Saturday, March 4, 2017

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक हमारी पत्नी

व्यंग लेख
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक हमारी पत्नी
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , नयागांव जबलपुर
९४२५८०६२५२ , ७०००३७५७९८
vivek1959@yahoo.co.in

        उनकी सब सुनना पड़ती है अपनी सुना नही सकते , ये बात रेडियो और बीबी दोनो पर लागू होती है . रेडियो को तो बटन से बंद भी किया जा सकता है पर बीबी को तो बंद तक नही किया जा सकता . मेरी समझ में भारतीय पत्नी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा प्रतीक है .
        क्रास ब्रीड का एक बुलडाग सड़क पर आ गया , उससे सड़क के  देशी कुत्तो ने पूछा, भाई आपके वहाँ बंगले में कोई कमी है जो आप यहाँ आ गये ? उसने कहा,  वहाँ का रहन सहन , वातावरण, खान पान, जीवन स्तर सब कुछ बढ़िया है , लेकिन बिना वजह भौकने की जैसी आजादी यहाँ है ऐसी वहाँ कहाँ ?  अभिव्यक्ति की आज़ादी जिंदाबाद .
        अस्सी के दशक के पूर्वार्ध में ,जब हम कुछ अभिव्यक्त करने लायक हुये , हाईस्कूल में थे . तब एक फिल्म आई थी "कसौटी" जिसका एक गाना बड़ा चल निकला था , गाना क्या था संवाद ही था ... हम बोलेगा तो बोलोगे के बोलता है एक मेमसाब है, साथ में साब भी है मेमसाब सुन्दर-सुन्दर है, साब भी खूबसूरत है दोनों पास-पास है, बातें खास-खास है दुनिया चाहे कुछ भी बोले, बोले हम कुछ नहीं बोलेगा हम बोलेगा तो...हमरा एक पड़ोसी है, नाम जिसका जोशी है ,वो पास हमरे आता है, और हमको ये समझाता है जब दो जवाँ दिल मिल जाएँगे, तब कुछ न कुछ तो होगा
जब दो बादल टकराएंगे, तब कुछ न कुछ तो होगा दो से चार हो सकते है, चार से आठ हो सकते हैं, आठ से साठ हो सकते हैं जो करता है पाता है, अरे अपने बाप का क्या जाता है ?
जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले,  हम तो कुछ नहीं बोलेगा , हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है .
        अभिव्यक्ति की आजादी और उस पर रोक लगाने की कोशिशो पर यह बहुत सुंदर अभिव्यक्ति थी . यह गाना हिट ही हुआ था कि आ गया था १९७५ का जून और देश ने देखा आपातकाल , मुंह में पट्टी बांधे सारा देश समय पर हाँका जाने लगा . रचनाकारो , विशेष रूप से व्यंगकारो पर उनकी कलम पर जंजीरें कसी जाने लगीं .  रेडियो बी बी सी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया . मैं  इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ रहा था ,उन दिनो हमने जंगल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा लगाई , स्थानीय समाचारो के साइक्लोस्टाइल्ड पत्रक बांटे . सूचना की ऐसी  प्रसारण विधा की साक्षी बनी थी हमारी पीढ़ी .  "अमन बेच देंगे,कफ़न बेच देंगे , जमीं बेच देंगे, गगन बेच देंगे कलम के सिपाही अगर सो गये तो, वतन के मसीहा,वतन बेच देंगे" ये पंक्तियां खूब चलीं तब . खैर एक वह दौर था जब विशेष रूप से राष्ट्र वादियो पर , दक्षिण पंथी कलम पर रोक लगाने की कोशिशें थीं .
        अब पलड़ा पलट सा गया है . आज  देश के खिलाफ बोलने वालो पर उंगली उठा दो तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन कहा जाने का फैशन चल निकला है . राजनैतिक दलो के  स्वार्थ तो समझ आते हैं पर विश्वविद्यालयो , और कालेजो में भी पाश्चात्य धुन के साथ मिलाकर राग अभिव्यक्ति गाया जाने लगा है  इस मिक्सिंग से जो सुर निकल रहे हैं उनसे देश के धुर्र विरोधियो , और पाकिस्तान को बैठे बिठाये मुफ्त में  मजा आ रहा है . दिग्भ्रमित युवा इसे समझ नही पा रहे हैं .
        गांवो में बसे हमारे भारत पर दिल्ली के किसी टी वी चैनल  में हुई किसी छोटी बड़ी बहस से या बहकावे मे आकर  किसी कालेज के सौ दो सौ युवाओ की  नारेबाजी करने से कोई अंतर नही पड़ेगा . अभिव्यक्ति का अधिकार प्रकृति प्रदत्त है , उसका हनन करके किसी के मुंह में कोई पट्टी नही चिपकाना चाहता  पर अभिव्यक्ति के सही उपयोग के लिये युवाओ को दिशा दिखाना गलत नही है , और उसके लिये हमें बोलते रहना होगा फिर चाहे जोशी पड़ोसी कुछ बोले या नानी , सबको अनसुना करके  सही आवाज सुनानी ही होगी कोई सुनना चाहे या नही .शायद यही वर्तमान स्थितियो में  अभिव्यक्ति के सही मायने होंगे .  हर गृहस्थ जानता है कि  पत्नी की बड़ बड़  लगने वाली अभिव्यक्ति परिवार के और घर के हित के लिये ही होती हैं . बीबी की मुखर अभिव्यक्ति से ही बच्चे सही दिशा में बढ़ते हैं और पति समय पर घर लौट आता है ,  तो अभिव्यक्ति की प्रतीक पत्नी को नमन कीजीये और दैस हित में जो भी हो उसे अभिव्यक्त करने में संकोच न कीजीये . कुछ तो लोग कहेंगे लोगो का काम है कहना , छोड़ो बेकार की बातो में कही बीत न जाये रैना ! टी वी पर तो प्रवक्ता कुछ न कुछ कहेंगे ही उनका काम ही है कहना .

Thursday, March 2, 2017

शराफत छोड़ दी मैने

व्यंग
शराफत छोड़ दी मैने
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , नयागांव जबलपुर
९४२५८०६२५२ , ७०००३७५७९८
vivek1959@yahoo.co.in

  बहुत देख लिया शरीफ बनकर . चाहे जो गदहा बनाकर निकल जाता है . बीबी लल्लू कह कर आंख मार देती है और मै कसमसा कर रह जाता हूं . शराफत के बाने पहने घूमते  हुये बाहर कोई और आंख मारती भी है तो  मै गधा यही समझता हूं कि उनकी आँख फड़क गई होगी ऐसी स्थिति में  वह पक्का उल्लू समझती होगी मुझ शरीफ को . आफिस में हर कोई गदहे की तरह लादे रहता है , कोल्हू के बैल की तरह मैं शराफत का चोला ओढ़े काम में जुटा रहता हूं  . मेट्रो में ट्रेवल करते हुये खाली पड़ी लेडीज या सिनीयर सिटिजन सीट पर  बैठना तो दूर मैं संस्कारी शरीफ अपनी जनरल सीट भी खट से आफर कर देता हूं किसी बुजुर्ग या महिला को  खड़े देख , जिस पर वह बिना थैंन्क्यू बोले धप से बैठ जाने में कतई संकोच नहीं करती .मैं अपनी शराफत के साथ कोने में खड़ा रह जाता हूं .  पिक्चर हाल में इंटरवल में पिज्जा कार्नर पर लगी लाइन में मेरी शराफत के चलते मुझे सबसे अंत में ही मेरा आर्डर मिल पाता है , तब तक इंटरवल समाप्त होकर पिक्चर शुरू हो चुकी होती है . अफिस में किसी विएय पर जब चाय पर चरचा का ग्रुप डिस्कशन होता है तो मुझे प्लीज प्लीज कहती लोकसभा अध्यक्ष और स्वयं की शराफत में अधिक अंतर नही दिखता . शराफत के बीज मुझमें जाने कैसे और कब पड़ गये थे , पर स्कूल में मुझे इनोसेंट , शाई , वगैरह कहा जाता था ,बिनोबा भावे की  संस्कारधानी का निवासी मैं धीरे धीरे अनजाने ही शरीफ बन गया . गांधी की जीवनी पढ़कर अपरोक्ष ही मैं इतना  प्रभावित हो गया लगता हूं कि मैने शराफत का ठेका ही ले लिया .
 मेरी शराफत के चलते जब मैने देखा कि मैं अपने बच्चो का सुपरमैन हीरो नही बन पा रहा हूं , इतना ही नही मंहगाई के इन दिनो में मेरी शराफत मेरे पर्स पर भी भारी पड़ने लगी है तो मेरा दिशा दर्शन किया विविधभारती पर बजते एक फिल्मी गाने ने "शराफत छोड़ दी मैंने " अपने नेताओ के कट्टर अनुयायी  मैने जबसे बड़े बड़े राजनेताओ के चुनावी भाषण सुने हैं , मै शराफत छोड़ने का निर्णय ले लेना चाहता था  . किसी निबंध में पढ़ा यह वाक्य मुझे याद आ रहा है , हमारी फिल्में हमारे अवचेतन मन पर गहन प्रभाव छोड़ती है , मुझ सरीफ पर भी शराफत छोड़ दी मैने गीत का प्रभाव पड़ता दीखता है . इन दिनो मैने शराफत छोड़ दी है .  पूरी बेशर्मी से अपने सहायक पर अपना सारा काम उंडेलकर मैं गुलछर्रे उड़ाता इस टेबल से उस टेबल पर मटरगश्ती करता रहता हूं इन दिनो आफिस में . कोई कुछ कहता है तो सरेआम घोषणा दोहरा देता हूं अपनी शराफत को तिलांजली दे देने की , सामने वाला शायद मेरी पुरानी शराफत वाले दिनो में किये गये मेरे शोषण को स्मरण कर कुछ नही कहता , मैं मन ही मन हँस लेता हूं . लाइन में धक्का मुक्की करते हुये आगे बढ़ने की मेरी विशुद्ध भारतीय शैली में शराफत छोड़ते ही जबरदस्त इजाफा हुआ है , यह योग्यता नोटबंदी के दिनो में मेरे बहुत काम आई , मैने मन ही मन कहा भी थैंक गाड , मैने शराफत छोड़ दी .
 अब मैं अपनी बीबी का हीमैन बन चुका हूं जो उसे मोटर साइकल पर पीछे चिपकाये , तेज हार्न मारते हुये कट मारकर आगे ही आगे बढ़ता जाता है बेहिचक .शराफत का नकली चोला छोड़कर बिंदास जी रहा हूं अपनी ठेठ देशी मौलिकता के साथ ठाठ से , बिना बनावटी मुस्कान के .

आंकड़ेबाजी

व्यंग
आंकड़ेबाजी

विवेक रंजन श्रीवास्तव
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , नयागांव जबलपुर
९४२५८०६२५२
vivek1959@yahoo.co.in

        मोदी जी बोलते तो हम ना भी मानते , पर जब आंकड़े बोल रहे हैं कि देश की विकास दर नोट बंदी से कम नही हुई है तो क्या करे ,  मानना ही पड़ेगा . हम तो एक दिन स्टेशन पर अपना मोबाइल वैलेट लेकर स्टाल स्टाल पर चाय ढ़ूंढ़ रहे थे ,पर हमें चाय नसीब नहीं हुई थी , पर एक कप चाय से देश की विकास दर थोड़े ही गिरती है !
        आंकड़ा तो यह भी है कि भीम एप दुनिया का सबसे कम समय में सबसे ज्यादा डाउन लोडेड एप बन चुका है हमने भी इसे डाउन लोड कर रखा है , जाने कब कौन हमें भीम से भीमकाय राशि देने की पेशकश कर दे इस कैश लैस करेंसी के युग में . पर यह बात और है कि न तो आज तक हमने किसी को भीम से एक रुपया दिया है और न ही अब तक हमें किसी ने फूटी कौड़ी भी भीम से  देने की पेशकश ही की है .सच तो यह है कि एक बार देश के बदलते वातावरण से तादात्म्य बनाने के लिये जब पेटीएम का फुल पेज विज्ञापन देखा था तो उत्साह में अपने मोबाईल में पेटीएम पर  ५००० रु शिफ्ट कर लिये थे , जब लम्बे समय तक उनका कोई उपयोग नही हो सका तो बच्चो को दो दो हजार शिफ्ट किये , एक बार  पेटीएम से पिक्चर की टिकिट बुक की , अगले फ्री टिकिट के आफर को इग्नोर किया ,और  बेवजह ओला से थियेटर गये फिर भी एक सौ छियासठ रुपये अभी भी हमारे मोबाईल में बचे हुये हैं , अब उन्हें ठिकाने लगाकर मुक्ति पाने के लिये बिजली बिल की राह देख रहे हैं .
        बात उन दिनो की है जब अमेरिका और रूस में कोल्ड वार हुआ करता था . ओलम्पिक की किसी स्पर्धा में केवल अमेरिका और रूस के ही खिलाड़ी फाइनल में  थे . अमेरिकन बन्दा पहले नम्बर पर आया और रशियन दूसरे नम्बर पर . अब आंकड़ेबाजी की रिपोर्टिंग सुनिये , अमेरिकन रेडियो ने कहा "अमेरिकन वेयर फर्स्ट एन्ड ड़सियन वेयर लास्ट" . रशियन न्यूज ने लिखा , "रशियन वेयर स्टुड सेकेंड , व्हेयर एज अमेरिकनस वेयर लास्ट बट वन " . गलत बिल्कुल नही , शत प्रतिशत सही कहा दोनो ने बस थोड़ा सा केल दिखा दिया आंकड़े बाजी का . 
        किसी अधिकारी को अपने दो मातहत कर्मचारियो की गोपनीय चरित्रावली लिखनी थी , पहला उनका बड़ा प्रिय था उनकी ठकुरसुहाती करता था यद्यपि काम काज में ढ़ीला ढ़ाला था , जबकि दूसरा मेहनती था पर काम से काम रखता था , अफसर की हाँ में हाँ नही मिलाता था . पहले ने कुल जमा दो ही प्रोजेक्ट किये थे , और उससे पिछले साल में तो केवल एक ही प्रोजेक्ट किया था , जबकि दूसरे ने जहाँ पिछले साल दस काम किये थे , वही इस साल और मेहनत करके अपना ही रिकार्ड तोड़कर ११ काम पूरे कर डाले थे . अफसर आंकड़ेबाज था . उसने अपने चहेते की रिपोर्ट में लिखा " ही अचीव्ड १०० परसेंट ग्रोथ " , लिखना न होगा कि दूसरे बन्दे की ग्रोथ केवल १० प्रतिशत दर्ज हुई थी . तो ये मजे होते हैं आंकड़ो के खेल के . स्टेटिस्टिकल आफीसर्स यही करतब करते रहते हैं और सरकारी रिकार्डो में दुखी पीडित जनता की मुस्कराती हुई तस्वीर छपती रहती है .
        आंकड़े केवल संख्याओ के ही नही होते ,  ट्रेन के तो सारे डब्बे ही एक दूसरे से आंकड़ो से फंसे खिंचते चले जाते हैं , आंकड़ो में फंसाकर कुंए में गिरी हुई बाल्टी हमने निकाली है .राजनेता हमेशा अपने आंकड़े खुले रखते हैं जाने कब किसको साथ लेना पड़े सरकार बनाने के लिये और जाने कब किसकी पैंट खींचनी पड़े आंकड़े फंसा कर . हुक अप , हैंगआउट वगैरह तो युवाओ के बड़े उपयोगी जुमले हैं . इन दिनो युवा प्रेमी , प्रेम से पहले हुक अप संस्कार से गुजरते हैं . गूगल हैंग आउट हम सभी ने किया है . लेकिन  आंकड़े बाजी के इस आंतरिक विश्लेषण का यह मतलब कतई नही है कि मुझे देश की विकास दर पर कही से भी जरा भी संशय है . देश बढ़े , आंकड़ो में भी बढ़े और असल में भी बढ़े . खूब बढ़े .

Sunday, February 5, 2017

धन्नो , बसंती और बसंत

धन्नो , बसंती और बसंत
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर
९४२५८०६२५२

                                                    बसंत बहुत फेमस है  पुराने समय से  , बसंती भी धन्नो सहित शोले के जमाने से फेमस हो गई है  .
बसंत हर साल आता है , जस्ट आफ्टर विंटर. उधर कामदेव पुष्पो के बाण चलाते हैं और यहाँ मौसम सुहाना हो जाता है .बगीचो में फूल खिल जाते हैं . हवा में मदमस्त गंध घुल जाती है . भौंरे गुनगुनाने लगते हैं .रंगबिरंगी  तितलियां फूलो पर मंडराने लगती है . जंगल में मंगल होने लगता है . लोग बीबी बच्चो मित्रो सहित पिकनिक मनाने निकल पड़ते हैं .  बसंती के मन में उमंग जाग उठती है .उमंग तो धन्नो के मन में भी जागती ही होगी पर वह बेचारी हिनहिनाने के सिवाय और कुछ नया कर नही पाती .
                                                    कवि और साहित्यकार होने का भ्रम पाले हुये बुद्धिजीवियो में यह उमंग कुछ ज्यादा ही हिलोरें मारती पाई जाती है . वे बसंत को लेकर बड़े सेंसेटिव होते हैं . अपने अपने गुटों में सरस्वती पूजन के बहाने कवि गोष्ठी से लेकर साहित्यिक विमर्श के छोटे बड़े आयोजन कर डालते हैं . डायरी में बंद अपनी  पुरानी कविताओ  को समसामयिक रूपको से सजा कर बसंत के आगमन से १५ दिनो पहले ही उसे महसूस करते हुये परिमार्जित कर डालते हैं और छपने भेज देते हैं . यदि रचना छप गई तब तो इनका बसंत सही तरीके से आ जाता है वरना संपादक पर गुटबाजी के षडयंत्र का आरोप लगाकर स्वयं ही अपनी पीठ थपथपाकर दिलासा देना मजबूरी होती है . चित्रकार बसंत पर केंद्रित चित्र प्रदर्शनी के आयोजन करते हैं . कला और बसंत का नाता बड़ा गहरा  है .
                                                     बरसात होगी तो छाता निकाला ही जायेगा , ठंड पड़ेगी तो स्वेटर पहनना ही पड़ेगा , चुनाव का मौसम आयेगा  तो नेता वोट मांगने आयेंगे ही , परीक्षा का मौसम आयेगा  तो बिहार में नकल करवाने के ठेके होगें ही . दरअसल मौसम का हम पर असर पड़ना स्वाभाविक ही है . सारे फिल्मी गीत गवाह हैं कि बसंत के मौसम से दिल  वेलेंटाइन डे टाइप का हो ही जाता है . बजरंग दल वालो को भी हमारे युवाओ को  संस्कार सिखाने के अवसर  और पिंक ब्रिगेड को  नारी स्वात्रंय के झंडे गाड़ने के स्टेटमेंट देने के मौके मिल जाते हैं . बड़े बुजुर्गो को जमाने को कोसने और दक्षिणपंथी लेखको को नैतिक लेखन के विषय मिल जाते हैं .
                                                    मेरा दार्शनिक चिंतन धन्नो को प्रकृति के मूक प्राणियो का प्रतिनिधि मानता है , बसंती आज की युवा नारी को रिप्रजेंट करती है , जो सारे आवरण फाड़कर अपनी समस्त प्रतिभा के साथ दुनिया में  छा जाना चाहती है . आखिर इंटरनेट पर एक क्लिक पर अनावृत  होती सनी लिओने सी बसंतियां स्वेच्छा से ही तो यह सब कर रही हैं . बसंत प्रकृति पुरुष है . वह अपने इर्द गिर्द रगीनियां सजाना चाहता है , पर प्रगति की कांक्रीट से बनी गगनचुम्बी चुनौतियां , कारखानो के हूटर और धुंआ उगलती चिमनियां बसंत के इस प्रयास को रोकना चाहती है , बसंती के नारी सुलभ परिधान , नृत्य , रोमांटिक गायन को  उसकी कमजोरी माना जाता है . बसंती के कोमल हाथो में फूल नहीं कार की स्टियरिंग थमाकर , जीन्स और टाप पहनाकर उसे जो चैलेंज जमाना दे रहा है , उसके जबाब में नेचर्स एनक्लेव बिल्डिंग के आठवें माले के फ्लैट की बालकनी में लटके गमले में गेंदे के फूल के साथ सैल्फी लेती बसंती ने दे दिया है , हमारी बसंती जानती है कि  उसे बसंत और धन्नो के साथ सामंजस्य बनाते हुये कैसे बजरंग दलीय मानसिकता से जीतते हुये अपना पिंक झंडा लहराना है . 

Saturday, January 28, 2017

मिले दल मेरा तुम्हारा

मिले दल मेरा तुम्हारा

विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर
९४२५८०६२५२

मुझे कोई यह बताये कि जब हमारे नेता "घोड़े"  नहीं हैं, तो फिर उनकी हार्स ट्रेडिंग कैसे होती है ?
जनता तो चुनावो में नेताओ को गधा मानकर  "कोई नृप होय हमें का हानि चेरी छोड़ न हुई हैं रानी" वाले मनोभाव के साथ या फिर स्वयं को बड़ा बुद्धिजीवी और नेताओ से ज्यादा श्रेष्ठ मानते हुये ,मारे ढ़केले बड़े उपेक्षा भाव से अपना वोट देती आई है . ये और बात है कि चुने जाते ही , लालबत्ती और खाकी वर्दी के चलते वही नेता हमारा भाग्यविधाता बन जाता है और हम जनगण ही रह जाते हैं .  यद्यपि जन प्रतिनिधि को मिलने वाली मासिक निधि इतनी कम होती है कि लगभग हर सरकार को ध्वनिमत से अपने वेतन भत्ते बढ़वाने के बिल पास करने पड़ते हैं , पर जाने कैसे नेता जी चुने जाते  ही  बहुत अमीर बन जाते हैं . पैसे और पावर  ही शायद वह कारण हैं कि चुनावो की घोषणा के साथ ही जीत के हर संभव समीकरण पर नेता जी लोग और उनकी पार्टियां  गहन मंथन करती दिखती है .चुपके चुपके "दिल मिले न मिले ,जो मिले दल मेरा तुम्हारा तो सरकार बने हमारी " के सौदे , समझौते होने लगते हैं , चुनाव परिणामो के बाद ये ही रिश्ते हार्स ट्रेडिंग में तब्दील हो सकने की संभावनाओ से भरपूर होते हैं .
"मेरे सजना जी से आज मैने ब्रेकअप कर लिया" वाले सेलीब्रेशन के शोख अंदाज के साथ नेता जी धुर्र विरोधी पार्टी में एंट्री ले लेने की ऐसी क्षमता रखते हैं कि बेचारा रंगबदलू गिरगिटान भी शर्मा जाये . पुरानी पार्टी आर्काईव से नेताजी के पुराने भाषण जिनमें उन्होने उनकी नई पार्टी को भरपूर भला बुरा कहा होता है , तलाश कर वायरल करने में लगी रहती है . सारी शर्मो हया त्यागकर आमआदमी की भलाई के लिये उसूलो पर कुर्बान नेता नई पार्टी में अपनी कुर्सी के पायो में कीलें ठोंककर उन्हे मजबूत करने में जुटा रहता है . ऐसे आयाराम गयाराम खुद को सही साबित करने के लिये खुदा का सहारा लेने या "राम" को भी निशाने पर लेने से नही चूकते  .  जनता का सच्चा हितैषी बनने के लिये ये दिल बदल आपरेशन करते हैं और उसके लिये जनता का खून बहाने के लिये दंगे फसाद करवाने से भी नही चूकते . बाप बेटे , भाई भाई , माँ बेटे , लड़ पड़ते हैं जनता की सेवा के लिये हर रिश्ता दांव पर लगा दिया जाता है . पहले नेता का दिल बदलता है , बदलता क्या है , जिस पार्टी की जीत की संभावना ज्यादा दिखती है उस पर दिल आ जाता है . फिर उस पार्टी में जुगाड़ फिट किया जाता है .प्रापर मुद्दा ढ़ूढ़कर सही समय पर नेता अपने अनुयायियो की ताकत के साथ दल बदल कर डालता है .   वोटर का  दिल बदलने के लिये बाटल से लेकर साड़ी , कम्बल , नोट बांटने के फंडे अब पुराने हो चले हैं . जमाना हाईटेक है , अब मोबाईल , लेपटाप , स्कूटी , साईकिल बांटी जाती है . पर जीतता वो है जो सपने बांट सकने में सफल होता है . सपने अमीर बनाने के , सपने घर बसाने के , सपने भ्रष्टाचार मिटाने के . सपने दिखाने पर अभी तक चुनाव आयोग का भी कोई प्रतिबंध नही है . तो आइये सच्चे झूठे सपने दिखाईये , लुभाईये और जीत जाईये . फिर सपने सच न कर पाने की कोई न कोई विवशता तो ब्यूरोक्रेसी ढ़ूंढ़ ही देगी . और तब भी यदि आपको अगले चुनावो में दरकिनार होने का जरा भी डर लगे तो निसंकोच दिल बदल लीजीयेगा , दल बदल कर लीजीयेगा . आखिर जनता को सपने देखने के लिये एक अदद नेता तो चाहिये ही , वह अपना दिल फिर बदल लेगी आपकी कुर्बानियो और उसूलो की तारीफ करेगी और फिर से चुन लेगी आपको अपनी सेवा करने के लिये . ब्रेक अप के झटके के बाद फिर से नये प्रेमी के साथ नया सुखी संसार बस ही जायेगा . दिल बदल बनाम दलबदल ,  लोकतंत्र चलता रहेगा .

Monday, January 16, 2017

गुमशुदा पाठक की तलाश


किताबें और मेले बनाम गुमशुदा पाठक की तलाश

विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर
९४२५८०६२५२

    हमने वह जमाना भी  जिया है जब रचना करते थे , सुंदर हस्त लेख में लिखते थे , एक पता लिखा टिकिट लगा लिफाफा साथ रखते थे , कि यदि संपादक जी को रचना पसंद न आई तो " संपादक के अभिवादन व खेद सहित" रचना  वापस मिल जायेगी , कहीं और छपने के लिये भेजने को .  फिर डाक निकलने के समय से पहले चिट्ठी लाल डिब्बे में डालने जाते थे  . रचना छपने से पहले उसकी स्वीकृति आ जाती थी .  बुक स्टाल पर जाकर पत्रिका के नये अंक उलटते पलटते थे इस जिज्ञासा में कि रचना छपी ? फिर पारिश्रमिक का चैक या मनीआर्डर जिसे अपेक्षा से बहुत कम होने के चलते कई पत्रिकायें "पत्रं पुष्पं" लिखती थी आता था .   कितना मजा आता था , यह  सारी प्रक्रिया अनवरत जीवन चर्या बन गई थी . इसे हम मित्रमण्डली में लेखनसुख कहते थे . जब कोई खूब छप चुकता था , तब उसकी किताब छपने की बारी आती थी . रायल्टी के एग्रीमेंट के साथ प्रकाशक के आग्रह पर किताबें छपती थीं .  
    ईमेल ने और आरटीजीएस पेमेंट सिस्टम ने आज के लेखको को इस सुख से वंचित कर दिया है .  सिद्धांत है कि ढ़ेर सा पढ़ो , खूब सा गुनो , तब थोड़ा सा लिखो . जब ऐसा लेखन होता है तो वह शाश्वत बनता है . पर आज लिखने की जल्दी ज्यादा  है , छपने की उससे भी ज्यादा . संपादको की कसौटी से अपनी रचना गुजारना पसंद न हो तो ब्लाग , फेसबुक पोस्ट जैसे संसाधन है , सीधे कम्प्यूटर पर लिखो और एक क्लिक करते ही दुनियां भर में छप जाओ . रचना की केवल प्रशंसा ही सुननी हो और आपकी भक्त मण्डली बढ़िया हो तो व्हाट्सअप ग्रुप बना लो , आत्ममुग्ध रहो .    
     इस सारे आधुनिककरण ने डाटा बेस में भले ही हिन्दी किताबो की संख्या और पत्रिकाओ का सर्क्युलेशन बढ़ा दिया हो पर  वास्तविक पाठक कही खो गया है . लोग ठकुरसुहाती करते लगते हैं . एक दिन मेरी एक कविता अखबार के साप्ताहिक परिशिष्ट में छपी , मेरे एक मित्र मिले और उन्होने उसका उल्लेख करते हुये मुझे बधाई दी , मुझे बड़ी खुशी हुई कि आज भी अच्छी रचनाओ के पाठक मौजूद हैं , पर जैसे ही मैने उनसे रचना के कथ्य पर चर्चा की मुझे समझ आ गया कि उन्होने मेरे नाम के सिवाय रचना मे कुछ नही पढ़ा था , और वे मुझे बधाई भी इस बहाने केवल इसलिये दे रहे थे क्योकि मेरे सरकारी ओहदे के कारण उनकी कोई फाइल मेरे पास आई हुई थी . पाठको की इसी गुमशुदगी के चलते नये नये प्रयोग चल रहे हैं . कविता पोस्टर बनाकर प्रदर्शनी लगाई जा रही हैं . काव्य पटल बनाकर चौराहो पर लोकार्पित किये जा रहे हैं . किसी भी तरह पाठक को साहित्य तक खींचकर लाने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं . इन्ही प्रयासो में से एक है "पुस्तक मेला" जहाँ लेखको , पाठको और प्रकाशको का जमघट लगता है . सरकारी अनुदान से स्कूल कालेज के पुस्तकालयो के लिये किताबें खरीदी जाती हैं जिनसे आंकड़े कुछ प्रदर्शन योग्य हो जाते हैं . कुछ स्कूल अपने छात्रो को ग्रुप में और चन्द माता पिता अपने बच्चो में पठन पाठन के संस्कार डालने के लिये उन्हें इन मेलो में लेकर आते हैं . ये और बात है कि ये बच्चे किताबो के इन मेलो से किताबें कम स्टेशनरी व कम्प्यूटर के एडवन्स अधिक ले जाते हैं . 
     साहित्यिक प्रकाशको के पण्डालो पर नये लेखको का प्रकाशको और धुरंधर समीक्षको तथा सुस्थापित लेखको से साहित्यिक संपर्क हो जाता है जिसे वे आगे चलकर अपनी क्षमता के अनुरूप इनकैश कर पाते हैं . अंयत्र पूर्व विमोचित किताबो का  पुनर्विमोचन होते भी हमने इन मेलो में देखा है ,किसी भी तरह किताब को चर्चा में लाने की कोशिश होती है . लोकार्पण , प्रस्तुतिकरण , समीक्षा गोष्ठी , किताब पर चर्चा , एक कवि एक शाम , लेखक पाठक संवाद , लेखक से सीधी बात , वगैरह वगैरह वे जुमले हैं ,जो शब्दो के ये खिलाड़ी उपयोग करते हैं और आयोजन को सफल बनाने में जुटे रहते हैं . महिला कवियत्रियां विशेष अटेंशन पाती हैं , यदि उनका कंठ भी अच्छा हो तो तरंनुम में काव्यपाठ स्टाल की भीड़ बढ़ा सकता है . कोई लोकल अखबार यदि प्रकाशको से विज्ञापन जुटा पाया तो मेला विशेषांक छाप कर मुफ्त बांट देता है . मेले के दिनो में लोकल टी वी चैनल वालो को भी एक सकारात्मक काम मिल जाता है .
    दुनियां में यदि कोई वस्तु ऐसी है जिसके मूल्य निर्धारण में बाजार का जोर नही है तो वह किताब ही है . क्योकि किताब में इंटेलेक्चुएल प्रापर्टी संग्रहित होती है जो अनमोल होती है. यदि लेखक कोई बड़ा नाम वाला आदमी हो या किताब में कोई विवादास्पद विषय हो तो किताब का मूल्य लागत से कतई मेल नही खाता . या फिर यदि लेखक अपने दम पर किताबो की सरकारी खरीद करवाने में सक्षम हो तो भी किताब का मूल्य कंटेंट या किताब के गेटअप की परवाह किये बिना कुछ भी रखा जा सकता है .
    अब किताबें छपना बड़ा आसान हो गया है , ईबुक तो घर बैठे छाप लो . यदि प्रकाशक को नगद नारायण दे सकें तो किताब की दो तीन सौ प्रतियां छपकर सीधे आपके घर आ सकती हैं , जिन्हें  अपनी सुविधा से किसी बड़े किताब मेले में या पाँच सितारा होटल में डिनर के साथ विमोचित करवा कर और शाल श्रीफल मानपत्र से किसी स्थानीय संस्था के बैनर में  स्वधन से सम्मानित होकर कोई भी सहज ही लेखक बनने का सुख पा सकता है .
    आज के ऐसे साहित्यिक परिवेश में मुझे पुस्तक मेलो में मेरे गुमशुदा पाठक की तलाश है , आपको मिले तो जरूर बताइयेगा . 
    
vivek ranjan shrivastav

Saturday, January 14, 2017

चुनाव और दंगल

चुनाव और दंगल
विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर ४८२००८
९४२५८०६२५२
vivek1959@yahoo.co.in

यूं तो व्यंग लिखने के लिये विषय की तलाश अब कोई मुश्किल काम नही रहा , सुबह का अखबार पलटने की देर है , चाय पीते पीते ही बाप बेटे के दंगल , चुनावी नगाड़े , नोट बंदी की क्रियायें , भक्तो की प्रतिक्रियायें , मफलर वाले की हरकतें , पप्पू की शरारतें , या सिद्धांतो की इबारतें बुला बुला कर कहती हैं , हो जाये एक व्यंग ... संपादकीय पृष्ठ पर जगह मिलना पक्का है .लिखने के लिये मूड बना मतलब आफिस के लिये देरी हुई ,सो इन सब विषयो के व्यंग लेखो की भ्रूण हत्या कर , खुद से बचते बचाते  बाथरूम की तरफ भागो भी कि नौकरी पर जाना है समय पर , तो मोबाइल की घंटी बड़े प्यार से बुला लेती है , मोबाइल खोलने का मतलब होता है व्यंग के लिये विषय वर्षा .  व्हाट्सअप मैसेज की बाढ़ बताती है कि हम कितने लोकप्रिय हैं . गुड मार्निंग के संदेशो के साथ सुंदर चित्र , जिंदगी जीने की कला सिखाते संदेशे , अपनी व्यंग दृष्टि कहती है लिख सकते हो . शाश्वत व्यंग लिख सकते हो .
इस सबसे भी बचो तो पत्नी जो मेरी सबसे बड़ी व्यंग प्रेरणा है ,नख शिख व्यंग लिखने का आव्हान करती नजर आती है . फिर भी मै धृष्ट नही लिखता , सोचता हूं कि पिछली चार व्यंग की किताबें लिखकर ही भला क्या और किसको सुधार लिया ? लेकिन आज अपने भाई अनूप शुकल जी की जुगल बंदी वाली पोस्ट ने कुछ नया सा अहसास दिलाया और मैने तय किया कि चुनाव और दंगल पर तो अपन भी लिखेंगे .
भारत में चुनाव किसी दंगल के पर्याय ही हैं . ऐसा दंगल जिसमें  दो ही नही कई कई पहलवान एक साथ एक ही अखाड़े में कूद पड़ते हैं ,रेफरी होता है मेरा रामभरोसे !
रामभरोसे को नही जानते आप , वही मुआ अदना आदमी जिसे वोट देने का अधिकार मिल जाता है १८ का होते ही . जो केवल वोट देकर जिता सकता है , चार चुकन्दरो में से किसी एक को . जीतने से पहले  सभी रामभरोसे से  तरह तरह के वादे करते हैं और जीतते ही उसी से दंगल खेलने लगते हैं . रामभरोसे हर बार चुनाव में बलिष्ठ से बलिष्ठ पहलवानो को अपने जजमेंट से चित्त कर चुका है . दुनिया उसके जजमेंट का लोहा मानती है . और यह भी शाश्वत तथ्य बन चुका है कि चुनावों के बाद जो दंगल मचता है , रामभरोसे और जीतने वाले के बीच उसमें बार बार लगातार , राभरोसे खुद को ठगा ठगा सा महसूस करता है . वह मन ही मन तय करता है कि अगले चुनाव आने दो ऐसा जजमेंट दूंगा कि उसे ठगने वाले को पटखनी पर पटखनी खानी पड़ेगी . क्रम अनवरत है . दुनिया इसे लोकतंत्र की ताकत जैसे बेहतरीन शब्दो से नवाजती है .
एनीवे , देश में एक बार फिर से मिनी आम चुनावों का माहौल है . छोटे बड़े कई राज्यो के जोधा रामभरोसे के अखाड़े में हरी , नीली , भगवा लंगोटें पहन पहन कर जाने के लिये तैयारियां करते दिख रहे हैं . किसी की साइकिल के परखच्चे खुल गये हैं तो किसी की झंडी लहरा रही है .कोई परेशान है कि दंगल की तैयारियो के लिये जो विटामिन एम बूंद बूंद कर जोड़ा गया था , वह पूरा का पूरा फिंकवा दिया है सरकार ने . नये नये गंठजोड़ बन रहे हैं , पहलवान एक दूसरे को दांव पेंच सिखाने के समझौते कर रहे हैं .  फिर भी  सब आत्म मुग्ध हैं , सबको भरोसा है कि रामभरोसे का फैसला इस बार बस उसके ही पक्ष में होगा .सब चीख चीख कर बता रहे हैं कि  अगर वो जीत गया तो रामभरोसे के सारे दुख दर्द खतम हो जायेंगे . 
रामभरोसे अच्छी तरह समझ चुका है कि "कोई नृप होये हमें का हानि , चेरी छोड़ न हुइहैं रानी"  . वह भी मजे ले रहा है . अखबारों को मसाला मिल रहा है , न्यूज चैनल्स को टी आर पी . आगे आगे देखिये होता है क्या ? देश आदर्श चुनाव संहिता के साथ जी रहा है . रामभरोसे कनफ्यूज्ड है वह सोच रहा है कि जब इन दिनो बिना नेता के अधिकार के भी सरकार चल सकती है , वह भी आदर्श के साथ तो फिर भला इस अखाड़े की जरूरत ही क्या है ?
ज्योतिषी अपनी अपनी भविष्य वाणियां कर रहे हैं , परिणामो के सर्वे चल रहे हैं . पर शाश्वत सत्य  है और इसमें कतई कोई व्यंग नहीं है कि  जीतने के लिये अखाड़े में खुद उतरना होता है , मेहनत करनी पड़ती है . तभी गीता फोगाट को स्वर्ण मिलता है , दंगल बाक्स आफिस पर हिट होती है या  रामभरोसे का भरोसा जीता जा सकता है . राम भरोसे को खुद भी किसी जीतने वाले पहलवान से कोई बड़ी उम्मीद नही रखनी चाहिये उसे राम के भरोसे बने रहने से बेहतर खुद अपने बल बूते पर अपना अखाड़ा जीतने के लिये संघर्ष करना ही होगा .