पश्चिम के स्वनाम ख्यात यूनिवर्सिटीज में शोध के नाम पर बाल की खाल निकाली जाती है . हाल ही फ्लोरिडा विश्वविद्यालय में  रिंग फिंगर को लेकर ऐसा ही शोध कार्य सम्पन्न हुआ है . जिसके अनुसार अनामिका अंगुली को शुक्राणुओं की संख्या, आक्रामक व्यवहार, यौन अनुकूलन और खेल कौशल से जोड़ा गया है.   ऐसा पाया गया कि पुरुष की तर्जनी की अपेक्षा अनामिका की लम्बाई  का संबंध उसकी उच्च सेक्स रुचि से है। 
 जो भारतीय हर बात में अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं और मानते हैं कि पुष्पक विमान तो उनके पास रामायण काल से ही है , या संजय ने महाभारत के युद्ध का लाइव  टेलीविजन प्रसारण किया था जैसा आजकल के दीपक चौरसिया डायरेक्ट जीरो पाइंट से रिपोर्टिंग करते पाये जाते हैं , उनके लिये गर्व का विषय हो सकता है कि भारतीय ज्योतिष के अनुसार पहले से ही अनामिका के नीचे सूर्य पर्वत माना जाता है .धार्मिक मान्यता के अनुसार अनामिका अंगुली पर स्वयं भगवान शंकर का वास माना जाता है. इसी कारण अनामिका अंगुली को सर्वथा धार्मिक रूप से पवित्र कहा गया है और  पूजा अनुष्ठान आदि धार्मिक कार्यों में अनामिका उंगली में कुशा से बनी पवित्री धारण करने की परम्परा है . अनामिका उंगली से ही देवगणों को गंध और अक्षत अर्पित किया जाता है. यही उंगली मान, धन ,संतान , यश और कीर्ति की सूचक है .  इसलिये महिलाओ को अपनी बिन मांगी सलाह है कि यदि उन्हें अपनी तर्जनी पर पुरुष को नचाना है तो उसकी अनामिका पर ध्यान दीजीये .

Wednesday, May 17, 2017

सिफारिशी घंटी का सवाल है बाबा

व्यंग
एक सिफारिशी घंटी का सवाल है बाबा

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
vivekranjan.vinamra@gmail.com


        अब तो मोबाईल का जमाना आ गया है , वरना टेलीफोन के जमाने में हमारे जैसो को भी लोगो को नौकरी पर रखने के अधिकार थे . और उन दिनो नौकरी के इंटरव्यू से पहले अकसर सिफारिशी टेलीफोन आना बड़ी कामन बात थी . सेलेक्शन का एक क्राइटेरिया यह भी रखना पड़ता था कि सिफारिश किसकी है . मंत्री जी की सिफारिश , बड़े साहब की सिफारिश   और रिश्तेदारो की सिफारिश में संतुलन बनाना पड़ता था . एक सिफारिशी घंटी केंडीडेट का भाग्य बदलने की ताकत रखती थी . अक्सर नेता जी से संबंध टेलीफोन की सिफारिशी घंटी बजवाने के काम आते थे .
        आज भी विजिटिंग कार्ड का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है टेलीफोन नम्बर , और टेबिल का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण होता है टेलीफोन . टेलीफोन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य होता है सिफारिश . टेलीफोन की घंटी से सामने बैठा व्यक्ति गौण हो जाता है , दूर टेलीफोन के दूसरे छोर पर बैठा व्यक्ति महत्वपूर्ण हो जाता है . जिस तरह पानी उंचाई से नीचे की ओर प्रवाहित होता है उसी तरह टेलीफोन में हुई वार्तालाप का नियम है कि इसमें हमेशा ज्यादा महत्वपूर्ण आदमी , कम महत्वपूर्ण आदमी को इंस्ट्रक्शन देता है . उदाहरण के तौर पर मेरी पत्नी मुझे घर के टेलीफोन से आफिस के टेलीफोन पर इंस्ट्रक्शन्स देती है . मंत्री जी बड़े साहब को और बड़े साहब अपने मातहतो को महत्वपूर्ण या गैर महत्वपूर्ण कार्यो हेतु भी महत्वपूर्ण तरीके से आदेशित करते हैं . टेलीफोन के संदर्भ में एक नियम और भी है , ज्यादा बड़े लोग अपना टेलीफोन स्वयं नहीं उठाते . इसके लिये उनके पास पी ए टाइप की कोई सुंदरी होती है जो बाजू के कमरे में बैठ कर उनके लिये यह महत्वपूर्ण कार्य करती है और एक्सटेंशन टेलीफोन पर महत्वपूर्ण काल ही फारवर्ड करती है . टेलीफोन एटीकेट्स के अनुसार मातहत को अफसर की बात सुनाई दे या न दे , समझ आये या न आये , किन्तु सर ! सर !  कहते हुये आदेश स्वीकार्यता का संदेश अपने बड़े साहब को देना होता है . मुझे गर्व है कि अपनी लम्बी नौकरी में मैने ऐसे लोग भी देखे हैं जो बड़े साहब का टेलीफोन आने पर अपनी सीट पर खड़े होकर बात करते हैं . ऐसे लोगो को नये इलेक्ट्रानिक टेलीफोन में कालर आई डी लग जाने से बड़ा लाभ हुआ है .  आजकल बड़े साहब का मोबाईल आने पर ऐसे लोग तुरंत सीट से उठकर गतिमान हो जाते हैं . यह बाडी लेंगुएज उनकी भारी दबाव में आने वाली मानसिक स्थिति की द्योतक होती है .
        हमारी पीढ़ी ने चाबी भरकर चार्ज कर बात करने के हैंडिल वाले टेलीफोन के समय से आज के टच स्क्रीन मोबाईल तक का सफर तय किया है . इस बीच डायलिग करने वाले मेकेनिकल फोन आये जिनकी वही रिटी पिटी ट्रिन ट्रिन वाली घंटी होती थी जैसे आजकल आधे कटे सेव वाले मंहगे एप्पल मोबाईल की  एक ही सुर की घंटी होती है . समय के साथ की पैड वाले इलेक्ट्रानिक फोन आये . और अब हर हाथ में मोबाईल का नारा सच हो रहा है , लगभग हर व्यक्ति के पास दो मोबाइल या कमोबेश दो सिम तो हैं ही . एक समय था जब टेलीफोन आपरेटर की शहर में बड़ी पहचान और इज्जत होती थी , क्योकि वह  ट्रंक काल पर मिनटो में किसी से भी बात करवा सकता था . शहर के सारे सटोरिये रात ठीक आठ बजे क्लोज और ओपन के नम्बर जानने के लिये मटका किंग से हुये इशारो के लिये इन्हीं आपरेटरो पर निर्भर होते थे . आज तो पत्नी भी पसंद नही करती कि पति का काल उसके मोबाईल पर आ जाये , पर मुझे स्मरण है उन दिनो हमारे घर पर पड़ोसियो के फोन साधिकार आ जाते थे . लाइटनिंग काल के चार्ज आठ गुने  लगते थे अतः लाइटनिंग काल आते ही लोग सशंकित हो जाते थे .
        मैं विद्युत विभाग में अधिकारी हूं , हमारे विभाग में बिजली की हाई टेंशन लाइन पर पावर लाइन कम्युनिकेशन कैरियर की अतिरिक्त सुविधा होती है , जिस पर हम हाट लाइन की तरह बातें कर सकते हैं , बातें करने की ठीक इसी तरह रेलवे की भी अपनी समानांतर व्यवस्था है . पुराने दिनो में कभी जभी अच्छे बुरे महत्वपूर्ण समाचारो के लिये हम लोग भी अनधिकृत रूप से अपनी इस समानांतर व्यवस्था का लाभ मित्र मण्डली को दे दिया करते थे . बातो के भी पैसे लगते हैं और बातो से भी पैसे बनाये जा सकते हैं यह सिखाता है टेलीफोन . यह बात मेरी पत्नी सहित महिलाओ की समझ आ जाये तो दोपहर में क्या बना है से लेकर पति और बच्चो की लम्बी लम्बी बातें करने वाली हमारे देश की महिलायें बैठे बिठाये ही अमीर हो सकती हैं . खैर महिलायें जब बातो से पेसे बनायेंगी तब की तब देखेंगे फिलहाल तो मायावती की माया टेलीफोन पर हुई उनकी बातो की रिकार्डिंग सुनाकर लुटती दिख रहि है .

Saturday, May 6, 2017

खीरा सर से काटिये, मलिये नमक लगाए, देख कबीरा यह कहे, कड़वन यही सुहाए

व्यंग्य

गनीमत है वे अंखियो से गोली नही

विवेक रंजन  श्रीवास्तव
 vivek1959@yahoo.co.in

 हम सब बहुत नादान हैं . इधर पाकिस्तान ने दो चार फटाके फोड़े नहीं कि  हमारा मीडीया हो हल्ला मचाने लगता है . जनता नेताओ को याद दिलाने लगती है कि तुमको चुना ही इसलिये था कि तुम पाकिस्तान को सबक सिखाओगे , बदला लो .  धिक्कार है हम पर जो अपने ही चुने गये नेताओ से सवाल करते हैं . दरअसल हमारे राजनेता बड़े साहित्यिक किस्म के हैं . जरूर उन्होने यह दोहा पढ़ा होगा " अस्त्र-शस्त्र के वार शत, करते कम आघात , वार जीभ का जब लगे, समझो पाई मात ".  यही कारण है कि जब जब बाजू वाला अपने बमो से वार करता है नेता जी कड़े शब्दो में जुबानी जंग लड़ते नजर आते हैं . कठोर शब्दो में भर्तस्ना करते हैं . विरोध दर्ज करते हैं .
 मुश्किल समय में विचलित न होने का संदेश भी चाणक्य नीति है . हमारे नेता भी असीम धैर्य का परिचय देते हैं वे दिलासा देते हैं कि शहीदो  का खून बेकार नही जायेगा . हमें गर्व करना चाहिये अपने ऐसे स्थित प्रज्ञ नेताओ पर . और भगवान का शुक्र मनाना चाहिये कि इन नेताओ ने यह नही पढ़ा  "तेरे कटाक्ष , ले लेते  हैं मेरे प्राण, चितवन को भेद जाते हैं , तेरे नयनों के तीर कमान " .  भले ही उन्होने यह पढ़ा हो और सुना भी हो कि "अँखियन से गोली मारे" पर कम से कम उस पर अनुसरण तो नही करते . वरना कल्पना कीजीये आपको कैसा लगता जब सीमा पर पाकिस्तान की बमबारी के बाद नेशनल चैनल में ब्रेकिंग न्यूज पर विशेष प्रसारण की घोषणा होती  और फिर नेता जी के दर्शन होते , वे कहते भाईयो और बहनो और फिर बाईं आँख बन्द कर पाकिस्तान को जबाब देते उसकी कायराना हरकत का . हो सकता था कि वे सारे देश वासियो से भी आग्रह करते कि आईये हम सब एक साथ अपनी बाईं आँख बन्द कर सबक सिखा दें पड़ोसी को . ऐसा नही हो रहा , इसलिये गर्व करिये अपने चुने हुये जन प्रतिनिधियो पर .
      जब आपने उन्हें चुन ही लिया है अगली बार फिर से बेवकूफ बनने तक के लिये तो जो कुछ वे कर रहे हैं उसमे हाँ में हाँ मिलाइये और खुश रहिये . विकास का स्वागत कीजीये . अंतरिक्ष की ओर निहारिये , वैज्ञानिको पर गर्व कीजीये . शहीदो को श्रद्धांजली दीजीये . संवेदना का ट्वीट कीजीये . कूटनीति की प्रशंसा कीजीये . अपना पूरा टैक्स अदा कीजीये . जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय दीजीये .मीडिया में हैं तो जन भावनाओ में उबाल भरिये .  यदि विपक्ष में हैं तो निश्चिंत होकर सरकार की कड़ी आलोचना कीजीये , यदि कभी आप सत्ता में लौट आये तो  उच्च कोटि के आई ए एस और भाषा विद सचिव आपके लिये अपनी बात से पलटी खाने के कई रास्ते निकाल देंगे . नई शब्दावली ढ़ूंढ़कर कठोर शब्दो में निंदा का नया जुमला गढ़ देंगे . शब्द की शक्ति असीम है . इससे तीर और तलवार भी हार जाते थे .  हिन्दी में एक कहावत है - बातन हाथी पाईये, बातन हाथी पांव .  अर्थात आपके द्वारा कहे गये शब्दों से प्रभावित होकर आपको हाथी के पैरों तले रौंदे  जाने का निर्णय भी लिया जा  सकता है और आपके द्वारा कहे गये शब्दों से प्रसन्न होकर  आपको हाथी के ऊपर बैठाया भी जा सकता है . शब्द इतने गहरे घाव देते हैं कि वे जीवन भर नहीं भरते. इसलिये नेताओ के शाब्दिक प्रहारो का समर्थन कीजीये . पाकिस्तान की नापाक हरकतो का यही तो सच्चा जबाब है कि उनको इतने गहरे घाव लगें जो कभी भरें नही . मुझे लगता है कि इतने बढ़िया शब्द बाणो के बाद भी जो असर पड़ोसी पर होना चाहिये वो यदि नही हो रहा ,तो  इसका मूल कारण यह हो सकता है कि पड़ोसी हिन्दी नही जानता . भैंस के आगे बीन बजाओ भैंस खड़ी पगुराये वाली स्थिति हो रही है .या फिर नेताओ की कड़ी निंदा की भाषा में दम नहीं है , यदि ऐसा है तो मेरे जैसे व्यंगकारो का एक पैनल नेता जी के बयान बनाने के लिये नियुक्त किया जाना जरूरी है .
 जबाब की भाषा वो ही ठीक होती है जो सामने वाला समझे ,मद्रासी को भोजपुरी में जबाब देना बेकार है .  तो यदि बम की भाषा ही उन्हें समझ में आती है तो उन्हें उसी भाषा में जबाब देने का पाठ हमारे  नेताओ को सिखाना ही  पड़ेगा और इस काम के लिये कबीर का एक ही दोहा काफी है खीरा सर से काटिये, मलिये नमक लगाए, देख कबीरा यह कहे, कड़वन  यही सुहाए ..

Friday, April 14, 2017

नाच न आवे आंगन टेढ़ा

व्यंग्य

नाच न आवे आंगन टेढ़ा 

विवेक रंजन श्रीवास्तव

 vivekranjan.vinamra@gmail.com 

बचपन में कभी न कभी "खेलेंगे या खेल बिगाड़ेंगे " का नारा बुलंद किया ही होगा आपने  . मैंने भी किया है . मेरी समझ में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह पहला प्रयोग बड़ा सफल रहा था . मुझे मेरी बड़ी बहन ने वापस चोर सिपाही के खेल में शामिल कर लिया था . यह और बात है कि कई दिनो बाद मुझे पता चल ही गया  कि इस तरह का शोर मचाने पर माँ की घुड़की से बचने के लिये मुझे "दूध भात" खिलाड़ी के रूप में खिलाया जाता था . मतलब मैं अपने आप में ही फुदकता रहता था खेल पर मेरे प्रयासो का कोई असर नही माना जाता था . यानी कुछ कुछ एक्स्ट्रा खिलाड़ी जैसी औकात बना दी जाती थी , छोटे से प्यारे से नन्हें से अपन की . खैर समय भाप की तरह उड़ता गया और हम बच्चे से बड़े बनते गये . ये और बात है कि आज तक "बड़े" बन नही पाये हैं , और यह भी और बात ही है कि लोग अपने को बड़े साहब वगैरह मानते हैं कभी जभी जब ड्राइवर हमें बड़ा मानता है तो कार का दरवाजा खोल देता है , जब कभी मुख्य अतिथि बनाकर कोई संस्था किसी आयोजन में बुला लेती है तो पत्नी जानबूझकर मुझे समय से कुछ विलंब से घर से रवाना करती है , और सचमुच अपने पहुंचते ही जब आयोजक लेने के लिये कार की ओर बढ़ते हैं या सभा कक्ष में  उपस्थित लोग खड़े होकर अपन को कथित सम्मान देते हैं तब भी बड़े होने की भ्रांति पालने में बुरा नही लगता . पर जल्दी ही मैं अपने आप को नैतिक शिक्षा के पाठ याद दिला देता हूं और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करता हूं  कि हे प्रभु मुझे मैं ही बना दे , ये बड़े वड़े के चक्कर में कहीं ऐसा न हो कि न घर का रहूं और न ही घाट का .  स्कूल में हिंदी में अपने भरपूर नम्बर आते थे . जो यह लेख पढ़ रहे हों उनके लिये अपनी सफलता का राज डिस्क्लोज कर  रहा हूं , निबंध में लोकप्रिय कवियो की पंक्तियां जरूर उधृत करता था और मौका मिल जाये तो गीता या राम चरित मानस से भी कोई उध्वरण कोट कर देता था . महात्मा गांधी और भारतीय संस्कृति के कुछ महत्वपूर्ण नायको की जीवनियां मैने एक्स्ट्रा करीक्युलर रूप से पढ़ रखी थीं ,  तो उसमें से भी कुछ कोट कर देने पर निबंध में भी मास्साब पूरे नम्बर दे देते थे .  मैं अपने उत्तरो में कहावतो तथा मुहावरो का भरपूर प्रयोग किया करता था .  नाच न आवे आंगन टेढ़ा ,  न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी , खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे , अंगूर खट्टे हैं वगैरह मुहावरो की याद है न आपको ! देश में ईवीएम को लेकर  कुछ उन खिलाड़ियो ने  उछल कूद लगा रखी है जो खेल नही पा रहे हैं . उनकी काठ की हांडी दो एक बार चढ़कर राख हो चुकी है . अब जनता के सामने अपना काला मुंह छिपाने के लिये मजबूरी में उन्होने राग ई वी एम छेड़ रखा है .चोर चोर मौसेरे भाईयो की तरह ऐसे सारे हारे हुये महारथी एक हो गये हैं . यदि ये हारे हुये धुरंधर देर आये दुरुस्त आये को चरितार्थ करते हुये अभी भी जनता के मत को स्वीकार कर लें तो बुरा नही . चुनाव आयोग भी कम नहीं है . आयोग ने ताल ठोंककर खुली चुनौती दे दी है , जिसने अपनी माँ का दूध पिया हो वो किसी  मशीन में हेरा फेरी करके दिखाये . और इसके लिये स्वयंवर जैसा कोई आयोजन किया जा रहा है . राजनीति का चीरहरण वगैरह जारी है . देखना है क्या होता है , खोदा पहाड़ निकली चुहिया जैसा ही  कुछ  होगा या जहां आग होती है , धुंआ वहीं उठता है की तर्ज पर कुछ गड़बड़ी भी मिलेगी ?  कुछ गड़बड़ी न मिली तो हम चुनाव आयोग का लोहा मान लेंगे .   फिलहाल उठा पटक जारी है . देखें ऊंट किस करवट बैठता है . ं अपने भरपूर नम्बर आते थे . जो यह लेख पढ़ रहे हों उनके लिये अपनी सफलता का राज डिस्क्लोज कर  रहा हूं , निबंध में लोकप्रिय कवियो की पंक्तियां जरूर उधृत करता था और मौका मिल जाये तो गीता या राम चरित मानस से भी कोई उध्वरण कोट कर देता था . महात्मा गांधी और भारतीय संस्कृति के कुछ महत्वपूर्ण नायको की जीवनियां मैने एक्स्ट्रा करीक्युलर रूप से पढ़ रखी थीं ,  तो उसमें से भी कुछ कोट कर देने पर निबंध में भी मास्साब पूरे नम्बर दे देते थे .  मैं अपने उत्तरो में कहावतो तथा मुहावरो का भरपूर प्रयोग किया करता था .  नाच न आवे आंगन टेढ़ा ,  न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी , खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे , अंगूर खट्टे हैं वगैरह मुहावरो की याद है न आपको ! देश में ईवीएम को लेकर  कुछ उन खिलाड़ियो ने  उछल कूद लगा रखी है जो खेल नही पा रहे हैं . उनकी काठ की हांडी दो एक बार चढ़कर राख हो चुकी है . अब जनता के सामने अपना काला मुंह छिपाने के लिये मजबूरी में उन्होने राग ई वी एम छेड़ रखा है .चोर चोर मौसेरे भाईयो की तरह ऐसे सारे हारे हुये महारथी एक हो गये हैं . यदि ये हारे हुये धुरंधर देर आये दुरुस्त आये को चरितार्थ करते हुये अभी भी जनता के मत को स्वीकार कर लें तो बुरा नही . चुनाव आयोग भी कम नहीं है . आयोग ने ताल ठोंककर खुली चुनौती दे दी है , जिसने अपनी माँ का दूध पिया हो वो किसी  मशीन में हेरा फेरी करके दिखाये . और इसके लिये स्वयंवर जैसा कोई आयोजन किया जा रहा है . राजनीति का चीरहरण वगैरह जारी है . देखना है क्या होता है , खोदा पहाड़ निकली चुहिया जैसा ही  कुछ  होगा या जहां आग होती है , धुंआ वहीं उठता है की तर्ज पर कुछ गड़बड़ी भी मिलेगी ?  कुछ गड़बड़ी न मिली तो हम चुनाव आयोग का लोहा मान लेंगे .   फिलहाल उठा पटक जारी है . देखें ऊंट किस करवट बैठता है .

Saturday, April 8, 2017

अथ सेल्फी कथा

जैसे शीला की सेल्फी हिट हुई ऐसी सबकी हो

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
vivekranjan.vinamra@gmail.com

 "स्वाबलंब की एक झलक पर न्यौछावर कुबेर का कोष " राष्ट्र कवि मैथली शरण गुप्त की ये पंक्तियां सेल्फी फोटो कला के लिये प्रेरणा हैं . ये और बात है कि कुछ दिल जले  कहते हैं कि सेल्फी आत्म मुग्धता को प्रतिबिंबित करती हैं . ऐसे लोग यह भी कहते हैं कि सेल्फी मनुष्य के वर्तमान व्यस्त एकाकीपन को दर्शाती है . जिन्हें सेल्फी लेनी नही आती ऐसी प्रौढ़ पीढ़ी सेल्फी को आत्म प्रवंचना का प्रतीक बताकर अंगूर खट्टे हैं वाली कहानी को ही चरितार्थ करते दीखते हैं .
 अपने एलबम को पलटता हूं तो नंगधुड़ंग नन्हें बचपन की उन श्वेत श्याम  फोटो पर दृष्टि पड़ती हैं जिन्हें मेरी माँ या पिताजी ने आगफा कैमरे की सेल्युलर रील घुमा घुमा कर खींचा रहा होगा . अपनी यादो में खिंचवाई गई पहली तस्वीर में मैं गोल मटोल सा हूं , और शहर के स्टूडियो के मालिक और प्रोफेशनल फोटोग्राफर कम शूट डायरेक्टर लड़के ने घर पर आकर , चादर का बैकग्राउंड बनवाकर सैट तैयार करवाया था , हमारी फेमली फोटोग्राफ के साथ ही मेरी कुछ सोलो फोटो भी खिंची थीं . मुझे हिदायत दी थी कि मैं कैमरे के लैंस में देखूं , वहाँ से चिड़िया निकलने वाली है . घर के कम्पाउंड में वह जगह चुनी गई थी जिससे सूरज की रोशनी मुझ पर पड़े  और पिताजी के इकलौते बेटे का  बढ़िया सा फोटो बन सके . फोटो अच्छा ही है , क्योकि वह फ्रेम करवाया गया और बड़े सालों तक हमारे ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाता रहा .अब वह फोटो मेरी पत्नी और बच्चो के लिये आर्काईव महत्व का बन चुका है .
 यादो के एलबम को और पलटें तो स्कूल , कालेज के वे ग्रुप फोटो मिलते हैं जिन्हें हार्ड दफ्ती पर माउंट करके नीचे नाम लिखे होते थे कि बायें से दायें कौन कहां खड़ा है . मानीतर होने के नाते मैं मास्साब के बाजू में सामने की पंक्ति पर ही सेंटर फारवार्ड पोजीशन पर मौजूद जरूर हूं पर यदि नाम न लिखा हो तो शायद खुद को भी आज पहचानना कठिन हो . वैसे सच तो यह है कि मरते दम तक हम खुद को कहाँ पहचान पाते हैं , प्याज के छिलको या कहें गिरगिटान की तरह हर मौके पर अलग रंग रूप के साथ हम खुद को बदलते रहते हैं . आफिस के खुर्राट अधिकारी भी बीबी और बास के सामने दुम दबाते नजर आते हैं . शादी में जयमाला की रस्मो के सूत्रधार फोटोग्राफर ही होते हैं वे चाहें तो गले में पड़ी हुई माला उतरवा कर फिर से डलवा दें . शादी का हार गले में क्या पड़ता है , पत्नी जीवन भर शीशे में उतारकर फोटू खींचती रहती है ये और बात है कि वे फोटू दिखती नही जीवन शैली में ढ़ल जाती हैं .
  कालेज के दिन वे दिन होते हैं जब आसमान भी लिमिट नही होता . अपने कालेज के दिनो में हम स्टडी ट्रिप पर दक्षिण भारत गये थे . ऊटी के बाटनिकल गार्डेन के सामने खिंचवाई गई उस फोटो का जिक्र जरूरी लगता है जिसे निगेटिव प्लेट पर काले कपड़े से ढ़ांक कर बड़े से ट्रिपाईड पर लगे  कैमरे के सामने लगे ढ़क्ककन को हटाकर खींचा गया था , और फिर केमिकल ट्रे में धोकर कोई घंटे भर में तैयार कर हमें सुलभ करवा दिया गया था . कालेज के दिनो में हम फोटो ग्राफी क्लब के मेंम्बर रहे हैं . डार्क रूम में लाल लाइट के जीरो वाट बल्ब की रोशनी में हमने सिल्वर नाइत्रेट के सोल्यूशन में सधे हाथो से सैल्युलर फिल्में धोई और याशिका कैमरे में डाली हैं . आज भी वे निगेटिव हमारे पास सुरक्षित हैं , पर शायद ही उनसे अब फोटो बनवाने की दूकाने हों .
 डिजिटल टेक्नीक की क्रांति नई सदी में आई . पिछली सदी के अंत में तस्करी से आये जापानी आटोमेटिक टाइमर कैमरे को सामने सैट करके रख कर मिनिट भर के निश्चित समय के भीतर कैमरे के सम्मुख पोज बनाकर सेल्फी हमने खींची है , पर तब उस फोटो को सेल्फी कहने का प्रचलन नहीं था . सेल्फी शब्द की उत्पत्ति मोबाइल में कैमरो के कारण हुई . यूं तो मोबाईल बाते करने के लिये होता है पर इंटनेट , रिकार्डिग सुविधा , और बढ़िया कैमरे के चलते अब हर हाथ में मोबाईल , कम्प्यूटर से कहीं बढ़कर बन चुके हैं . जब हाथ में मोबाईल हो , फोटोग्राफिक सिचुएशन हो , सिचुएसन न भी हो तो खुद अपना चेहरा किसे बुरा दिखता है .  ग्रुप फोटो में भी लोग अपना ही चेहरा ज्यादा देखते हैं . हर्रा लगे न फिटकरी रंग चोखा आये की शैली में सेल्फी खींचो और डाल दो इंस्टाग्राम या फेसबुक पर लाईक ही लाईक बटोर लो . अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ साधन हैं सेल्फी . मेरे फेसबुक डाटा बताते हैं कि मेरी नजर में मेरे अच्छे से अच्छे व्यंग को भी उतने लाइक नही मिलते जितने मेरी खराब से खराब प्रोफाइल पिक को लोड करते ही मिल जाते हैं . शायद पढ़ने का समय नही लगाना पड़ता , नजर मारो और लाइक करो इसलिये . शायद इस भावना से भी कि सामने वाला  भी लाइक रेसीप्रोकेट करेगा . यूं लड़कियो को यह प्रकृति प्रदत्त सुविधा है कि वे किसी को लाइक करें न करें उनकी फोटो हर कोई लाइक करता है .
 सेल्फी से ही रायल जमाने के तैल चित्र बनवाने के मजे लेने हो तो अब आपको घंटो एक ही पोज पर चित्रकार के सामने स्थिर मुद्रा में बैठने की कतई जरूरत नहीं है . प्रिज्मा जैसे साफ्टवेयर मोबाईल पर उपलब्ध हैं , सेल्फी लोड करिये और अपना राजसी तैल चित्र बना लीजीये वह भी अलग अलग स्टाइल में मिनटो में .
 जब सस्ती सरल सुलभ सेल्फी टेक्नीक हर हाथ में हो तो उसके व्यवसायिक उपयोग केसे न हों . कुछ इनोवेटिव एम बी ए पढ़े प्रोडक्ट मेनेजर्स ने उनके उत्पाद के साथ  सेल्फी लोड करने  पर पुरस्कार योजनायें भी बना डालीं . परसाई जी , शरद जी , श्रीलाल शुक्ल व्यंग लिखते रहे हम आप ज्ञान चतुर्वेदी ,आलोक पुराणिक , अनूप शुक्ल और टैग किये गये सारे व्यंगकारों सहित कई मित्र  व्यंग लिख रहे हैं  पर व्यंग को हास्य में ढ़ालकर रुपये बना रहे हैं कपिल शर्मा अपने टीवी शो के जरिये . वे भी लावा सेल्फी धड़्ड़ले से खिंचे जा रहे हैं . तो अपनी ढ़ेर सी शुभकामनायें . सैल्फी युग में सब कुछ हो . भगवान से यही दुआ है कि हम सैल्फिश होने से बचें और खतरनाक सेल्फी लेते हुये  किसी पहाड़ की चोटी ,  बहुमंजिला इमारत , चलती ट्रेन , या बाइक पर स्टंट की सेल्फी लेते किसी की जान न जावें .

Saturday, March 4, 2017

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक हमारी पत्नी

व्यंग लेख
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक हमारी पत्नी
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , नयागांव जबलपुर
९४२५८०६२५२ , ७०००३७५७९८
vivek1959@yahoo.co.in

        उनकी सब सुनना पड़ती है अपनी सुना नही सकते , ये बात रेडियो और बीबी दोनो पर लागू होती है . रेडियो को तो बटन से बंद भी किया जा सकता है पर बीबी को तो बंद तक नही किया जा सकता . मेरी समझ में भारतीय पत्नी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा प्रतीक है .
        क्रास ब्रीड का एक बुलडाग सड़क पर आ गया , उससे सड़क के  देशी कुत्तो ने पूछा, भाई आपके वहाँ बंगले में कोई कमी है जो आप यहाँ आ गये ? उसने कहा,  वहाँ का रहन सहन , वातावरण, खान पान, जीवन स्तर सब कुछ बढ़िया है , लेकिन बिना वजह भौकने की जैसी आजादी यहाँ है ऐसी वहाँ कहाँ ?  अभिव्यक्ति की आज़ादी जिंदाबाद .
        अस्सी के दशक के पूर्वार्ध में ,जब हम कुछ अभिव्यक्त करने लायक हुये , हाईस्कूल में थे . तब एक फिल्म आई थी "कसौटी" जिसका एक गाना बड़ा चल निकला था , गाना क्या था संवाद ही था ... हम बोलेगा तो बोलोगे के बोलता है एक मेमसाब है, साथ में साब भी है मेमसाब सुन्दर-सुन्दर है, साब भी खूबसूरत है दोनों पास-पास है, बातें खास-खास है दुनिया चाहे कुछ भी बोले, बोले हम कुछ नहीं बोलेगा हम बोलेगा तो...हमरा एक पड़ोसी है, नाम जिसका जोशी है ,वो पास हमरे आता है, और हमको ये समझाता है जब दो जवाँ दिल मिल जाएँगे, तब कुछ न कुछ तो होगा
जब दो बादल टकराएंगे, तब कुछ न कुछ तो होगा दो से चार हो सकते है, चार से आठ हो सकते हैं, आठ से साठ हो सकते हैं जो करता है पाता है, अरे अपने बाप का क्या जाता है ?
जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले,  हम तो कुछ नहीं बोलेगा , हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है .
        अभिव्यक्ति की आजादी और उस पर रोक लगाने की कोशिशो पर यह बहुत सुंदर अभिव्यक्ति थी . यह गाना हिट ही हुआ था कि आ गया था १९७५ का जून और देश ने देखा आपातकाल , मुंह में पट्टी बांधे सारा देश समय पर हाँका जाने लगा . रचनाकारो , विशेष रूप से व्यंगकारो पर उनकी कलम पर जंजीरें कसी जाने लगीं .  रेडियो बी बी सी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया . मैं  इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ रहा था ,उन दिनो हमने जंगल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा लगाई , स्थानीय समाचारो के साइक्लोस्टाइल्ड पत्रक बांटे . सूचना की ऐसी  प्रसारण विधा की साक्षी बनी थी हमारी पीढ़ी .  "अमन बेच देंगे,कफ़न बेच देंगे , जमीं बेच देंगे, गगन बेच देंगे कलम के सिपाही अगर सो गये तो, वतन के मसीहा,वतन बेच देंगे" ये पंक्तियां खूब चलीं तब . खैर एक वह दौर था जब विशेष रूप से राष्ट्र वादियो पर , दक्षिण पंथी कलम पर रोक लगाने की कोशिशें थीं .
        अब पलड़ा पलट सा गया है . आज  देश के खिलाफ बोलने वालो पर उंगली उठा दो तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन कहा जाने का फैशन चल निकला है . राजनैतिक दलो के  स्वार्थ तो समझ आते हैं पर विश्वविद्यालयो , और कालेजो में भी पाश्चात्य धुन के साथ मिलाकर राग अभिव्यक्ति गाया जाने लगा है  इस मिक्सिंग से जो सुर निकल रहे हैं उनसे देश के धुर्र विरोधियो , और पाकिस्तान को बैठे बिठाये मुफ्त में  मजा आ रहा है . दिग्भ्रमित युवा इसे समझ नही पा रहे हैं .
        गांवो में बसे हमारे भारत पर दिल्ली के किसी टी वी चैनल  में हुई किसी छोटी बड़ी बहस से या बहकावे मे आकर  किसी कालेज के सौ दो सौ युवाओ की  नारेबाजी करने से कोई अंतर नही पड़ेगा . अभिव्यक्ति का अधिकार प्रकृति प्रदत्त है , उसका हनन करके किसी के मुंह में कोई पट्टी नही चिपकाना चाहता  पर अभिव्यक्ति के सही उपयोग के लिये युवाओ को दिशा दिखाना गलत नही है , और उसके लिये हमें बोलते रहना होगा फिर चाहे जोशी पड़ोसी कुछ बोले या नानी , सबको अनसुना करके  सही आवाज सुनानी ही होगी कोई सुनना चाहे या नही .शायद यही वर्तमान स्थितियो में  अभिव्यक्ति के सही मायने होंगे .  हर गृहस्थ जानता है कि  पत्नी की बड़ बड़  लगने वाली अभिव्यक्ति परिवार के और घर के हित के लिये ही होती हैं . बीबी की मुखर अभिव्यक्ति से ही बच्चे सही दिशा में बढ़ते हैं और पति समय पर घर लौट आता है ,  तो अभिव्यक्ति की प्रतीक पत्नी को नमन कीजीये और दैस हित में जो भी हो उसे अभिव्यक्त करने में संकोच न कीजीये . कुछ तो लोग कहेंगे लोगो का काम है कहना , छोड़ो बेकार की बातो में कही बीत न जाये रैना ! टी वी पर तो प्रवक्ता कुछ न कुछ कहेंगे ही उनका काम ही है कहना .

Thursday, March 2, 2017

शराफत छोड़ दी मैने

व्यंग
शराफत छोड़ दी मैने
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , नयागांव जबलपुर
९४२५८०६२५२ , ७०००३७५७९८
vivek1959@yahoo.co.in

  बहुत देख लिया शरीफ बनकर . चाहे जो गदहा बनाकर निकल जाता है . बीबी लल्लू कह कर आंख मार देती है और मै कसमसा कर रह जाता हूं . शराफत के बाने पहने घूमते  हुये बाहर कोई और आंख मारती भी है तो  मै गधा यही समझता हूं कि उनकी आँख फड़क गई होगी ऐसी स्थिति में  वह पक्का उल्लू समझती होगी मुझ शरीफ को . आफिस में हर कोई गदहे की तरह लादे रहता है , कोल्हू के बैल की तरह मैं शराफत का चोला ओढ़े काम में जुटा रहता हूं  . मेट्रो में ट्रेवल करते हुये खाली पड़ी लेडीज या सिनीयर सिटिजन सीट पर  बैठना तो दूर मैं संस्कारी शरीफ अपनी जनरल सीट भी खट से आफर कर देता हूं किसी बुजुर्ग या महिला को  खड़े देख , जिस पर वह बिना थैंन्क्यू बोले धप से बैठ जाने में कतई संकोच नहीं करती .मैं अपनी शराफत के साथ कोने में खड़ा रह जाता हूं .  पिक्चर हाल में इंटरवल में पिज्जा कार्नर पर लगी लाइन में मेरी शराफत के चलते मुझे सबसे अंत में ही मेरा आर्डर मिल पाता है , तब तक इंटरवल समाप्त होकर पिक्चर शुरू हो चुकी होती है . अफिस में किसी विएय पर जब चाय पर चरचा का ग्रुप डिस्कशन होता है तो मुझे प्लीज प्लीज कहती लोकसभा अध्यक्ष और स्वयं की शराफत में अधिक अंतर नही दिखता . शराफत के बीज मुझमें जाने कैसे और कब पड़ गये थे , पर स्कूल में मुझे इनोसेंट , शाई , वगैरह कहा जाता था ,बिनोबा भावे की  संस्कारधानी का निवासी मैं धीरे धीरे अनजाने ही शरीफ बन गया . गांधी की जीवनी पढ़कर अपरोक्ष ही मैं इतना  प्रभावित हो गया लगता हूं कि मैने शराफत का ठेका ही ले लिया .
 मेरी शराफत के चलते जब मैने देखा कि मैं अपने बच्चो का सुपरमैन हीरो नही बन पा रहा हूं , इतना ही नही मंहगाई के इन दिनो में मेरी शराफत मेरे पर्स पर भी भारी पड़ने लगी है तो मेरा दिशा दर्शन किया विविधभारती पर बजते एक फिल्मी गाने ने "शराफत छोड़ दी मैंने " अपने नेताओ के कट्टर अनुयायी  मैने जबसे बड़े बड़े राजनेताओ के चुनावी भाषण सुने हैं , मै शराफत छोड़ने का निर्णय ले लेना चाहता था  . किसी निबंध में पढ़ा यह वाक्य मुझे याद आ रहा है , हमारी फिल्में हमारे अवचेतन मन पर गहन प्रभाव छोड़ती है , मुझ सरीफ पर भी शराफत छोड़ दी मैने गीत का प्रभाव पड़ता दीखता है . इन दिनो मैने शराफत छोड़ दी है .  पूरी बेशर्मी से अपने सहायक पर अपना सारा काम उंडेलकर मैं गुलछर्रे उड़ाता इस टेबल से उस टेबल पर मटरगश्ती करता रहता हूं इन दिनो आफिस में . कोई कुछ कहता है तो सरेआम घोषणा दोहरा देता हूं अपनी शराफत को तिलांजली दे देने की , सामने वाला शायद मेरी पुरानी शराफत वाले दिनो में किये गये मेरे शोषण को स्मरण कर कुछ नही कहता , मैं मन ही मन हँस लेता हूं . लाइन में धक्का मुक्की करते हुये आगे बढ़ने की मेरी विशुद्ध भारतीय शैली में शराफत छोड़ते ही जबरदस्त इजाफा हुआ है , यह योग्यता नोटबंदी के दिनो में मेरे बहुत काम आई , मैने मन ही मन कहा भी थैंक गाड , मैने शराफत छोड़ दी .
 अब मैं अपनी बीबी का हीमैन बन चुका हूं जो उसे मोटर साइकल पर पीछे चिपकाये , तेज हार्न मारते हुये कट मारकर आगे ही आगे बढ़ता जाता है बेहिचक .शराफत का नकली चोला छोड़कर बिंदास जी रहा हूं अपनी ठेठ देशी मौलिकता के साथ ठाठ से , बिना बनावटी मुस्कान के .