Tuesday, January 6, 2015

मेरे पड़ोसी के कुत्ते

व्यंग
मेरे पड़ोसी के कुत्ते

विवेक रंजन श्रीवास्तव
Public Relation Officer , MPPKVVCo
ओ बी ११ . विद्युत मण्डल कालोनी
रामपुर , जबलपुर
मो ९४२५८०६२५२

        मेरे पड़ोसी को कुत्ते पालने का बड़ा शौक है . उसने अपने फार्म हाउस में तरह तरह के कुत्ते पाल रखे हैं . कुछ पामेरियन हैं , कुछ उंचे पूरे हांटर हैं कुछ दुमकटे डाबरमैन है , तो कुछ जंगली शिकारी खुंखार कुत्ते हैं .पामेरियन   केवल भौंकने का काम करते हैं , वे पड़ोसी के पूरे घर में सरे आम घूमते रहते हैं  . पड़ोसी उन्हें पुचकारता , दुलारता रहता है . ये पामेरियन अपने आस पास के लोगो पर जोर शोर से भौकने का काम करते रहते हैं ,  और अपने मास्टर माइंड से साथी खुंखार कुत्तो को आस पास के घरो में भेज कर कुत्तापन फैलाने के प्लान बनाते हैं .
        पड़ोसी के कुछ कुत्ते बहुत खूंखार किस्म के हैं , उन्हें अपने कुत्ते धर्म पर बड़ा गर्व है , वे समझते हैं कि इस दुनिया में सबको बस कुत्ता ही होना चाहिये . वे बाकी सबको काट खाना जाना चाहते हैं .और इसे धार्मिक काम मानते हैं .  ये कुत्ते योजना बनाकर जगह जगह बेवजह हमले करते हैं .इस हद तक कि  कभी कभी स्वयं अपनी जान भी गंवा बैठते हैं . वे बच्चो तक को काटने से भी नही हिचकते . औरतो पर भी ये बेधड़क जानलेवा हमले करते हैं . वे पड़ोसी के  फार्म हाउस से निकलकर आस पास के घरो में चोरी छिपे घुस जाते हैं और निर्दोष पड़ोसियो को केवल इसलिये काट खाते हैं क्योकि वे उनकी प्रजाति के नहीं हैं . मेरा पड़ोसी इन कुत्तो की परवरिश पर बहुत सारा खर्च करता है , वह इन्हें पालने के लिये  बड़े लोगो से उधार लेने तक से नही हिचकिचाता . घरवालो के रहन सहन  में कटौती करके भी वह इन खुंखार कुत्तो के दांत और नाखून पैने  करता रहता है . पर पड़ोसी ने इन कुत्तो के लिये कभी जंजीर नही खरीदी . ये कुत्ते खुले आम भौकने काटने निर्दोष लोगो को दौड़ाने के लिये उसने स्वतंत्र छोड़ रखे हैं . पड़ोसी के चौकीदार उसके इन खुंखार कुत्तो की विभिन्न टोलियो के लिये तमाम इंतजाम में लगे रहते हैं , उनके रहने खाने सुरक्षा के इंतजाम और इन कुत्तो को दूसरो से बचाने के इंतजाम भी ये चौकीदार ही करते हैं . इन कुत्तो के असाधारण खर्च जुटाने के लिये पड़ोसी हर नैतिक अनैतिक तरीके से धन कमाने से बाज नही आता .इसके लिये पड़ोसी चुपके से  वह ड्रग्स तक का धंधा करने लगा है . जब भी ये कुत्ते लोगों  पर चोरी छिपे खतरनाक हमले करते हैं तो पड़ोसी चिल्ला चिल्लाकर सारे शहर में उनका बचाव करता घूमता है , वह यहां  तक कह डालता है  कि ये कुत्ते तो उसके हैं ही नहीं . पड़ोसी कहता है कि वह खूंखार कुत्ते पालता ही नहीं है . लेकिन सारा शहर जानता है कि ये कुत्ते रहते पड़ोसी के ही फार्म हाउस में ही हैं . ये कुत्ते दूसरे देशो के देशी कुत्तो को अपने गुटो में शामिल करने के लिये उन्हें कुत्तेपन का हवाला देकर बरगलाते रहते हैं .
        जब कभी शहर में कही भले लोगो का कोई जमावड़ा होता है , पार्टी होती है तो पड़ोसी के तरह तरह के कुत्तो की चर्चा होती है . लोग इन कुत्तो पर प्रतिबंध लगाने की बातें करते हैं . लोगो के समूह , अलग अलग क्लब मेरे पड़ोसी को समझाने के हरसंभव यत्न कर चुके हैं , पर पड़ोसी है कि मानता ही नहीं . इन कुत्तो से अपने और सबके बचाव के लिये शहर के हर घर को ढ़ेर सी व्यवस्था ढ़ेर सा खर्च व्यर्थ ही करना पड़ रहा है . घरो की सीमाओ पर कंटीले तार लगवाने पड़ रहे हैं , कुत्तो की सांकेतिक भाषा समझने के लिये इंटरसेप्टर लगवाने पड़े हैं . अपने खुफिया तंत्र को बढ़ाना पड़ा है , जिससे कुत्तो के हमलो के प्लान पहले ही पता किये जा सकें . और यदि ये कुत्ते हमला कर ही दें तो बचाव के उपायो की माक ड्रिल तक हर घर में लोग करने पर विवश हैं . इस सब पर इतने खर्च हो रहे हैं कि लोगो के बजट बिगड़ रहे हैं . हर कोई सहमा हुआ है जाने कब किस जगह किस स्कूल , किस कालेज , किस मंदिर,  किस गिरजाघर,  किस माल , किस हवाईअड्डे , किस रेल्वेस्टेशन , किस बाजार में ये कुत्ते किस तरह से हमला कर दें ! कोई नही जानता . क्योकि सारी सभ्यता , जीवन बीमा की सारी योजनायें जिस एक मात्र सिद्धांत पर टिकी हुई हैं कि हर कोई जीना चाहता है , कोई मरना नही चाहता उस मूल मानवीय मंत्र को ही इन्होने किनारे कर दिया है . इनका इतना ब्रेन वाश किया गया है कि अपने कुत्तेपन के लिये ये मरने को तैयार रहते हैं . इस पराकाष्ठा से निजात कैसे पाई जावे यह सोचने में सारे बुद्धिजीवी , सब लगे हुये हैं . टीवी चैनलो पर इस मुद्े पर बहसे हो रही हैं .
        हाल ही इन कटखने कुत्तो ने पड़ोसी के खुद के ही स्कूल के बच्चो को काट खाया . फिर क्या था पड़ोसी के घर में कोहराम मच गया . पड़ोसी जो अब तक अच्छे कुत्ते बुरे कुत्ते वगैरह के राग अलापता रहता था अचानक ही सारे कुत्तो को बुरा कहने लगा . मैने भी सोचा चलो अब शायद पड़ोसी को समझ आवे कि खूंखार कुत्ते पालना ठीक नही , शायद अब पड़ोसी की नीति में बदलाव हो . शायद अब वह हमारी परेशानी भी समझे , कि उसके कुत्ते पालने से हमें और सारे शहर के सभ्य लोगो को कितनी कठिनाई हो रही है . शायद अब पड़ोसी हमें वे पामेरियन मास्टर माइंड सौंप दे जिन्होने हमारे घर में हमले करवाये थे . पर नही दूसरे ही दिन पड़ोसी ने एक उस कुत्ते को जेल से पंजड़े से छोड़ दिया जो हमारा गुनहगार है .
        अब शायद लोगो को ही समझ लेना चाहिये कि पड़ोसी कुत्तो के सामने कहि न कही बेहद मजबूर है , और वह उन्हें जंजीर नही पहना सकता . अब शहर के लोगो को ही सामूहिक तरीके से कुत्ते पकड़ने वाली वैन लगाकर मानवता के इन दुश्मन कुत्तो को पिंजड़े में बंद कर डालना होगा तभी सुरक्षा पर किया जाने वाला बेतहाशा खर्च रोका जा सकता है , और उसे गरीब लोगो के विकास में खर्च किया जा सकेगा . मैं दुआ करता हूं कि जल्दी से जल्दी सबको यह समझ आ जावे , कि कुत्ते की दुम टेढ़ी ही रहती है , उसे सीधा करने के सारे यत्न फिर फिर असफल ही होंगे .

Tuesday, March 4, 2014

लो फिर लग गई आचार संहिता

व्यंग
लो फिर लग गई आचार संहिता
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म प्र ४८२००८
मो ९४२५४८४४५२


        लो फिर लग गई आचार संहिता . अब महीने दो महीने सारे सरकारी काम काज  नियम कायदे से  होंगें . पूरी छान बीन के बाद . नेताओ की सिफारिश नही चलेगी . वही होगा जो कानून बोलता है , जो होना चाहिये  . अब प्रशासन की तूती बोलेगी .  जब तक आचार संहिता लगी रहेगी  सरकारी तंत्र , लोकतंत्र पर भारी पड़ेगा .बाबू साहबों  के पास लोगो के जरूरी  काम काज टालने के लिये आचार संहिता लगे होने का  आदर्श बहाना होगा  . सरकार की उपलब्धियो के गुणगान करते विज्ञापन और विज्ञप्तियां समाचारों में नही दिखेंगी . अखबारो से सरकारी निविदाओ  के विज्ञापन गायब हो जायेंगे . सरकारी कार्यालय सामान्य कामकाज छोड़कर चुनाव की व्यवस्था में लग जायेंगे .
          मंत्री जी का निरंकुश मंत्रित्व और राजनीतिज्ञो के छर्रो का बेलगाम प्रभुत्व आचार संहिता के नियमो उपनियमो और उपनियमो की कंडिकाओ की भाषा  में उलझा रहेगा . प्रशासन के प्रोटोकाल अधिकारी और पोलिस की सायरन बजाती मंत्री जी की एस्कार्टिंग करती और फालोअप में लगी गाड़ियो को थोड़ा आराम मिलेगा .  मन मसोसते रह जायेंगे लोकशाही के मसीहे , लाल बत्तियो की गाड़ियां खड़ी रह जायेंगी .  शिलान्यास और उद्घाटनों पर विराम लग जायेगा . सरकारी डाक बंगले में रुकने , खाना खाने पर मंत्री जी तक बिल भरेंगे . मंत्री जी अपने भाषणो में विपक्ष को कितना भी कोस लें पर लोक लुभावन घोषणायें नही कर सकेंगे .
        सरकारी कर्मचारी लोकशाही के पंचवर्षीय चुनावी त्यौहार की तैयारियो में व्यस्त हो जायेंगे . कर्मचारियो की छुट्टियां रद्द हो जायेंगी .वोट कैंपेन चलाये जायेंगे .  चुनाव प्रशिक्षण की क्लासेज लगेंगी .चुनावी कार्यो से बचने के लिये प्रभावशाली कर्मचारी जुगाड़ लगाते नजर आयेंगे .देश के अंतिम नागरिक को भी मतदान करने की सुविधा जुटाने की पूरी व्यवस्था प्रशासन करेगा .  रामभरोसे जो इस देश का अंतिम नागरिक है , उसके वोट को कोई अनैतिक तरीको से प्रभावित न कर सके , इसके पूरे इंतजाम किये जायेंगे . इसके लिये तकनीक का भी भरपूर उपयोग किया जायेगा , वीडियो कैमरे लिये निरीक्षण दल चुनावी रैलियो की रिकार्डिग करते नजर आयेंगे . अखबारो से चुनावी विज्ञापनो और खबरो की कतरनें काट कर  पेड न्यूज के एंगिल से उनकी समीक्षा की जायेगी राजनैतिक पार्टियो और चुनावी उम्मीदवारो के खर्च का हिसाब किताब रखा जायेगा . पोलिस दल शहर में आती जाती गाड़ियो की चैकिंग करेगा कि कहीं हथियार , शराब , काला धन तो चुनावो को प्रभावित करने के लिये नही लाया ले जाया रहा है .मतलब सब कुछ चुस्त दुरुस्त नजर आयेगा . ढ़ील बरतने वाले कर्मचारी पर प्रशासन की गाज गिरेगी . उच्चाधिकारी पर्यवेक्षक बन कर दौरे करेंगे .सर्वेक्षण  रिपोर्ट देंगे . चुनाव आयोग तटस्थ चुनाव संपन्न करवा सकने के हर संभव यत्न में निरत रहेगा . आचार संहिता के प्रभावो की यह छोटी सी झलक है .
         केजरीवाल जी को उनके लक्ष्य के लिये हम आदर्श आचार संहिता का नुस्खा बताना चाहते हैं . व्यर्थ में राहुल , मोदी , या अंबानी सबको कोसने की अपेक्षा उन्हें यह मांग करनी चाहिये कि देश में सदा आचार संहिता ही लगी रहे , अपने आप सब कुछ वैसा ही चलेगा जैसा वे चाहते हैं .  प्रशासन मुस्तैद रहेगा और मंत्री महत्वहीन रहेंगें तो भ्रष्टाचार नही होगा .  बेवजह के निर्माण कार्य नही होंगे तो अधिकारी कर्मचारियो को  रिश्वत का प्रश्न ही नही रहेगा . आम लोगो का क्या है उनके काम तो किसी तरह चलते  ही रहते हैं धीरे धीरे , केजरीवाल मुख्यमंत्री थे तब भी और जब नही हैं तब भी , लोग जी ही रहे हैं . मुफ्त पानी मिले ना मिले , बिजली का पूरा बिल देना पड़े या आधा , आम आदमी किसी तरह एडजस्ट करके जी ही लेता है , यही उसकी विशेषता है .
        कोई आम आदमी को विकास के सपने दिखाता है , कोई यह बताता है कि पिछले दस सालो में कितने एयरपोर्ट बनाये गये और कितने एटीएम लगाये गये हैं . कोई यह गिनाता है कि उन्ही दस सालो में कितने बड़े बड़े भ्रष्टाचार हुये , या मंहगाई कितनी बढ़ी है . पर आम आदमी जानता है कि यह सब कुछ , उससे उसका वोट पाने के लिये अलापा जा रहा राग है .  आम आदमी  ही लगान देता रहा है , राजाओ के समय से . अब वही आम व्यक्ति ही तरह तरह के टैक्स  दे रहा है , इनकम टैक्स , सर्विस टैक्स , प्रोफेशनल टैक्स ,और जाने क्या क्या , प्रत्यक्ष कर , अप्रत्यक्ष कर . जो ये टैक्स चुराने का दुस्साहस कर पा रहा है वही अंबानी बन पा रहा है .
         जो आम आदमी को सपने दिखा पाने में सफल होता है वही शासक बन पाता है . परिवर्तन का सपना , विकास का सपना , घर का सपना , नौकरी का सपना , भांति भांति के सपनो के पैकेज राजनैतिक दलो के घोषणा पत्रो में आदर्श आचार संहिता के बावजूद भी  चिकने कागज पर रंगीन अक्षरो में सचित्र छप ही रहे हैं और बंट भी रहे हैं . हर कोई खुद को आम आदमी के ज्यादा से ज्यादा पास दिखाने के प्रयत्न में है . कोई खुद को चाय वाला बता रहा है तो कोई किसी गरीब की झोपड़ी में जाकर रात बिता रहा है , कोई स्वयं को पार्टी के रूप में ही आम आदमी  रजिस्टर्ड करवा रहा है . पिछले चुनावो के रिकार्डो आधार पर कहा जा सकता है कि आदर्श आचार संहिता का परिपालन होते हुये , भारी मात्रा में पोलिस बल व अर्ध सैनिक बलो की तैनाती के साथ  इन समवेत प्रयासो से दो तीन चरणो में चुनाव तथाकथित रूप से शांति पूर्ण ढ़ंग से सुसंम्पन्न हो ही जायेंगे . विश्व में भारतीय लोकतंत्र एक बार फिर से सबसे बड़ी डेमोक्रेसी के रूप में स्थापित हो  जायेगा . कोई भी सरकार बने अपनी तो बस एक ही मांग है कि शासन प्रशासन की चुस्ती केवल आदर्श आचार संहिता के समय भर न हो बल्कि हमेशा ही आदर्श स्थापित किये जावे , मंत्री जी केवल आदर्श आचार संहिता के समय डाक बंगले के बिल न देवें हमेशा ही देते रहें . राजनैतिक प्रश्रय से ३ के १३ बनाने की प्रवृत्ति  पर विराम लगे ,वोट के लिये धर्म और जाति के कंधे न लिये जावें , और आम जनता और  लोकतंत्र इतना सशक्त हो की इसकी रक्षा के लिये पोलिस बल की और आचार संहिता की आवश्यकता ही न हो .

Tuesday, April 24, 2012

सैक्स स्कैंडल में भी हम दुनिया से पीछे नही रहे , थैंक्स टु मनु

हमारा देश भी प्रगति पथ पर है , मनु सिंघवी स्कैंडल ने हमें अमेरिका और इंगलेंड के समकक्ष ला खड़ा किया है . वो दिन गये जब बिल क्लिंतन के सैक्स स्कैंडल दुनियां में चर्चे में थे . जिस तरह हम अग्नि ५ के जरिये दुनिया के खास देशो में शामिल हो गये हैं , ठीक उसी तरह अब हमारी चर्चा राजनैतिक सैक्स स्कैंडल मामलो में अमेरिका जैसे देशो के समक्ष कम नही है . थैंक्स टु अवर बिलव्ड मनु . पाश्चात्य देशो में नये नये प्रयोग हो रहे हैं , कोई टमाटर मसलने का कीर्तिमान बना रहा है तो कोई बर्फ पर कलाकारी करने का ,आये दिन कुछ न कुछ नया हो रहा है कीर्तिमान बनाने के लिये लोग जान की बाजी लगा रहे हैं . लिम्का ने तो सालाना बुक आफ रिकार्डस की किताब ही छापनी शुरू कर दी है . हमारे देश में पुरस्कारो के नामो के लिये हम अपने अतीत पर गर्व करते हुये पुरातन प्रतीको को अपना ब्रांड आइकान बनाते रहे हैं , निशानेबाजी के लिये एकलव्य पुरुस्कार ,खेलो के लिये अर्जुन पुरुस्कार ,वीरता के लिये महाराणा प्रताप पुरुस्कार , सामाजिक कार्यों के लिये बाबा साहेब अंबेडकर आदि आदि के नाम पर गौरव पूर्ण पुरस्कारो की स्थापना हमने कर रखी है . हमारे एक प्रदेश के ८६ वर्षीय बुजुर्ग महामहिम जी पर केंद्रित , पता नहीं , असल या नकल शयन शैया पर निर्मित फिल्म का प्रसारण एक टी वी चैनल पर हुआ है , जरूरत हो चली है कि वात्सायन पुरस्कारो की स्थापना हो .वानप्रस्थ की परम्परा और जरावस्था को चुनौती देते कथित प्रकरण से कई बुजुर्गो को नई उर्जा मिलेगी ,प्राचीन समय से हमारे ॠषि मुनी और आज भी वैज्ञानिक चिर युवा बने रहने की जिस खोज में लगे रहे हैं , उसी दिशा में यह एक कदम है . महर्षि वात्सायन ने जिस कामसूत्र की रचना की है , उसका सारा विश्व सदा से दीवाना रहा है .खजुराहो के विश्व विख्यात मंदिर वात्सायन के कामसूत्र को अद्वितीय मूर्तिकला के रूप में प्रदर्शित करते हैं . पाश्चात्य चिंतक फ्रायड के सिद्धांत के अनुसार भी दुनिया के हर कार्य में प्रत्यक्ष या परोक्ष , आधारभूत रूप से सैक्स ही होता है. . अर्थात हमें यह समझ लेने की जरूरत है कि सैक्स की जिस धारणा को जिसे छुपा छुपा कर हम बेवजह परेशान हैं , को गर्व से उजागर करने की आवश्यकता है . अब समय आ गया है कि यौन कुंठाओ का अंत हो . विधान सभा या संसद में मोबाइल पर वर्जित फिल्में देखने के प्रकरण हों या मनुसिंघवी की सीडी के नजारे हो , राजनेताओ , साधु साध्वियो के कथित सैक्स स्कैंडल हो या फिल्म अभिनेताओ के कास्टिंग काउच चर्चे हो बेवजह दूसरो की व्यक्तिगत जिंदगी में खुफिया कैमरे लगाकर एम एम एस बनाने की अपेक्षा मीडिया को फ्रंटपेज स्कैंडल , ब्रेकिंग न्यूज के लिये कुछ बेहतर दूसरी वजहें तलाशनी चाहिये. यह समय कीर्तीमानो का है . तरह तरह के कीर्तिमान बनाये जा रहे हैं , उनका लेखा जोखा रखा जा रहा है .तरह तरह के सम्मान , पुरुस्कार स्थापित हो रहे हैं ,सम्मान पाकर लोग गौरवांवित हो रहे हैं . . पहले का समय और था ,पुरस्कार देकर देने वाले गौरवान्वित होते थे अब पुरुस्कारों के लिये जुगाड़ किये जा रहे हैं , जिन्हें सीधे तरीको से पुरस्कार नही मिल पाते , वे अपने लिये नई कैटेगिरी ही बनवा लेते हैं .खेलकूद में ढ़ेरो पुरुस्कार हैं , प्रतियोगितायें हैं . साहित्य में , लेखन में कविता , कहानी , व्यंग में , पुस्तको के लिये भी कई कई पुरुस्कार हैं , जिन्हें खुद कभी कोई पुरस्कार नही मिला वे भी किसी की स्मृति में चंदा वंदा करके कोई पुरुस्कार या सम्मान समारोह आयोजित करने लगते हैं और एक विज्ञप्ति निकालते ही उनके साथ भी , सम्मान की चाहत रखने वालो की भीड़ जुटने लगती है . इंटरनेट पर वैसे ही सब कुछ केवल एक क्लिक पर सर्व सुलभ है . सैक्स टायज का बाजार करोड़ो में पहुंच रहा है .वियाग्रा , व अन्य कथित सैक्सवर्धक जड़ी बूटियों , दवाओ की विश्वव्यापी मांग है . फिल्मों में लम्बे किस सीन , निर्वस्त्र हीरोइन पुरानी बातें हो चली हैं . अब लासवेगास में लम्बे चुम्बन को लेकर प्रतियोगितायें हो रही हैं ,एक ही व्यक्ति कितनी लड़कियों से लगातार एक के बाद एक चुम्बन ले सकता ये कीर्तिमान बनाये जा रहे हैं . हमारे ही देश में वैश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा देने की मांग उठ रही है . अब सही समय है कि वात्सायन पुरस्कारो की स्थापना हो .इससे पहले कि विदेशी बाजी मार लें , सैक्सोलाजिस्ट वात्सायन पुरस्कारो की स्थापना , प्रतियोगिता के स्वरूप आदि को लेकर खुली चर्चा करे और महर्षि वात्सासयन के देश में विभिन्न कैटेगरीज में वात्सायन पुरस्कारो की स्थापना की जावे . जिससे जब किसी छिपे कैमरे से किसी कमरे की छुपी तस्वीरें बाहर आ जावें तो किसी योग्य नेता को त्यागपत्र न देना पड़े , वरन उसे वात्सायन पुरस्कारो की समुचित श्रेणि से सम्मानित कर हम गौरवांवित हो सकें . विवेक रंजन श्रीवास्तव

Saturday, November 12, 2011

श्रीमद्भगवत गीता का भी श्लोकशः पद्यानुवाद

श्रीमद्भगवत गीता विश्व का अप्रतिम ग्रंथ है !
धार्मिक भावना के साथ साथ दिशा दर्शन हेतु सदैव पठनीय है !
जीवन दर्शन का मैनेजमेंट सिखाती है ! पर संस्कृत में है !
हममें से कितने ही हैं जो गीता पढ़ना समझना तो चाहते हैं पर संस्कृत नहीं जानते !
मेरे ८४ वर्षीय पूज्य पिता प्रो सी बी श्रीवास्तव विदग्ध जी संस्कृत व हिन्दी के विद्वान तो हैं ही , बहुत ही अच्छे कवि भी हैं , उन्होने महाकवि कालिदास कृत मेघदूत तथा रघुवंश के श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद किये , वे अनुवाद बहुत सराहे गये हैं . हाल ही उन्होने श्रीमद्भगवत गीता का भी श्लोकशः पद्यानुवाद पूर्ण किया . जिसे वे भगवान की कृपा ही मानते हैं .
उनका यह महान कार्य http://vikasprakashan.blogspot.com/ पर सुलभ है . रसास्वादन करें . व अपने अभिमत से सूचित करें . कृति को पुस्तकाकार प्रकाशित करवाना चाहता हूं जिससे इस पद्यानुवाद का हिन्दी जानने वाले किन्तु संस्कृत न समझने वाले पाठक अधिकतम सदुपयोग कर सकें . नई पीढ़ी तक गीता उसी काव्यगत व भावगत आनन्द के साथ पहुंच सके .
प्रसन्नता होगी यदि इस लिंक का विस्तार आपके वेब पन्ने पर भी करेंगे . यदि कोई प्रकाशक जो कृति को छापना चाहें , इसे देखें तो संपर्क करें ..०९४२५८०६२५२, विवेक रंजन श्रीवास्तव

Friday, May 20, 2011

क्या स्वतंत्र भारत के माननीय न्यायलयो को अपनी महीने महीने भर की छुट्टियो पर पुनर्विचार नही करना चाहिये ...

लाखो मुकदमें पेंडिग हैं और माननीय न्यायालय बच्चो के स्कूल की छुट्टियो की तरह एक महीने की गर्मियो की छुट्टियां मना रहे हैं ...
अंग्रेजो के समय की बात और थी अब तो ए सी की सुविधा हैं जज साहब ....
क्या स्वतंत्र भारत के माननीय न्यायलयो को अपनी महीने महीने भर की छुट्टियो पर पुनर्विचार नही करना चाहिये ...
क्या सुप्रिम कोर्ट मेरी इस खुली जनहित याचिका पर कोई डाइरेक्टिव जारी करेगा !

Friday, April 8, 2011

केवल इस जीत से भ्रष्टाचार समाप्त नही हो जावेगा ..

अन्ना की जीत रामभरोसे की जीत है ... जानते हैं न आप रामभरोसे को .. मेरे देश का अंतिम नागरिक !
लेकिन केवल इस जीत से भ्रष्टाचार समाप्त नही हो जावेगा ...उसके लिये आम आदमी के चारित्रिक उत्थान के लिये भी ऐसे ही अभियान की जरूरत है ....

Monday, December 13, 2010

ब्राण्डेड-वर-वधू

व्यंग
ब्राण्डेड-वर-वधू
विवेक रंजन श्रीवास्तव

हर लड़की अपने उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ घर-वर देखकर शादी करती
है, पर जल्दी ही, वह कहने लगती हैं- तुमसे शादी करके तो मेरी किस्मत ही
फूट गई है। या फिर तुमने आज तक मुझे दिया ही क्या है। इसी तरह प्रत्येक
पति को अपनी पत्नी `सुमुखी` से जल्दी ही सूरजमुखी लगने लगती है। लड़के के
घर वालों को तो बारात के वापस लौटते-लौटते ही अपने ठगे जाने का अहसास
होने लगता है। जबकि आज के इण्टरनेटी युग में पत्र-पत्रिकाओं,
रिश्तेदारों, इण्टरनेट तक में अपने कमाऊ बेटे का पर्याप्त विज्ञापन करने
के बाद जो श्रेष्ठतम लड़की, अधिकतम दहेज के साथ मिल रही होती हैं, वहीं
रिश्ता किया गया होता हैं यह असंतोष तरह तरह प्रगट होता है । कहीं बहू
जला दी जाती हैं, कहीं आत्महत्या करने को विवश कर दी जाती हैं पराकाष्ठा
की ये स्थितियां तो उनसे कहीं बेहतर ही हैं, जिनमें लड़की पर तरह तरह के
लांछन लगाकर, उसे तिल तिल होम होने पर मजबूर किया जाता हैं।

नवयुगल फिल्मों के हीरो-हीरोइन से उत्श्रंखल हो पायें इससे बहुत पहले ननद, सास
की एंट्री हो जाती है। स्टोरी ट्रेजिक बन जाती है और विवाह जो बड़े उत्साह
से दो अनजान लोगों के प्रेम का बंधन और दो परिवारों के मिलन का संस्कार हैं,
एक ट्रेजडी बन कर रह जाता है। घुटन के साथ, एक समझौते के रूप में समाज के
दबाव में मृत्युपर्यन्त यह ढ़ोया जाता है। ऊपरी तौर पर सुसंपन्न, खुशहाल
दिखने वाले ढेरो दम्पत्ति अलग अलग अपने दिल पर हाथ रख कर स्वमूल्यांकन
करें, तो पायेंगे कि विवाह को लेकर अगर-मगर, एक टीस कहीं न कहीं हर किसी
के दिल में हैं।
यहां आकर मेरा व्यंग्य लेख भी व्यंग्य से ज्यादा एक सीरियस निबंध बनता जा रहा है। मेरे व्यंग्यकार मन में विवाह की इस समस्याका समाधान ढूंढने का यत्न किया । मैंने पाया कि यदि दामाद को दसवां ग्रह
मानने वाले इस समाज में, यदि वर-वधू की मार्केटिंग सुधारी जावें, तो
स्थिति सुधर सकती है। विवाह से पहले दोनों पक्ष ये सुनिश्चित कर लेवें कि
उन्हें इससे बेहतर और कोई रिश्ता उपलब्ध नहीं है। वधू की कुण्डली लड़के के
साथसाथ भावी सासू मां से भी मिलवा ली जावे। वर यह तय कर ले कि जिदंगी भर ससुर को
चूसने वाले पिस्सू बनने की अपेक्षा पुत्रवत्, परिवार का सदस्य बनने में ही
दामाद का बड़प्पन हैं, तो वैवाहिक संबंध मधुर स्वरूप ले सकते है।

अब जब वर वधू की एक्सलेरेटेड मार्केटिंग की बात आती है तो मेरा प्रस्ताव
है ब्राण्डेड वर, वधू सुलभ कराने की। यूं तो शादी डॉट कॉम जैसी कई
अंर्तराष्ट्रीय वेबसाइट सामने आई हैं। माधुरी दीक्षित जी ने तो एक
चैनल पर बाकायदा एक सीरियल ही शादी करवाने को लेकर चला
रखा था। अनेक सामाजिक एवं जातिगत संस्थाये सामूहिक विवाह जैसे आयोजन कर ही
रही हैं। लगभग प्रत्येक अखबार, पत्रिकायें वैवाहिक विज्ञापन दे रहें है,
पर मेरा सुझाव कुछ हटकर है। यूं तो गहने, हीरे, मोती सदियों
से हमारे आकर्षण का केन्द्र रहे हैं, पर हमारे समय में जब से ब्राण्डेड
`हीरा है सदा के लिये´ आया हैं, एक गारण्टी हैं, शुद्धता की। रिटर्न
वैल्यू है। रिलायबिलिटी है। आई एस ओ प्रमाण पत्र का जमाना है
साहब। खाने की वस्तु खरीदनी हो तो हम चीज नहीं एगमार्क देखने के आदि हैं
पैकेजिंग की डेट, और एक्सपायरी अवधि, कीमत सब कुछ प्रिंटेड पढ़कर हम , कुछ
भी सुंदर पैकेट में खरीदकर खुश होने की क्षमता रखते है। अब आई एस आई
के भारतीय मार्के से हमारा मन नहीं भरता हम ग्लौबलाईजेषन के इस युग में
आई एस ओ प्रमाण पत्र की उपलब्धि देखते है। और तो और स्कूलों को
आई एस ओ प्रमाण पत्र मिलता है, यानि सरकारी स्कूल में दो दूनी चार
हो, इसकी कोई गारण्टी नहीं है, पर यदि आई एस ओ प्रमाणित स्कूल में
यदि दो दूनी छ: पढ़ा दिया गया, तो कम से कम हम कोर्ट केस करके मुआवजा तो पा ही सकते हैं

हाल ही एक समाचार पढ़ा कि अमुक ट्रेन को आई एस ओ प्रमाण पत्र मिला
है। मुझे उस ट्रेन में दिल्ली तक सफर करने का अवसर मिला, पर मेरी कल्पना
के विपरीत ट्रेन का शौचालय यथावत था जहां विशेष तरह की चित्रकारी के द्वारा यौन शिक्षा के सारे पाठ पढ़ाये गये थे , मैं सब कुछ समझ गया। खैर विषयातिरेक न हो, इसलिये पुन: ब्राण्डेड वर वधू पर आते हैं-! आशय यह है कि ब्राण्डेड खरीदी से हममें एक कान्फीडेंस रहता है। शादी एक अहम मसला
है। लोग विवाह में करोड़ो खर्च कर देते है। कोई हवा में विवाह रचाता है,
तो कोई समुद्र में। हाल ही भोपाल में एक जोड़े ने ट्रेकिंग करते हुए पहाड़
पर विवाह के फेरे लिये, एक चैनल ने बकायदा इसे लाइव दिखाया। विवाह आयोजन में लोग जीवन भर की कमाई खर्च कर देते हैं , उधार लेकर भी बड़ि शान शौकत से बहू लाते हैं , विवाह के प्रति यह क्रेज देखते हुये मेरा अनुमान है कि ब्राण्डेड वर वधू अवश्य ही सफलतापूर्वक मार्केट
किये जा सकेगें। ब्राण्डेड बनाने वाली मल्टीनेशनल कंपनी सफल विवाह की
कोचिंग देगी। मेडिकल परीक्षण करेगी। खून की जांच होगी। वधुओं को सासों से
निपटने के गुर सिखायेगी।लड़कियो को विवाह से पहले खाना बनाने से लेकर सिलाई कढ़ाई बुनाई आदि ललित कलाओ का प्रशिक्षण दिया जावेगा .
भावी पति को बच्चे खिलाने से लेकर खाना बनाने तक
के तरीके बतायेगी, जिससे पत्नी इन गुणों के आधार पर पति को ब्लेकमेल न कर
सके। विवाह का बीमा होगा।
इसी तरह के छोटे-बड़े कई प्रयोग हमारे एम बी ए पढ़े लड़के ब्राण्डेड दूल्हे-दुल्हन पर लेबल लगाने से पहले कर सकते है। कहीं ऐसा न हो कि दुल्हन के साथ साली फ्री का लुभावना आफर ही
कोई व्यवसायिक प्रतियोगी कम्पनी प्रस्तुत कर दें। अस्तु! मैं इंतजार में
हूं कि सुदंर गिफ्ट पैक में लेबल लगे, आई एस ओ प्रमाणित
दूल्हे-दुल्हन मिलने लगेंगे, और हम प्रसन्नता पूर्वक उनकी खरीदी करेगें, विवाह
एक सुखमय, चिर स्थाई प्यार का बंधन बना रहेगा। सात जन्म का साथ निभाने की
कामना के साथ, पत्नी हीं नहीं, पति भी हरतालिका व्रत रखेगें।

विवेकरंजन श्रीवास्तव