Wednesday, January 7, 2026

फैशन बनाम फ्रीडम

 व्यंग्य 

फैशन बनाम फ्रीडम 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से



स्त्री विमर्श की आड़ में नया बौद्धिक फैशन चला है , “कपड़ों में खराबी नहीं, तुम्हारी नज़र में खराबी है!” सुनने में यह वाक्य बड़ा आधुनिक और आत्मनिर्भर लगता है, पर असल में यह एक ऐसा नारा है, जो सोच की बहस को एक ही दिशा में मोड़ देता है। सवाल यह नहीं कि कौन क्या पहनता है ? सवाल यह है कि सोच किसकी बदलनी चाहिए, देखने वाले की या दिखाने वाले की?  

पहले भी लोग कपड़े पहनते थे, आज भी पहनते हैं। फर्क बस इतना है कि तब वस्त्र देह को ढंकने के लिए होते थे, अब फैशनेबल वस्त्र चर्चा में रहने के साधन बना लिए गए हैं ।

 चाणक्य ने वासना को सबसे बड़ा नशा कहा था। आज वही नशा “बॉडी पॉजिटिविटी” के नाम से सभ्यता की थाली में परोसा जा रहा है। 

 “हम क्या पहनेंगे, यह हम तय करेंगे।” बिल्कुल ठीक है! पर यह भी उतना ही सच है कि “दूसरे हमें कैसे देखेंगे, यह भी वे ही तय करेंगे।” दोनों अर्ध सत्य हैं, पर मिलकर एक पूरा सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य बनाते हैं । सम्मान मांगने से नहीं, व्यवहार से अर्जित होता है। समस्या कपड़ों की नहीं, उस विचार की है जो कपड़ों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा रहा है।

 “आधुनिकता” की परिभाषा कुछ ऐसी हो गई है कि जितना कम कपड़ा, उतनी ज़्यादा प्रगति। तो क्या जंगलों में रहने वाले साधन हीन आदिवासी सबसे आधुनिक थे ? अगर सभ्यता का पैमाना वस्त्रों की लंबाई है, तो यह पैमाना तो काफ़ी गड़बड़ा गया लगता है।  

 फैशन जगत “स्वतंत्रता” बेचता है और समाज उसे “प्रगतिशीलता” के दाम पर खरीद लेता है। स्त्री देह का नैसर्गिक सौंदर्य विज्ञापन की भेंट चढ़ रहा है। अब वस्तु से अधिक उसका प्रमोशन महत्वपूर्ण बना दिया गया है। इंस्टाग्राम पर फोटो को विचार समझ लिया गया है, और सोच को ‘लाइक’ के पैमाने पर नापा जाता है। सब तरफ एक ही आवाज़ “सोच बदलो!” मगर सवाल वही पुराना “किसकी सोच?”  


कभी हमारे यहाँ लाज, मर्यादा, शालीनता को नारी का आभूषण कहा गया था। आज ब्रांडेड कपड़े उस आभूषण के प्रतिस्पर्धी बन बैठे हैं। पहले माँ अपनी बेटी से कहती थी “बेटी, ऐसा पहन जो तुझे शोभा दे।” अब बेटी कहती है “माँ, ऐसा पहन जो ट्रेंड में हो।” फर्क वक्त का नहीं, दृष्टि का है।  


फैशन के विरोध में कोई नहीं किन्तु विसंगति उस सोच से है जहाँ “दिखने” का अर्थ “होने” से बड़ा हो गया है। वस्त्र तभी खूबसूरत लगते हैं जब वे व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाते हैं, उसे वस्तु में नहीं बदलते । संस्कृति और सभ्यता को कपड़ों से नहीं, सोच से जाना जाता है।  


आधुनिकता को त्याग नहीं, चयन बनाइए। न दृष्टि को दूषित करें, न अभिव्यक्ति को अशोभन। वस्त्र सौंदर्य का प्रतीक रहें, संस्कार का विकल्प नहीं, फैशन की आज़ादी बुरा विचार नहीं, पर सोच की गुलामी बुरी ज़रूर है।  

कपड़े बदलिए जितना चाहे , पर सोच ऐसी रखिए जो सभ्यता न उतारे, उसे शालीनता से धारण करे।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

पहचाना?

 पहचाना आप ने ? 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


पहचाना आप ने ? ...

, अरे कैसी बात करते हैं, आप भी! संकोच में ऐसा कह चुकने के बाद , वे बातों बातों में वह सूत्र ढूंढते हैं कि किसी तरह मिलने वाले का नाम याद आ जाए ? दरअसल, 

नाम आदमी की पहचान है, पर याददाश्त के साथ उसका रिश्ता हमेशा लुका-छुपी का ही रहा है। चेहरा तो लोग पहचान लेते हैं, पर नाम जैसे हमारी स्मृति से सबसे पहले पलायन कर जाता है। किसी को फोन करना हो तो याद ही नहीं आता कि बंदे का नंबर किस नाम से सेव किया था । 

एक विवेक ढूंढो तो तीन निकल आते हैं, इसलिए रिफरेंस या शहर का नाम साथ लिखना पड़ता है।

किसी पार्टी या सभा में मिलते समय नाम स्मरण की यह समस्या सबसे अधिक होती है। सामने वाला मुस्कराते हुए "कैसे हैं आप" कहता है और हम भी उतनी ही आत्मीयता से "अरे आप!" कह देते हैं। इस "आप" के पीछे कितनी मजबूरी और कितना अपराध बोध छुपा होता है, यह वही समझ सकता है जिसने मिलने वाले का नाम दिमाग की हार्ड डिस्क से डिलीट कर ‘रीसायकल बिन’ में पहुंचा दिया होता है। और रिसाइकिल बिन क्लीन कर दी होती है। दिमाग को सारे खाए हुए बादाम की कसम देते रहो पर नाम याद ही नहीं आते, तब सभ्यता के नाते दिमाग से काम लेना पड़ता है , और पहचानने की एक्टिंग करनी पड़ती है।


शशि कपूर साहब ने इस विसंगति का हल खोज निकाला था। वे मिलते ही सामने वाले से कहते, "हाय, आई एम शशि कपूर।" सामने वाला भी शिष्टाचार निभाने के चक्कर में अपना परिचय दे देता। यह फार्मूला कलाकारों और सेलिब्रिटीज के लिए तो ठीक है, पर अगर मोहल्ले का गजोधर प्रसाद या हरिप्रसाद यही तरीका अपनाए तो सामने वाला शक करने लगेगा कि कहीं यह बीमा बेचने वाला एजेंट तो नहीं।


कुछ लोग इस समस्या को छिपाने के लिए ऐसे रचनात्मक वाक्य गढ़ते हैं कि सुनकर हंसी भी आए और दया भी। जैसे कोई कहे "भाई साहब, आप तो बिल्कुल नहीं बदले!" अब सामने वाला सोचता है कि मैं पचास साल से यही हूँ, बदली तो तुम्हारी याददाश्त है। या फिर लोग बचने के लिए रिश्तों का सहारा लेते हैं "भाभी जी", "भाई साहब", "चाचा जी"। यही तो भारतीय संस्कृति का अद्भुत चमत्कार है। जब नाम याद न आए तो रिश्ते का लेबल चिपका दो, सामने वाला खुद ही नाम बता देगा।


हमारे एक अंकल ने इस समस्या को सीधे ईमानदारी से हल किया। वे मिलते ही कहते, "बेटा, याददाश्त कमजोर हो चुकी है, बातें करने से पहले नाम और पता बता दीजिए।" अब उनकी इस सादगी में न दिखावा है, न शिष्टाचार का जाल। सामने वाला झट से नाम बता देता है, जैसे परीक्षा हॉल में अपना एडमिशन कार्ड दिखा रहा हो।


नाम भूलने की समस्या अक्सर हास्यास्पद हालात पैदा कर देती है। शादी ब्याह में रिश्तेदार एक-दूसरे से टकराते हैं, पर नाम भूलने का अपराधबोध दोनों ओर इतना गहरा होता है कि बातचीत का सारांश यही रह जाता है "अरे आप!" और "जी, वही!" 

ऑफिस पार्टियों में तो यह विसंगति और भी दिलचस्प हो जाती है। कोई पूरे आत्मविश्वास से पांच मिनट तक बतियाता रहता है और फिर पूछ बैठता है "वैसे आपने मेरा नाम तो नहीं भुलाया?" तब तक नाम सचमुच स्मृति की फाइलों से प्रसंगवश रिकवर हो गया तो हम पूरे आत्मीय भाव से मुस्कराते हुए कहते हैं , अरे फलां जी कैसी बात करते हैं आप भी ।

वरना बाद में सिर खुजाते मिलने वाले का नाम स्मृति पटल पर खोजना होता है। 

सच यह है कि नाम भूलना कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है, यह भीड़ में घुल जाने की कला है। हम रोज़ इतने चेहरों से मिलते हैं कि दिमाग भी कभी-कभी ‘सिस्टम हैंग’ कर देता है। और तब "अरे आप" या "भाई साहब" जैसे संबोधन जीवनरक्षक ऐप साबित होते हैं।


अब समय आ गया है कि सरकार आधार कार्ड में एक नया फीचर जोड़ दे। जैसे ही हम किसी से मिलें, दोनों के मोबाइल पास लाते ही ब्लूटूथ से स्क्रीन पर स्वयं ही नाम चमक उठे। पर तब तक हमें अंकल की ही ईमानदार शैली अपनानी होगी कहना होगा "ओ मिलने वाले, जरा अपना नाम तो बता।" क्योंकि बिना नाम का संदर्भ समझे बातचीत करना वैसा ही है जैसे अंधेरे में रेडियो सुनना । आवाज तो आती है, मज़ा भी आता है, लेकिन यह समझ ही नहीं पड़ता कि प्रसारण किस स्टेशन से चल रहा है।

मैं एक सज्जन के यहां, रात्रि भोज पर निमंत्रित था , भोजन कर आया । उनकी पत्नी से यह पहली भेंट थी । सभ्यता से भाभी जी की ओर बहुत ध्यान से देखा भी नहीं । अगले दिन जब बाजार में जब एक महिला मेरी ओर देख कर मुस्करा रही थी, तो मुझे समझ ही नहीं आया कि यह क्या और क्यों हो रहा है । मुझे अजनबी सा देखते पा कर देवी जी बोली , अरे खाना खाकर भी आपने पहचाना नही , झेंपने के सिवा क्या कर सकता था मैं । दरअसल महिलाएं हेयर स्टाइल बदल दें, या देसी परिधान की जगह पाश्चात्य ड्रेस पहन लें तो उन्हें पहचानना मेरे लिए वैसे भी कठिन हो जाता है । सच तो यह है कि एक नग अपनी पत्नी के मूड तक को भी अब तक कभी पहचान नहीं पाया! 

खैर आप ही बताइए , किस को कितना पहचाना आप ने? आभासी दुनिया के ढेरों मित्र बड़े मिले मिले से लगते हैं, पर आसपास के कई लोग भी बहुत अनजाने होते हैं।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 भोपाल

Tuesday, January 6, 2026

नंबर वन का 'अमृत' और नरक का ड्रेनेज

 व्यंग्य

नंबर वन का 'अमृत' और नरक का ड्रेनेज


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


इंदौर में इन दिनों गजब का द्वंद्व चल रहा है। एक तरफ आसमान से टपकती स्वच्छता की 'नंबर वन' की ट्राफियां हैं और दूसरी तरफ जमीन फाड़कर निकलता 'भागीरथपुरा' का सच। सूचना मिली है कि प्रशासन ने अपनी चिर-परिचित फुर्ती दिखाते हुए कुछ अधिकारियों का 'स्थानांतरण' कर दिया है। वाह! क्या गजब का इलाज है। जैसे किसी का अपेंडिक्स फट गया हो और डॉक्टर उसका बिस्तर बदल दे। साहब यहाँ से वहाँ हुए नहीं कि सिस्टम का पाप धुल गया! सुना है नए साहब के आते ही पुरानी पाइप लाइन ने शर्म के मारे जहर उगलना बंद कर दिया है।


भागीरथपुरा, नाम कितना पवित्र है। महाराज भगीरथ ने गंगा लाने के लिए अंगूठे पर खड़े होकर तपस्या की थी ताकि पूर्वजों को तार सकें, पर हमारे आधुनिक भगीरथों (इंजीनियरों) ने पाइपलाइन बिछाते समय ऐसी 'तपस्या' की कि अमृत योजना की नली को सीधे ड्रेनेज की नाली से 'कनेक्ट' कर दिया। अब पुरखे तरें न तरें, मोहल्ले वाले सीधे इस लोक को छोड़  मोक्ष की यात्रा पर निकल पड़े। यह सरकारी मोक्ष ही है, बस फर्क इतना है कि यह यमराज द्वारा नहीं, बल्कि नगर निगम द्वारा 'स्पॉन्सर्ड' है।

इस पूरी त्रासदी के पीछे जो 'महान कलाकार' छिपा है, वह है, सरकारी ठेकेदार। यह वह प्रजाति है जो लोहे के पाइप को कागज की तरह मोड़ सकती है और कंक्रीट में इतनी रेत मिला सकती है कि रेगिस्तान को भी शर्म आ जाए। ठेकेदार साहब का गणित एकदम स्पष्ट है, "ऊपर की सड़क ऐसी बनाओ कि मुख्यमंत्री का काफिला निकले तो झटका न लगे, और नीचे पाइप ऐसा डालो कि अगली बारिश तक गायब हो जाए।" टेंडर की मलाई और कमीशन के खेल में पाइपलाइन की मोटाई इतनी कम रह गई कि सीवेज के कीड़ों ने उसे 'डोरस्टेप डिलीवरी' का रास्ता समझ लिया। ठेकेदार के लिए 'अमृत' का मतलब वह 'प्रसाद' है जो उसे फाइल पास होने के बाद मिलता है, जनता का गला सूखे या सड़े, इससे उसके बैंक बैलेंस का 'फ्लो' नहीं रुकता।

शहर का चेहरा तो इतना चमकीला है कि आप अपनी शक्ल डिवाइडर पर देख लें। दीवारों पर नाचते मोर हैं, स्वच्छता के गान गाती गाड़ियाँ हैं और हर खंभे पर मुस्कराते नेताओं के पोस्टर हैं। पर इस चमक-धमक के नीचे शहर क्या 'पाल' रहा है, यह तब पता चलता है जब अस्पताल के बेड कम पड़ जाते हैं। यहाँ मोहल्ला राजनीति का भी अपना स्वैग है। "हमारे भाईसाहब" का वोट बैंक बना रहे, इसलिए पाइपलाइन चाहे गटर के भीतर से निकले या शौचालय के नीचे से, बस 'नल' चलना चाहिए। पार्षद जी को चिंता इस बात की नहीं थी कि पानी में बैक्टीरिया हैं, उन्हें चिंता इस बात की थी कि उद्घाटन के पत्थर पर उनका नाम बड़ा है या नहीं। चुनावी गणित में 'शुद्ध पेयजल' से ज्यादा जरूरी 'मुफ्त का टैंकर' होता है, ताकि संकट के समय मसीहा बना जा सके।

जब जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँचा, तो नेताओं ने अपना अचूक ब्रह्मास्त्र निकाला, 'स्थानांतरण'। कलेक्टर साहब हटा दिए गए, कमिश्नर साहब विदा कर दिए गए। जनता दुख भूल कर फटाफट खुश हो गई! उसे लगा  कि 'न्याय' हो गया। अरे भाई, साहब तो बदल गए, पर वह सड़ा हुआ सिस्टम और वह लीकेज वाली पाइपलाइन तो वहीं है जो पिछले दस सालों से ड्रेनेज को चूम रही है। यह तो वही बात हुई कि इंजन खराब है और आप बार-बार ड्राइवर बदल रहे हैं। राजनेता जानते हैं कि पब्लिक की याददाश्त और पानी का स्वाद, दोनों बहुत जल्दी बदल जाते हैं।

रही बात समाधान की, तो हुजूर! समाधान किसी फाइल या तबादले में नहीं, बल्कि इस 'स्मार्ट' चश्मे को उतारने में है। जल्दी ही मजबूर जनता जीने के लिए अपने घरों में यूरेका के असरदार वाटर फिल्टर खुद लगा ही लेगी । तब तक बिसलेरी की बोतलों से नहाने का सौभाग्य मिलेगा । 

पर यह कौन बताए कि असली 'अमृत' जल तब बरसेगा जब ड्रेनेज और पेयजल की लाइनों के बीच की दूरी कम से कम उतनी कर दी जाएगी जितनी एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच नेता और जनता की होती है। बेहतर होगा कि अगली बार 'स्मार्ट सिटी' का तमगा देने से पहले दीवारों के पेंट की जगह पाइपों के 'प्रेसर' की जाँच की जाए। समाधान तो यह भी है कि जिस ठेकेदार और इंजीनियर ने यह महान 'जुगलबंदी' की है, उन्हें तब तक उसी मोहल्ले का पानी पिलाया जाए जब तक वे खुद न मान लें कि अमृत योजना में 'विष' का मिश्रण सरकारी गाइडलाइन का हिस्सा नहीं है। बड़े अधिकारियों के तबादलों के इस सर्कस को बंद कर अगर 'जवाबदेही' को भी 'नंबर वन' बना दिया जाए, तो शायद किसी और भगीरथ को अपने मोहल्ले के पुरखों को तारने के लिए श्मशान न जाना पड़े। वरना याद रखिए, इतिहास केवल आपके रंगे-पुते डिवाइडर याद नहीं रखेगा, वह उन पाइपों के बारे में भी लिखेगा जिन्होंने शहर की साख को गटर में बहा दिया। आज इंदौर कल कोई दूसरा शहर लीकेज का माइलेज अखबार की इबारत बनता रहने से रोकना है तो तकनीकी प्रोजेक्ट्स को राजनीति से दूर करना होगा । 


विवेक रंजन श्रीवास्तव