व्यंग्य
फैशन बनाम फ्रीडम
विवेक रंजन श्रीवास्तव
न्यूयॉर्क से
स्त्री विमर्श की आड़ में नया बौद्धिक फैशन चला है , “कपड़ों में खराबी नहीं, तुम्हारी नज़र में खराबी है!” सुनने में यह वाक्य बड़ा आधुनिक और आत्मनिर्भर लगता है, पर असल में यह एक ऐसा नारा है, जो सोच की बहस को एक ही दिशा में मोड़ देता है। सवाल यह नहीं कि कौन क्या पहनता है ? सवाल यह है कि सोच किसकी बदलनी चाहिए, देखने वाले की या दिखाने वाले की?
पहले भी लोग कपड़े पहनते थे, आज भी पहनते हैं। फर्क बस इतना है कि तब वस्त्र देह को ढंकने के लिए होते थे, अब फैशनेबल वस्त्र चर्चा में रहने के साधन बना लिए गए हैं ।
चाणक्य ने वासना को सबसे बड़ा नशा कहा था। आज वही नशा “बॉडी पॉजिटिविटी” के नाम से सभ्यता की थाली में परोसा जा रहा है।
“हम क्या पहनेंगे, यह हम तय करेंगे।” बिल्कुल ठीक है! पर यह भी उतना ही सच है कि “दूसरे हमें कैसे देखेंगे, यह भी वे ही तय करेंगे।” दोनों अर्ध सत्य हैं, पर मिलकर एक पूरा सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य बनाते हैं । सम्मान मांगने से नहीं, व्यवहार से अर्जित होता है। समस्या कपड़ों की नहीं, उस विचार की है जो कपड़ों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा रहा है।
“आधुनिकता” की परिभाषा कुछ ऐसी हो गई है कि जितना कम कपड़ा, उतनी ज़्यादा प्रगति। तो क्या जंगलों में रहने वाले साधन हीन आदिवासी सबसे आधुनिक थे ? अगर सभ्यता का पैमाना वस्त्रों की लंबाई है, तो यह पैमाना तो काफ़ी गड़बड़ा गया लगता है।
फैशन जगत “स्वतंत्रता” बेचता है और समाज उसे “प्रगतिशीलता” के दाम पर खरीद लेता है। स्त्री देह का नैसर्गिक सौंदर्य विज्ञापन की भेंट चढ़ रहा है। अब वस्तु से अधिक उसका प्रमोशन महत्वपूर्ण बना दिया गया है। इंस्टाग्राम पर फोटो को विचार समझ लिया गया है, और सोच को ‘लाइक’ के पैमाने पर नापा जाता है। सब तरफ एक ही आवाज़ “सोच बदलो!” मगर सवाल वही पुराना “किसकी सोच?”
कभी हमारे यहाँ लाज, मर्यादा, शालीनता को नारी का आभूषण कहा गया था। आज ब्रांडेड कपड़े उस आभूषण के प्रतिस्पर्धी बन बैठे हैं। पहले माँ अपनी बेटी से कहती थी “बेटी, ऐसा पहन जो तुझे शोभा दे।” अब बेटी कहती है “माँ, ऐसा पहन जो ट्रेंड में हो।” फर्क वक्त का नहीं, दृष्टि का है।
फैशन के विरोध में कोई नहीं किन्तु विसंगति उस सोच से है जहाँ “दिखने” का अर्थ “होने” से बड़ा हो गया है। वस्त्र तभी खूबसूरत लगते हैं जब वे व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाते हैं, उसे वस्तु में नहीं बदलते । संस्कृति और सभ्यता को कपड़ों से नहीं, सोच से जाना जाता है।
आधुनिकता को त्याग नहीं, चयन बनाइए। न दृष्टि को दूषित करें, न अभिव्यक्ति को अशोभन। वस्त्र सौंदर्य का प्रतीक रहें, संस्कार का विकल्प नहीं, फैशन की आज़ादी बुरा विचार नहीं, पर सोच की गुलामी बुरी ज़रूर है।
कपड़े बदलिए जितना चाहे , पर सोच ऐसी रखिए जो सभ्यता न उतारे, उसे शालीनता से धारण करे।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
न्यूयॉर्क से